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Poems written by Bhagwan Singh Jayara-भगवान सिंह जयड़ा द्वारा रचित गढ़वाली कविता

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, February 22, 2013, 10:16:20 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

भगवान सिंह जयाड़ा कांसी कु हुक्का कभी उत्तराखंड का हर परिवार कु एक अभिन्न हिस्सा होन्दु थैई ,बीडी सिगरेट लोग बहुत कम पेंदा था ,मेहमानु की आवभगत और महफ़िल की शान यु हुक्का अब बदलदा समाज का साथ कखी हरीची सी गैई ,,
********पहाड़ी हुक्का *******                                           

हुक्का की गुड गुड कखी हरीची गैई ,
बीडी सिगरेट अब सबू कु फैशन व्हेई,
जाली की मढी वा चघटी वाली साज ,
घर बणोंयु गुडाखू ,कखी हर्चिगी आज   
हुक्का, होन्दु थैई पैली घर की शान ,
समझदा था, अपरा मैमानु कू मान ,
दादा पेंदू थैई हुक्का तिबारी बैठीक ,
दादी पिंदी थैई हुक्का खांदा लुकीक ,
हुक्का घरु बीटी अब कखी हरची गैई ,
या त कखी घर सान्द्यों फुण समै गैई ,
दाना संयाणों की बैठक की शान थैई ,
ऊ उठणु बैठणु भी अब कखी हर्ची गैई ,
कांसी का हुक्का कु थैइ पैली बडू मान ,
बढोंदु थैई स्यू घर्य्या महफ़िल की शान ,
अब समय बदलिगी हुक्का भी बदलिगी ,
बीडी, सिगरेट कु अब यु जमानु एगी ,
पुराणा रीती रिवाज सब बदली गैन ,
नया नया रीती रिवाज समाज मा ऐन ,
हुक्का की गुड गुड कखी हरीची गैई ,
बीडी सिगरेट अब सबू कु फैशन व्हेई,

द्वारा रचित >भगवान सिंह जयाड़ा
दिनांक >07/04/2013
  अबू धाबी (संयुक्त अरब अमीरात )       
चित्र सौजन्य ,ऑफिसियल ग्रुप ऑफ नरेंदर सिंह नेगी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

भगवान सिंह जयाड़ा ***चैत कु फुल्यारु मैनू****
डाड्यों खिलिग्या फिर फूल बुरांस ,
बौडी ऐग्यन फिर घुगती हिल्वांस ,
लय्या ,पंय्या, खिली होली फ्योंली,
चादरी मा लिपटीं प्यारी धरती होली ,
हरयाली डाल्यों मा फिर बौडी एगी,
बानी बानी का फूलु न धरती सजीगी ,
बसंती बयार फिर बगण लैगी होली ,
फूलु कु जांदी होली नौन्यालू की टोली ,
चैत कु फुल्यारु मैनू फिर बौडी  एगी ,
कौथग्यारु मैनू बैशाक नजदीक एगी ,
बचपन मा रांदु थैइ मन मा बडू उलार,
जब ओंन्दू थई  बिगोथी  कु त्यौहार ,
बेटी ब्वारयों की मैत की तैयारी होली ,
हंसी खेली कुछ दिन अपर मैत राली ,
डाड्यों खिलिग्या फिर फूल बुरांस ,
बौडी ऐग्यन फिर घुगती हिल्वांस ,

द्वारा रचित >भगवान सिंह जायाड़ा
दिनांक >८/४ /२०१ ३
http://pahadidagadyaa.blogspot.ae

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

 
भगवान सिंह जयाड़ा
मेरु मकसद कैकी भावनावों कै ठेश पहुचौण कु निछ बस "उत्तराखंड देव भूमि ऑफ़ इण्डिया" माँ या फोटू देखि क अनायाश ही कुछ लिखण कु मन करी ,,,,

