• Welcome to MeraPahad Community Of Uttarakhand Lovers.
 

Poems by Dr Narendra Gauniyal - डॉ नरेन्द्र गौनियाल की कविताये

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, March 12, 2012, 12:01:35 AM

Bhishma Kukreti

            Philosophical Hindi Poetries  by Dr Narendra Gauniyal

                               
डा. नरेंद्र गौनियाल की हिंदी कविताओं में दर्शन,


Philosophical Hindi poetries by Asian Hindi Poets, PhilosophicalHindi poetries by  South Asian Hindi Poets,Philosophical Hindi poetries by  SAARCCountries Hindi Poets, Philosophical Hindi poetries by  Indian Hindi Poets, Philosophical Hindipoetries by  North Indian Hindi Poets, PhilosophicalHindi poetries by  Himalayan Hindi Poets,Philosophical Hindi poetries by  MidHimalayan Hindi Poets, Philosophical Hindi poetries by Uttarakhandi  Hindi Poets, Philosophical Hindi poetries by  Kumauni Hindi Poets, Philosophical Hindipoetries by Garhwali  Hindi Poets series

एशियाई हिंदी कवियों की हिंदी कविताओं में दर्शन, दक्षिण एशियाई हिंदी कवियों की हिंदी कविताओं में दर्शन, सार्क देशीय हिंदी कवियों की हिंदी कविताओं में दर्शन, भारतीय  हिंदी कवियों की हिंदी कविताओं में दर्शन, उत्तर भारतीय हिंदी कवियों की हिंदी कविताओं में दर्शन, हिमालयी हिंदी कवियों की हिंदी कविताओं में दर्शन, मध्य हिमालयी हिंदी कवियों की हिंदी कविताओं में दर्शन, उत्तराखंडी हिंदी कवियों की हिंदी कविताओं में दर्शन, कुमाउनी हिंदी कवियों की हिंदी कविताओं में दर्शन, गढ़वाली हिंदी कवियों की हिंदी कविताओं में दर्शन लेखमाला 


*******भाव *********



कवि: डा. नरेंद्र गौनियाल


रात के अँधेरे में
सड़क पर चलते हुए
एक दिन
लापरवाही में अचानक
बहुत ऊंचाई से
गिर गया नीचे
कठोर जमीन पर
घुटने थिंच गए
पसलियाँ भचक गयी
दोनों आँखों के बीच
नाक के ऊपर
गहरा घाव हो गया

कुछ देर अचंभित
हाथ-पैर टटोले
घाव पर रुमाल रखकर
चुपके से उठ गया
लचकते-लचकते
घर पहुँच गया
चोट-घाव का उपचार करके
रात को
निश्चिन्त सो गया

मै खुद
अपनी गलती से
लापरवाही से
गिरा था
किसी ने
धक्का नहीं दिया
मेरे गिरने में
कोई व्यक्ति
कारण नहीं बना

बनता तो
भाव बदल जाता
मेरा रक्तचाप
बढ़ जाता
विवाद हो जाता
नींद भंग हो जाती
शरीर की पीड़ा के साथ
मन की पीड़ा होती
अपने इलाज की
चिंता से अधिक
बदले की भावना होती

कोई कारण न था
मन में
कोई पीड़ा न थी
शरीर की पीड़ा
जल्दी ही
दूर हो गयी
नहीं विकृत हुआ
मन का भाव
जल्दी ठीक हो गए
शरीर के
गहरे घाव ..
   डॉ नरेन्द्र गौनियाल (दृष्टिकोण  से )




Philosophical Hindi poetries by Asian Hindi Poets, PhilosophicalHindi poetries by  South Asian Hindi Poets,Philosophical Hindi poetries by  SAARCCountries Hindi Poets, Philosophical Hindi poetries by  Indian Hindi Poets, Philosophical Hindipoetries by  North Indian Hindi Poets, PhilosophicalHindi poetries by  Himalayan Hindi Poets,Philosophical Hindi poetries by  MidHimalayan Hindi Poets, Philosophical Hindi poetries by Uttarakhandi  Hindi Poets, Philosophical Hindi poetries by  Kumauni Hindi Poets, Philosophical Hindipoetries by Garhwali  Hindi Poets seriesto be continued....

