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Stinging Nettle (Bichhu Ghass) - सियूँण, बिच्छू घास , कनाली (Urtica Dioica )

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, January 04, 2013, 05:06:10 PM





एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जागरण विशेष::फोटो::अब सिसौंड़ के रेशे से बनेंगे गर्म कपड़े
-वन वर्धनिक ने गोपेश्वर व ज्योलीकोट में किया अनुसंधानचन्द्रेक बिष्ट, नैनीताल : पहाड़ों में पायी जाने वाली सिसौड़ (बिच्छू घास) से अब गर्म कपड़े बनाये जायेंगे। वन वर्धनिक उत्तराखंड ने गढ़वाल के गोपेश्वर व नैनीताल के गांजा ज्योलीकोट में आधे-आधे हेक्टेयर में सिसौंड़ का प्लाटेंशन कर अनुसंधान शुरू कर दिया है। पहाड़ों में बिच्छू घास के रेशों से जूते व रस्सी बनाने की पुरानी परम्परा रही है। नये अनुसंधान के बाद इससे कीमती व गर्म कपड़े बनाये जा सकेंगे। यह ग्रामीणों की अतिरिक्त आय का साधन होगा। उत्तराखंड के मध्य हिमालय क्षेत्र में बहुतायत पाये जाने वाले बिच्छू घास को कुमाऊं में सिन या सिसौंड़ तथा गढ़वाल में कंडाली नाम से पुकारा जाता है। वनस्पति विज्ञान में इसे जिराडियाना हैट्रोफिला कहा जाता है। उत्तराखंड बेम्बो बोर्ड द्वारा बांस के रेशे से कीमती कपड़ा निकाले जाने की सफलता को देखते हुए उत्तराखंड वन वर्धनिक ने बिच्छू घास से कपड़ा उत्पादन की संभावना तलाश करते हुए इसके रेशे की गुणवत्ता व उत्पादन पर कार्य शुरू कर दिया है। उत्तराखंड वन वर्धनिक कुबेर सिंह बिष्ट ने बताया कि बिच्छू घास से पहाड़ों में रस्सी व जूते बनाने की परम्परा रही है। अब विभाग ने इसके रेशे की गुणवत्ता व उत्पादन की संभावनाओं को तलाश किया है। भविष्य में व्यापक रूप से इसका उत्पादन किया जायेगा। भविष्य में यह ग्रामीणों के आय का स्रोत भी बन जायेगा। उन्होंने बताया कि गोपेश्वर व ज्योलीकोट में नर्सरी तैयार कर उस पर अनुसंधान कार्य चल रहा है। इन्सेटसंजीवनी है बिच्छू घासनैनीताल : पहाड़ों में पाये जाने वाली इस घास में चुभने वाले रोयें होते हैं जो फौरमिक एसिड से भरे होते। यह चुभने पर बिच्छू के काटे के समान एहसास कराते हैं। बावजूद यह घास संजीवनी के समान है। इसकी जड़ों के रस से पेट विकारों की रामबाण औषधि बनायी जाती है। पत्तों का चारा पशुओं के दूध बढ़ाने का कार्य करता है। पत्तियों की सब्जी पेट विकारों को खत्म करने तथा तने को जलाकर इसकी राख दाद, खाज, खुजली व अन्य चर्म रोगों के लिए रामबाण दवा है। 30 एनटीएल-35परिचय-बिच्छू घास का पौंधा।