****उत्तराखंड मा शराब ***
कन फुके पहाड़ी समाज माँ या दारू ,
कनी छ हैंशदी मवास्यों कु या खारू ,
यख ब्यो बरात होंन या जन्म दिन ,
अब त यनु उलटू  रिवाज देखि मिन ,
बिना ईका कार्योँ मा मजा नि रैगी ,
यन बात यख सबुका मन मा समैगी ,
शराब छ त सभी लोग वाह वाह करदा ,
नित सभी वीं मवासी का नौउ धरदा,
जैन जादा पिलाई वेकि वाह क्या बात ,
सभी देण्या छन यख यन लोगु कु  साथ ,
खाणु पाणी कथगा भी जू खूब करदा ,
शराब नि छ ता लोग ऊं का नौऊ  धरदा ,
मन्न जन्मण मा अब कुछ फर्क नि रैगी ,
या निर्भागी दारू  अब सब जगा समैगी ,
अगर यनि यीं दारू कु बोल बालू रालू ,
दिन दूर नि ,जब दारु मा सब समै जालू ,
तब पछतैक कुछ हमारा हाथ नि औण,
अपरी गलती कु सबून यख बाद मा रोण ,
कन फुके पहाड़ी समाज मा या दारू ,
कनी छ हैंशदी मवास्यों कु या खारू ,

द्वारा रचित >भगवान सिंह जयाड़ा
दिनांक >१२ /०४ /२०१३

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

भगवान सिंह जयाड़ा आज उत्तराखंड की हकीकत पर मेरु यु छोटू सी प्रयाश ,कन लगी आप तै मेरी या रचना ,,,,

     ******लाटू बौडी घौर******
कु होलू धारउद स्यू नौन्याल औणू ,
स्यु त मेरु अपुरु लाटू जन छ दिखेणू ,
भिन्डी साल बीटी छ स्यू घौर औणू ,
तभी त ठीक सी निछ स्यु पछन्याणु ,
बचपन मा चलिगी धौउ स्यु घौर छोड़ी ,
अब ज्वाँन व्हेकि तै आई स्यु घर बौडी ,
लाटू जब अपर घर गुठ्यारा माँ जांदू ,
ब्वॆइ बाबू का चरणु मा अपरी सेवा लांदु ,
कख चलेगी थैइ मेरा लाटा ,बोलदी ब्वॆइ,
खूब भिंटेंदी गला ,बुड्या आँखी रोई रोई ,
ब्वॆइ बाबू कु त्वे कभी ख्याल नि आई ,
तेरा बिना काटि रात हमुन घर रोई रोई ,
जै भूमि मा त्वेंन अपरू बचपन काटी ,
भूली गैई थै क्या वीं अपरी पवित्र माटी ,
सौजड्या तेरा घौर सदा औन्दु जांदा रैन ,
त्वेसण यु  बुढया आँखी सदा हेरदु रैन ,
मेरी भी ब्वॆइ कुछ अपरी मजबूरी रैन ,
नी त अपर घौर किलै नि औण थौ मैन ,
बेरोजगार शाहरू मा पैली भटकणु रैंयो ,
कैई दिन भूखा पेट रातू सड़क्यों मा सेयों ,
प्रदेश दुःख बिपदा ब्वॆइ बहुत उठैन मैंन ,
निर्भैइ शहरू मा कभी नि मिलादु चैन ,
अपर भी दुःख बिपदा मा मुख मोड़ी गैन ,
अब कुछ खाणी कमौणी का दिन ऐन ,
अब द्वि बक्त की रोटी चैन सी खै सकदू ,
शुख दुःख ब्वॆइ बाबू कु अब देखि सकदू ,
भगवान् अब जू मै राजी ख़ुशी राखलू ,
घौर बौण बराबर अब औणु जाणु राखलू ,
दुःख शुख मा ब्वॆइ बाबू कु ख्याल रखलु ,
अपरी जन्म भूमि सी सदा जुड्यु रौलु ,
बार त्योहारु मा ब्वॆइ अब जरूर घर औलू ,
तेरा हाथ का पकवान तुम्हारा दगड़ा खौलू ,
कु होलू धारउद स्यू नौन्याल औणू ,
स्यु त मेरु अपुरु लाटू जन छ दिखेणू ,

