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Poems written by Krishna Nayal - कृषण नयाल जी की कविताएं !

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, November 19, 2012, 10:50:06 PM


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

From - Krishna Nayal

इस्कूली दिन...

खिमुली जाने इस्कुलेहे ईजा, हाथ में लिबे पाठी- दावत.
बेली तले पड़छि अ आ क ख, आज करणभगे बाराखडी याद..

नान भूलू दगे इस्कुलेहे जानू, ईजा मी त्यर खुट पड़नू.
मी सुपभरि धान कूट जानू, गोर भैसों गे पाणी दे जानू..

किले फरक चालिया में करछा, को दिन बदलल म्योर पहाड़.
खिमुली जाने इस्कुलेहे ईजा, हाथ में लिबे पाठी- दावत..

ठुलहेबे परघर भेजला, पापुण सिरक ब्वज खेडला.
आस पडोसक, घर सोराष्क, चिठी मिथे जब पढाला.

खिमुली जाने इस्कुलेहे ईजा, हाथ में लिबे पाठी- दावत.
बेली तले पड़छि अ आ क ख, आज करणभगे बाराखडी याद..

(यह तस्वीर "मेरो उत्तराखंड- मेरो पहाड़" के सोजन्य से प्राप्त हुयी है) — with Kishan Bisht and 30 others.
इस्कूली दिन... खिमुली जाने इस्कुलेहे ईजा, हाथ में लिबे पाठी- दावत. बेली तले पड़छि अ आ क ख, आज करणभगे बाराखडी याद.. नान भूलू दगे इस्कुलेहे जानू, ईजा मी त्यर खुट पड़नू. मी सुपभरि धान कूट जानू, गोर भैसों गे पाणी दे जानू.. किले फरक चालिया में करछा, को दिन बदलल म्योर पहाड़. खिमुली जाने इस्कुलेहे ईजा, हाथ में लिबे पाठी- दावत.. ठुलहेबे परघर भेजला, पापुण सिरक ब्वज खेडला. आस पडोसक, घर सोराष्क, चिठी मिथे जब पढाला. खिमुली जाने इस्कुलेहे ईजा, हाथ में लिबे पाठी- दावत. बेली तले पड़छि अ आ क ख, आज करणभगे बाराखडी याद.. (यह तस्वीर "मेरो उत्तराखंड- मेरो पहाड़" के सोजन्य से प्राप्त हुयी है)  ·

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

From - Krishana Nayal
बाँट देखी छू भिटोली की आस माँ ..(भिटोई)..

देणा होया खोली का गणेशा हो.
कब आली मेरी भिटोली, भूलू परदेशा हो..

घुट घुट मिगे बाटुली लागुछी.
जब बासे घुघूती हिया भरी उछि..

पास होना भेटी उछि म्योर मैतियो का देशा.
देणा होया खोली का गणेशा हो.

हफ्ते भर बीती गीना, सबुकॆ भिटोई उनीना.
कब आली इजू मेरी, कब आलो उदीना..

उडी जा ओ घुघती, भेजी दे सन्देशा हो.
देणा होया खोली का गणेशा हो..

साडी, बीलोजा और धोती लेआली .
चैत भिटोई रीत निभाली.

भोजी बस इतुके छू आशा, भूमी को भूमिया नी टूटो भरोसा हो.
देणा होया खोली का गणेशा हो..

परखो को चलन इजा, आश को कारण ईजा.
चेली बेटियों ते भेटन रया, आपुण फ़रज निभाया..

चैत महिना आये जाया, नी टोड़िया रीता हो.
देणा होया खोली का गणेशा हो..

कब आली मेरी भिटोई, भूलू परदेशा हो.
देणा होया खोली का गणेशा हो..बिभिन्न प्रकार के प्राकर्तिक वन संपदाओ को सजोये उत्तराखंड का भू - भाग दुनिया के मानचित्र में जिस प्रकार अपना विशेष महत्व रखता है ठीक उसी प्रकार यहाँ के रीति रिवाज का अपना अलग ही महत्त्व व मान्यता है I हिन्दू वर्ष का चैत महिना उत्तराखंड की एक अनमोल और पारंपरिक रीति का बयान करती है "भिटोई" उनही रशमो की एक झलक है जो हर विवाहित बहु बेटियाँ की आशा और ख़ुशी का इजहार अपने भिटोई से दर्शाती है I

प्रत्येक वर्ष मायके से माँ बाप व भाईओ द्वारा मिलाने वाली भेट "भिटोई" की प्रतीक्शा में एक बेटी की आशा और बिन्ती मेरी छोटी सी कविता के माध्यम से आप सभी के सम्मुख.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Krishna Nayal


घर -आँगन (परछाईया)..

कल अपना था जो, आज बेगाना सा क्यों लगता है.
अजनबी हो गयी है घर की सीडिया, चोखट अंजना सा क्यों लगता है..

