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Our Culture & Tradition - हमारे रीति-रिवाज एवं संस्कृति

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, December 31, 2007, 12:16:54 PM

खीमसिंह रावत

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Mehta ji pl aap kundli font apane computer par dal le shri anubhav ji ne kundli font esi series me dali hai/

पंकज सिंह महर

Quote from: khimsrawat on July 10, 2008, 11:58:00 AM
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खीम दा,
     बारात जाते समय लाल निशाण इसलिये होता था क्योंकि पहले राजा किसी राज्य में आक्रमण करते थे और उनकी लड़की से विवाह करते थे, लाल रंग विजय और युद्ध का भी प्रतीक माना जाता है। साथ ही जब वह लड़की से शादी करके लाते थे, तो उस राज्य से संधि हो जाती थी और मित्राम बन जाता था, सफेद रंग ्को सुख-शांति और खुशहाली का प्रतीक माना जाता है। इसलिये वापसी में सफेद रंग का निशाण लगाया जाता था कि आ रही दुल्हन हमारे राज्य के लिये सुख-शांति और समृद्धि का वाहक होगी।
     अब यह रस्म के रुप में ही रह गई है, कई लोगों को इसके महत्व के बारे में पता ही नहीं है, दिल्ली-मुंबई में शादी करने वाले निशाण लगायेंगे कहां, जब उन्हें इसका महत्व ही नहीं पता।
     इसके साथ ही एक प्रथा और है कि बारात के गांव में पहुचने से पहले एक स्थान पर सभी वाद्य यंत्रों (ये बजते रहते हैं और इनके सामने एक कपड़ा रख दिया जाता है) और निशाणों को रख दिया जाता है, बारात पक्ष के सभी लोग इसमें कुछ मुद्रा आदि रखते हैं, यह पैसा बाजा बजाने वालों और निशाण पकड़ने वालों का ही होता है।

खीमसिंह रावत

mahar ji ab gaov wale bend baja le jane lage hai / ek to yah nagare-shrikar-ransing ke mukabale sasta padata hai/ dusara shahari karan ki jade dhire dhire gaov me bhi fail rahi hai/

aapako jankar khushi hogi ki delhi jaise shaharo me ab gaov ke vadhy yantro ko asani se book kara sakate hai/ bendwalo ki tarah pahadi bhai bhi ek part-time job esame kar rahe hai /

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

BY : D.N.Barola / डी एन बड़ोला 

पर्वतीय अंचल मैं जब वर वधू की शादी रचाई जाती है तो अनेक रश्में निभाई जाती है  मोबाइल व इन्टरनेट के युग मैं आज भी वधू के बाकायदा  आगमन की सूचना देने हेतु मस्चुन्गाई, मन्ग्च्बाई या मस्चोई को वधू पक्ष के घर भेजा जाता है.  मस्चुन्गाई कंधे मैं मॉस की दाल व चावल की थैली तथा  हाथों मैं दही की ठेकी लेकर वधू पक्ष के घर जाता है. उसे ससम्मान पिठ्याँ लगा व दक्षिणा देकर पठाया जाता है  दही की ठेकी पीले वस्त्र मैं लपेटकर व कच्ची हल्दी तथा एक मुट्ठा हरी साग (सब्जी) व दूब  के साथ भेजी जाती है. वधू पक्ष के लोग इस लगुनी शगुनी ठेकी का इन्तजार करते हैं तथा कौतुक वस पूछते है की मस्चुन्गाई दही की ठेकी लेकर आया कि नहीं मस्चुन्गाई दही की ठेकी को वर पक्ष द्वारा निर्मित मंडप मैं रख देता है.  इस प्रथा का मुख्य उद्देश्य वधू पक्ष को बरात के आगमन तथा बारातियों की संख्या आदि की सूचना देना होता है.  वधू पक्ष मस्चुन्गाई का स्वागत शंख  घंट बजाकर करता है तथा उसको जलपान एवं टीका पिठ्या लगाकर तथा समुचित दक्षिणा देकर सम्मानित करता है.
मस्चुन्गाई से सूचना प्राप्त होते ही वधू पक्ष मैं चहल पहल शुरू हो जाती है तथा वधू के माता पिता दुल्हे व बरात के स्वागत एवं धूलि  अर्घ के लिये  तैयार हो जाते हैं.
  पुराने जमाने मैं जब यातायात अवं टेलीफोन आदि के साधन नहीं थे मस्चुन्गाई एक दिन पहले ही वधू पक्ष के घर जाकर वधू पक्ष को वर पक्ष द्वारा  तैयारी, बारातियों की संख्या व बरात आने का समय आदि की पूर्ण जानकारी दिया करता था तथा दूसरे दिन बरात आने से पूर्व  कुछ दूर पहले बरात मैं शामिल होकर वधू पक्ष की तयारियोँ की पूर्व  सूचना एक भेदुवे (सी आइ डी) की तरह देता था.

