• Welcome to MeraPahad Community Of Uttarakhand Lovers.
 

Some Exclusive Kumaoni Folk Songs- कुछ प्रसिद्ध कुमाऊंनी लोकगीतों का संग्रह

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, August 14, 2012, 07:02:44 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Prayag Pande यो बाटो कां जान्या  होला सुरा - सुरा देवी का मंदीरा |
चमकनी गिलास सुवा रमकनी   चाहा छ |
तेरी - मेरी पिरीत को दुनिये ड़ाहा छ |
यो बाटो कां जान्या  होला सुरा - सुरा देवी का मंदीरा  |
जाई फ़ुली , चमेली फुली, देणा फुली खेत |
तेरो बाटो चानै  -  चानै उमर काटी मेता |
यो बाटो कां जान्या  होला सुरा - सुरा देवी का मंदीरा  |
गाडा का गडयार  मारा दैत्या पिसचे ले |
मैं यो देख दुबली भ्यूं तेरा निसासे लै |
यो बाटो
कां जान्या  होला सुरा - सुरा देवी का मंदीरा  |
तेरा गावा मूंगे की माला मेरा गावा जंजीरा |
तेरी - मेरी भेंट होली देबी का मंदीरा |
यो बाटो कां जान्या  होला सुरा - सुरा देवी का मंदीरा  |
अस्यारी को रेट सुवा अस्यारी को रेट |
यो दिन यो मास आब कब होली भेंट |
यो बाटो कां जान्या  होला सुरा - सुरा देवी का मंदीरा  |

भावार्थ :
 
इस राह से किधर जा रही हो तुम ? सीधे देवी के मंदिर की ओर |
चमकते गिलास में तेज रंग की चाय रही हुई है |
तुम्हारे , मेरे प्रेम से सभी लोग ईर्ष्या करने लगे हैं |
इस राह से किधर जा रही हो तुम ? सीधे देवी के मंदिर की ओर |
जाई और चमेली के फूल खिले हैं , खेतों में सरसों फूली है |
तुम्हारी राह देखते - देखते मैंने अपनी सारी उम्र मायके में ही बिता दी है |
इस राह से किधर जा रही हो तुम ? सीधे देवी के मंदिर की ओर |
दैत्य- पिचास ने छोटी नदी की मछलियाँ मार डाली हैं |
देखा , तुम्हारे विरह में कितनी दुर्बल हो गई हूँ |
इस राह से किधर जा रही हो तुम ? सीधे देवी के मंदिर की ओर |
तुम्हारे गले में मूंगे की माला है और मेरे गले में जंजीर |
तुम्हारे और मेरी भेंट होगी देवी के मन्दिर में |
इस राह से किधर जा रही हो तुम ? सीधे देवी के मंदिर की ओर |
असेरी (स्थानीय माप का बर्तन )का घेरा |
आज के दिन , इस माह ,हम मिले , अब कब भेंट होगी ?
इस राह से किधर जा रही हो तुम ? सीधे देवी के मंदिर की ओर |

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Prayag Pande हो नी काटो , नी काटो झुमरयाली बाँज , बंजानी धुरा ठंडो पानी |
ठंडो पानी , ठंडो पानी , बाँज बंजानी धुरा ठंडा पानी |
नैपाल की धनपुतली , कमर खुकुरी |
बरमा जानी धनपतली ,कमर खुकुरी |
ठंडो पानी , ठंडो पानी , बाँज बंजानी धुरा ठंडो पानी |
हो नी काटो , नी काटो झुमरयाली बाँज , बंजानी धुरा ठंडो पानी |
म्हैना आयो चैत को हो कोई न कोई आलो |
जैको भाई , चाई रौली , गत भिटौली ल्यालो |
ठंडो पानी , ठंडो पानी , बाँज , बंजानी धुरा ठंडो पानी|
हो नी काटो , नी काटो झुमरयाली बाँज , बंजानी धुरा ठंडो पानी |
यो दिन यो बार मेरी ऊमर की बात |
भुलुलो , भुलुलो कुंछी , बांकी उन्छी याद |
ठंडो पानी , ठंडो पानी , बाँज बंजानी , धुरा ठंडो पानी |
हो नी काटो , नी काटो झुमरयाली बाँज , बंजानी धुरा ठंडो पानी |
(कुमाऊ का लोक साहित्य से साभार )

