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Dr Manoj Upreti Book Adran Sween Kyap-Kayp 'अद्‌राण स्वैंण' और 'क्याप-क्याप

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, January 20, 2012, 01:46:05 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


Dosto,

We are sharing here information about Dr Manoj Upreti Ji Book 'अद्‌राण स्वैंण' और 'क्याप-क्याप which has been written in kumoani language. Here is review of about his book which has been done by  Anil Karki <anilsingh.karki@gmail.com>.

M S Mehta
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From: Anil Karki <anilsingh.karki@gmail.com>


मनोज उप्रेती -हमारे समय का कुमाऊँनी कवि

'अनिल कुमार कार्की

द्याोध छात्र हिंदी

डी०एस०बी०परिसर नैनीताल देर से ही भले इस बात का एहसास होने लगा है कि, कुमाऊँनी कविता करवट ले रही है इस बीच मनोज उप्रेती की कविताओं के दो संकलन प्रकाद्गिात हुए 'अद्‌राण स्वैंण' और 'क्याप-क्याप' । फिलहाल पुस्तक  'क्याप-क्याप' को लेकर कुछ बाँतें। मनोज उप्रेती पहाड़ों से निकल रही वह मौन दहाड  है, जिसमें पहाड ी नदी का वेग है, जिसके एक  छोर पर हिमालय तो दूसरे छोर पर मैदान है। नये भाव बोध और बदलते प्रतिमानों, उपमानों, समाजिक  राजनीतिक दबावों को व्यक्त करने के लिए कुमाऊँनी कविता को जिस तेवर की जरूरत थी उसका परिमार्जित स्वर मनोज उप्रेती की कविताओं में देखने को मिला पहली बार कुमाऊँनी कविता का यह नया  सौन्दर्य देखकर एहसास हुआ कि लोकभाच्चा के आदिम तत्वों के बीच समकालीन परिवेद्गा की गूंज को भरा जा सकता है। हो सकता है कि उनका प्रवासी कवि के रूप मे मूल्यांकन किया जाय पर यह गलत  होगा। मैं हमेद्गाा मानता हूँ कि कविता जटिल मानवीय भावों की सरल अभिव्यक्ति है, चाहे वह लोक गायकों की भाच्चा हो या हो सकता है कि  उनका प्रवासी कवि के रूप मे मूल्यांकन किया जाय पर यह गलत होगा। मैं हमेद्गाा मानता हूँ कि कविता जटिल मानवीय भावों की सरल अभिव्यक्ति है, चाहे वह लोक गायकों की भाच्चा हो या पड़े-लिखे लोगों की भाच्चा लोक और देद्गा की सीमाओं में नहीं बांधी जा सकती है।

कुमाऊँनी साहित्य के मूल्यांकन के पैमाने भले ही कुछ भी हों यह आचार्य एंव हिन्दी विभागों की जिम्मेदारी है पर जनता और धूर-जंगलों मे कान पर अंगुली डाले घस्यारिनों और ग्वालों को क्या पसंद है, किस कविता में उनके जीवन तत्व हैं, ये वे तय करगें, इधर पहाड  अब झोड ा,चांचरी का या ढोल-नगाड ो का पहाड  नहीं रहा आधुनिकता और उत्तर-आधुनिक, नव-साम्राज्यवाद , उत्तर आधुनिक समाजद्गाास्त्रीय सिद्धान्तों का असर उस पर भी वैसे ही पड ा है जैसे देद्गा-दुनिया पर बाँधों से बधे वर्तमान परिस्थितियों का असर क्या यहाँ की भाच्चाओं, संवेदनाओं में नहीं पड ा है? क्या परम्परागत त्यौहारों के स्वरूप नहीं बदले है? क्या गाँव से नगरों(अल्मोड ा, हल्द्वानी ,बागेद्गवर, पिथौरागढ , चम्पावत, रामनगर)के तरफ लोग खास कर फौजी परिवार नहीं सरक रहे है? पहाड ों का यह नगरीकरण एक अलग किस्म के सौन्दर्यद्याास्त्र की माँग कर रहा है, युवा और बेरोजगार कितने भाई हल जोत रहे है?

