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Articles & Poem by Sunita Sharma Lakhera -सुनीता शर्मा लखेरा जी के कविताये

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, July 15, 2012, 02:24:33 PM

Sunita Sharma Lakhera


आपदा
__________
बादलों का फटन मा
घोरों कु उजडन मा
पुंगडियों कु बहण मा
जरा टैम नी लगदा

टीमों का बनन मा
विचारों कु बदलन मा
लांछन कु बरसात मा
जरा टैम नी लगदा

विकास ते बढान मा
विस्थापितों ते बसाण मा
अर सभियूं ते बचौण मा
जरा टैम नी लगदा


Sunita Sharma Lakhera

सुहाना जीवन
__________
जहाँ भोर की स्वर्णिम बेला हो
चहूँ ओर विहंगम दृश्य हो
सुन्दर गीतों की माला हो
तो जीवन क्यों न सुहाना हो

जहाँ लोगों में आपसी मैत्री हो
काम में साथ निबाहते हो
सुख दुःख को साँझा करते हो
तो जीवन क्यों न सुहाना हो

जहाँ प्यार की फसल उगती हो
मानवता का पाठ पढ़ते हों
बच्चों में संस्कार दिखते हो
तो जीवन क्यों न सुहाना हो

जहाँ मर्यादा की सीमा हो
बेटी बहुओं का सम्मान हो
बेटों को बुजुर्गों की फ़िक्र हो
तो जीवन क्यों न सुहाना हो

जहाँ सभी मेहनती लोग हो
कठिन जीवन में हँसते हो
नशा मुक्त जीवन जीते हो
तो जीवन क्यों न सुहाना हो

जहाँ दहेज़ मुक्त विवाह होते हो
सामाजिक उन्नति के कार्य हो
हर घर में राष्ट्र हित की बाते हो
तो जीवन क्यों न सुहाना हो
_________सुनीता शर्मा
आप सभी सुधिजनो को सादर नमस्कार ।

Sunita Sharma Lakhera

मानबता कु सिपै
__________

धन्य छिन वो मन्खी जौंथे अपरी प्राण प्यार नी छिन
मुसीबत कु मारा दगडी जू सरे दिन -राति लगीं छिन
घोर वूंकी भी व्होला जौंक घरवाल जग्वाल करणा व्हाला
वीर छिन वो मानबता कु सिपै जौन अपरी प्राण गंवें
किले नी सोच्दन कुई मनखी वूंकी घरवालों कु बारा मा
धरती मा दुःख तकलीफ सबी कुण बराबर च यु हमिथै नी दिखैणी
बुये- बाबा, भुल्ली - भुल्ला ,दादा- बौ, बोड़ा -बोडी भी युंक व्हाल
कण कैकि यून सभीयुं भी अपरी जिकुड़ी मा कठौरता लै होली
हे मेरा मुल्क कु प्यारो ज़रा यूँ हमदर्दो कु घरवालो कु ध्यान धरिन ।