भावार्थ :
मत काटो काटो मत , इस नुकीली घनी पत्तियों वाले बाँज को , बाँज के वन का जल बहुत शीतल होता है |
शीतल , बहुत शीतल जल , बाँज के वन में बहुत शीतल जल होता है |
नेपाल का धनपुतली नामक व्यक्ति कमर में खुकुरी बांधे है |
धनपुतली वर्मा जा रहा है , कमर में खुकरी बंधी है |
शीतल बहुत शीतल जल , बाँज के वन में बहुत शीतल जल है |
मत काटो काटो मत , इस नुकीली घनी पत्तियों वाले बाँज को , बाँज के वन का जल बहुत शीतल होता है |
चैत का महीना आ रहा है , कोई न कोई अवश्य आवेगा |
जिन बहिनों के भाई हैं वे भाई की राह देखती होंगी कि कब भिटौली लेकर भाई आ जावे |
शीतल , बहुत शीतल जल , बाँज के वन में बहुत शीतल जल है |
मत काटो काटो मत , इस नुकीली घनी पत्तियों वाले बाँज को , बाँज के वन का जल बहुत शीतल होता है |
वह दिन , वह वार जीवन भर मेरी स्मृति में रहा |
जितना इसे भुलाने की चेष्टा की , उतना ही अधिक याद आया यह |
शीतल , बहुत शीतल जल , बाँज के वन में बहुत शीतल जल है |
मत काटो काटो मत , इस नुकीली घनी पत्तियों वाले बाँज को , बाँज के वन का जल बहुत शीतल होता है |

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Prayer

ए संज्या झुकि गेछ भगवान , नीलकंठ हिवाला |
ए संज्या झुकि गेछ हो रामा, अगास रे पताला|
ए संज्या झुकि गेछ भगवाना ,नौ खंडा धरति मांझा|
नौ खंडा धरति हो रामा , तीन हो रे लोका |
के संज्या झुकि गेछ भगवाना ,के संज्या झुकि गेछ |
के संज्या झुकि गेछ रामा ,कृष्ण ज्यु की द्वारिका |
हो के संज्या झुकि गेछ हो रामा , यो रंगीली वेराटा|
के संज्या झुकि गेछ भगवाना , यो पंचवटी मांझा |
के संज्या झुकि गेछ हो रामा ,रामाज्यु की अजुध्या |
के संज्या झुकि गेछ भगवाना , कौरवुं को बंगला |
के संज्या झुकि गेछ हो रामा ,यो गेली समुन्दरा|
के संज्या झुकि गेछ भगवाना ,पंचचुली का धुरा |
के संज्या झुकि गेछ हो रामा ,हारीहरा हरिद्वारा|
के संज्या झुकि गेछ भगवाना ,सप्ता रे सिन्धु ,पंचा रे नंदा |
ए संज्या झुकि गेछ हो रामा ,सुनै की लंका धामा ||

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बेटी की विदाई के समय गिदारों द्वारा गए जाने वाला कुमांऊनी संस्कार गीत -------

हरियाली खड़ो मेरे द्वार , इजा मेरी पैलागी ,इजा मेरी पैलागी |
छोडो -छोडो ईजा मेरी अंचली,छोडो -छोडो काखी मेरी अंचली ,
मेरी बबज्यु लै दियो कन्यादान , मेरा ककज्यु लै दियो सत्यबोल ,
इजा मेरी पैलागी |
इजा मेरी पैलागी |
छोडो -छोडो बोजी मेरी अंचली , छोडो -छोडो बहिना ,मेरी अंचली ,
मेरे भाई लै दियो कन्यादान , मेरे भिना लै दियो सत्यबोल,
इजा मेरी पैलागी |
इजा मेरी पैलागी |
छोडो -छोडो मामी मेरी अंचली , मेरे मामा लै दियो कन्यादान ,
इजा मेरी पैलागी ,इजा मेरी पैलागी

Courtesy  - Prayag Pande

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

लीजिये आज पेश है-   उत्तराखंड में पलायन के चलते वीरान होती बाखलियों की तस्वीरों के साथ उत्तराखंड और यहाँ के निवासियों की नियति को व्यक्त करता बहुत पुराना कुमांऊनी बाल - गीत -----------

छक - छक छुपरी मोत्यूं का दाणा |
पार बटी अइन  कुमइया राणा |
कुमइये ल मैं कै धान दिं |
धान मैं लै ऊखव दिं |
ऊखलै ल मैं कै चावल दिं |
तौलिल मैं कै भात दिं |
भात मैं लै ल्वारी दी |
ल्वारी लै  मैं कै दात्ती दी |
दात्ती मैं कै घस्यारी दी |
घस्यारिल मैं कै घास दी |
घास मैं लै गोरु दी |
गोरुल मैं कै दूद दी |
दूद मैं लै राजा दी |
राजा लै मैं कै घोड़ी दी |
मैं ग्यूँ माव |
घोड़ी लागि डाव |
मैं बैठयूँ स्योव |
घोड़ी पड़ी भ्योव ||

