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Religious Chants & Facts -धार्मिक तथ्य एव मंत्र आदि

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, March 03, 2012, 02:08:05 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


Dosto,

We will share some exclusive religious chants & facts related to various religions in this topic.

M S Mehta
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देव भूमि बद्री-केदार नाथ11 hours ago On your profile ·
शनि  महराज की गाथा       
शनि ही भय मुक्ती दाता      
शनि की महीमा अप्रमपर       
शनि  ही लगाये बेडा पार        
शुभ प्रभात उत्तरखंड
शनि महिमा सबसे निराली
राज रंक रंक राजा पल मै होता भाई है
ॐ शनिचरय भगवान की जय बद्री-केदार


शनि देवता
वैदूर्य कांति रमल:,प्रजानां वाणातसी कुसुम वर्ण विभश्च शरत: . अन्यापि वर्ण भुव गच्छति तत्सवर्णाभि सूर्यात्मज: अव्यतीति मुनि प्रवाद: .
भावार्थ:-शनि ग्रह वैदूर्यरत्न अथवा बाणफ़ूल या अलसी के फ़ूल जैसे निर्मल रंग से जब प्रकाशित होता है,तो उस समय प्रजा के लिये शुभ फ़ल देता है यह अन्य वर्णों को प्रकाश देता है,तो उच्च वर्णों को समाप्त करता है,ऐसा ऋषि महात्मा कहते हैं.
शनि ग्रह के प्रति अनेक आखयान पुराणों में प्राप्त होते हैं.शनि को सूर्य पुत्र माना जाता है.लेकिन साथ ही पितृ शत्रु भी.शनि ग्रह के सम्बन्ध मे अनेक भ्रान्तियां और इस लिये उसे मारक,अशुभ और दुख कारक माना जाता है.पाश्चात्य ज्योतिषी भी उसे दुख देने वाला मानते हैं.लेकिन शनि उतना अशुभ और मारक नही है,जितना उसे माना जाता है.इसलिये वह शत्रु नही मित्र है.मोक्ष को देने वाला एक मात्र शनि ग्रह ही है.सत्य तो यह ही है कि शनि प्रकृति में संतुलन पैदा करता है,और हर प्राणी के साथ न्याय करता है.जो लोग अनुचित विषमता और अस्वाभाविक समता को आश्रय देते हैं,शनि केवल उन्ही को प्रताडित करता है.
शनि स्तोत्रम

नम: कृष्णाय नीलाय शिति कण्ठ निभाय च.
नम: कालाग्नि रूपाय, कृत-अन्ताय च वै नम:..
नम: निर्मांस देहाय दीर्घ श्म्श्रु जटाय च.
नम: विशाल नेत्राय शुष्क उदर भायाकृते..
नम: पुष्कल गात्राय स्थूल रोम्णे अथ वै नम:.
नम: दीर्घाय शुष्काय काल्द्रंष्ट नम: अस्तु ते..
नमस्ते कोटरक्षाय ,दुर्निरीक्ष्याय वै नम:.
नम: घोराय रौद्राय भीषणाय कपालिने..
नमस्ते सर्वभक्षाय वलीमुख नम: अस्तु ते.
सूर्य पुत्र नमस्ते अस्तु भास्करे अभयदाय च..
अधो द्रष्टे ! नमस्ते अस्तु संवर्तक नम: अस्तु ते.
नमो मन्द गते तुभ्यम नि: त्रिंशाय नम: अस्तु ते..
तपसा दग्ध देहाय नित्यं योग रताय च.
नम: नित्यं क्षुधार्ताय अतृप्ताय च वै नम:..
ज्ञान चक्षु: नमस्ते अस्तु कश्यप आत्मज सूनवे.
तुष्टो ददासि वै राज्यं रुष्टो हरसि तत क्षणात..
देवासुर मनुष्या: च सिद्ध विद्याधरो-रगा:.
त्वया विलोकिता: सर्वै नाशम यान्ति समूलत:.
प्रसादं कुरु मे देव वराहो-अहम-उपागत:.
एवम स्तुत: तदा सौरि: ग्रहराज: महाबल:..
पदमपुराणानुसार यह महाराजा दसरथकृत सिद्ध स्तोत्र है.इसका नित्य १०८ पाठ करने से शनि सम्बन्धी सभी पीडायें समाप्त हो जाती हैं.तथा पाठ कर्ता धन धान्य समृद्धि वैभव से पूर्ण हो जाता है.और उसके सभी बिगडे कार्य बनने लगते है.यह सौ प्रतिशत अनुभूत है.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720





अकृत्वा दर्शनं वैश्वय केदारस्याघनाशिन:।
यो गच्छेद् बदरीं तस्य यात्रा निष्फलतां व्रजेत्।।केदारखण्ड में द्वादश (बारह) ज्योतिर्लिंग में आने वाले केदारनाथ दर्शन के सम्बन्ध में लिखा है कि जो कोई व्यक्ति बिना केदारनाथ भगवान का दर्शन किये यदि बद्रीनाथ क्षेत्र की यात्रा करता है, तो उसकी यात्रा निष्फल अर्थात व्यर्थ हो जाती है


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

काशी विश्वनाथ बाबा की जय.........