एक मीठी सी चुभन मेरे मन में क्यों है.
एक अगल एहसास घर के आँगन में क्यों है.

दीवारों के दरारों में उगे कनेर के पौंधे,घास के झरोखे से झाकते.
आँगन के पत्थर कहने लगे, पैरो की आहट ना सुने जमाना सा क्यों लगता है..

कल अपना था जो, आज बेगाना सा क्यों लगता है.
अजनबी हो गयी है घर की सीडिया, चोखट अंजना सा क्यों लगता है..

चरमरा रहे है पेडो में केले के सूखे पत्ते.
छत पर लटकते सूखे कद्दू की बेलें..

खुटी पर लटका बचपन का कुर्ता, महक मेरी पाकर बोला.
जाने ये शख्श जाना पहचाना सा क्यों लगता है..

टूटी बिखरी घर की जमीन, मकड़ी, दीमक, फफूदी नमी.
सहमी सहमी घर की दीवारे भी कहने लगी,जाने ये मेहमान पुराना सा क्यों लगता है..

कल अपना था जो, आज बेगाना सा क्यों लगता है.
अजनबी हो गयी है घर की सीडिया, चोखट अंजना सा क्यों लगता है..

"झन छोडिया बोली बुलान, आपुन घर आपुन द्वार"
"जय पहाड़ जय पहाड़ "

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Krishna Nayal किस कदर झुलसा जीवन (हिटो पहाड़).

वादियाँ मेरे गाँव की मुझको बुला रही है.
वाह रे मन, तुझको तो सिक्को की खनक भा रही है..

सब कुछ लूट जायेगा, क्या तब तुम जाओगे.
भिखरा हुआ आशियाना, क्या फिर सजाओगे..

मुंगेरी लाल के सपने मुझे झूले में झुला रही है.
वादियाँ मेरे गाँव की मुझको बुला रही है..

विनाश काले बिपरीत बुद्धि कितना सत्य लगता है.
टपक पड़े जब बूद पत्थर पर, पत्थर भी घिसने लगता है..

मुरझा रहे है फूल खुशियों के, और मन चाँद को पाने का सपना दिखा रही है.
वादियाँ मेरे गाँव की मुझको बुला रही है..

बेखबर हम है, उस जमीन पर किसी और ने ठिकना कर लिया.
सर छुपाने की जिद्दोजेहद में जिंदगी को परवाना कर दिया..

जलकर सबकुछ  खाक हो जायेगा एक दिन, दर पर आज बर्बादी की चिंगारी सुलगा आये है.
वाह रे मन, तुझको तो सिक्को की खनक भा रही है..

वादियाँ मेरे गाँव की मुझको बुला रही है.
वाह रे मन, तुझको तो सिक्को की खनक भा रही है..

(अशोक नयाल दा रचित ये सुन्दर पंकतिया) — with Geeta Chandola and 5 others.किस कदर झुलसा जीवन (हिटो पहाड़). वादियाँ मेरे गाँव की मुझको बुला रही है. वाह रे मन, तुझको तो सिक्को की खनक भा रही है.. सब कुछ लूट जायेगा, क्या तब तुम जाओगे. भिखरा हुआ आशियाना, क्या फिर सजाओगे.. मुंगेरी लाल के सपने मुझे झूले में झुला रही है. वादियाँ मेरे गाँव की मुझको बुला रही है.. विनाश काले बिपरीत बुद्धि कितना सत्य लगता है. टपक पड़े जब बूद पत्थर पर, पत्थर भी घिसने लगता है.. मुरझा रहे है फूल खुशियों के, और मन चाँद को पाने का सपना दिखा रही है. वादियाँ मेरे गाँव की मुझको बुला रही है.. बेखबर हम है, उस जमीन पर किसी और ने ठिकना कर लिया. सर छुपाने की जिद्दोजेहद में जिंदगी को परवाना कर दिया.. जलकर सबकुछ  खाक हो जायेगा एक दिन, दर पर आज बर्बादी की चिंगारी सुलगा आये है. वाह रे मन, तुझको तो सिक्को की खनक भा रही है.. वादियाँ मेरे गाँव की मुझको बुला रही है. वाह रे मन, तुझको तो सिक्को की खनक भा रही है.. (अशोक नयाल दा रचित ये सुन्दर पंकतिया)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Krishna Nayal पतझड़ है मेरा जीवन, बन के बहार आजा,
सुन ले पुकार काहना बस एक बार आजा।
बैचैन मन के तुम्ही आराम मुरली वाले॥
तुम हो दया के सागर, जनमों की मैं हूँ प्यासी,
दे दो जगह मुझे भी चरणों में बस ज़रा सी।
सुबह तुम्ही हो, तुम्ही ही मेरी श्याम मुरली वाले॥
जय श्री राधे कृष्णा ...


शुभ दिन !!