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Articles & Poem by Sunita Sharma Lakhera -सुनीता शर्मा लखेरा जी के कविताये

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, July 15, 2012, 02:24:33 PM

Sunita Sharma Lakhera

रेत के कण

रेत के कणों में छिपा जीवन का सार ,
पल पल जीवन के घटते दिनों का आधार!

भोर की बेला में स्वर्णिम इसकी किरण ,
जैसे फैलती शिशु के मुख का भोली सी मुस्कान !

सुबह -सुबह नदी तीरे पंछियों का रेत पर देख कलरव ,
याद आते हैं बचपन के वे खिलखिलाते पल !

सूर्य की गर्मी से तपते इसके अंश ,
जैसे जीवन में युवावस्था की बढती उमंग !

दिन में इन्ही रेत के कणों का तपकर सुर्ख होना ,
प्रोढ़ावस्था में ज्ञान के सरोवर में सबका जीवन !

चाँदनी की ठंडक से मिलती इनमे शीतलता ,
जैसे जीवन की सांझ में बढ़ते बचपन को छूने का सकून !

मुट्ठी खुलने पर हाथो से इनका खिसकना ,
यूँ ही होता जीवन का मृत्यु से सामना !

बहुत समय से अजमा रही जैसे प्रकृति ,
रेत से अडिग धूप - छाँव की आसक्ति !

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Sharma ji.

This is one of the best poem you have written. You have described the real situation.

Quote from: Sunita Sharma Lakhera on July 30, 2012, 06:15:31 AM
देखो धरा  रो  रही है .......
देखो धरा  रो  रही है .......


देखो धरा  रो  रही है .......
चारो  ओर फैलता देख वैर -वैमनस्य ,
नैतिकता रौंदी जा रही अनैतिकता के हाथों !

देखो धरा  रो  रही है .......
अवचेतन होती मूल्य  धारा  से ,
ममता छिन रही बर्बता  के हाथों !

देखो धरा  रो  रही है .......
मूर्छित हो रही वज्र कठोर धर्मनीति  अब ,
कुलाचे मार रहे आतंकी निर्ममता  के हाथों ,

देखो धरा  रो  रही है .......
हिंसक बनती उसकी रचना ,
निष्क्रिय  होता मानव आत्मबल  शोषण  के हाथों  !

देखो धरा  रो  रही है .......
जाती पाती की विभस्तथा बढ़ रही ,
बन रही महाकाल रंजिशों के हाथों  !

देखो धरा  रो  रही है .......
कास्तकारों के उजड़े  बंजर भूमि ,
बन रही बली  बिजली कटौती  के हाथों !

देखो धरा  रो  रही है .......
धर्म क्षेत्रवाद  से बंट रहा रास्ट्र ,
स्वर्ग सी इस धरा को रौंद रहे आन्दोलनों  के हाथो !

देखो धरा  रो  रही है .......
मोह ,माया ,मृगतृष्णा  से शुब्ध सब जन ,
कुचल रही मानवता बढती महंगाई  के हाथों !

देखो धरा  रो  रही है .......
बिसर चुके हैं परतंत्र की बेडी,
स्वतंत्रता खो रहे हैं ,विदेशी पूंजीपत्ति के हाथों !

देखो धरा  रो  रही है .......
देखो धरा  रो  रही है ......

Sunita Sharma Lakhera

इंसानियत

इन्तजार इन आँखों से अब जुदा हुआ
शायद कोई टूटा तारा कहीं दफ़न हुआ
खुद अपनी बस्ती जलाकर भी दीदार न हुआ
जिसके लिए ताउम्र जगे वही शायद अब रुखसत हुआ

भीड़ से भरी महफिलों से शायद वह तन्हा हुआ
शब्दों के पथराव से शायद वह घायल हुआ
वक्त के अंधियारे गलियारे में शायद वह गुम हुआ
हुकुमरानो की बड़ी दुनिया में वह नितांत एकांकी हुआ

बचपन की कसक ,यौवन की ग्लानी में वह खाक हुआ
चिंतित मन में अवसादों का सैलाब गहरा हुआ
रात के भयावह सायों में उसका अक्ष धूमिल हुआ
समय के कुचक्र में वह पूरी तरह उलझा हुआ

मायूसी के आलम में वह खुशनुमा न हुआ
जीने की उमंग से मानो वह बेज़ार हुआ
कोमल लफ्जो की भटक में वह नीलाम हुआ
कुदरत के सितम से टूट कर वह खुदी हुआ

कुछ कर गुजरने की चाह में वह मदहोश हुआ
दीपक सा रौशन उसका दिन फना हुआ
प्रकृति के खिलवाड़ से उसका जीवन तन्हा हुआ
फिर भी इंसानियत घुट्ती रही और लुटेरों का बाज़ार गर्म हुआ ...