एशियाई हिंदी कवियों की हिंदी कविताओं में दर्शन, दक्षिण एशियाई हिंदी कवियों की हिंदी कविताओं में दर्शन, सार्क देशीय हिंदी कवियों की हिंदी कविताओं में दर्शन, भारतीय  हिंदी कवियों की हिंदी कविताओं में दर्शन, उत्तर भारतीय हिंदी कवियों की हिंदी कविताओं में दर्शन, हिमालयी हिंदी कवियों की हिंदी कविताओं में दर्शन, मध्य हिमालयी हिंदी कवियों की हिंदी कविताओं में दर्शन, उत्तराखंडी हिंदी कवियों की हिंदी कविताओं में दर्शन, कुमाउनी हिंदी कवियों की हिंदी कविताओं में दर्शन, गढ़वाली हिंदी कवियों की हिंदी कविताओं में दर्शन लेखमाला जारी ...

डा. नरेंद्र गौनियाल की हिंदी कविताओं में दर्शनशाश्त्र लेखमाला जारी ....

Bhishma Kukreti

Hindi Poem by Dr Narendra Gauniyal


*******माँ******


यह मैंने किया
यह मेरा है
यह मेरी बदौलत है
हम सब
ऐसा ही कहते हैं

हम
बहुत थोडा सा
करते हैं
ढिंढोरा
बहुत बड़ा
पीटते हैं.
कुछ करते हैं
उसका श्रेय मिलने की
चाहत रखते हैं
जबतक
श्रेय न मिले
लोग धन्यबाद न कहें
तबतक
बेचैन रहते हैं

असली करने वाला
चुपके से कर जाता है
बिना बताये
खिसक जाता है
वह कुछ करके
आनंद ले चुकता है
श्रेय की उसे
कोई चाहत नहीं होती
कोई जरूरत नहीं होती

माँ भी कभी
नहीं कहती
उसने अपने बच्चों को
दूध पिलाया है
अपने बच्चे को
दूध पिलाने से
उसे सुख
मिल जाता है स्वयं
श्रेय की कोई
चाहत नहीं होती
यह सौदा नहीं
स्वार्थ नहीं
उसका कर्तव्य है
वात्सल्य है
जो श्रेय चाहेगी
वह
माँ नहीं हो सकती .
    डॉ नरेन्द्र गौनियाल


Bhishma Kukreti

Hindi Verses  by Dr Narendra Gauniyal



Hindi Verses by Asian Hindi  Poets, Hindi Verses by South Asian Hindi Poets,

Hindi Verses by SAARC Country Hindi   Poets,Hindi Verses by Indian Hindi  Poets,

Hindi Verses by North Indian Hindi Poets,Hindi Verses by Himalayan  Hindi Poets,

Hindi Verses by Mid Himalayan Hindi Poets,Hindi Verses by Famous Uttarakhandi   Hindi Poets,

Hindi Verses by Kumauni Hindi Poets,Hindi Verses by Famous Garhwali  Hindi Poets,



हिंदी कविताओं में एशियाई हिंदी कवि द्वारा आभाव विषयक दी कविताये,   

हिंदी कविताओं में दक्षिण एशियाई हिंदी कवि द्वारा आभाव विषयक की हिंदी कविताये,

हिंदी कविताओं में सार्क देशीय  हिंदी कवि द्वारा आभाव विषयक  हिंदी कविताये,

हिंदी कविताओं में भारतीय  हिंदी कवि द्वारा आभाव विषयक हिंदी कविताये,

हिंदी कविताओं में हिमालयी  हिंदी कवि द्वारा आभाव विषयक  हिंदी  कविताये,

हिंदी कविताओं में मध्य हिमालयी हिंदी कवि द्वारा आभाव विषयक हिंदी कविताये,

हिंदी कविताओं में कुमाउनी   हिंदी कवि द्वारा आभाव विषयक हिंदी कविताये,

हिंदी कविताओं में गढ़वाली  हिंदी कवि द्वारा आभाव विषयक हिंदी कविताये,

*********हम अभाव में जीते हैं *********


जो नहीं है
हम उसे
पाना चाहते हैं
जिसे खो चुके
उसे जिंदगी भर
याद रखते हैं
जो नहीं मिल पता
उसे हटा नहीं पाते
स्मृति से 

जबतक था
तब तक
कोई गर्ज नहीं
जब तक है
तब तक
कोई ख्याल नहीं
जब नहीं रहा
तब ध्यान
उस ओर लगातार
जब खो दिया
तब अभाव का बोध