'वेद: शिव: शिवो वेद:' वेद शिव हैं और शिव वेद हैं अर्थात् शिव वेद स्वरूप हैं। यह भी कहा है कि वेद नारायण का साक्षात् स्वरूप है-'वेदो नारायण: साक्षात् स्वयम्भूरिति शुश्रुम।' इसके साथ वेद को परमात्म प्रभु का नि:श्वास कहा गया है। इसीलिये भारतीय संस्कृति में वेद की अनुपम महिमा है। जैसे ईश्वर अनादि-अपौरुषेय हैं, उसी प्रकार वेद भी सनातन जगत् में अनादि-अपौरुषेय माने जाते हैं। इसीलिये वेद-मन्त्रों द्वारा शिवजी का पूजन, अभिषेक, यज्ञ और जप आदि किया जाता है।

'शिव' और 'रुद्र' ब्रह्म के ही पर्यायवाची शब्द हैं। शिव को रुद्र कहा जाता है- ये'रुत्' अर्थात् दु:ख को विनष्ट कर देते हैं- 'रुतम्-दु:खम्, द्रावयति-नाशयतीति रुद्र:।'
ऱुद्र भगवान् की श्रेष्ठता के विषय में रुद्रहृदयोपनिषद् में इस प्रकार लिखा है-

सर्वदेवात्मको रुद्र: सर्वे देवा: शिवात्मका:।
रुद्रात्प्रवर्तते बीजं बीजयोनिर्जनार्दन:। यो रुद्र: स स्वयं ब्रह्मा यो ब्रह्मा स हुताशन:।।
ब्रह्मविष्णुमयो रुद्र अग्नीषोमात्मकं जगत्।।

इसी प्रमाण के आधार पर यह सिद्ध होता है कि रुद्र ही मूलप्रकृति-पुरुषमय आदिदेव साकार ब्रह्म हैं। वेदविहित यज्ञपुरुष स्वयम्भू रुद्र हैं।

भोले बाबा औघड़ दानी हैं। मुझे विश्वास है कि मेरे आमंत्रण को स्वीकार कर कल (५ मार्च, सोमवार) सोम प्रदोष को वे मेरी कुटिया में पार्थिव शिवलिंग-रूप में पधारे। मैं और मेरी पत्नी ने स्वागत कर रूद्र-मन्त्रों से उनका अभिषेक किया तथा सभी के कल्याण हेतु प्रार्थना की। सभी पर बाबा की कृपा हो.......