Sunita Sharma Lakhera

फेसबुक व् रिश्ते
फेसबुक  पर  रिश्तों की महिमा बड़ी विचित्र
कहीं पर जन्म जन्मान्तर के रिश्ते हैं बनते
अटूट दोस्ती के  मिशाल भी यहीं  पर बनते
सुख दुःख साँझा करने का अद्भुत मंच यहीं हैं बनते
पर यहीं  बेरहम  लोग  रिश्तों की कद्र नहीं जानते
एक दूसरे  की भावनावों  को नहीं पहचानते
लोग अपनों के साथ ही विश्वाशघात किये जाते हैं
ये  दुनिया है घोटालों की दुनिया ,दिल यहीं तोड़े जाते हैं
दोस्तों की बातें भरी महफिलों  में उड़ाई  और  जग हसाई की जाती है
इस मंच पर सभी मोखोटा लिए बैठे हैं ,और दूसरों  का परिहास किये जाते हैं
इस सुंदर मेल मिलाप के जगत को क्यूँ हो प्रदूषित करते
अपनी चंद लम्हों की ख़ुशी की खातिर दूसरों का हृदय भेदन करते
मान बड़ाई सभी को  प्यारी ,सबका  स्वाभिमान का ध्यान क्यूँ नहीं रखते
अपने प्रशसको व् मित्रों  के शब्दों को  प्रोत्साहित नहीं कर सकते तो हतोसाहित भी क्यूँ हो करते
लड़कियां भी किसी घर की माँ, बहन, बेटियां  हैं उनमें आप अपने  घर की महिलाएं क्यूँ नहीं देखते ,
उनके तश्वीरों को नीलाम कर  क्यूँ  अपने घरों को असुरक्षित हो बनाते
जगत में भाई बहन का रिश्ता बड़ा ही अनमोल  उसकी आप अपने मित्रों संग  क्यूँ तिरस्कार करते
फेसबुक के संसार को सुंदर न बनाकर , आपस के इस आसान परिचेय व् व्यवहार  मंच को क्यूँ कुछ लोग  विभस्त बनाते !

Sunita Sharma Lakhera

प्रहरी

धरती की इस विराट नगरी
में अडिग खड़ा रहता सदैव प्रहरी
पहाड़ों व् कन्दराओं में खड़े साये आतंकी
मौसम की जटिलता को सहर्ष  स्वीकारे प्रहरी
मानवतावाद व् देश प्रेम तो दिखता इसमें हर घड़ी

आतंकी आक्रमण हो यदि कहीं
सीने पर हँस कर  खाता वह गोली
कुदरत  की मार गर पड़े समाज पर कभी
फिर  करता पहरेदारी बन अडिग प्रहरी
कर्तव्य पथ पर सदा बढ़ता प्रहरी

देश सुरक्षा  में समर्पित रहते ये सदा
समाज की कृपा दृष्टी को तरसते ये प्रहरी
वीरगति के बाद मिलती इनको ख्याति
नही पहचान उसकी जब तक नही पहुंचती अर्थी
इन्हें तो बस चाहत  हमारे प्रेम व् प्रोत्साहन  की

अपनी माँ का आँचल छोड़कर जाना आसन नहीं
अपनी  बहिन का स्नेह को ठुकराकर जाना सरल नहीं
अपनी हमदम  का साथ भुलाकर जाना आसन नही
अपनी मात्रभूमि पर जान न्योछावर  करना आसन नहीं
भावनाओं  को कर  ह्रदय में कैद फ़र्ज़ निभाता  प्रहरी

सेवानिरवृत पर समाज में नहीं होती उसका परिचय
मात्र फौजी का दमका टाँगे घूमता गली गली
स्वाभिमान त्याग कर जीता बन मामूली
युद्ध गाथा गर सुनाये  तो कहलाता ढोंगी
भावनाओं  के  त्याग  को न समझे कोई

उसके सम्मान  पर जैसे किसी को अभिमान नही
हमारे लिए सदैव  गर्व  से खड़ा सीमा पर प्रहरी
कभी समाज  कभी स्वयं   से हार गया प्रहरी
प्रकृति  के आगे बहादुर हार जाता अपनों से प्रहरी
फिर भी देखो हर रोज कितने लाल बन रहे प्रहरी

Sunita Sharma Lakhera

आस  मेरे मन की......