जो है
उसके प्रति लापरवाह
भूल जाते हैं उसे
मानो कि
वह हो ही नहीं
जो नहीं मिला
उसके प्रति
बहुत सजग
अत्यंत आतुर
बर्षों तक
भोगते सुख का
कभी ध्यान नहीं
एक घड़ी का दुःख
भुलाये नहीं भूलता 
जिंदगी भर   

बर्षों के प्रेम पर
क्षण भर का क्रोध
दिन भर की उपलब्धता पर
घड़ी भर का न होना
भारी पड़ता है

हमें
होना नहीं
न होना
याद रहता है
हम भाव में नहीं
अभाव में जीते हैं ..
   Coyright@ डॉ नरेन्द्र गौनियाल 


Hindi Verses by Asian Hindi Poets, Hindi Verses by South Asian Hindi Poets,

Hindi Verses by SAARC Country Hindi Poets,Hindi Verses by Indian Hindi Poets,

Hindi Verses by North Indian Hindi Poets,Hindi Verses by Himalayan Hindi Poets,

Hindi Verses by Mid Himalayan Hindi Poets,Hindi Verses by Famous Uttarakhandi   Hindi Poets,

Hindi Verses by Kumauni Hindi Poets,Hindi Verses by Garhwali Hindi Poets to be continued....




हिंदी कविताओं में एशियाई हिंदी कवि द्वारा आभाव विषयक दी कविताये,

हिंदी कविताओं में दक्षिण एशियाई हिंदी कवि द्वारा आभाव विषयक की हिंदी कविताये,

हिंदी कविताओं में सार्क देशीय हिंदी कवि द्वारा आभाव विषयक हिंदी कविताये,

हिंदी कविताओं में भारतीय हिंदी कवि द्वारा आभाव विषयक हिंदी कविताये,

हिंदी कविताओं में हिमालयी हिंदी कवि द्वारा आभाव विषयक हिंदी कविताये,

हिंदी कविताओं में मध्य हिमालयी हिंदी कवि द्वारा आभाव विषयक हिंदी कविताये,

हिंदी कविताओं में कुमाउनी हिंदी कवि द्वारा आभाव विषयक हिंदी कविताये,

हिंदी कविताओं में गढ़वाली हिंदी कवि द्वारा आभाव विषयक हिंदी कविताये,

Bhishma Kukreti


गडवाळि कवि अर स्वांग लिख्वार डा. नरेंद्र गौनियाल  जीs दगड  भीष्म कुकरेतीs   छ्वीं



भीष्म कुकरेती - आप साहित्यौ दुनिया मा कनै ऐन?

डा. नरेंद्र गौनियाल-- जनु कि ब्वले जान्द ''बियोगी होगा पहला कवि '' मेरी पैली कविता हमारो एक प्यारो भोटू कि अप्रत्याशित मौत पर लिखे गे.  जु मिन सिर्फ १३ साल कि उम्र मा लिखी छै.ख़ुशी अर ग़म द्वी स्थिति इनि छन जैम मन्खी भारी भावुक ह्वै जान्द अर फिर अपणो  मन  कि बात लिखित रूप मा ले आन्द.गीत या कविता मान का भाव का दगड़ ज्यादा सहज होना का कारण साहित्य  लेखन मा सबसे पैली गीत, कविता कि प्रवृति हूंद.अपणा मन का भाव सहज रूप मा गीत,कविता का रूप मा प्रकट ह्वै जन्दीन.

भी.कु- वा क्या मनोविज्ञान छौ कि आप साहित्यौ तरफ ढळकेन ? 
न.गौ. -साहित्य लेखन खुद मा ही  परिस्थितिजन्य एक मनोवैज्ञानिक प्रभाव अर परिणाम छ,जै तै व्यक्ति कि सोच,बौद्धिक क्षमता,प्रवृति,देशकाल परिस्थिति,निकट वातावरण,सुख-दुःख,आश्चर्य,आक्रोश,भय आदि प्रभावित करदीं.म्यार दगड बि ए तरह कि परिस्थिति समय-समय पर घटनै अर मनोभाव समय-समय पर पैदा हुने कारण साहित्य लेखन कि प्रवृति ह्वै.मन कि बात ब्वलन या ल्यखन से एक तृप्ति कु भाव पैदा हूंद.साहित्य लेखन से एक विशिष्टता कु भाव बि मन मा पैदा हूंद ,किलै कि हर क्वी मन्खी साहित्य नि ल्य्ख्दू,कविता नि करदू,गीत नि रच्दू.प्राचीनकाल से ही साहित्यकारों कु समाज मा एक बिशेष स्थान रहे.साहित्य लेखन से मान-सम्मान कि वृद्धि ,एक अलग पछ्याण मन्खी कि हूंद.