द्वारा रचित >भगवान् सिंह जयाड़ा
दिनांक >१४ /०४ /२०१३
फोटो साभार >पहाड़ी दगड्या — with सुनीता शर्मा and 20 others.आज उत्तराखंड की हकीकत पर मेरु यु छोटू सी प्रयाश ,कन लगी आप तै मेरी या रचना ,,,, ******लाटू बौडी घौर****** कु होलू धारउद स्यू नौन्याल औणू , स्यु त मेरु अपुरु लाटू जन छ दिखेणू , भिन्डी साल बीटी छ स्यू घौर औणू , तभी त ठीक सी निछ स्यु पछन्याणु , बचपन मा चलिगी धौउ स्यु घौर छोड़ी , अब ज्वाँन व्हेकि तै आई स्यु घर बौडी , लाटू जब अपर घर गुठ्यारा माँ जांदू , ब्वॆइ बाबू का चरणु मा अपरी सेवा लांदु , कख चलेगी थैइ मेरा लाटा ,बोलदी ब्वॆइ, खूब भिंटेंदी गला ,बुड्या आँखी रोई रोई , ब्वॆइ बाबू कु त्वे कभी ख्याल नि आई , तेरा बिना काटि रात हमुन घर रोई रोई , जै भूमि मा त्वेंन अपरू बचपन काटी , भूली गैई थै क्या वीं अपरी पवित्र माटी , सौजड्या तेरा घौर सदा औन्दु जांदा रैन , त्वेसण यु  बुढया आँखी सदा हेरदु रैन , मेरी भी ब्वॆइ कुछ अपरी मजबूरी रैन , नी त अपर घौर किलै नि औण थौ मैन , बेरोजगार शाहरू मा पैली भटकणु रैंयो , कैई दिन भूखा पेट रातू सड़क्यों मा सेयों , प्रदेश दुःख बिपदा ब्वॆइ बहुत उठैन मैंन , निर्भैइ शहरू मा कभी नि मिलादु चैन , अपर भी दुःख बिपदा मा मुख मोड़ी गैन , अब कुछ खाणी कमौणी का दिन ऐन , अब द्वि बक्त की रोटी चैन सी खै सकदू , शुख दुःख ब्वॆइ बाबू कु अब देखि सकदू , भगवान् अब जू मै राजी ख़ुशी राखलू , घौर बौण बराबर अब औणु जाणु राखलू , दुःख शुख मा ब्वॆइ बाबू कु ख्याल रखलु , अपरी जन्म भूमि सी सदा जुड्यु रौलु , बार त्योहारु मा ब्वॆइ अब जरूर घर औलू , तेरा हाथ का पकवान तुम्हारा दगड़ा खौलू , कु होलू धारउद स्यू नौन्याल औणू , स्यु त मेरु अपुरु लाटू जन छ दिखेणू , द्वारा रचितभगवान् सिंह जयाड़ा दिनांक >१४ /०४ /२०१३ फोटो साभार >पहाड़ी दगड्या" height="264" width="398">

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

भगवान सिंह जयाड़ा पहाड़ का बिकाश कु यु पहलू हम तै अपरी पवित्र धरोहर और संस्क्रती पर सोचण कु मजबूर करदू
क्या हम सी कुछ भूल चा होणी ??
***बिकाश बनाम बिनाश****
यु कनु विकाश छ पहाड़ माँ होणूँ ,
जैका पैथर पहाड़ी जन यख रोणूँ ,
कुड़ी पुन्गण्यॉ कु बिछोह छ सौणूँ
बिस्थापन का दर्द सी छ स्यू रोणूँ ,
कुड़ी पुन्गड़ी लोगु की दुबिगी पाणी,
बिपदोऊ की बाड़ यख सौणु प्राणी ,
देवी देब्तोऊ का उठिग्या यख थान ,
जौकी करदा हम पूजा और ध्यान ,
लोगु की आस्था कु होणु अपमान ,
कन  कैई रालू यख मान सम्मान ,
देब्तोउ का प्रकोप त भौत व्हेग्या ,
बिकाश की रौड़ मा ,देखदा रैग्या  ,
देव भूमि तै अब इथ्गा नी खोदा ,
देबी देबता यख का अब यन बोदा ,
यख की परिस्थिति समझा ज़रा ,
बिकाश भी ऊनि ढंग सी यख करा ,
नि त पहाड़ एक दिन उजड़ी जालू ,
तब पछतौण का सिवा कुछ नि रालू ,
यु कनु विकाश छ पहाड़ माँ होणूँ ,
जैका पैथर पहाड़ी जन यख रोणूँ ,