Sunita Sharma Lakhera


खरी -खरी : साहित्य जगत में आत्ममुग्धता
******************************************
'आत्ममुग्धता' जिसे मनोवैज्ञानिक 'नार्सीसिज्म' कहते हैं आज सबसे अधिक दिखने में आ रहा है । आज के नवोदित साहित्यकार सबसे अधिक इस मनोरोग का शिकार हो रहे है । इस मनोरोग में कलमकार को वही लोग पसंद आते हैं जो उनकी हर सोच को सर्वोच्च कहें और हर बात पर वाह- वाह करते दिखाई दें । नतीजा चाहे कुछ भी हो, अपनी प्रशंसा सुनना ही उनकी सबसे बड़ी कमजोरी बनती जा रही है । एक सीमा के भीतर यह प्रेरक का काम करती है, पर इसके बाद जहर बन जाती है। मनोवैज्ञानिकों की मानें तो चापलूसी पसंद करना कोई शौक नहीं, यह एक रोग है। एक ईमानदार लेखक अपनी कृति को जब पाठकों के समक्ष रखता है तो उसे अपनी कमियों की सदैव तलाश रहती है । वह अपनी कृतियों की पहले कठोर समीक्षा पसंद करता है ताकि वह कृति उसकी प्रगति में बेड़ियां नहीं बने किन्तु आज स्तिथि बिलकुल विपरीत हो चुकी है । आखिर आज हर दूसरा रचनाकार अपने बारे में क्यों प्रचार करवाने पर तुला है । माना सोसियल मीडिया हर रचनाकार को पाठकों तक बहुत आसानी से जोड़ रहा है किन्तु रचनाकारों में प्रसिद्धि की लालसा इतनी बढ़ गई है कि ऊँचे मुकाम तक पहुँचाने के लिए नित्य नए हथकंडे अपनाए जा रहे हैं । प्रशंसकों की असली नकली भीड़ जुटाकर भोले पाठकों तक अपनी प्रसिद्धि का मायाजाल बनाने वाले ये बुनकर और कोई नहीं आत्ममुग्धता के शिकार वे मनोरोगी हैं जिनके अंदर धीरज व् आत्मविश्वास की भारी कमी दिखाई देती है । इसकी अति व्यक्ति और परिवार से लेकर समाज तक की तबाही का कारण बन सकती है । अक्सर आत्ममुग्ध रचनाकार अपनी आलोचना बिलकुल नहीं बर्दाश्त कर पाते और मामूली आलोचना मिलने पर उसे भविष्य की निधि न मानकर उसे अपनी मान -प्रतिष्ठा से जोड़ने लगते हैं जिसका खामियाजा भुगतता है वह आलोचक । सुधि आलोचक ने यदि किसी रचनाकार की कृति पर खामिया दिखाई हों तो उसे सकरात्मक भाव में नहीं ले पाते हैं ऐसे लोग और फिर उस आलोचक के पीछे पड़कर उसे पाठक वर्ग व् कलम मैत्री वर्ग में नीचे दिखाना भी इनके अहंकारी स्वाभाव का सबसे बड़ा गन बन जाता है । मंचों पर विशिष्ट सम्मान न मिलने पर इनके ईर्ष्यालु गुण प्रबल दिखने लगता है और ये कुंठित हो या तो अपना नुक्सान करते हैं या फिर दूसरों का । फ्रायड के अनुसार हम एक व्यक्ति के रूप में अपने होने के बोध या अहंकार के साथ नहीं जन्मे हैं। अहंकार समय के साथ-साथ हम में भरता जाता है। यह बाहरी दुनिया से हमारे संपर्क के प्रभाव से आता है। व्यक्ति अपनी तुलना अपने परिवेश की चीजों से करने लगता है। तुलना की यह प्रक्रिया जब बहुत बढ़ जाती है तो व्यक्ति कई स्थितियों में स्वयं को हीन महसूस करता है और वह एक अति की ओर बढ़ता है। जब कोई रचनाकार स्वयं को किसी की तुलना में हीन समझता है तो वह या तो समाज से बचने लगता है या आडंबर ओढ़ लेता है जब उसे लगता है कि उसकी असलियत जाहिर हो सकती है तो वह रक्षात्मक हो जाता है। अगर इस स्थिति पर वह शुरुआती दौर में ही गौर करना सीख जाए  तो इससे उबरना आसान हो जाता है। हालाँकि आमतौर पर आत्ममुग्ध रचनाकार खुद को असहज मानने को तैयार नहीं होता, पर अगर लक्षणों पर तटस्थ भाव से गौर किया जाए तो इसे समझा जा सकता है और इस तरह इसे बढ़ने से तो रोका ही जा सकता है। अगर आप इन आदतों के शिकार हैं तो स्वयं का समय रहते मूल्यांकन करें। अपनी कमियों और कमजोरियों पर भी बराबर नजर रखें। अपने सच्चे मित्र बनाएँ। कुंठा और अति आत्मविश्वास से बचने का उपाय है खुद को रचनात्मक कार्यों में लगाएँ। हमेशा सहज और संतुलित बने रहें। सफलता को सिर पर ना चढ़ने दें। दूसरों की अच्छी बातों की प्रशंसा करना शुरू करें ताकि आपका मन उदारता के मायने समझ सकें। ईर्ष्या से बचिए और अपने आस- पास अधिकतर आलोचकों की भीड़ जुटाएं जो आपके आत्मिक उथान के सच्चे सहायक हैं और आपको बेहतरीन करने के लिए प्रेरित करेंगे ।