भी.कु. आपौ साहित्य मा आणो पैथर आपौ बाळोपनs कथगा हाथ च ?
न.गौ. - साहित्य लेखन मा बालपन कि महत्वपूर्ण भूमिका हूंद.दरअसल साहित्यकार अर वैको साहित्य कि आधारशिला त बालपन मा ही पड़ी जान्द.भौत काम लोग होला जु कि खूब  पढ़ी-लिखी कि बाद मा परिपक्व होणा का बाद ही साहित्य ल्य्ख्नो शुरू कारला.साहित्य अर विशेषकर गीत-कविता जबरदस्ती या सोची-सोची कै नि लिखे जै सकेंदी.वो त जब आलि त समझो अफ्वी ऐ जाली.घचोरी-घचोरी कै नि औंदी.

भी.कु- बाळपन मा क्या वातवरण छौ जु सै त च आप तै साहित्य मा लै ?
न.गौ. -बालपन मा पहाड़ कु वातावरण,यख कु समाज,समस्या,प्रकृति से निकटता,यख कि परिपूर्णता अर यख का अभाव ए तरह का विरोधाभास सब्बि कुछ कुछ ना कुछ ल्यखणा वास्त प्रेरित करदन.

भी.कु. कुछ घटना जु आप तै लगद की य़ी आप तै साहित्य मा लैन !
न.गौ. - जनु कि मिन बोली छौ कि अपणा एक कुक्कर कि अचानचक मौत से दुखी ह्वै कि मिन पैलू गीत-कविता लेखी छौ.ए का साथ-साथ बचपन मा गौमा रामलीला,खुदेड गीत,थड्या-चौफुला ,रेडियो मा गीत,किताबों मा कविता पाठ ,रामायण,महाभारत कि कथा,गौं मा काकी-बोडी ,दादी-नानी कि परी,रागस,भूत-पिचास,देवी-द्य्ब्तों कि कथा बि प्रभावित करण वळी रैनी.

भी.कु. - क्या दरजा पांच तलक s किताबुं हथ बि च ?
न.गौ. --दर्जा पांच तक कि कितब्यों एक वातावरण तैयार करे.विशेषकर कविताओं कि भूमिका महत्वपूर्ण रहे.छंद बद्ध कविताओं तै लय बद्ध ,मदमस्त ह्वैकी गाण से कविता का तरफ झुकाव ह्वै.




भी.कु. दर्जा छै अर दर्जा बारा तलक की शिक्षा, स्कूल, कौलेज का वातावरण को आपौ साहित्य पर क्या प्रभाव च ?
न.गौ-- -दर्जा ६ से १२ अर वैका बाद कॉलेज शिक्षा क्रमशः साहित्य लेखनमा मददगार रहे.जनि-जनि ल्यखणो   पढ्नु बढ्दू गै उनी-उनी साहित्यिक प्रवृति बि बढ्दी गै. विद्यार्थी जीवन मा मिन कविता शुरू करी याली छै.स्कूल पत्रिकाओं मा बि कविता-लेख शुरू ह्वै गे छया




भी.कु.- ये बगत आपन शिक्षा से भैराक कु कु पत्रिका, समाचार किताब पढीन जु आपक साहित्य मा काम ऐन ?
न.गौ-- -स्कूल-कॉलेज मा हिंदी साहित्य कि किताब्यों का साथ-साथ बाजार मा उपलब्ध तत्कालीन पत्र-पत्रिकाओं कु बि योगदान रहे.कादम्बिनी मेरी तब कि फेब्रेट छै.यंका दगड़ी दैनिक अख़बारों का साहित्यिक परिशिष्ट बि द्य्ख्दू छौ. ९- रामायण,रामचरितमानस,विनय पत्रिका,सूर सागर,कबीर-रहीम का दोहा,आधुनिक युग मा निराला,मुक्तिबोध ,सुमित्रानंदन पंत,आदि कविताओं कि रचना विशेष रूप से भली लगीं.     