द्वारा रचित >भगवान सिंह जयड़ा
दिनांक >०२/०५/२०१३
अबू धाबी (संयुक्त अरब अमीरात )
http://pahadidagadyaa.blogspot.ae/ — with सुनीता शर्मा and 13 others. Photo: पहाड़ का बिकाश कु यु पहलू हम तै अपरी पवित्र धरोहर और संस्क्रती पर सोचण कु मजबूर करदू क्या हम सी कुछ भूल चा होणी ?? ***बिकाश बनाम बिनाश**** यु कनु विकाश छ पहाड़ माँ होणूँ , जैका पैथर पहाड़ी जन यख रोणूँ , कुड़ी पुन्गण्यॉ कु बिछोह छ सौणूँ बिस्थापन का दर्द सी छ स्यू रोणूँ , कुड़ी पुन्गड़ी लोगु की दुबिगी पाणी, बिपदोऊ की बाड़ यख सौणु प्राणी , देवी देब्तोऊ का उठिग्या यख थान , जौकी करदा हम पूजा और ध्यान , लोगु की आस्था कु होणु अपमान , कन  कैई रालू यख मान सम्मान , देब्तोउ का प्रकोप त भौत व्हेग्या , बिकाश की रौड़ मा ,देखदा रैग्या  , देव भूमि तै अब इथ्गा नी खोदा , देबी देबता यख का अब यन बोदा , यख की परिस्थिति समझा ज़रा , बिकाश भी ऊनि ढंग सी यख करा , नि त पहाड़ एक दिन उजड़ी जालू , तब पछतौण का सिवा कुछ नि रालू , यु कनु विकाश छ पहाड़ माँ होणूँ , जैका पैथर पहाड़ी जन यख रोणूँ , द्वारा रचितभगवान सिंह जयड़ा दिनांक >०२/०५/२०१३ अबू धाबी (संयुक्त अरब अमीरात ) http://pahadidagadyaa.blogspot.ae/" height="378" width="504">

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

भगवान सिंह जयाड़ा **जिंदगी का द्वी दिन**
जिंदगी द्वी दिनै की छ यख ,
किलै छां मन अपरा रूसांण्या,
प्रेम प्यार सी रवा यख सभी ,
किलै छै यन द्वेष, भाव बढौण्या , 
मन मिटाव नि हो कभी यख ,
यनि भावना सभी तुम राखा ,
प्रेम प्यार का द्वी बोला बोल ,
भावनावों कु यख ख्याल राखा,
जिंदगी द्वी दिनै.............,
मिली जुली रैला जब सभी ,
ताकत एक तब बणली हमारी ,
कुई नि होलू जब दुश्मन कैकु ,
तब होली, सच्ची जीत तुम्हारी ,
अफु अफु सदा यख गोरु चरदा,
फिर मनखी मा क्या फर्क रैगी,
बोन्न त नि चांदू बोल मै यन ,
पर जमानु ही कुछ, यन ऐगी ,
जिंदगी द्वी दिनै .............,
भाई भाई मा प्यार नि रैगी ,
यन निर्भागी जमानु अब एगी ,
दूर वालों सी क्या आश करला,
जब अपरा ही यख मुख मोडला,
दुनिया त सदानी चलणी राली ,
पर सदानी एक घुटन सी राली,
सभी समझा दूसरा तै अपरू ,
जब यनि भावना सबू मा आली ,
दुनिया वे दिन या स्वर्ग व्हे जाली ,
जिंदगी द्वी दिनै की छ यख ,
किलै छां मन अपरा रूसांण्या,
प्रेम प्यार सी रवा यख सभी ,
किलै छै यन द्वेष, भाव बढौण्या ,

द्वारा रचित < भगवान् सिंह जयाड़ा
दिनांक >१५/०५/२०१३   

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

भगवान सिंह जयाड़ा
12 hours ago
आज कल श्री अन्ना हजारे जी उत्तराखंड के दौरे पर है ,इसी पर मेरी यह छोटी सी रचना ..
****अन्ना पंहुचे पहाड़ ***
*************************
देश का एक मशीहा पहुंचा पहाड़ ,
जहां लगाई फिर से वही दहाड़ ,
सुन लो सब उत्तराखंड वासियों ,
सब से है मेरी एक ही पुकार ,
शसक्त जनलोकपाल नारा है ,
रहो आप सब इसको तैयार,
भ्रष्ट तंत्र को देश से हटाना है ,
शसक्त जनलोकपाल लाना है ,
लोकसभा चुनाव नजदीक है ,
बस ध्यान अब की तुम रखना ,
जाति धर्म से तुम ऊपर उठकर ,
भाई भतीजाबाद सब भूल कर ,
विवेक से तुम मतदान करना ,
स्वच्छ छबी वाले को ही चुनना ,
जो सुन सके जनता की पुकार ,
और कर सके जो देश का उद्दार ,
तभी साकार होगा मेरा सपना ,
समिर्ध होगा तब ,देश अपना ,