अपने आदर्शों से दूसरों  के स्वाभिमान  न कुचलना ,
अपने सोच की धरोहर से दूसरों को अपमानित न करना ,
अपनी बातों की महिमा में दूसरों का तिरस्कार न करना ,
अपनी संकुचित मानसिकता से दूसरों का हृदय अवसादित न करना !

अपनी आजादी के लिए दूसरों को पराधीन मत करना ,
अपना शीश के अहंकार में दूसरों के शब्दों की अवहेलना  न करना ,
अपने मन के भाव खिलाने में दूसरों के मन को मत रौदना ,
अपने तन के घाव भरने के लिए दूसरों को घाव न देना !

अपने बोझिल चिन्तन से दूसरों को हतोसाहित न करना ,
अपने बंजर धरती के रंज में दूसरों को रंज मत देना,
अपने पत्थर  दिल से दूसरों को प्रताड़ित न करना ,
अपने मन को विशाल बनाकर समाज कल्याण में तत्पर रहना !

Sunita Sharma Lakhera

मेरी पहचान है हिंदी

हर्षित करती ह्रदय हिंदी ,
हल्की न समझना हँसती हिंदी ,
हिमालय पर हिम समान हिंदी ,
झर -झर बहती घर -घर हिंदी ,
अंग्रेजी को हाँका करती हिंदी ,
ह्रदय को विराट करती हिंदी ,
सब भाषाओ से सरल हिंदी ,
देश प्रेमियों को भाये हिंदी
हमारा सम्मान है हिंदी ,
अपने व्यवहार में लाओ हिंदी ,
सब भाषाओँ का सम्मान पर स्वाभिमान हिंदी ,
हिंदी दिवस पर न करो अपमान कहती हिंदी ,
मूल अपना पहचान बोलो बस आज केवल हिंदी ,
लीडरों ,वक्ताओं से है विनती केवल अपनाओ हिंदी,
विदेश में माना पहचान अंग्रेजी पर संस्कृति है हिंदी ,
याद रखें सदैव हिन्दुस्तान की पहचान है हिंदी,
आओ मिलकर हम सब कहें मेरी पहचान है हिंदी !

Sunita Sharma Lakhera

ख़ामोशी

प्रकृति की देख अजब पहेली ,
जिसकी न संग कोई सहेली ,
धूप छाँव संग नित्य खेली ,
फिर भी जाने क्यूँ है अकेली !

भोर की बेला या दोपहर की चुभन ,
साँझ की लाली या रात काली इस गगन ,
प्रकृति की ख़ामोशी से रुकी धड़कन ,
मायाव्यी लगते अब इसके हर उपवन !

उदासी व् क्रुन्दन का माहोल से होती भोर
बेबसी का आलम छाया हर छोर
मंजिलो की तलाश में भटकता मुसाफिर
शुष्क भावनाओं की बढती भीड़ चारों ओर !

कभी हंसती थी इसकी डाली डाली ,
चारो ओर फैली रहती खुशहाली ,
अब देखो विपदाओं से है बदहाली ,
इंसानियत का कत्ल हो रहा गली गली !

कहीं मजहबी दंगे तो कही रोटी की लूट ,
अमानवीय मूल्यों पर चढ़ रही युवा पीढ़ी की भेंट ,
शिक्षा या रोजगार आरक्षण बनाम अत्याचार का बढ़ रहे रेट,
खामोशियों से न भरें इस बढते भ्रस्टाचार से ग्रसित लोगों के पेट !