कोई नहीं। एम०ए०, बी०ए० पढ़े-लिखे नौजवान पहाड ी युवाओं में जो वर्तमान समय के दबाव है, विसंगति, विडम्बना और तनाव है,वह एक दम अलग नहीं है, देद्गा दुनिया के युवाओं की तरह ही है। जिस संस्कृति पर नाज  किये जाने का आग्रह अक्सर कविताओं में आज तक देखने को मिल रहा था कुछ राजनैकि विचारों और नयी चेतना के कवियों को छोड कर,अधिकतर कविताओं में संवेदना के नाम पर एक अजीब उदासीपन, नास्टेलेजियापन था, या फिर विरह में विलखते पहाड ों की नारी का विरहालाप था, जिससे पहाड के स्त्री-पुरूच्च संबधों में परपीड क बनाम स्वपीड क (मासोईज्म और द्यौडोईज्म) की गंध थी। क्या अब वो परिस्थियाँ हैं? और अगर है भी तो हमें उसको नकारते हुए पोखर के मेढकी टर्रटराहट से बाहर निकल कर नयी चुनौतीयों को स्वीकार करते हुए समय के खिलाफ लामबद्व होना ही होगा। सामाजिक परिवर्तनों को भी अगर नयी पीड ी अपना रही है तो उसमें क्या हर्ज इसमें पहाड  विमुखता या प्रवासीपन का आरोप या फिर संस्कृति के खत्म होने की घोच्चणाएं कितनी जायज है? और वैसे भी संस्कृति का संस्कृत होना भाच्चाओं का मरना और प्रगतिद्गाीलता का गला घोंटना होता है। नयी पीड ी के रचनात्मक लोग इस बात को समझ रहें हैं। और यही सही दिद्गाा है। क्या हमारी महिलाएं गोठ प्रवास या फिर अछूतपन से मुक्त होने की अधिकारी नहीं है? क्या हम चाहते है कि वह  अब भी हमारी माँओं की तरह वो भी जंगल जाए और ऊँचे टीलों पर चढ़कर अपने सैनिक पति के याद में गीत गायें? नहीं अगर आज के जीवन से और कविता से यह आद्गाा की जाय तो मुझे लगता है कि साहित्य को भी रूढ  हो जाना चाहिए। आज कौन सा ऐसा व्यक्ति है जो प्रवासी नहीं है। क्या प्रवासी वह अपनी मर्जी

से है? अस्सी के बाद तेजी से जो बदलाव हुए हैं उनकी तह तक जाना होगा खड न्चे और भूमिया देवताओं के मन्दिरों का सौन्दर्यीकरण करने में खर्च विधायक निधियाँ क्या इसकी जिम्मेदार नहीं? क्या सरकारों का मेले त्यौहारों का आयोजक होकर उनके उद्‌घाटन में फीता काटना संस्कृति का संरक्षण है? जिन लोक गायकों पर नाज करते हुए बुद्धजीवी कभी नहीं अघाते क्या वह भी जिन्दा हैं? दरवाजों की देहरी पर बैठा वह लोक गायक अब आधुनिक मानव के मुक्ति का प्रतीक है। अपनी ढोल की थाप पर तथाकथित बामनों और ठाकुरों के इच्च्ट को ताल-बेताल नचा देने वाला वह आदमी अब कहाँ गायब है और क्यों है? इसकी क्या वजहें हैं?, क्यों कविता में लय नहीं है? क्यों बाण के मन्दिरों में मुर्गी काटने वाला और सैम के मन्दिर का भौकर बनाने वाला दिल्ली में एडिदास का जूता, बिस्कुट, गाड़ी के पुर्जें या फिर गार्ड के कपड े पहने चमचमाते भवनों के गेट पर खड ा है। यह द्योखर जोद्गाी के दाज्यू का वेटर नहीं, यह पहाड ी रूढ  परंपराओं से विद्रोह करने वाला तपका है। वेटर होते हुए भी अब तुम्हें दाज्यू नहीं कहेगा और तुम उस भनमजुएं से दाज्यु सुनने को तरद्गाते रहोगे। नई पीड ी पर पहाड  विमुख होने का घटिया आरोप लगाते रहोगे। खैर अब इस आरोप को मनोज उप्रेती ने पूरी तरह खारिज कर दिया है। हो सकता है कि कुछ रसवादी आचार्यों के गले उनकी संद्गालिच्च्ट यथार्थ, विचार और फंतासी से भरी कविताएं न उतरे, पर बेइज्जत होना ही रचनात्मकता और गतिद्गाीलता की पहली द्यार्त है। यह सब तो करना ही पड ेगा अब कविता के लिए आलोचना और सौन्दर्य द्याास्त्र की जरूरत है, न की आलोचना के लिए कविता की।  मनोज उप्रेती ने जिन सूक्ष्म संवेदनाओं को औजार की तरह इस्तेमाल किया है, कविता की पकड  के साथ-साथ अनुभूति की प्रामाणिकता और भोगे हुए यथार्थ के साथ- साथ संवेदनात्मक ज्ञान और ज्ञानात्मक संवेदना का ऑथेंटिक चित्र है, जिसमें समकालीन भारतीय साहित्य के साथ चलने की क्षमता है। इसमें कोई संदेह नहीं, कविता को  मनोज उप्रेती ने जिस तरह अभिजात और तुक्कों के सरदारीपन से मुक्त करके आम आदमी के मनोरंजन के स्तर पर नहीं, चेतना के स्तर पर प्रहार किया है। वह पहाड़ पर हो रही कविताओं के प्रति आद्गाा की नज र देखने को प्रेरित करता है।  उनकी कविता आज के त्रासदी, कुठां और उकताहट व मोहभंग से भरे आमजन का औजार है, उनके द्याब्दों में जो धार है, वह बखिया नहीं उधेड ती बल्कि सत्ता की दीवार तोड ती हुई जन युद्ध का ऐलान करती है। इसलिए  मनोज उप्रेती  बेझिझक नई संवेदनाओं का कवि है।



एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Poem -

पैं उठो
दियो टुक्याव
यल डान बटी
पल डान तलै
एक बटियो
ठाड़ है जाओ
उठै लियो नाँगर निद्गााण
उन लिजी
जो छिनण री हमार हक
 
मनोज उप्रेती जन चेतना एंव राजनीतिक वैचारिक दृच्च्िटकोण के कवि हैं उनमें कोरी भावुकता नहीं है और न कविता में बयानबाजी, वो पहाड ी जनमानस के प्रतिनिधि कवि के रूप में आम जन के अन्तर्विराधों को मुखर करते हैं-
गुस्स के पावण सीख रौ हमूल
ज्वाला मुखी जस द्याान्त रूण
सीख रौ हमूल
आन्दोलन में कूँदण नीं भूलाय हमूँल।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

सर्वहारा वर्ग के प्रति सहानुभूति और सत्ताओं की मीठी बयानबाजी में छिपे निहित वर्गीय उद्‌देद्गयों को वह जनकवि नागार्जुन , गोरख, फ़ैज, पाद्गा , रघुवीर, धूमिल की तरह किसी भी राजनैतिक हलचल की तह में उतरकर उसका पर्दाफाद्गा करते हैं। उम्मीद के दीपक को जलाने और सूर्य के प्रकाद्गा पर सन्देह करने में भी  नहीं हिचकते।

सूर्ज के कामक
जो नि दिखाओ बाट
गगगगगगगगगगगगगग
उ ह वैर
नानू- नान दी भल
जो भर दी उज्याव
अन्यार अमूसी रातों में,
या फिर सत्ता के ठेकेदारों पर तीखा कटाक्ष करते हुए लिखते हैं-
काग जों क इतर हाल
गरीब, अभाव, भूख
भान मासणी नानतिन
फाटी भिदाड
टालों पर टाल
चिर पड ी ल्वै टपकणी खुट
भात पकुणी मासाब
घाम तापणी नानातिन
गगगगगगगगगगगगगगगग
कर दिया उद्‌घाटन
भैर-भैर बटी
छन आया भीतेर
कै बात नी भय
बास-खूस में
य हमारी दुनिया की नुमाइस छू
हम देखि ल्यूँल

उनकी कविताओं में सघन अनुभूतियों की चित्रात्मकता है, जिसमें परदेद्गा गए बेटे के समझौते भी हैं, और गाँव के प्रति गहन लगाव भी। एक तरफ रोजी-रोटी से समझौते तो दूसरी और पहाड़ से लगााव इन सबके बीच आधुनिक दबाव और महानगरीय बोध ओर द्याहरों का उकताहट भरा जीवन जिसमें एक अंतहीन दौड  है। इस बीच कहीं रचनाकार एकान्त होता है या उकताहट का एहसास होता है तो उसका पांखी मन गाँव की ओर भागता है, निसंदेह इस स्थिति में कामगार व्यर्थताबोध से भरता है और अजनबीपन उसे आ घेरता है, वर्तमान परिस्थितियों के दबाव से अधबीच में ही आधुनिक मानव का इद्गतहार बनाकर मल्टीनेद्गानल कम्पनियों के विज्ञापनों सा, भीड  भरे चौराहों पर टाँग दिया जाता है। मनोज जी की कविता 'क्याप-क्याप' में इस अन्तरद्वन्द्व की सटीक अभिव्यंजना हुई है-
उ चाखुड  पकड ी गोय
पकड  बेर वी खिड की बाट
भैर धकियाई गोय
मह सोचणीं री कृत्रिमता स्वाद चाखी
उ चौड  कै, कौल भैर जबै
आपण दगडि यों थें
साची या द्‌याल लालच
भीतेर एक बखत जाँणक
नये उपमानों के साथ फिर जटिल जीवनानुभवों को व्यक्त करते हुए कहते हैं-
नारिङ  व पिरीतिक बास नि छिपाइन
उकें ले तो पिरीत छी कृत्रिमता दगै
यो कृत्रिमता ले भली छू
ललचैं दें