भावार्थ -
टोकरी भरी है मोतियों से |
सामने से आया दुष्ट कुमइया |
कुमइया ने मुझे धान दिए |
धान मैंने ओखली में डाले |
ओखली ने मुझे चावल दिए |
चावल मैंने पतीली में डाले |
पतीली ने मुझे भात दिया |
भात मैंने लोहारिन को दिया |
लोहारिन ने मुझे दराती ला दी |
दराती दी मैंने घसियारी को |
  घसियारी ने मुझे घास दी |
घास दी मैंने गाय को |
गाय ने मुझे दूध दिया |
दूध मैं राजा को दे आई |
राजा ने मुझे घोड़ी दी |
घोड़ी लेकर मैं चली मैदानों को |
घोड़ी मुड़ी पहाड़ों  को |
मैं बैठी थी छाया में|
घोड़ी गिरी पहाड़ से ||
(कुमाऊं का लोक साहित्य से )

Courtesy - Prayag Pande

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

From :Prayag Pande


बरसात का मौसम पुरे यौवन में है | गरजते काले बादल और कभी तेज तो कभी रिमझिम वर्षा के बीच रोजी - रोटी की तलाश में परदेश गए अपने प्रियतम की याद आना स्वाभाविक है | सो , लीजिये पेश है - बरसात के मौसम में अपने निष्ठुर प्रियतम से विछोह में व्यथित पहाड़ की वीरांगना के दर्द को व्यक्त करता बहुत पुराना कुमांऊनी ऋतु लोकगीत -

सण सण सण मण सौंणाक ,
रिमा झिमा दयो लागो दणाक |

घनघोर बादली घमकी |
गोरी बांकी बिजुली चमकी |

तलि सारी मलि सारी हरिया |
नदी नौला चुपटौला भरिया|

कां देखीनो यो ऋतु यो मास ?
चारै दिन रंगीलो चौमास |

डीना काना झुरि गेछ हौली |
साँस पड़ी सासु नि ऐ कौली |

कसी काटूं पालुरी को घास |
नी थामिनी हियै को निसास |

जै कारण रंग छियो राज |
कैंथैं कूं मैं ऊ घरै नै आज |

कां छै भागी , आगरा कि दिल्ली ?
आजि तक कुसलै नि मिली |

घन तेरी बैरूंण पराणी|
जोग्यानी सूं चीठी लै हराणी |

बजी जाली माया को लपोड़ |
झुरी खांछ जोड़ी  को बिछोड |

भगवान कै  आला उ दिना |
बिछुडिया मिलुंला जै दिना ||

भावार्थ :
जल धाराओं की कल - कल , छल -छल ध्वनि में सावन का संगीत सुनाई देता है |
कभी रिमझिम वर्षा हो रही है तो कभी मूसलाधार |
घने बादल उमड़ - घुमड़ कर चले आ रहे हैं |
गोरी , बांकी , चपला चमक रही है |
नीचे - ऊपर के सब खेतों में हरियाली छाई है |
नदी - नाले और तलैया भरे हुए हैं |
वर्षा ऋतु के समान ऋतु और सावन के समान माह और कहाँ दिखता है |
यह रंगीला चार्तुमास चार दिन का है |
पर्वत और वनों में कोहरा छाया है |
संध्या हो आई है | अब सास कहेंगी कि बहु इतनी देर तक वन से नहीं लौटी |
कैसे काटूं मैं अब यह घास ?
मन की आकुलता तो थामे नहीं थमती |
जिसकी बदौलत सारा सुख - चैन था ,
किससे कहूँ मैं कि आज तो वह घर से दूर है |
कहाँ , किस सुदूर प्रदेश में जा बसे हो , प्रिय ?
तुम जाने आगरा हो या दिल्ली |
आज तक तुम्हारा कुशल - समाचार तक न मिला |
तुम्हारा निष्ठुर मन भी धन्य है |
मुझ  जोगन के लिए तुम्हारा एक पत्र भी दुर्लभ हो गया |
प्रेम के इस जंजाल को भी क्या कहें |
प्रिय से बिछोह किस तरह मन - प्राण कचोट देता है |
हे भगवान , क्या कभी वह दिन भी आएगा ,
जिस दिन दो बिछुड़े हुए प्राणी फिर मिलेंगे ||

                       (कुमांऊँ का लोक - साहित्य )

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720



प्रयाग पाण्डे


हो सरग तारा , जुन्याली रात|
को सुनलो यो मेरी बात ?
पाणी को मसिक सुवा पाणी को मसिक |
तू न्है गये परदेस मैं रूंली कसीक ?
हो सरग तारा ,जुन्याली रात ,को सुनलो यो मेरी बात ?
विरहा कि रात भागी , विरहा की रात |
आखन वै आंशु झड़ी लागी वरसात |
हो सरग तारा ,जुन्याली रात ,को सुनलो यो मेरी बात ?
तेल त निमडी गोछ ,बुझरोंछ बाती |
तेरी माया लै मेडी दियो सरपे कि भांति |
हो सरग तारा ,जुन्याली रात ,को सुनलो यो मेरी बात ?
अस्यारी को रेट सुवा, अस्यारी को रेट |
आज का जईयां बटी कब होली भेंट |
हो सरग तारा ,जुन्याली रात ,को सुनलो यो मेरी बात ?

