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Articles & Poem by Sunita Sharma Lakhera -सुनीता शर्मा लखेरा जी के कविताये

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, July 15, 2012, 02:24:33 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


Dosto,

We are introducing Poet & Writer Sunita Sharma Lakhera Ji to Merapahadforum Community. She is a writer and  her  ambition is to bring awareness in every individual and home for the development of her state (Uttarakhand) and country as a whole.

She believes that if we are able to change public opinion then we are able to mould our society .Her medium of explosion is her poetry and articles in Hindi ,Garhwali and of course English too that are written for social enlightenment.We hope you would like the article & poems written by Lekhera ji Merapahdforum.com.

Once again a very warm welcome to Merapahadforum Community Sunita Sharma Lakhera ji.

M S Mehta
Merapahad Team

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


Here is the first poem by Sunita Sharma Lakhera Ji. Very good poem written on migration issue in garhwali language.   

पलायन कु पीड़ा च तयार हृदय मा
बाँझ पड़ी छन पुन्गुड़ी कुठियार सरा !
अपाहिज ह्येह गयों मी ,भी तुय जनि,
मी नि बिसरे छौ तुय जन !
सुप्नेय कु तान- बान मा दूर हुय गयों बस ,
मरर्ण बाद जन शरीर कु हाल हुन्द ,
तन छाई मेअरा प्राण हे देवभूमि !

तेरी बठुली दिन रति सतौन्दी छ ,
मुलुक -२ हसंदी आय जांदी तू सुपन्यों मा,
भूखि तब भी रान्द्द छयी ,अब भी वनी छ ,
नौनियों का बचपन त घर भीतर सिमट गेई ,
उनक खेल परदेश मा खोई गैन !

यख ता मी पेल भी इकुली छाई ,अर अब भी,
प्रवासी हूण की सजा भुग्दी रांदु सदनि ,
अब त वापिस आन भी चांदू पर .....,
सुप्न्युन व् हकीकत कु अंतर्द्वंद ,च लग्युं !

Sunita Sharma Lakhera

मी छौं पहाड़ की नारी
मी छौं पहाड़ की नारी
मिसे रुठयी च जग सरी
जन्म से हुन्द संघर्ष जारी
ढोर डंगर से बदतर जिंदगानी
घर पुन्ग्री पंदेरों मा सदनी पिसेंदी

मी छौं पहाड़ की नारी

म्योर डाऊ कैनी नि जानी
घास कु भोझ मा दब्यु सदनी
बस्खयाल मा जिकुड़ी झुरन्दी
भैर भीतर मीनी संभालनी

मी छौं पहाड़ की नारी
घाम जड्डू बरखा मेरी सहेली
तेडू- मेडू रस्ता मा भात्क्दी रौंदी
भूख तीस भुलैक्न्न औरो कुन पीसदी
पण तारीफ त दूर गाली मेरु हिस्सा ही औंदी

मी छौं पहाड़ की नारी
डीनडालू मा सासु कु रम्रार्ण
घोर मा बच्चों की घिम्सान
सरपया घर्वालू कु दगडी औख्याली जन
जन्द्रू जन दुई पाटयूँ मा पिस्दा जीवन

मी छौं पहाड़ की नारी
जन्न कंन लोग्यु कु बखान
दानो सयानो मा मेरी छुयाल
अप्रि सोच ते देकन नै उडान
चल पड्यु में अब नै रस्तो पर

मी छौं पहाड़ की नारी
दीनै छौ दुनिया ते मिसाल
चिपको से हिमालये बचाण
सर्प्यों से देवभूमि बचाण
घर -२ ज्ञान कु रौशनी फैलान
मी छौं पहाड़ की नारी
त्यार जीवन अर पहाड़ कु आंसू अब व्हेल तेरी जुबानी
कंडली सा धरी कण रूप बन जा अब तू शेरनी
जैबर तू उठी जैली त तेरी जीवन कु कुयेडी छटी जैली
साहस कर तू ही ली सकद यख क्रांति !!