वर पक्ष के दूत को मस्चुन्गाई क्यों कहा जाता है ? इसका  कारण यह हो सकता है की वर पक्ष एक थैली मैं मॉस की दाल व चावल भी भेजता है. पहले थैली मैं मॉस की दाल रखी जाती है, फिर र्थैली मैं एक गाँठ मारी जाती है . इस गाँठ के बाद थैली मैं चावल भर दिया जाता है. फ़िर इसे गाँठ पाड़कर  बंद कर दिया जाता है.  इस थैली को कंधे मैं सहूलियत से रख व हाथ मैं दही की ठेकी लेकर मस्चुन्गाई वधू पक्ष के घर जाता है. थैली  मैं मॉस व चावल रखे जाने के कारण ही  इसे मॉस चावल का अपभ्रन्स मस्चुन्गाई कहा जाता है. इस प्रकार मस्चुन्गाई प्रथा आज भी बदस्तूर जारी है.  (D.N.Barola)
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खीमसिंह रावत

मेहता जी हमारे यहाँ बुजुर्ग आदमी के साथ एक बच्चा भी मस्चुन्गाई भेजते है
क्या आपके यहाँ मस्चुन्गाई को सिसोन लगाकर नीबू के काटें चुभाते हैं किंतु ये सब मजाक में होता है/

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


उरकून - दुरकून ( शादी से जुड़ी प्रथा)

शायद यह प्रथा आजकल एक दिवसीय शादियों मे चलता है या नही ! लेकिन जहाँ तक मुझे याद है की बागेश्वर में जब में अपने घर था तो वह प्रथा वहाँ थी !

इस प्रथा में दूल्हा और दुल्हन शादी के दुसरे दिन फिर दुल्हन के घर जाते है और अपने माता पिता का आशीर्वाद लेते है ! शाम से समय (गोधूली) पर ये दूल्हा एव दुल्हन (दुल्हन का मायका) के घर पहुचते है जहाँ पर दोनों के आरतिया उतारी जाती है !  और पुनः दुसरे दिन ये दूल्हा दुल्हन की एक बार फ़िर से विदाई होते है !

हेम पन्त

हां ये प्रथा अब भी प्रचलित है... हमारे इलाके में इसे "दुन-गून" कहा जाता है.

अर्थात शादी के बाद दुल्हन की पुन: एक बार और विदाई की जाती है. इस प्रथा में थोङा सा परिवर्तन यह आया है कि शादी के बाद  दुल्हन व दूल्हे को विदा करने के बाद ही थोङी दूरी के बाद पुनः घर में ला कर विदाई के समय ही "दुन-गून" की प्रथा का निर्वाह कर दिया जाता है.