Sunita Sharma Lakhera

खरी -खरी
***********
आज के युग में जहाँ जीवन का केंद्र बिंदु धनोपार्जन व् सामाजिक विवशताएं बन चुकी हैं ऐसे में आग में घी का काम किया है फेसबुक और अन्य सोसियल मीडिया ने । पहले बच्चों की शिक्षा की प्रथम पाठशाला उसका अपना घर होता था जिसमें जीवंत रिश्ते संयुक्त रूप में बाल मन को एक प्रवीण मूर्तिकार की भांति उसकी सुंदरता बढ़ाने के लिए नित्य प्रयासरत रहती थी । घर परिवार का हर एक सदस्य बच्चे के जीवन में सुदृढ़ नीव डालता था । पढाई के साथ -साथ मनोरंजन पर भरपूर ध्यान दिया जाता था और हम सभी व्यसक उसी अनमोल परिवेश में बड़े हुए हैं किन्तु आज का कटु यथार्त यही है कि हम सभी के पास समय आभाव तो है ही किन्तु जो थोड़ा बहुत समय होता भी है उसे हम अपने बच्चों को न देकर फेसबुक पर जाया कर देते हैं । जो लोग किसी सृजनकार्य से जुड़े हैं या सोसियल मीडिया उनकी जरूरत है उनके लिए तो सब ठीक है क्योंकी ऐसे घरों के बच्चे भी भविष्य के लिए अपने आस - पास की विचारक गतिविधियों से बहुत कुछ सीखते हैं किन्तु बाकि आम जन अपना मूलयवान समय अपने बच्चों को न देकर अपने मनोरंजन को दे रहा है जिसके फलस्वरूप बच्चे भटक रहे हैं और एक ही छत के नीचे एक ही परिवार के लोग अज़नबी सा जीवन और औपचारिक रिश्ते निबाह रहे हैं विशेषकर महानगरीय जीवनशैली में तो अब संस्कार बच्चे मीडिया और सोशल मीडिया से सीखने लगे हैं जो बहुत ही चिंताजनक है ।

Sunita Sharma Lakhera



यातायात जाम
_____________
दुनिया के जामनगर में
चारो तरफ भीड़ ही भीड़
सड़क और सड़कों को
जोड़ती सड़कें चलती
अंतहीन सफर पर
जहाँ आदमी की मात्र
पहचान बस वाहन
रेंगती - हॉर्न बजाती
असंख्य छोटे- बड़े वाहन
हरदम रंगों पर इतराते
फिर अपनी अमीरी पर
ऐंठते -धकेलते ठेंगा दिखाते
जीवन पथ पर बढ़ते ये मुसाफिर
मशीनी युग के अजीब दीवाने
जहां हर शक्स कैद होकर
इसकी तृष्णा संसार में
इतना उलझ चुका है
हर घर के हर व्यक्ति
चाहने लगा एक वाहन
समाज पर प्रभाव दिखाने
भीड़ बढ़ाने जाम लगाने
क्योंकि वाहन मोह को
भोग रहा है ढ़ो रहा है
गाली- गलौच के बोझ को
असमय मृत्यु के खौफ को
जिसको देख रहा निसदिन
जाम को पचाने की आदत ने
सिखा दिया आदमी को पचाना
समय की सभी अनियमित को
जिसमें हर रोज एक नया जीवन को
मजबूरी में जीते हैं नासमझ लोग ।

Sunita Sharma Lakhera



केदारनाथ आपदा
__________
समय कहाँ कब .....
किसी के लिए ठहरता है ,
थम जाती हैं ....
यहाँ केवल सांसे ,
प्राकृतिक हो ....
या अप्राकृतिक ,
रूह का देह को ..
त्यागने की परंपरा ,
फिर ब्रह्मलीन हो जा जाना ,
जहां शायद वेदनाओं की ,
पाषाण धरती न हो ,
केदार घाटी की भांति जो ,
पत्थरों का शहर बन गया ,
प्यासी रूहें भटक रही है ,
अपनों की तलाश में ,
जीवन की आस में ,
जैसे हर पत्थर के नीचे ..
लिख दी गई हो ...
दम तोड़ती तड़पती ....
अनगिनत मार्मिक दास्तान ,
जिनका इतिहास भूगोल ,
जानने के लिए फिर ...
असंख्य बेरोजगारों को ...
रोजगार मिल ही जायेगा ,
क्योंकि आपदा का असर ,
लोगों के जेहन में ,
साल छह माह ही रहता है ,
फिर समय चक्र में सबको सब ,
भुलाने की विवशता ही तो है ,
पुराने दर्द पर मरहम बोझ लगने लगता है ,
हर पल नवीन हादसों का इंतज़ार करती ,
मानवता वक़्त के साथ ढलती जाती हैं ,
वेदनाओं के नए सफर के लिए ।
___________________
सादर श्रद्धा सुमन अर्पित ।