Sunita Sharma Lakhera

विदाई की घडी

विवाह के बाद आती विदाई की घडी ,
लग जाती है सबके नयनो में अश्रुझर्री,
शुभ घड़ी कहीं तो कस्टदाई कड़ी कहीं ,
समझोता कहीं तो कहीं फर्जों की झड़ी !

विवाह के बाद आती विदाई की घड़ी ,
वरपक्ष बटोरते नोटों की गड्डी,
वधुपक्ष का दर्द समझता वही जिसके ऊपर आन पड़ी ,
जुदा होती दिल के टुकड़े पर निगाहें अड़ी!

विवाह के बाद आती विदाई की घड़ी ,
अश्रु कहीं तो कहीं आभूषण की देखी जाती लड़ी
धैर्य का मोती पहन अज्ञात राह बढ़ चली
नई डगर पर द्हेजी दानवी खड़ी !

विवाह के बाद आती है विदाई की घड़ी ,
अश्रु पीक़े पिता का घर छोड़ चली ,
कडवे बोल ,जख्मी हृदय न खोल सकी कभी ,
जीवन -मृत्यु के कट्टु अवसादों में हर पल घिरी !

विवाह के बाद आती है विदाई की घड़ी ,
आभावग्रस्त जीवन हर पल हँसकर जीती ,
कन्याओं को यमभेंट क़र न ले सकी सिसकी ,
जीवन चिता को हंस कर झेल गयी बेटी !!

Sunita Sharma Lakhera

इंसानियत के मसीहा

इंसानियत पर देखो आडम्बर का साया है ,
प्रगतिशील समाज पर विषधर की छाया है ,
भूख से बिलखता बचपन ,चंद रुपयों का तमाशा है ,
बसन रहित तन जिनके अक्षि प्यास बुझाते हैं ,
रजनी जिनके सहचर ,कृशनु जिनका जीवन है ,
तीर्थस्थलों में कनक चढाते ,पंडो के भरे पेट भरते हैं ,
वसुधा की त्रास भुलाकर ,व्योम की कल्पना करते हैं ,
विटप को छिन-भिन क्र पुहुप की चाह रखते हैं ,
तोयज हृदय में त्रिश्नाओं के मायाजाल बुनते हैं ,
पन्नग बन इस भव में व्यथा हर पल बढ़ाते हैं ,
अपने उमंग की खातिर ,वपु का सौन्दर्य बढ़ाते हैं ,
अमीर द्रुम न बन रंजो गम की अग्नि फैलाते हैं ,
गरीब की इंसानियत ,अमीर जगत में सुरसरि समान है ,
भागीरथी सा जीवन जीते गरीब इंसानियत के मसीहा हैं

Sunita Sharma Lakhera

दहेज़ पर पूर्व प्रकाशित रचना !

मौत

शब्दों के भयावह झंझावत खामोश हो चले ,
मन की त्रिश्नाओं में वीरान मौन सिमट गयी ,
मुस्कुराती फूलों पर घोर विभस्ता छाई ,
जीवन ज्योति को तिमिर सिन्धु में डुबो गयी,
रूह चीत्कार उठी तेरे आने पर ए मौत !

चेहरों पर विभस्त विकराल दानवी चेहरे लिए ,
घर -घर ,नगर -नगर तेरे स्वरांजलि बने हुए ,
दहेज़ -वेदी से उत्पीडन ज्वाला लिए हुए ,
फूलों की सेज से सती कुण्ड तक बिखरी हुए ,
क्यों लील जाती जीवन ए मौत तू ख़ामोशी लिए हुए !

तुझे बनाने वाला स्वयं आशुतोष कहलाता ,
फिर तू क्यों इतना विष भीतर छिपाए मासूमो को लीलता ,
क्यों अनगिनत मासूमो के हृदय को तू दुःख रंजित करता ,
क्यों इन दहेजी दानवों के जीवन तू बकसता,
क्यों न तू इन दहेज़ पिपासु गिद्धों के चीथ्रे उडाता !

Sunita Sharma Lakhera




आखिर क्यों ?

