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Kumauni Holi - कुमाऊंनी होली: एक सांस्कृतिक विरासत

Started by पंकज सिंह महर, January 04, 2008, 02:44:23 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

प्रयाग पाण्डे


कुमाऊँनी होली :-

तू करि ले अपनों व्याह देवर हमरो भरोसो झन करियै ।
मैलै बुलाये एकीलो हो एकीलो ,
तू ल्याये जन चार , देवर हमरो भरोसो झन करियै ।
तू करि ले अपनों व्याह देवर हमरो भरोसो झन करियै ।
मैलै बुलाये बागा में हो बागा में ,
तू आये घर बार , देवर हमरो भरोसो झन करियै ।
तू करि ले अपनों व्याह देवर हमरो भरोसो झन करियै ।
मैलै मंगायो लहंगा रे लहंगा ,
तू लाये बेसनार , देवर हमरो भरोसो झन करियै ।
तू करि ले अपनों व्याह देवर हमरो भरोसो झन करियै ।
झन करियै एतवार , देवर हमरो भरोसो झन करियै ।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

प्रयाग पाण्डे


कुमाऊँनी होली :-

फागुन के दिन चार सखी री ,
अपनों बलम मोहे मांग हूँ दे री ।
सोना मैं दूंगी , रूपा मैं दूंगी ,
मोती दिए अनमोल ।
जो कुछ मांगो, सभी कुछ दूंगी ,
बलमा न दूंगी उधार ।सखी री ।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

प्रयाग पाण्डे

कुमाऊँनी होली :-

अगना में बोलत काग सखी री ,
पिया के आवन को शगुन भयो री ।
उडि जा रे कागा मोरे आगन से ,
पिया की खबर ला ।
जो पिया आवें मोरे मंदिरवा ,
सोने से चौंच मढ़ाऊँ ।
पिया को गले से लगाऊँ ।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

प्रयाग पाण्डे


कुमाऊँनी खड़ी होली :-

शिव के मन माहि बसे काशी ,
शिव के मन माहि बसे काशी ।
आधी काशी में वामन - बनियां ,
आधी काशी में सन्यासी ।
शिव के मन माहि बसे काशी ।
काहे करन को बामन , बनियां ,
काहे करन को सन्यासी ।
पूजा करन को बामन , बनियां ,
सेवा करन को सन्यासी ।
शिव के मन माहि बसे काशी ।
काहे को पूजे बामन , बनियां ,
काहे को पूजे सन्यासी ।
देवी को पूजे बामन , बनियां ,
शिव जी को पूजे सन्यासी ।
शिव के मन माहि बसे काशी ।
क्या इच्छा पूजे बामन , बनियां ,
क्या इच्छा पूजे सन्यासी ।
नव सिद्धि पूजे बामन , बनिया,
अष्ट सिद्धि पूजे सन्यासी ।
शिव के मन माहि बसे काशी ।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

प्रयाग पाण्डे


कुमाऊँनी होली :-

मत जाओ पिया , होरी आय रही ,
जिनके पिया निज घर ही बसत हैं ,
उनकी नार उमंग भरी ।
जिनके पिया परदेश बसत हैं ,
उनकी नार सोच भरी ।
मत जाओ पिया , होरी आय रही ।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

प्रयाग पाण्डे


,
कुमाऊँनी होली :-

आयो नवल वसंत ,
सखी ऋतु राज कहावे ।
आयो नवल वसंत ,........
पुष्प कली सब फूलन लागे ,
फूल ही फूल सुहाये ,
कामिनी के मन मंजरी फूले ,
सखी बनी माधव आये ।
आयो नवल वसंत ,
सखी ऋतु राज कहावे ।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

प्रयाग पाण्डे


कुमाऊँनी होली

रंग केसर की पिचकारी भरी ।
दुरयोधन घर मेवा त्यागे , साग बिदुर घर खायो हरि ।
गज और ग्राह लडें जल भीतर लडत - लडत गज हारो हरि ।
जौं भर सूंड रहे जल बाहर तब हरि नाम पुकारो हरि ।
गज की टेर सुनी द्वारिका में आपुं गरुड तजि आयो हरि ।
कौरव पांडव चौपड़ खेलें , खेलत - खेलत हार पड़ी ।
द्रोपदी चीर दुसासन खैचें , चीर को अंत न पायो हरि ।
जनक रजाज्यू को यो प्रण भारी , को ए उ धनुष उठायो हरि ।
सियाजी को कंकण खुजत नाही , गांठ को मरम न पायो हरि ।
रंग केसर की पिचकारी भरी ।