  कुमांऊँ का लोक साहित्य से )

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

प्रयाग पाण्डे यो सेरी  का मोत्यूं तुम भोग लागला हो |
स्योव दिया विद हो |
यों  भूमि  को  भूमियाँ बरदैन  हया हो |
रोपारों   तोपारों  बरोबरी दिया  हो |
हालिया  बलदा  बरोबरी  दिया हो |
हात दिया छावा हो , बियों दिया फ़ारो हो |
पंचनाम देवो हो !!

भावार्थ -
इस खेत मे पैदा होने वाले धानों के मोती के समान चावल आपको भोग लगायेंगे |
हे देव ,आप छाया प्रदान कीजिये , वर्षा रोक लीजिये |
हे इस भूमि के अधिपति देव , आप अनुकूल रहिये ,कृपालु रहिये |
रोपाई के इन पौधों से टोकरी भर - भर कर धान दीजिये |
हलवाहा और बैल समान रूप से परिश्रमी दीजिये |
रोपाई करने वाले श्रमिकों को दक्षता दीजिये , उनके हाथ तेज चलें और
पौधे सारे खेत के लिए पर्याप्त हों |
हे पंचनाम देव , आप कृपा कीजिये !!

(कुमाऊँ का लोक साहित्य )

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

प्रयाग पाण्डे

कुमाऊनी लोक गीत और लोक संगीताक प्रेमियों लिजी आज भौत पुराण बाल गीत चै लै रयों | तो लियो आज य बाल गीतक आनन्द लीजियो _

झुलील्ये झुली  भावा झुली लै |
पुरवी को पिंगढ्यों लो |
पछिम को हावा |
झुली लै भावा |
तेरी ईजू पलुरिया घास जाई रैछ |
तेरा लिजिया भावा
चुचि भरि ल्याली , चड़ी मारि ल्याली |
चुचि खाप लैलै भावा |
चड़ी खेल लगाले होलि लै होलि |
चुंगरी तोड़लै भावा |
खातडी फाड़लै |
तेरि छत्तर राजगद्दी , बड़ी - बड़ी हौली लै |
कुमवी को जौल खाले , अजुवा को पानी |
गुदडी में सोई रौले .होलि लै होलि लै ||

भावार्थ :
ओ मेरे नन्हे , सो जा मेरे बच्चे |
पूर्व की ओर से आयेगी पीली गेंद (सूर्य )|
पश्चिम से आ रही होगी हवा |
सो जा मेरे मुन्ने , सो जा |
माँ तेरि गई है पुरलिया घास लाने |
तेरे लिए ओ बच्चे
वह स्तन पर दूध लायेगी , चिड़िया मार लायेगी |
तू माँ का स्तन पान करेगा ओ नन्हे |
तू चिड़िया से खेलेगा , सो जा मुन्ने सो जा |
तू फिर चुगरा तोड़ेगा |
और अपने गद्दे फाडेगा |
तेरा छत्र होगा , बड़ी राजगद्दी होगी |
तू कुमई की खिचड़ी खायेगा और सोते का पानी पीएगा |
गुदड़ी में सोया रहेगा , सो जा मुन्ने सो जा ||
                           - कुमाऊ का लोक साहित्य

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

प्रयाग पाण्डे


बेटी की विदाई के समय का कुमांऊनी संस्कार गीत _

काहे कि छोडूँ मैं एजनी पैजनी काहे कि लम्बी कोख ए ?
बाबु कि छोडूँ मैं एजली पैजली माई कि लम्बी कोख ए |
काहे कि छोडूँ मैं हिल मिल चादर , काहे कि रामरसोई ए ,
भाई कि छोडूँ मैं हिल मिल चादर , भाभि कि रामरसोई ए |
छोटे - छोटे भाईन पकड़ी पलकिया हमरी बहिन कांहाँ जाई ए ,
छोडो - छोडो भाई हमरी पलकिया , हम परदेसिन लोक ए |
जैसे जंगल की चिड़ियाँ बोलै , रात बसे दिन उडि चलै ,
वैसे बाबुल का घर हम धिय सोहें , रात बसे दिन उडि चलै |
बाबुल घर छाडी ससुर का देस , छाड़ो तुम्हारो देस ए ,
भाईन घर छाडी जेठ का देस , छाड़ो तुम्हारो देस ए |
माई कहे बेटी नित उठि अइयो, बाबु काहे छट मास मे,
भाई कहे बैना काज परोसन ,भाभि कहे क्या काज ए ||

( कुमांऊँ का लोक साहित्य )