द्वारा रचित >भगवान सिंह जयाड़ा
दिनांक >१८ /०५/२०१३

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

भगवान सिंह जयाड़ा  पहाड़ के दैनिक जीवन में परम्परागत उपयोग की बस्तुओं का तेजी से बिलुप्त होना आज पहाड़ की बिडम्बना बन गयी है ,इन से बिमुखता का खामियाजा हम कहीं न कहीं भुगत रहे है ,लेकिन आज के परिबेस में हम सब बिवस है ,,
           ****बदलाव****
उखल्यारि ,जान्दरी कखी हर्चिग्यन ,
लोड़ी सिलोटी लोग अब बिसरिग्यन ,
घट्ट पहाड़ मा अब सभी उजड़ीग्यन ,
घर की यूं चिज्यों ,लोग बिसरिग्यन ,
बस अब त ,चट पट कु जमानु ऐगी ,
यु सभी घर्या चीजी समलौण्या  रैगी ,
जीभी कु स्वाद भी लोगु कु बदलिगी ,
मनिख्यों कै फुक्यां की आदत व्हेगी ,
मोटू खाणु मोटू पैनणु ,अब कख रैगी ,
विकाश की आंधी अब पहाड़ मा ऐगी ,
जब बीटी लोग यूँसी यख बिमुख व्हेन ,
बानी बानी की बिमारी भी ,पहाड़ ऐन ,
फिर भी आँखा मूंजी सभी सौण्या छन ,
अपरा  पहाड़  कु  खाणू  भुलण्या छन ,
कुछ अपरी संस्क्रती जब जुड्या रौला ,
तभी हम यख  जीवन मा शुखी होला ,
उखल्यारि ,जान्दरी कखी हर्चिग्यन ,
लोड़ी सिलोटी लोग अब बिसरिग्यन ,

द्वारा रचित >भगवान सिंह जयाड़ा
दिनांक >०४ /०६/२०१३
सर्ब अधिकार सुरक्षित @
http://pahadidagadyaa.blogspot.ae/ — with राजेन्द्र सिंह कुँवर 'फरियादी' and 16 others. Photo: पहाड़ के दैनिक जीवन में परम्परागत उपयोग की बस्तुओं का तेजी से बिलुप्त होना आज पहाड़ की बिडम्बना बन गयी है ,इन से बिमुखता का खामियाजा हम कहीं न कहीं भुगत रहे है ,लेकिन आज के परिबेस में हम सब बिवस है ,, ****बदलाव**** उखल्यारि ,जान्दरी कखी हर्चिग्यन , लोड़ी सिलोटी लोग अब बिसरिग्यन , घट्ट पहाड़ मा अब सभी उजड़ीग्यन , घर की यूं चिज्यों ,लोग बिसरिग्यन , बस अब त ,चट पट कु जमानु ऐगी , यु सभी घर्या चीजी समलौण्या  रैगी , जीभी कु स्वाद भी लोगु कु बदलिगी , मनिख्यों कै फुक्यां की आदत व्हेगी , मोटू खाणु मोटू पैनणु ,अब कख रैगी , विकाश की आंधी अब पहाड़ मा ऐगी , जब बीटी लोग यूँसी यख बिमुख व्हेन , बानी बानी की बिमारी भी ,पहाड़ ऐन , फिर भी आँखा मूंजी सभी सौण्या छन , अपरा  पहाड़  कु  खाणू  भुलण्या छन , कुछ अपरी संस्क्रती जब जुड्या रौला , तभी हम यख  जीवन मा शुखी होला , उखल्यारि ,जान्दरी कखी हर्चिग्यन , लोड़ी सिलोटी लोग अब बिसरिग्यन , द्वारा रचितभगवान सिंह जयाड़ा दिनांक >०४ /०६/२०१३ सर्ब अधिकार सुरक्षित @ http://pahadidagadyaa.blogspot.ae" height="378" width="504">