Pawan Pathak

डीडीहाट के 200 गांवों में अब भी नहीं मनाते होली

अतीत में मथुरा से लाई गई चीर हो गई थी चोरी

संजू पंत
डीडीहाट (पिथौरागढ़)। कुमाऊं में वैसे तो होली प्रमुख त्योहारों में एक है। यहां पर होली और दीपावली को पूरे देश की तरह धूमधाम से मनाया जाता है लेकिन यह जानकर आश्चर्य होगा कि डीडीहाट तहसील के 200 से ज्यादा गांवों में होली नहीं मनाई जाती। इन गांवों में न तो होली गायन होता है और न होली की चीर ही बांधी जाती है।
भागीचौरा क्षेत्र के करीब 50 गांवों में होली नहीं बनाई जाती। इसी तरह आदीचौरा घाटी के 80 गांवों में लोग होली का त्योहार नहीं मनाता। भनड़ा, दूनाकोट, बोरागांव के पांच दर्जन गांवों में लोग होली नहीं मनाते। दूनाकोट गांव निवासी नैन सिंह बोरा कहते हैं कि अतीत में उनके पूर्वज मथुरा से होली की चीर लाए थे लेकिन यह चीर चोरी हो गई। गांव के लोगों ने इसे अशुभ घटना करार दिया और होली मनाने का इरादा ही छोड़ दिया। कुछ गांवों में तो लोग कहते हैं कि होली मनाने से उनके गांव में अशुभ हो जाता है। यह मिथक लंबे समय से चला आ रहा है। नई पीढ़ियों ने भी इस मिथक को तोड़ने का प्रयास नहीं किया। भनड़ा गांव के कुंडल सिंह कन्याल का कहना है कि उनके गांव में भादौ में आठूं का पर्व मनाया जाता है। होली मनाने की कोई परंपरा नहीं है।


होली और आठूं भी मनाते हैं

डीडीहाट। हाटथर्प गांव के पूर्व प्रधान धन सिंह कफलिया कहते हैं कि उनका गांव अपवाद है। जहां पर होली और आठूं को समान तरीके से उल्लास के साथ मनाया जाता है। वह कहते हैं कि आठूं मनाने वाले गांवों में होली न मनाने का तुक समझ में नहीं आता। इस बार हाटथर्प गांव में होली की तैयारी हो रही है।

वनरावतों को होली से कोई वास्ता नहीं

डीडीहाट। डीडीहाट तहसील में रहने वाली आदम जनजाति वनरावतों को भी होली त्योहार से कोई वास्ता नहीं रहता। वह होली नहीं मनाते। यहां तक कि कुमाऊं में प्रचलित अन्य त्योहारों में भी वनरावतों की भागीदारी नहीं के बराबर रहती है। गणागांव, कूटाचौरानी, मदनपुरी, किमखोला गांवों में रहने वाले वनरावतों को होली की परंपरा का कोई पता नहीं रहता।
Source - http://epaper.amarujala.com/svww_zoomart.php?Artname=20150306a_005115004&ileft=-5&itop=392&zoomRatio=130&AN=20150306a_005115004

Pawan Pathak

डेढ़ दशक पूर्व हुई थी मंडली की स्थापना
लोहाघाट। पाटी में मस्टा संगीत मंडली की 21 वर्ष पूर्व की गई स्थापना के बाद इसके द्वारा लोक संस्कृति, लोक कला एवं उत्तराखंड के सांस्कृतिक दलों को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की जा रही है। समिति के निर्देशक चतुर सिंह मौनी, समाजसेवी शिक्षक आरसी पचौली, प्रमुख तबला वादक केसी भटृ, भुवन जोशी, रामलाल द्वारा न केवल विलुप्त होती जा रही संस्कृति को मंच पैदा किया जा रहा है, बल्कि इस ग्रामीण परिवेश में युवा पीढ़ संगीत के प्रति लगातार रुचि ले रही है।

लोहाघाट में काली कुमाऊं की होली की धूम
महाभारत काल का वर्णन किया जाता है यहां की होली में