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

प्राचीन काल में हमारे मनीषी ऋषि -मुनियों ने दिव्य ज्ञान से सृष्टि के प्रत्येक अवयव का परस्पर प्रभाव का अनुभव किया .''या ब्रह्मांडे सा पिंडे ''के आधार पर उन्होंने आकाशस्थ ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति  के प्रभाव को जाना और समझा .इसी आधार पर ज्योतिष विद्या का सूत्रपात हुआ .
                     ग्रहों की सौरमंडल में गति ,स्तिथि व् प्रवृति का क्या प्रभाव भूमंडल के प्राणी भोगेंगे या भोग सकते है इसके लिए उन्होंने लोकहित को दृष्टि में रखकर अनेक ग्रंथो की रचना की .ज्योतिष शास्त्र के सभी मुख्य ग्रहों को समस्त सृष्टि की व्यवस्थाओं में इस प्रकार विभाजित किया जिससे संसार में किसी एक का अधिपत्य ही दृष्टि गोचर न हो बल्कि सभी की शक्ति प्रभाव का अनुभव किया जा सके .
                      इस वर्ष आकाशीय परिषद् में गठित दस पदों की सभा में शुक्र -चन्द्र -गुरु -शनि और सूर्य में ही पदों का विभाजन हुआ है .गत वर्षों की भांति इस वर्ष भी शुभ ग्रहों के पास अधिक पदों का भार होने से शुभता के संकेत है .राजा -मंत्री जेसे मुख्य पदों पर शुक्र महाराज को अधिपत्य प्राप्त हुआ है .शुक्र अपनी भौतिक वादी प्रवृति व् भोग विलास के कारक होने से इस वर्ष में सर्वत्र सम्पन्नता के संकेत होंगे .शुक्र की शुभता से अन्न,उत्पादंता में वृद्धि ,नदियों के जल का सही उपयोग ,फलों के उत्पादन और वितरण में सामान व्यवस्था के संकेत हैं.
                       इस वर्ष  प्रकृति भीलोगो की समृद्धि में सहयोग करती नजर आएगी .अन्न का अधिपत्य चंद्रमा को प्राप्त होने से शुक्रदेव का कार्य और भी सरल होगा.शीतकालीन अन्न के स्वामी इस वर्ष शनिदेव है .शनिदेव वेसे तो न्यायप्रिय है किन्तु शुष्कता ,मंदता  का स्वाभाव होने से शीतकालीन फसलों की हानि होने की सम्भावना है.कहीं -कहीं समय पर आपूर्ति न होने से लोगो में आक्रोश बढेगा .
                       वृहस्पति मेघेश होने से इस वर्ष में सात्विक प्रकृति का सहयोग मिलेगा .वर्षा अनुकूल होगी.रसपति [रसेश ]मंगल होने से अपनी प्रवृति के अनुकूल कभी -कभी शासन प्रशासन ,बाहुबली व् धन से संपन्न लोग गरीब व्यक्ति व् उसके अधिकारों से वंचित करने का प्रयास करेंगे .
                       नीरसेश सूर्य होने के कारण सोना चांदी के भाव में वृद्धि के संकेत हैं .फलेश गुरु होने से कुछ शुभता रहेगी शासन प्रशासन भले ही जन विरोधी रहे लेकिन प्रकृति लोगो के अनुकूल रहेगी .२२ मार्च २०१२ को चैत्र अमावस्या की समाप्ति तुला लग्न में होगी .
                        तुलालग्नेमध्यदेशेछत्र भंगश्चविग्रह:
                        धान्यस्य विक्रय :प्राच्यांछ्त्र्भंगमुपद्रव: 
तुला लग्न में वर्ष प्रवेश होने से मध्य देशों में उपद्रव ,विग्रह सत्ता परिवर्तन के योग बनते हैं .   

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Acharya Vipin Krishna
Jyotishi, Vedpathi & Katha Vachak
Mobile- 09015256658, 09968322014

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

 ‎'SHUBH+PRABHTAM TO EACH ONE+EVERY ONE. HAVE ANICE SHUBH SOMSHIV DAY.**शिव ईश्वर का रूप हैं। हिन्दू धर्म के प्रमुख देवताओं में से हैं । वेद में इनका नाम रुद्र है। यह व्यक्ति की चेतना के अन्तर्यामी हैं। इनकी अर्धाङ्गिनी (शक्ति) का नाम पार्वती है। इनके पुत्र स्कन्द और गणेश हैं।

शिव अधिक्तर चित्रों में योगी के रूप में देखे जाते हैं और उनकी पूजा लिंग के रूप में की जाती है । भगवान शिव को संहार का देवता कहा जाता है ।भगवान शिव सौम्य आकृति एवं रौद्ररूप दोनों के लिए विख्यात हैं। अन्य देवों से शिव को भिन्न माना गया है। सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति एवं संहार के अधिपति शिव हैं। त्रिदेवों में भगवान शिव संहार के देवता माने गए हैं। शिव अनादि तथा सृष्टि प्रक्रिया के आदिस्रोत हैं और यह काल महाकाल ही ज्योतिषशास्त्र के आधार हैं। शिव का अर्थ यद्यपि कल्याणकारी माना गया है, लेकिन वे हमेशा लय एवं प्रलय दोनों को अपने अधीन किए हुए हैं।नमः शम्भवाय च मयोभवाय च नमः शन्कराय च मयस्करय च नमः शिवाय च शिवतराय च।। ईशानः सर्वविध्यानामीश्वरः सर्वभूतानां ब्रम्हाधिपतिर्ब्रम्हणोधपतिर्ब्रम्हा शिवो मे अस्तु सदाशिवोम।। तत्पुरषाय विद्म्हे महादेवाय धीमहि। तन्नो रुद्रः प्रचोदयात।। भगवान शिव को सभी विध्याओ के ग्याता होने के कारण जगत गुरु भी कहा गया है।** 
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हलिया

मंत्रों का जप कैसे करें?   