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

इस तरह से अपने समकालीन यथार्थ को पकड़ते हुए वक्त के नज ाकत को आखों की पुतलियों में बसाते हैं, उम्मीद की बाट भी जोहते हैं, और वक्त के खिलाफ  आवाज  भी उठाते हैं। अपने समय की गोलबन्दी करने का उनका अन्दाज उन्हें भारतीय साहित्य के समकालीन तो खड ा करता ही है, कई बार वो देद्गा की हदों को भी पार कर जाते हैं।
और ग रज के साथ कहते हैं-
पहाड  आपण हम छोड  नि सकन
अपणी बात तोड  नि सकन
इतुक ले नि भाय आय कमजोर
और फिर इस गहन निराद्गाा के परिदृद्गय के बीच संघर्च्च और उम्मीद का लाल सूरज उगाने में लग जाते हैं-
कै दिन तलै ढपोक द्यांख बजाला
लाट-काल-ढुन दगडि यों भरोसल नाचला
देखणी सब तुमरि लुट-पाट
क दिन तलै चलल झुठ राजपाठ
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उज्याव हुण फैगो
और कतु दिन अन्यार
सूरज के डराला
वह अफसर, नेता, भूमाफियाओं को सीधे जनता की अदालत में खड ा कर उनसे प्रद्गन पूछते है-
कटुक डबल हमार उडै  गया।
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यो लगाल इसिके गणमणाट
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कभै बिजुलि कभै पाणिक कचकचाट

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

मनोज  उप्रेती कोरी भावुकता और लगाव के कवि नहीं हैं, वह गतिद्गाील यथार्थ को पैनी निगाह से पकड़ते हैं। संवेदनाओं, भावनाओं और भावुकता को विचारों की लगाम में कस कर कविता को आम जन के लिए उपयोगी बनाते हैं। उनका यही दृच्च्िटकोण जानता है कि प्रतिरोध का रास्ता इतनी जल्दी तैयार नहीं हो सकता और ना ही जल, जंगल और जमीन के हक की लड ाई एक दिन में तैयार हो सकती है। इसके लिए एक लम्बी प्रोसेस की जरूरत होगी लेकिन जब यह लड ाई द्याुरू होगी निद्गिचत है जीत आम जन-मन की होगी। इसी उम्मीद में वे अपनी कविता 'माठू- माठ'ू में लिखते हैं-
चाँचरी झोड ा फिर भभकाल,
पहाड क्‌ चीज दुनि में चमकाल
घटक फितड  फिर घुमल
पहाड  अपनी नई पोंध देखी झुमल,
  ये अलग बात है कि कुमाऊँनी हिन्दी कविता और कुमाऊँनी कविता में वर्तमान में मोहभंग का स्वर प्रमुख है। जन आकांक्षाओं और राज्य निर्माण के बाद के परिदृद्गय ने न केवल यहाँ के आम जनमानस को प्रभावित किया है, बल्कि पृथक राज्य की पोल खुल चुकी है। इसलिए मोहभंग समकालीन कुमाऊँनी साहित्य का प्रमुख स्वर है या प्रवृत्ति है। अद्‌वाइ, तुम आया, अंधेर चल तुमडि बाटै-बाट, चित्तवृत्ति, हौरी माया, द्विमुखी राँख, ठाँगर और लागुल, हाल- चाल,  पर उनकी कविताएं का स्वर प्रगतिद्गाील हैं, उनमें बात को कहने का जो अंदाज है उससे पता चलता है उनकी रचनाओं में क्या सम्भावनाएं हैं। कविता का रचना विधान स्वयं में बन पड ा है, जिसमें कवि के यथार्थवादी दृच्च्िटकोण और अनुभव की प्रामाणिकता की महत्वपूर्ण भूमिका है। भाच्चा सहज और सरल है, बिम्ब, प्रतीक, फैन्टसी, तनाव ,विसंगति कविताओं को समकालीन जीवन बोध से जोड ती है। मनोज  उप्रेती की लम्बी कविताएं अपने आप में अनूठी हैं उनकी आन्तरिक लय , अन्विति, विचार और संद्गिलच्च्ट यथार्थ युगीन परिस्थियों की संवेदना, भवुकता और लगाव का आदिम दस्तावेज है। समकालीन कुमाऊँनी कविता अपने मूल्याँकन के नये सौन्दर्यद्गाास्त्र की माँंग कर रही है। इस दिद्गाा की ओर बुद्धिजीवियों का ध्यान जाना जरूरी है, नही ंतो हमारे समय के कवियों और उनकी कविताओं का सही मूल्यांकन नहीं हो पायेगा। इसलिए इस नई धारा के रचनाकारों को एक जुट होने की जरूरत है।