हे सर्वत्र प्रेम सरिता बहाने वाले श्री लयकर्ता,
क्यों तेरी ही बनायीं इस दुनिया में घृणा ,द्वेष व् अराजकता फ़ैल रही है ?
क्यों तेरे ही बनाये किरदार एक दूसरे के खून के प्यासे हो रहे हैं ?
क्यों तेरा गुणगान गाने वालों को रौंदा जा रहा ?
क्यों तेरी आस्था के स्थान पर नास्तिक लोगों को पूजा जा रहा ?
क्यों कहीं व्यभ्याचार व् कहीं विभस्त चीखें गूँज रही ?
क्यों इमानदारी परेशान तो बईमानी हंस रही है ?
क्यों तो हे त्रिकाल अभी तक आँखे मूंदे तुम कुछ सोच रहे ?
क्यों नहीं हे लयकर्ता ,सर्वत्र व्याप्त इस असंतोष हेतु अपनी त्रिकाल दृष्टी अपना रहे ?

Sunita Sharma Lakhera

कहते हैं ..गुजरा जमाना सही था !

कहते हैं पुराना जीवन सही था ,
गरीब जून भर रोटी खाता था ,
कमरकस मेहनत पर मुस्कुराता था ,
पर अब महंगाई हँसती ,गरीबी रोती है !
कहते हैं गुजरा जमाना अच्छा था ,
पत्राचार दिलों में राज करती थी
अब इन्टरनेटई दुनिया मे सिमटे सभी ,
हर व्यक्ति इस भंवर में खो सा गया कहीं !
कहते पुराना जमाना सही था ,
तांगा ,बैलगाड़ी ,साईकिल इंधन रहित चलती थी ,
अब इंधनयुक्त वाहन बीमारी बन चली ,
हालातों के समंदर में कमरतोड़ महंगाई की आपाधापी !
कहते हैं पुराना वक़्त सही था ,
घर परिवेश में आदर ,प्यार ,मान बड़ाई आबाद थे ,
संस्कारों के दुर्लभ मोती जाने कब बिखर गए ,
शेष बची कशमकश भरी तनावग्रस्त जिन्दगी है !
कहते हैं पुराना समय ठीक था !

Sunita Sharma Lakhera


ईर्ष्या
जब दुनिया फूलों के बीच है खिलती ,
दर्द का रिश्ता बन मैं हूँ उभर आती ,
निर्झर बहते स्नेह धारा में हूँ ज्वालामुखी सी ,
तेरे भीतर से दहकती यह मेरी ज्वाला सी ,
हर कदमों पर काँटे बन जो उभर आती !

बढती तेरी संवेदनाओं की मैं दर्पण सी ,
तेरी टीस बन जाती मेरी टीस सी ,
तुम्हारी दुर्दशा मेरी सकून बन जाती ,
अपने इस ईर्ष्यालु संसार में मुस्कुराती ,
पल पल तड़पती रूहें देख मैं इठलाती !

तेरे मन का लहू,मेरी प्यास बुझाती,
तेरा संताप ,मेरे आभामंडल बन जाती ,
तेरी चिंता मेरी ख़ुशी बन जाती,
जो तू न मुझे बुलाती ,तो कैसे तुझे रिझाती
बन ज्योति तेरे हृदय केसे यूँ समाती !

Sunita Sharma Lakhera

वक़्त
मैंने पत्थरों में भी अकांक देखे हैं ,
जिसके निश्चल धरा में जीवन बसते हैं I
मैंने पत्थरों में भी फूल देखे हैं ,
वक्त से टूटे वीराने भी महकते देखे हैं I
मैंने पत्थरों में भी फूल देखे हैं ,
जीवन पतवार धोते रोते हुए देखे हैं !
मैंने पत्थरों में भी इंसान देखे हैं ,
अपनी पीड़ा मैं दूसरों के प्रेरक बनते देखा है I
मैंने पत्थरों में भी फरेब देखे हैं ,
रिश्तों के बीम मसलते ,नासूर बनते घाव देखे हैं I
मैंने पत्थरों में भी आपदाएं भी देखी हैं ,
अपने वजूद खोकर इंसानियत मिटते देखा है इ
मैंने पत्थर में भी भगवान देखे हैं ,
दूसरों के जीवन हेतु समर्पित इंसान देखे हैं !!