भी.कु- बाळापन से लेकी अर आपकी पैलि रचना छपण तक कौं कौं साहित्यकारुं रचना आप तै प्रभावित करदी गेन? आप तै साहित्यकार बणान मा शिक्षकों कथगा मिळवाग च ?

न. गौ. वरिष्ठ साहित्यकार श्री विष्णु दत्त जुयाल जी  हमारी स्कूल मा तब शिक्षक छया.उंकी साहित्य साधना,रचनाधर्मिता से बि प्रेरणा मिली.

भी.कु. आपक न्याड़ ध्वार, परिवार,का कुकु लोग छन जौंक आप तै परोक्ष अर अपरोक्ष रूप मा आप तै साहित्यकार बणान मा हाथ च ?
न.गौ- - गुरुकुल आयुर्वेद कॉलेज मा कॉलेज पत्रिका मा कविता छपिना का बाद  गुरुजनों अर छात्र-दग्द्यों न मेरी प्रशंसा करी अर साहित्य लेखन तै ईथर बढ़ोना कि सलाह दे ..१२-.मेरो एक दगडया डॉ अशोक रस्तोगी  तै मेरी हिंदी कि कविता भौत अच्छी लगदी छै.कॉलेज टाइम कि मेरी कविताओं कु अशोक जी न अब्बी तक संग्रह कर्यूं.

भी.कु-ख़ास दगड्यों क्या हाथ च ?कौं साहित्यकारून /सम्पादकु न व्यक्तिगत रूप से आप तै उकसाई की आप साहित्य मा आओ ?साहित्य मा आणों परांत कु कु लोग छन जौन आपौ साहित्य तै निखारण मा मदद दे ?
न.गौ- - स्कूल टाइम मा कत्गे पत्र-पत्रिकाओं मा ल्याख्नो शुरू करे.वैका बाद धाद से जुडी गयूं.वैका दगड़ी चिठ्ठी-पत्री,हिलांस,स्वास्थ्य सन्देश,नैनी जन दर्पण,गढ़ ऐना,हिमाचल टाईम्स,हिमालय टाईम्स,नैनीताल समाचार,सहित कई पत्र पत्रिकाओं मा कविता लेख छपिनी. हिंदी का बाद गढ़वाली मा ल्य्ख्ने प्रेरणा मुख्य रूप से भाई लोकेश नवानी जी से मिली.पैली मि हिंदी मा जड़ा,गढ़वाली मा काम ल्य्ख्दु छौ.मेरो गढ़वाली साहित्य कि तरफ झुकाव नवानी जी कि ही देन छ.मेरी गढ़वाली कविताओं तै बेहतर रूप-स्वरूप देना माबी वूंको बड़ो योगदान छ. मेरो पैलो गढ़वाली कविता संग्रह ''धीत ''तै  अस्तित्व मा ल्याण मा बि उंकी महत्वपूर्ण भूमिका छ.यंका अतिरिक्त अपणा दगड्या महेंद्र ध्यानी,देवेन्द्र जोशी,दर्शन सिंह बिष्ट,निरंजन सुयाल,मदन दुक्लान,बीना कंडारी,बीना देव्शाली, वीरेन्द्र पंवार, गणेश खुकसाल गणी, नरेंद्र सिंह नेगी,आदि कु बि आभारी छौं जौंका दगड  कविता यात्रा मा  कई सुखद साहित्यिक अनुभूति ह्वै.यांका साथ-साथ आकाशवाणी लखनऊ,, आकाशवाणी नजीबाबाद , भाई सुभास थलेडी,भाई विभूति भूषन भट्ट,विनय ध्यानी,आदि को बि आभार छ ,जौन गढ़वाली कविता को विकास मा अपनी भूमिका अदा करे.एका अतिरिक्त आज का समय मा गढ़वाली साहित्य तै नेट पर उपलब्ध करना मा भीष्म कुकरेती जी ,मेहता जी सहित मेरा पहाड़ फोरम,पहाड़ी फोरम,ई मैगजीन,आदि से जुड़याँ सब्बि दगड्यों कि महत्वपूर्ण भूमिका छ.