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

भगवान सिंह जयाड़ा उत्तराखंड में आई आपदा का यह वीभत्स रूप देख कर एक बार सब की रूह काप उठती है,और आँखों में आँशु आ जाते है ,,       
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          --------आपदा कु कुरूप ------
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पहाड़ का कुकर , स्याळ भी बण्या  छन खौंबाघ,
मनख्यों कु मासु खैकी ,बणीग्यन स्यू मनस्वाघ,
             
              मर्याँ जानबरू की सी गत,यख मनख्यों की व्हेगी,
              क्यी बगण्या छन अधफुका ,क्यी कखी दब्यां रैगी,

इन्शान की इन गत भी होली ,यन कैन नि सोची ,
चिलांगा और कागा भी खाला जु ,मासु नोची नोची,
               
                मनख्यों की गणती नि छ ,कथा मर्याँ कथा लापता ,
                टपराणी छ नजर अभी भी ,कनि करिगी या आपदा ,

यनु भी होलू  देव भूमि मा,जख थै आस्था सबु की,
कुदरत पर बस निछ कैकु,देखदा रैग्या हाथ धरीकी,
                 
                  कलयुग मा यन होन्दु ,सबून अपरी आंख्योंन देखी ,
                  माँ बाबू यन व्हेन असहाय जौन,नौन्याल बगदु देखि,

सभी सी निवेदन छ मेरु ,जरा ता इन्शानियत राखा ,
मनखी छन चुचौ यू ,जानबरू  की तरोऊ यूँ नी देखा,
                     
                      पहाड़ का कुकर , स्याळ भी बण्या  छन खौंबाघ,
                      मनख्यों कु मासु खैकी ,बणीग्यन स्यू मनस्वाघ, 
               -------------------------------------------------------------------
               द्वारा रचित >भगवान सिंह जयाड़ा
               दिनांक >२० /०७ /२०१३
               सब अधिकार सुरक्षित @
               http://pahadidagadyaa.blogspot.ae/ — with सुनीता शर्मा and 19 others.
भगवान सिंह जयाड़ा दिनांक >२० /०७ /२०१३ सब अधिकार सुरक्षित @ http://pahadidagadyaa.blogspot.ae/" height="280" width="400">

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720




Optionsभगवान सिंह जयाड़ा अपने एक अजीज मित्र की लिखी रचना पढ़ी जो अपने गाँओ की ब्यथा पर लिखी थी ,उसी से पिरेरणा ले कर यह लाइनें लिख रहा हूँ ,उम्मीद करता हूँ आप लोग भी जन्म भूमि के इस दर्द को गहराई से समझने की कोशिश करेंगे,,,

                                                                                                           
   >जन्म भूमि की पुकार<
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कभी मुड़ीक जरा इथै भी देखा ।
बैर इथगा तुम मै सी नि राखा ॥
           किलै छां बिमुख मै सी होण्या ।
           अपरू जलणु किलै छै खोण्या ॥
फांग्यों मा तुम जख भी जैल्या ।
भटकी तैई फिर भी मैमू एल्या ॥
           माँ का समान छौऊ मै तुम्हारी ।
           रोंदू मै जब याद औन्दी तुम्हारी ॥
खेल्यां जख जै माटी मा म्यारी ।
भूली गया बचपन की याद प्यारी ॥
           बुड्या ब्वे बाबू भी तुम हेरदी रांदा ।
           कब ऐला घौर तुम ,खुदेंण्यां रांदा ॥
छोड़ीक मैकू ,तुम किलै जाण्यां ।
गौऊ छोड़ीक छै,परदेशी होण्या ॥
           खाण कामौंण कु कखी भी जावा ।
           पर सदानी तुम यु , ध्यान द्यावा ॥
गौऊ मुल्क सदा औन्दु जांदू रवा ।
माँ सी अपरी यन बिमुख नि होवा॥
          जन्म भूमि कू तुम रखा सदा मान ।
          जन्म भूमि होंदी माँ का समान ॥
कभी मुड़ीक जरा इथै भी देखा ।
बैर इथगा तुम मै सी नि राखा ॥
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द्वारा रचित >भगवान सिंह जयाड़ा
दिनांक >२७ /०५ /२०१३
पूर्व प्रकाषित @