Sunita Sharma Lakhera

पहाड़ों का दर्द
_________
महत्वकांक्षी मानव का  अहंकार देख ...
बदहाल पहाड़ अब रोता ही नहीं ...
बारिश भी उसका अंतर्मन भिगो नहीं पाती ,
औ उसके फेफड़ों में जमने लगी दर्द की झील ,
जो कालांतर में कहर बरपाएगी जरूर ,
चूँकि तुम्हारे जीवित होना ही उसकी मृत्यु है ,
तो इन दरकते पहाड़ों की मृत संवेदनाओं ने ,
वेदनाओं में जीना सीख लिया है शायद ,
ममता के आँगन पहाड़ पर हे मानव !
खनन में मगन तूने अपने अस्तित्व को ...
अंतहीन खतरे में डाल ही दिया है,
पूर्वजों के पूजे संवारे पहाड़ों की सम्पदा बेचकर ...
तेरा जीवन मद की भेंट चढ़ ही जाएगा ,
और कालांतर में बाढ़ का उग्र वेग ....
बहा ले जाएगी तेरे विभस्त अरमानो को ,
तेरे अहंकार की बढ़ती मीनारों को ,
तब हे मानव ! तेरा अस्तिव !
अंजुली भर मीठे पानी को तरसेगा ,
क्योंकि अभी नदी तेरे लिए नाला भर है ,
जिसमें तू बहाता अपने तन-मन के अवसादों को ,
उन जहरीले नदियों में जीवन का आधार ढूंढ लेना तुम ,
वृक्ष रहित बंजर पर्वत पर कैक्टस के उपवन उगा लेना तुम !
__________

( चित्र गूगल साभार )

Sunita Sharma Lakhera

पहाड़ों का दर्द
_________
महत्वकांक्षी मानव के अहंकार देख ...
बदहाल पहाड़ अब रोता ही नहीं ...
बारिश भी उसका अंतर्मन भिगो नहीं पाती ,
औ उसके फेफड़ों में जमने लगी दर्द की झील ,
जो कालांतर में कहर बरपाएगी जरूर ,
चूँकि तुम्हारे जीवित होना ही उसकी मृत्यु है ,
तो इन दरकते पहाड़ों की मृत संवेदनाओं ने ,
वेदनाओं में जीना सीख लिया है शायद ,
ममता के आँगन पहाड़ पर हे मानव !
खनन में मगन तूने अपने अस्तित्व को ...
अंतहीन खतरे में डाल ही दिया है,
पूर्वजों के पूजे संवारे पहाड़ों की सम्पदा बेचकर ...
तेरा जीवन मद की भेंट चढ़ ही जाएगा ,
और कालांतर में बाढ़ का उग्र वेग ....
बहा ले जाएगी तेरे विभस्त अरमानो को ,
तेरे अहंकार की बढ़ती मीनारों को ,
तब हे मानव ! तेरा अस्तिव !
अंजुली भर मीठे पानी को तरसेगा ,
क्योंकि अभी नदी तेरे लिए नाला भर है ,
जिसमें तू बहाता अपने तन-मन के अवसादों को ,
उन जहरीले नदियों में जीवन का आधार ढूंढ लेना तुम ,
वृक्ष रहित बंजर पर्वत पर कैक्टस के उपवन उगा लेना तुम !


( चित्र गूगल साभार )

Sunita Sharma Lakhera

पहाड़ों का दर्द
_________
महत्वकांक्षी मानव के अहंकार देख ...
बदहाल पहाड़ अब रोता ही नहीं ...
बारिश भी उसका अंतर्मन भिगो नहीं पाती ,
औ उसके फेफड़ों में जमने लगी दर्द की झील ,
जो कालांतर में कहर बरपाएगी जरूर ,
चूँकि तुम्हारे जीवित होना ही उसकी मृत्यु है ,
तो इन दरकते पहाड़ों की मृत संवेदनाओं ने ,
वेदनाओं में जीना सीख लिया है शायद ,
ममता के आँगन पहाड़ पर हे मानव !
खनन में मगन तूने अपने अस्तित्व को ...
अंतहीन खतरे में डाल ही दिया है,
पूर्वजों के पूजे संवारे पहाड़ों की सम्पदा बेचकर ...
तेरा जीवन मद की भेंट चढ़ ही जाएगा ,
और कालांतर में बाढ़ का उग्र वेग ....
बहा ले जाएगी तेरे विभस्त अरमानो को ,
तेरे अहंकार की बढ़ती मीनारों को ,
तब हे मानव ! तेरा अस्तिव !
अंजुली भर मीठे पानी को तरसेगा ,
क्योंकि अभी नदी तेरे लिए नाला भर है ,
जिसमें तू बहाता अपने तन-मन के अवसादों को ,
उन जहरीले नदियों में जीवन का आधार ढूंढ लेना तुम ,
वृक्ष रहित बंजर पर्वत पर कैक्टस के उपवन उगा लेना तुम !


( चित्र गूगल साभार )