Copyright@ Bhishma Kukreti 14/6/2012

s = आधी अ

Bhishma Kukreti

*****अनंत प्रेम****

कवि- डा. नरेंद्र गौनियाल
प्रेम और मोह
संलग्न थे
मन करता था
देखता रहूँ
छूता रहूँ
ह्रदय से लगाता रहूँ
निरंतर

फिर बोध हो गया
मोह छूट गया
प्रेम रह गया
देखूं या न देखूं
छुऊँ या न छुऊँ
आलिंगन करूं न करूं
प्रेम यथावत
आत्मज्ञान
मुक्त कर चुका
मोह पाश से

राह लूं
गंतव्य की
निर्मोह
निर्विकार
प्रेममय

यह प्रेम
ह्रदय से उपजा
आत्मा में समाहित
स्थूल से
सूक्ष्म की ओर
सूक्ष्म से सूक्ष्मतम होता हुआ
अब शेष है
प्रेम ही प्रेम
राग-द्वेष से परे
मोह रहित
अनंत प्रेम ....
डॉ नरेन्द्र गौनियाल   
--

Bhishma Kukreti

अप्रत्याशित मोह ****



कवि- नरेंद्र गौनियल


मेरे यौवन के आँगन में,
क्यों यह प्रेम भावना आई .
मद की प्याली भर-भर के,
क्यों मुझे पिलाने आई.

मै कृशकाय भला था लेकिन,
यौवन फिर भी अपना रंग लाया.
संयम की डोरी से चित चंचल,
पूर्णरूप से बाँध न पाया.

मेरे शांत-सरल चित्त पर,
क्यों यह ज्वाला धधक उठी.
कुसुमायुध का अस्त्र अहो,
क्यों यह संयम भित्ति हटी.

चिंतन सागर में डूबा मैं,
सोचा क्या त्रुटि हुई मुझसे.
भ्रमर पराग पा सकता है,
क्या सुन्दर पुष्पित उपवन से.

हाँ लेकिन मैं तो निरपराध हूँ,
त्रुटि नहीं मैं कोई कर पाया.
गंतव्य मार्ग पर निर्विकार,
निष्काम भाव से था मैं आया.

चलते-चलते उपवन में,
अति सुन्दर पुष्प परिलक्ष्य हुआ.
विस्फारित नयनों से अपलक,
कुछ मोहित सा सुधिहीन हुआ.

मन में मुस्कान उठी कुछ मृदुमय,
मन ही मन मात्र मंद मुस्काये
प्रत्युत्तर में परन्तु परस्पर,
होंठ नहीं फिर भी खुल पाये.

सहसा बोध हुआ तत्क्षण ,
किंचित शक्ति मिली संयम को.
मर्यादा फिर जाग उठी,
उद्द्यत हुआ अपने गंतव्य को..
डॉ नरेन्द्र गौनियाल....अप्रकाशित ,अपूर्ण आत्मकथा -*त्रिशंकु *के लिए रचित १९८३.

Bhishma Kukreti

*****नाली का कीड़ा *****



कवि-  डॉ नरेन्द्र गौनियाल



नाली का कीड़ा !
घृणा पैदा कर रहा है
हमारे मन में
गन्दगी में पैदा हुआ
नाली का कीड़ा
जो हमारी पैदाइश है
हमारी गन्दगी है
गंदे शरीर का मल है
गंदे आचरण का
परिणाम है

हम उसके जनक हैं.
हमने कभी
नाली साफ नहीं की
हर रोज
मैला डालते रहे
सड़ने दिया उसे
लगातार

हमारी सोच
हमारे आचरण
हमारे कृत्यों का
परिणाम है
नाली का कीड़ा

उसे सिर्फ
पानी डालकर
बहाने से क्या होगा
बहानी होगी
अपनी बुराइयाँ
सुधारना होगा
अपना आचरण
साफ़ करनी होगी
पूरी नाली
स्वच्छ रखना होगा
सम्पूर्ण समाज ..
     डॉ नरेन्द्र गौनियाल

--








Bhishma Kukreti

******जैकि दिल्ली तिन त ब्यटा*****



कवि- डा, नरेन्द्र गौनियाल



जैकि दिल्ली तिन त ब्यटा,हम तै छोडि जाण रै.
ब्वारी तै लिजैकी दगड़ी ,हमते बिसरी जाण रै.