मंत्र का मूल भाव होता है - मनन। मनन के लिए ही मंत्रों के जप का विधान धर्मग्रंथों में बताया गया है। शास्त्रों के अनुसार मंत्रों का जप पूरी श्रद्धा और आस्था से करना चाहिए। साथ ही एकाग्रता और मन का संयम मंत्रों के जप के लिए बहुत जरुरी है। इनके अभाव में मंत्रों की शक्ति कम हो जाती है और कामना पूर्ति या लक्ष्य प्राप्ति में उनका प्रभाव नहीं होता है।
मंत्रों का पूरा लाभ पाने के लिए जप के दौरान सही मुद्रा या आसन में बैठना भी बहुत जरुरी है। इसके लिए पद्मासन मंत्र जप के लिए श्रेष्ठ होता है। इसके बाद वीरासन और सिद्धासन या वज्रासन को प्रभावी माना जाता है। (आसन की जानकारी के लिए देखें इस वेबसाईट का योग सेगमेंट)
यहां मंत्र जप से संबंधित कुछ ओर जरुरी नियम बताए जा रहे हैं। जो मंत्र और कार्यसिद्धी के लिए बहुत जरुरी है -
- मंत्र जप के लिए उचित समय बहुत आवश्यक है। इसके लिए ब्रह्म मूर्हुत यानि लगभग ४ से ५ बजे या सूर्योदय से पहले का समय श्रेष्ठ माना जाता है। प्रदोष काल यानि दिन का ढलना और रात्रि के आगमन का समय भी मंत्र जप के लिए उचित माना गया है।
- अगर यह समय भी संभव न हो तो सोने से पहले का समय भी चुना जा सकता है।
- मंत्र जप प्रतिदिन नियत समय पर ही करें।
- एक बार मंत्र जप शुरु करने के बाद बार-बार स्थान न बदलें। एक स्थान नियत कर लें।
- मंत्र जप में तुलसी, रुद्राक्ष, चंदन या स्फटिक की १०८ दानों की माला का उपयोग करें। यह प्रभावकारी मानी गई है।
- कुछ विशेष कामनों की पूर्ति के लिए विशेष मालाओं से जप करने का भी विधान है। जैसे धन प्राप्ति की इच्छा से मंत्र जप करने के लिए मूंगे की माला, पुत्र पाने की कामना से जप करने पर पुत्रजीव के मनकों की माला और किसी भी तरह की कामना पूर्ति के लिए जप करने पर स्फटिक की माला का उपयोग करें।
- जप दिन में करें तो अपना मुंह पूर्व या उत्तर दिशा में रखें और अगर रात्रि में कर रहे हैं तो मुंह उत्तर दिशा में रखें।
- किसी विशेष जप के संकल्प लेने के बाद निरंतर उसी मंत्र का जप करना चाहिए।
- मंत्र जप के लिए कच्ची जमीन, लकड़ी की चौकी, सूती या चटाई अथवा चटाई के आसन पर बैठना श्रेष्ठ है। सिंथेटिक आसन पर बैठकर मंत्र जप से बचें।
- मंत्र जप के लिए एकांत और शांत स्थान चुनें। जैसे कोई मंदिर या घर का देवालय।
- मंत्रों का उच्चारण करते समय यथासंभव माला दूसरों को न दिखाएं। अपने सिर को भी कपड़े से ढंकना चाहिए।
- माला का घुमाने के लिए अंगूठे और बीच की उंगली का उपयोग करें।
- माला घुमाते समय माला के सिर को पार नहीं करना चाहिए, जबकि माला पूरी होने पर फिर से सिर से आरंभ करना चाहिए।

हलिया

मंत्र जप से जागती है आंतरिक शक्ति

जप किसी शब्द अथवा मंत्र को दोहराने की क्रिया ही नहीं है। यह पूजा-पाठ की परंपरा का हिस्सा है तो विज्ञान भी। जब हम किसी शब्द को बार-बार दोहराते हैं तो उसे जप करना कहते हैं। पूजा पद्धति में जप के माध्यम से ईश्वर के स्वरूप पर ध्यान केंद्रित किया जाता है। राम, कृष्ण, शिव, दुर्गा, हनुमान आदि देवताओं के जप की परंपरा मिलती है। जप के माध्यम से भीतरी शक्ति को जागृत किया जा सकता है। आइए, जानें जप से किस तरह हम नई ऊर्जा से भर सकते हैं...।
जप करने के तीन तरीके हैं-
वाचिक- जब किसी शब्द या मंत्र को आवाज के साथ दोहराया जाता है।
उपांशु- मुंह से आवाज नहीं निकालते हुए जीभ (जुबान) से शब्द को दोहराना।
मानसिक- केवल मन ही मन किसी शब्द या मंत्र को दोहराना। 

जप का प्रभाव
जप करने से हमारे अंदर सोई हुई आध्यात्मिक शक्ति जागती है। जिससे पूजा में होने वाली अनुभूति को अधिक निकटता से अनुभव किया जा सकता है। ईश्वर की अनुभूति के नजदीक पहुंचने के लिए सभी धर्मों-संप्रदायों में जप का तरीका अपनाया गया है।

हलिया

क्यों करते हैं मंत्रोच्चार?