पंकज सिंह महर

:)सम्मान के बहाने निकाली दिल की भड़ास

नैनीताल। कूर्माचल सहकारी बैंक के रजत जयंती समारोह में सम्मानित लोक संस्कृति के पुरोधा खुलकर बोले। मुख्य सचिव की मौजूदगी में उन्होंने सूबे में लोक संस्कृति के नाम पर हो रहे मजाक पर इसके जिम्मेदार लोगों को आड़े हाथों लिया। उन्होंने दो टूक कहा कि यदि यह न रुका तो देवभूमि की सांस्कृतिक परंपराओं व मान्यताओं का नामोनिशान मिट जाएगा।
नैनीताल क्लब में आयोजित समारोह में पिथौरागढ़ की जोहार घाटी की संस्कृति व परंपराओं के विशेषज्ञ डा. शेर सिंह पांगती, गढ़वाल की जौनसार भाबर की संस्कृति को सबसे पहले लिपिबद्ध करने वाले डा.रतन सिंह जौनसारी व कुमाऊंनी कवि शेरदा अनपढ़ आदि के संबोधन में एक ही चिंता थी। उनका कहना था कि पाश्चात्य सभ्यता का बढ़ता प्रभाव राज्य की लोक संस्कृति को रसातल में पहुंचा रहा है। संयुक्त परिवार प्रथा टूटने से व्यथित डा.जौनसारी बोले संयुक्त परिवार पाठशाला है, जहां इज्जात व आदर्श सभी मौजूद रहते है, लेकिन यह प्रथा तेजी से दम तोड़ रही है। उन्होंने फिल्मी धुन पर कुमाऊंनी-गढ़वाली गीतों की रचनाओं को संस्कृति के लिए सबसे अधिक खतरनाक बताया। डा.पांगती ने कहा कि वैश्रि्वक दौर में एक विश्व एक संस्कृति की कल्पना की जा रही है, जिससे राज्य की लोक संस्कृति की जड़े खोखली हो रही है। उन्होंने कुमाऊंनी व्यंजनों को किचन से दूर कर उसके स्थान पर नोडल्स व चिप्स के उपयोग पर भी चिंता जताई। कुमाऊंनी कवि शेरदा अनपढ़ ने अपनी कविताओं के बहाने सांस्कृतिक गिरावट पर करारे व्यंग कसे। अपनी लोकप्रिय कविता कुछै तू सुनाकर उन्होंने उपस्थित लोगों को लोटपोट करने के साथ ही आत्ममंथन को मजबूर कर दिया। बहरहाल राज्य के बुजुर्ग संस्कृति कर्मी मौजूदा हालातों से कतई खुश नहीं है।

Devbhoomi,Uttarakhand

चूडाकर्म संस्कार

शिशु के जन्म के पहले तीसरे ,या पांचवें वर्ष चूडा कर्म संस्कार करने का प्रचलन है !रात्री में  बालक  के बालों पंच्देवी के रूप में पीले कपडे में पैसे और सुपारी कि पांच पोटलियाँ बाँधी जाती हैं



प्रात विधि विधान से पुरोहित द्बारा पूजन इत्यादि के बाद बाल कटवाए जाते हैं ,और दुल्ल्हे के सामान बच्चे का हल्दी हाथ किया जात है !बान दिए जाते हैं चौकी स्नान के बाद पीले वस्त्र पहनाये जाते हैं!

तथा आरती उतारी जाती है ,लड़के का मामा वस्त्र और चांदी कि हंसुली और हाथों के कंगन उपहार देता है !गाँव के लोगों तथा रिश्तेदारों के द्बारा वस्त्र तथा रूपये पैसे उपहार में दिए जाते हैं !

पूरे गाँव और समाज में विवाह जैसा उत्साह मनाया जाता है उतारे गए बाल पवित्र माने जाते हैं उन बालों को गंगा में या किसी अन्य पवित्र नदी में प्रवाहित किया जात! है !

Devbhoomi,Uttarakhand

जनेऊ संस्कार

इसे उपनयन या यज्ञोंपवित संस्कार भी कहा जाता है,कुमाऊँ में जनेऊ के लिए वर्तपान सब्द प्रचलित है और गढ़वाल मंडल में इसे जनेऊ ही कहा जाता है !

जहां यह संस्कार बड़े उत्साह से संपन्न होता है गढ़वाल के अधिकांस छेत्रों में इस संस्कार कि ओपचारिकता विवाह से पूर्व मंगल स्नान के साथ पूर्ण कर दी जाती है !

आधुनिक जीवन शैली तथा यज्ञोंपवित धारण करने के लिए सांस्कारिक बंधनों का पालन करने में असमर्थ रहने के कारण यज्ञोंपवित को नियमित धारण करने कि परम्परा केवल कुछ ही लोगों को सिमित रह गयी है !