हम त छवां बूड-बुड्या आंखि द्यखदा क्वी बि ना.
जांठि पकड़ी-पकड़ी कैकी,भैर-भितर हिटदिना
अपणि खैरि-विपदा हमन, कैमा लगाण रै.
.जैकि दिल्ली टिन त ब्यटा,हम तै बिसरि जाण रै

कमर यींकू दुखद सदनि,घुंडा म्यारा चसगंदा.
मींडि अर मलासि कैकि,खडा ह्वै सक्दिना.
कब्बि कै गल्या मा बबा,उन्नी पड्यां रौंला रै
जैकि दिल्ली तिन त ब्यटा,हमते बिसरि जाण रै..

अपणु-पर्याऊ क्वी बि नि छा ,हम लोगों तै देखण्या.
कैका सहारा कूड़ी यख, हम छवां जग्वलना .
नींद-भूख हर्चि सब्बि राति आंखि ताड़ रे.
जैकि दिल्ली तिन त ब्यटा ,हमते बिसरि जाण रै.

कब्बि-भूखा कबी तिसला ,इनि दिन कट्दिना
आंखि रक्-रके की बबा,त्वे तै द्यख दिना.
कब्बि घार ऐकि तिन,हमते म्वर्यूं पाण रै.
जैकि दिल्ली तिन त ब्यटा,हमते बिसरि जाण रै.

जैकि दिल्ली तिन त ब्यटा,हमते छोडि जाण रै.
ब्वारि तै लिजैकि दगड़ी,हमते बिसरि जाण रै.
      डॉ नरेन्द्र गौनियाल...



Bhishma Kukreti

********वन नीति *******



कवि- डा, नरेंद्र गौनियाल

[वर्तमान वन नीति के खिलाफ गढ़वाली कविता ; वर्तमान वन नीति के खिलाफ कुमाउनी   कविता ; वर्तमान वन नीति के खिलाफ उत्तराखंडी कविता ; वर्तमान वन नीति के खिलाफ मध्य हिमालयी कविता ; वर्तमान वन नीति के खिलाफ हिमालयी कविता ;वर्तमान वन नीति के खिलाफ उत्तर भारतीय कविता ; वर्तमान वन नीति के खिलाफ भारतीय कविता ;  वर्तमान वन नीति के खिलाफ सार्क देशीय कविता ; वर्तमान वन नीति के खिलाफ एशियाई कविता ]



किन नीतिकारों ने
पहाड़ को
चीड के जंगलों से
ढक दिया है.
यहाँ के मूल वृक्ष
बांज,बुरांश,तिलंज को
हर्चाने का
किसने इन्हें
हक़ दिया है

रूखे हुए जंगल
सूख गए जल स्रोत
जन मानस हैरान
वन पालने वाला
वनों के निकट रहने वाला
गरीब किसान परेशान

नगर ,महा नगर में
बनती है नीति
वहाँ रहने वालों के अनुकूल
तो फिर
वन नीति
वनों के निकट रहने वालों
वनों को लगाने वालों
वनों को पालने वालों के
अनुकूल क्यों नहीं

जहां प्रदूषण है
प्रदूषणकारी  हैं
वहाँ कोई मानक नहीं
कटते रहते हैं हजारों पेड़
बनते रहते हैं बेहिसाब
कंक्रीट के भवन 

लेकिन पहाड़ में
अपने लगाये वन में भी
गाय-बकरी नहीं चर सकती
नहीं उठाया जा सकता
एक तिनका भी

जंगल के बीच
सदियों से गुजरने वाले रास्ते
चौड़े नहीं हो सकते
हजारों की आवादी
मीलों दूर पैदल
भटकने के लिए मजबूर
लेकिन
सड़कें नहीं बन सकती.

वन अधिनियम
सिर्फ हमारे लिए
पेड़ नहीं हटेंगे.
जमीन नहीं खुदेगी
अधूरी पड़ी सड़कें
आगे नहीं बढेंगी

पहले भी जंगल थे
जंगल से लगे गाँव थे
गाँव से लगे चारागाह थे
एक व्यवस्था थी
समुचित
न कोई दिक्कत
न कोई परेशानी

किस नीति के तहत
पूरे पहाड़ में
चीड के जंगल लगाये
आज खेतों के बीच में 
घर-आँगन में
चीड के भयंकर वन
उग आये हैं
जंगली जानवर
बन्दर,सूअर ,बाघ ,भालू
घर के अन्दर तक
घुस आये हैं