हिंदू धर्म में मंत्रों को महिमा बताई गई है। निश्चित क्रम में संगृहीत विशेष वर्ण जिनका विशेष प्रकार से उच्चारण करने पर एक निश्चित अर्थ निकलता है, मंत्र कहलाते हैं। शास्त्रकार कहते हैं-मननात् त्रायते इति मंत्र:। अर्थात मनन करने पर जो त्राण दे, या रक्षा करे वही मंत्र है।
मंत्र एक ऐसा साधन है, जो मनुष्य की सोई हुई सुषुप्त शक्तियों को सक्रिय कर देता है। मंत्रों में अनेक प्रकार की शक्तियां निहित होती है, जिसके प्रभाव से देवी-देवताओं की शक्तियों का अनुग्रह प्राप्त किया जा सकता है। रामचरित मानस में मंत्र जप को भक्ति का पांचवा प्रकार माना गया है। मंत्र जप से उत्पन्न शब्द शक्ति संकल्प बल तथा श्रद्धा बल से और अधिक शक्तिशाली होकर अंतरिक्ष में व्याप्त ईश्वरीय चेतना के संपर्क में आती है जिसके फलस्वरूप मंत्र का चमत्कारिक प्रभाव साधक को सिद्धियों के रूप में मिलता है।
शाप और वरदान इसी मंत्र शक्ति और शब्द शक्ति के मिश्रित परिणाम हैं। साधक का मंत्र उच्चारण जितना अधिक स्पष्ट होगा, मंत्र बल उतना ही प्रचंड होता जाएगा।वैज्ञानिकों का भी मानना है कि ध्वनि तरंगें ऊर्जा का ही एक रूप है। मंत्र में निहित बीजाक्षरों में उच्चारित ध्वनियों से शक्तिशाली विद्युत तरंगें उत्पन्न होती है जो चमत्कारी प्रभाव डालती हैं।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

.ज्योतिषशास्त्र कहता है कि हमारे जीवन पर ग्रहों का सीधा प्रभाव होता है. ग्रह अगर हमारी कुण्डली में कमज़ोर अथवा नीच स्थिति में हैं तो वह हमारे जीवन पर विपरीत प्रभाव डालते रहते हैं. इस स्थिति में कमज़ोर और नीच ग्रहों का उपाय करना आवश्यक होता है.

ज्योतिषशास्त्र के अनुसार ग्रहों के उपाय (Remedies for Planets) : 1
सूर्य के उपाय (Remedies for Surya)
सूर्य ग्रह की शांति के लिए दान
आपकी कुण्डली में सूर्य अगर नीच का है अथवा पीड़ित अवस्था में है तो सूर्य की शांति के लिए आप दान कर सकते हैं. गाय का दान अगर बछड़े समेत करें तो इससे ग्रह के विपरीत प्रभाव में कमी आती है. गुड़, सोना, तांबा और गेहूं का दान भी सूर्य ग्रह की शांति के लिए उत्तम माना गया है. सूर्य से सम्बन्धित रत्न का दान भी उत्तम होता है. दान के विषय में शास्त्र कहता है कि दान का फल उत्तम तभी होता है जब यह शुभ समय में सुपात्र को दिया जाए. सूर्य से सम्बन्धित वस्तुओं का दान रविवार के दिन दोपहर में 40 से 50 वर्ष के व्यक्ति को देना चाहिए. सूर्य ग्रह की शांति के लिए रविवार के दिन व्रत करना चाहिए. गाय को गेहुं और गुड़ मिलाकर खिलाना चाहिए. किसी ब्राह्मण अथवा गरीब व्यक्ति को गुड़ का खीर खिलाने से भी सूर्य ग्रह के विपरीत प्रभाव में कमी आती है.

अगर आपकी कुण्डली में सूर्य कमज़ोर है तो आपको अपने पिता एवं अन्य बुजुर्गों की सेवा करनी चाहिए इससे सूर्य देव प्रसन्न होते हैं. प्रात: उठकर सूर्य नमस्कार करने से भी सूर्य की विपरीत दशा से आपको राहत मिल सकती है.
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Acharya Vipin Krishna
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