(source Dainik jagran)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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प्रस्तुतकर्ता   कामोद Kaamod  बिच्छू घास*****bbb कल की चित्र पहेली में अलग-अलग तरह के उत्तर मिले. पर सबसे पहले पकड़ा अनामी डीसीपी ने. पर समीर जी, राज जी और अरविन्द जी सही उत्तर देने में अंतत: सफल रहे. समीर जी तो खुशी में जिन्दाबाद- जिन्दाबाद के नारे भी लगा बैठे. :) चित्र पहेली में जो पौधा दिखाया गया था उसे भारत में सामान्यतया  बिच्छू घास या बिच्छू बूटी के नाम से जाना जाता है और यह बहुतायत से पहाड़ी क्षेत्रों में पाया जाता है. इसे Stinging Nettle नाम से भी जाना जाता है. इसका बैज्ञानिक नाम Urtica dioica है यह यूरोप, एशिया, उत्तरी अमेरीका और उत्तरी अफ्रीका में पाया जाता है. बिच्छू घास पूरी तरह कांटों से भरा होता है जिनमें acetylcholine, histamine, 5-HT और formic acid का मिश्रण होता है जिससे इसको छूने मात्र से असहनीय जलन और खुजली महसूस होती है और दाने निकल आते हैं. इसलिए इसे खुजली वाला पौधा के नाम से भी पहचाना जाता है.  इसका प्रयोग दवाई के रूप में किया जाता है. यह घुटनों और जोड़ों के दर्द में असर अचूक माना जाता है. स्थानीय लोग इसे सीधे दर्द वाले स्थान पर लगाते हैं. यह अर्थेराइटिस (arthritis) में इसका प्रयोग किया जाता है. इसे हर्बल दवाईयों के निर्माण में प्रयुक्त किया जाता है.  अमेरिका में तो इसकी खेती भी की जाती है. वहाँ होने वाली बिच्छू घास कुछ  लाल की होती है और पत्ते गोलाई लिये होते हैं. जिसे उत्तराखण्ड में अल्द के नाम से जाना जाता है.  बिच्छू घास के कोमल पत्तों का सूप और सब्जी भी बनाई जाती है. जिसे हर्बल डिश कहते हैं. यह गरम तासीर की होती है और इसका स्वाद कुछ-कुछ पालक की तरह होता है. इसमें बिटामिन A,B,D , आइरन, कैल्सियम और मैगनीज़ प्रचुर मात्रा में होता है.   उत्तराखण्ड के पिथौरागढ़ शहर  में होने वाले बग्वाल मेले के प्रसिद्ध पत्थर युद्ध में घायल लोगों का इलाज किसी ह्स्पताल में न कराकर मन्दिर के पीछे होने वाले बिच्छू घास से ही की जाती है. उत्तराखण्ड के अल्मोड़ा शहर में एक एनजीओ ने पास के गांवों से लगभग 700 महिलाओं को काम पर लगा रखा है जो ऊन और बिच्छू घास से मेरीनो सब्जी डाई का उपयोग करते हुए खूबसूरत शॉल बनाती हैं. जिसे पंचुचूली शॉल के नाम से जाना जाता है. भारत में यह जंगली पौधे के रूप में अपने आप पैदा हो जाता है. इसका प्रयोग स्थानीय लोग पशुओं के चारे के रूप में साधारणतया करते हैं. इसका प्रयोग दण्ड देने के लिए भी किया जाता है. बिच्छू घास को पाने में भिगाकर लगाने से दण्ड से अपराधी को दादी-नानी याद आने लगती है:)  उत्तराखण्ड के कई इलाकों में शराबियों को सुधारने के के लिए बिच्छू धास का सहारा भी लिया.   शनिदेव के प्रकोप से बचने और पटाने के लिए भी  बिच्छू धास  का प्रयोग ज्योतिषी बताते हैं. नीलम,नीलिमा,नीलमणि,जामुनिया,नीला कटेला, आदि शनि के रत्न और उपरत्न हैं. अच्छा रत्न शनिवार को पुष्य नक्षत्र में धारण करना चाहिये. इन रत्नों मे किसी भी रत्न को धारण करते ही चालीस प्रतिशत तक फ़ायदा मिल जाता है. जो इन रत्नों का जुगाड़ ना कर सके वह बिच्छू बूटी की जड़ का प्रयोग कर सकता है. बिच्छू बूटी की जड़ या शमी जिसे छोंकरा भी कहते है की जड शनिवार को पुष्य नक्षत्र में काले धागे में पुरुष और स्त्री दोनो ही दाहिने हाथ की भुजा में बान्धने से शनि के कुप्रभावों में कमी आना शुरु हो जाता है. (http://khattimithimirch.blogspot.in)

विनोद सिंह गढ़िया

अब पीजिए बिच्छू घास की ताजा चाय

पहाड़ के लोग तो परंपरागत सिसूण (बिच्छू घास) के साग को भूल गए हैं, लेकिन विटामिन और मिनरल्स से भरपूर यह घास अब अमीरों की पसंदीदा बन गई है। जिस बिच्छू घास को आमतौर पर हम जानवरों को भी नहीं खिलाते हैं, अब उसकी चाय 2200 रुपए किलो बिक रही है।
अल्मोड़ा के निकट चितई के पंत गांव में स्थापित कंपनी पिछले डेढ़ साल में बिच्छू घास से बनी 500 किलो चाय देश भर के बड़े शहरों में बेच चुकी है। अभी सालाना उत्पादन करीब चार क्विंटल है। इसका फ्लेवर खीरे की तरह होता है। कंपनी से जुड़ीं कर्नाटक की अमृता बताती हैं कि करीब छह साल पहले पति संतोष व चितई के पंत गांव निवासी डा. वसुधा पंत के सहयोग से पहाड़वासियों के परंपरागत चीजों के मार्केटिंग की योजना बनाई थी। इसी कड़ी में पहाड़ के परंपरागत सिसूण की उपयोगिता को ध्यान में रखते हुए उन्होंने बिच्छू घास की चाय बनाने की सोची। बिच्छू घास की चाय के 50 ग्राम के एक पैकेट की कीमत 110 रुपए है और इसकी काफी मांग है।

विटामिन और मिनरल्स से भरपूर

बिच्छू घास स्वास्थ्य के लिए बेहद लाभप्रद है। इसमें ढेर सारे विटामिन और मिनरल्स हैं। इसमें प्रोटीन, कार्बोहाइट्रेड, एनर्जी, कोलेस्ट्रोल जीरो, विटामिन ए, सोडियम, कैल्शियम और आयरन हैं।

बिच्छू घास को अंग्रेजी में नेटल कहा जाता है। इसका बॉटनिकल नाम अर्टिका डाइओका है। कुमाऊंनी में इसे सिसूण कहते हैं। वह विशुद्ध कुमाऊंनी शब्द है। बिच्छू घास मध्य हिमालय क्षेत्र में होती है। यह घास मैदानी इलाकों में नहीं होती। बिच्छू घास में पतले कांटे होते हैं। इसमें बिच्छू के काटने जैसी पीड़ा होती है और बहुत लगने से सूजन आ जाती है। इसका प्रयोग सजा देने के लिए भी होता रहा है।


दीप जोशी, अमर उजाला-अल्मोड़ा