Sunita Sharma Lakhera

हमारे बुजुर्ग

जीवन के कर्तव्य पथ को खूब निभाते माँ पिता ,
माँ होती अगर  धरती तो है जग में  विराट आसमां पिता,
माँ निस दिन अपना सुख  चैन खोकर बच्चों को सुख  देती ,
पिता अपने खून पसीने से बच्चो की अभिलाषाएं पूरा करते,
शैशवस्था से यौवन  तक उनका जीवन त्याग में बीतता ! 

पंख निकलते  बच्चे अपना खुद का आशियाँ बना लेते,
जीवनभर  जिस आस से उन्हें प्रवीण बनाया ,
आज वही माँ बाप बच्चो को खुद पर भारी पड़ते ,
माँ यदि अपंग नही तो बनती तुम्हारी नौकरानी ,
पिता यदि पेन्सन रहित तो बनते केवल ताड़न के अधिकारी !

जिन माँ पिता की ऊँगली  पकड चलना ,बोलना और कमाना सीखा,
उनके बुढ़ापे में तुम नही वही  कार्य करते व् अपना फ़र्ज़ निभाते,
जीवन भर तुम्हारी ख़ुशी की खातिर जिन्होंने नींद भूख त्यागी,
आज उन्ही से तुम दो रोटी और चंद प्यार के बोल ठुकराते ,
जब उन्हें तुम्हारा सहारा चाहिए तब उनके अकेला छोड़ दूर कहीं नीड़ बसाते !

वक़्त के आखिरी पड़ाव में कितने मजबूर से वे लगते ,
जिन सपनो की खातिर उन्होंने अपना सुख चैन न देखा ,
उन्ही सपनो को तोड़ बच्चे उन्हें कितनी पीड़ा देते ,
बच्चों ने तो इस आधुनिकता की दौड़ में भुला दिए संस्कार सभी,
अपने माँ पिता की लाचारी देख भी उन्हें न पीड़ा होती कभी !

जिन माँ पिता ने बच्चों को वसीयत में कुछ न दिया,
बच्चों ने उन्हें काल कोठरी या फिर मृत्यु दंड दिया ,
इन बुजुर्गों का जिस्म से रूह  तक वेदना में गुजरती ,
साथ न हो यदि बुजुर्ग दंपत्ति  तो घर समाज पर बोझ कहलाते ,
आज के बच्चे कल बुजुर्ग कहलायेंगे  ये इन्हें कौन समझाएगा !

जैसा करोगे वैसा भरोगे ,ये वक़्त तो नियति ही बतलाएगी ,
अपना समय न दे सको तो अपने बच्चों के साथ तो रहने दो ,
क्यों यह डर तुम्हे सताता की ये तुम्हारे बच्चों का अहित सोचते,
अरे खुदगर्जों तुम क्या यूहि संसार में बड़े हुए ,
तुमको दुनियादारी सिखाने वाले क्या तुम्हारी संतान को न चाहेंगे !

लोग वर्ष में अंतरास्ट्रीय वरिष्ठ  दिवस मानते ,
धिक्कार है हमारी सोच को की हम केवल बाहय दिखावा करते,
हो मन में जरा सा भी आत्मसम्मान कहीं ,
घर के बुजुर्गों को दो सम्मान ,न करें वर्ष का इन्तजार,
बुजुर्ग घर का नीव होता ,होता समाज की संजीवनी !

अपनों को अपनाकर देखो सारी धरती तुम्हारी ,
धन्य हैं वे घर जहाँ पर बुजुर्ग की दिखती खुशहाली,
जिस घर में होती बड़े बुजुर्ग की निस दिन सेवा ,
और गूंजती रहती जिसमें हरपाल बड़ों की अमृतवाणी ,
उस घर में हर दिन होती खुशहाली और हर दिन दिवाली !

Sunita Sharma Lakhera

बादल

`बादल हैं आँसू धरती माँ  के आँखों  के,
कुछ पलों में ही देती सबक इंसान को ,
गर्मियों में निरंतर बाट जोहते जिन बादलों की ,
वही बनती विपदा जब फटता बादल इंसान पर ,
चारों  तरफ हैं पानी पानी  फिर भी बेहाल इंसान ,
घर बह गए ,जीवन मिट गये ,त्रासदी का माहौल ,
बादल हैं आँसू प्रकृति के ,ले रही प्रतिशोध खिलवाड़ की !