चारागाह ख़त्म हो गए
चीड की विकरालता ने
सम्पूर्ण पर्वत श्रृंखला पर
अपनी जड़ें जमा ली हैं
चौड़ी पत्ती के पारंपरिक वनों पर
दानव रुपी चीड का
तोप लगने लगा है
बांज,बुरांश,तिलंज आदि का
लोप होने लगा है

यहाँ का किसान
अपने पुश्तैनी खेत के किनारे पर खड़े
चीड का एक कतरा
अपने घर की टूटती धूर के लिए
नहीं काट सकता
घर के कच्चे फर्श-दीवारों को
लीपने के लिए
लाल-सफ़ेद मिटटी का एक ढेला
नहीं उठा सकता

पीढ़ियों से
जंगलों के बीच
पैदा हुए
बढे-पले लोग
जंगल से
एक पत्ता नहीं बीन सकते

यहाँ के रास्ते
चौड़े नहीं हो सकते
सड़कें नहीं बन सकती
क्योंकि
पर्यावरण का मामला है
वन अधिनियम लागू है

ये कैसी
कुरीति है
कुनीति है
वन एवं पर्यावरण को
सर्वाधिक सुरक्षित
रखने वालों पर
पर्यावरण रक्षा की
पड़ रही है
सबसे अधिक मार
उनकी अपनी जरूरत पर
नहीं कट सकती है
पेड़ की एक डाल
मगर   
स्वार्थवश
कुनीतिवश
सरकारी मुहर लगने से
चल सकती हैं हजारों आरियाँ
अनगिनित पेड़ों पर.


           डॉ नरेन्द्र गौनियाल ...
[वर्तमान वन नीति के खिलाफ गढ़वाली कविता ; वर्तमान वन नीति के खिलाफ कुमाउनी कविता ; वर्तमान वन नीति के खिलाफ उत्तराखंडी कविता ; वर्तमान वन नीति के खिलाफ मध्य हिमालयी कविता ; वर्तमान वन नीति के खिलाफ हिमालयी कविता ;वर्तमान वन नीति के खिलाफ उत्तर भारतीय कविता ; वर्तमान वन नीति के खिलाफ भारतीय कविता ; वर्तमान वन नीति के खिलाफ सार्क देशीय कविता ; वर्तमान वन नीति के खिलाफ एशियाई कविता ]

Bhishma Kukreti

डा. नरेंद्र गौनियाल की दो गढवाली कविताएँ



***असगुनी बत्ती***


गाडी मा
बत्ती लगण से
वूंकी त 
अपणी ही
बत्ती बुझी गे

तू बि अपणी खुटी
भुयां धैर
आज की देख
भोल की सोच
जमीन मा रहे कि
अगास देख
बिन फंकुड़ों का
सुद्दी न उड़
सुप्पा का फंकडु लगेकि
भ्याल का मुंड मा जैकि
फाळ नि मार

सिर्फ
अपणी पुट्गी
भ्वरनै फिकर मा नि रहे
तू जन प्रतिनिधि छै
जन कि सेवा कैर
गरीब लोगों तै नि ठग
पैदल हिट
कुंगली खुट्यूं
नि हिटेंदु त
गाड़ी मा जैले
पण
गाड़ी का बरमंड  मा
असगुनी बत्ती
नि लगै .
     डॉ नरेन्द्र गौनियाल

******घंघतोळ  ***** 
टोंटी पर पाणि
द्वी-चार घाम मा हि
सुक्की जान्द
बरखा हूण पर पाणि
अफ्वी ऐ जान्द

लापता बिजली
वीआईपी का ऐथर
सुरुक ऐ जान्द
अर वापस जाण पर
दगड़ी चलि जांद

चुनौ का टैम पर
नेता भग्यान
ठुला,नना,टिटपुन्ज्या
रिंगणा रंदीन
चुनौ का बाद
हर्चि जन्दीन
जनता
चकरे जांद
रकरे जांद

पक्ष-विपक्ष
विकास कि बात छोडि कै
कुर्सी-मैक चुटाणा रंदीन
एक-हैंका पर
कीच-कादौ
लपोड़ना रंदीन
मै रैंदु घंघतोल मा
क्य जि करूँ
कैका बटन पर
हाथ धरूँ
कैकि कपाळी मा
डाम धरूँ..
     डॉ नरेन्द्र गौनियाल