लोहाघाट। काली कुमाऊं की होलियों में भगवान श्रीकृष्ण के चरित्र के साथ महाभारत काल का वर्णन किया जाता है। इनमें कौरव और पांडवों के चरित्र का भी वर्णन होता है। साथ ही कौरवों के द्वारा छल कपट से पांडवों को जुए में हराने का भी होलियों में उल्लेख मिलता है। कौरव जुवरा खेलें कलयुग को अवतार, पांडव जुवरा खेलें सतयुग को अवतार। यहां की होलियों में द्वापर युग के साथ त्रेता युग का भी वर्णन किया जाता है।
दशरथ के लाल होरी खेलेंगे। जिस प्रकार योगीराज कृष्ण गोपियों के साथ होली खेलकर पूरे ब्रज मंडल में होली की धूम होती है तथा लोग अपनी विभिन्न कलाओं का प्रयोग भूलकर ललित कला की ओर ध्यान केंद्रित करते हैं, ठीक उसी प्रकार यहां की होलियों में भी रोमांच पैदा करने वाले अभिनय भी पेश किए जाते हैं।
ब्रज मंडल देश देखो रसिया, ब्रज मंडल हो। तै तेरी ब्रज में नारी अधिक हैं, छोटी मोटी नारी सुगड़ रसिया ब्रज मंडल हो। होली एकादशी से छलड़ तक यहां का उत्साह परवान पर चढ़ रहता है। इस दौरान धूम के राग भी गाए जाते हैं। पइयां पडूं पलंगा ना चढूंगी, पलंग के के ओरे धीरे ठाड़ रहूंगी।
यहां की होलियों की शुरुआत देवी देवताओं एवं अपने ईष्ट के आराधना से की जाती है। जैसे शिव के मन मान रहो काशी, इसी प्रकार पौराणिक गाथाएं भी गाई जाती हैं जैसे कुंडल पुर के राजा भीष्मक नाम सुहाय गीतों से भी इसका प्रमाण मिलता है।

Source- http://earchive.amarujala.com/svww_zoomart.php?Artname=20090310a_007115009&ileft=129&itop=341&zoomRatio=130&AN=20090310a_007115009

Pawan Pathak

देवभूमि उत्तराखंड के पहाड़ में शास्त्रीय संगीत पर आधारित बैठकी होली गायन की परंपरा डेढ़ सौ साल से चल रही है
यहां शीतकाल के पौष मास के प्रथम रविवार से गणपति की वंदना से बैठकी होली का आगाज होता है। यह होली विभिन्न रागों में चार अलग-अलग चरणों में गाई जाती है। जो होली टीके तक चलती है। पहाड़ में बैठकी होली गीत गायन का जनक उस्ताद अमानत उल्ला को माना जाता है। तब से अब तक लोक संस्कृति प्रेमियों ने इस परंपरा को कायम रखा है। कड़ाके की ठंड में भी होली गीतों के रसिक इस बैठकी होली गायन में उत्साहपूर्वक भागीदारी करते हैं। कुमाऊं में होली गायन की परंपरा ऐतिहासिक सांस्कृतिक नगरी अल्मोड़ा से शुरू हुई। पर्वतीय क्षेत्र में होली गीत गायन का इतिहास 150 साल से भी अधिक पुराना है। जानकारों के अनुसार कुमाऊं में होली गीतों के गायन का सांस्कृतिक नगरी अल्मोड़ा से हुआ। रामपुर के उस्ताद अमानत ने बिटिश शासनकाल के दौरान 1860 में इसकी शुरूआत की। बैठकी होली गायन मुख्यतया शास्त्रीय संगीत पर आधारित है। विशेषता यह है कि पहाड़ में बैठकी होली गायन की शुरूआत होली से करीब तीन माह पहले पौष मास के पहले रविवार से शुरू हो जाती है। जो होली के टीके तक चलती है। बैठी होली गायन चार चरणों में पूरा होता है। पहला चरण पौष मास के प्रथम रविवार से आध्यात्मिक होली 'गणपति को भज लीजे मनवा' से शुरू होकर बसंत पंचमी के एक दिन पूर्व तक चलता है। बसंत पंचमी से महाशिवरात्रि के एक दिन पूर्व तक के दूसरे चरण में भक्तिपरक व श्रृंगारिक होली गीतों का गायन किया जाता है। तीसरे चरण में महाशिवरात्रि से रंगभरी एकादशी के एक दिन पूर्व तक हंसी मजाक व ठिठोली युक्त गीतों का गायन होता है। रंगभरी एकादशी से होली टीके तक मिश्रित होली की स्वरलहरियां चारों ओर गूंजती हैं। गौरतलब है कि पहले से तीसरे चरण तक की होली गायन सायंकाल घर के भीतर गुड़ के रसास्वादन के बीच पूरी तल्लीनता से गाई जाती है। चौथे चरण में बैठी होली के साथ ही खड़ी होली गायन का भी क्रम चल पड़ता है। इसे चीर बंधन वाले स्थानों अथवा सार्वजनिक स्थानों में खड़े होकर पद संचनल करते हुए वाद्य यंत्रों के साथ लयबद्ध तरीके से गाया जाता है

Source-http://epaper.jagran.com/ePaperArticle/06-jan-2016-edition-Pithoragarh-page_4-27975-2382-140.html