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Poems written by Bhagwan Singh Jayara-भगवान सिंह जयड़ा द्वारा रचित गढ़वाली कविता

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, February 22, 2013, 10:16:20 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Dosto,

Here we will be posting poems written by Bhagwan Singh Jayara Ji who has written by interesting & meaningful garhwali & hindi poems. We hope that you would like Mr Jayara Poem.



भगवान सिंह जयाड़ा13 hours ago**रात कु सुपिन्यु **

रात मैन एक प्यारु यनु सुपन्यु देखि ।
हरीं भरीं धरती छई बांज बुरांस कखी ।।
ह्युवाली डांडी काँठी,सफ़ेद चादर जन ह्यू ।
बार बार देखण जैकू करदु थोउ ज्यू ।
माँ बाबू कु, बचपन कु ऊ दुलार देखि ।
भैई बैणों कु , बचपन कु प्यार देखि ।।
ग्वेर दगड्यों कु ऊ पुराणु उलार देखि ।
स्कूली  दगड्यों कु पुराणु प्यार देखि ।।
दाना सयाणु कु उ पुराणु दुलार देखि ।
डाली बुटिल्यों कु प्यारु मौल्यार देखि ।।
कखी गाड़ गद्न्यों कु स्यूस्यातट भारी ।
हरीं भरी धरती कन लगदी थै प्यारी ।।
लैया ,पंया फ्ह्योंली का फूल था प्यारा ।
बुरांस का फूलुन जंगल लगदा था प्यार ।।
सभी जगा थैई छायीं जख बसंती बयार ।
सभी लोगु मा देखि एक अनोखू  उलार ।।
प्रेम प्यार देखि मैन जख सबू मा न्यारू ।
हकीकत सी लगी मैं यनु सुपन्यु प्यारु ।
देवी देव्तोऊ का मंदिर देख्या मैन सारा ।
दर्शन करण कु जाण्या जख लोग सारा ।।
गॉऊ की चहल पहल जन फिर बौडी एगी ।
पुराणु रीती रिवाज जन फिर लौटी एगी ।।
एक बिसरीं जिंदगी फिर जन याद एगी  ।
हकीकत की जिंदगी जन मैं बिसरी गैगि ।।
सुबेर जनि मेरु आंख्यों कु सुपिन्यु टूटी ।
सभी देख्युं करयूँ वखि पहाड़ मा ही छूटी ।।
या सपनों की दुनिया भी क्या छ न्यारी ।
सेयाँ सेयाँ मा ही दुनिया घुमौंदी सारी ।। 
रात मैन एक प्यारु यनु सुपन्यु देखि ।
हरीं भरीं धरती छई बांज बुरांस कखी ।।

द्वारा रचित >भगवान सिंह जयड़ा
दिनांक>21/02/2013
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M S Mehta


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

***मन मिटाव किलै ***

मन इन्शान कु किलै बदली जांदू ।

एक जनु यु सदानी किलै नि रांदु ।।

द्वेष भाव किलै यख मन मा औन्दू ।

अपुरू किलै यख हम सी दूर जांदू ।।

जै अपुरु समझदा किलै मुख फ़ेरदु ।

अफु अफु मा ही किलै फुकेंदु रांदु ।।

किलै मन मिटाव अपरोऊ सी होंदु ।

अपुरु किलै कभी मुख मोड़ी जांदू ।।

मन कु यु मैल हटौण पडौलू पैली।

प्रीत प्रेम तब यख सदा बणी रैली ।।

छोटी छोटी बातु पर कभी नि रूठा ।

मिली जुली राँण कु तुम खड़ा ऊठा ।।

नि रौवा आपस मा यख मुख मोड़ी ।

प्रीत प्यार रखा सदा यख थोड़ी थोड़ी ।।

आपसी प्यार जब यख यु बण्यु रालू ।

जिंदगी जीण कू तब सच्चू मजा आलू।।

मन इन्शान कु किलै बदली जांदू ।

एक जनु यु सदानी किलै नि रांदु ।।

द्वारा रचित >भगवान सिंह जयड़ा

अबुधाबी (यूं .ए .ई .)

दिनांक >18/02/2013

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

From - गवान सिंह जयाड़ा एक कल्पना मेरे मन की ,,,,,
******साहिल और लहरें ***
लहरों ने छेड़ा कुछ यूँ ही साहिल  को ,
तुम सदा खामोश निष्चल क्यों रहते हो ,
हम बेताब रहते है तुम को मिलने को ,
तुम हो कि इजहार तक नहीं करते हो ,
साहिल ने कहा तब मुझे क्या जरूरत है ,
तुम सदा हमें गले तो मिलते रहते हो ,
थपेड़ों का अहशास तो जरूर होता है मुझे ,
मगर मैं अचल निष्चल को मजबूर हूँ ,
दिल तो मचलने को मेरा भी करता है ,
मगर क्या करू बंदिशों से जकड़ा हुवा हूँ ,
अगर जज्ज्बात में अपनी हद तोड़ता हूँ ,
तो क़यामत सी आ सकती है जमीं पर ,
तुम मनचलों का क्या भरोंसा है यहाँ ,
तुम कहाँ तक चली आओगी जहां पर ,
फिर तो साहिल की क्या हैशियत यहाँ ,
इस जहां पर सकल तुम ही मचलावोगी ,
सारी धरा पर तब तुमारा ही राज होगा ,
जमीन सारी तुम में  बिलींन हो जायेगी ,
जल प्रलय का मंजर होगा सब जगह ,
तुम्हारी मौज मस्ती मुझे महँगी पड़ेगी ,
कोशता रहूँगा तब हर पल अपने को ,
सोचता हूँ हर पल सदा इसी सपने को ,
इस लिए मत छेड़ो मुझे यूं  इस कदर ,
नहीं तो भटकती रहोगी सदा यूँ दर बदर ,
मुझे निष्चल खामोस सदा यूँ ही रहने दो ,
बस यूँ ही मिलने का सिलसिला चलने दो ,

द्वारा रचित >भगवान् सिंह जयाड़ा

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

गाँव कु पढ़ी लिख्यु एक लड़का जब प्रदेश जांदू ,और बिदेश तक पहुंची जांदू ,बहुत सालू का बाद अपरा गंवाड्या दगड्यों कै मिलदु त कनी बात करदू ,,,

****सभ्यता की ब्यथा ****

हल्लो ब्रदर हावु आर यू,

मैन बोली वे तै मैं ठीक छऊ ,

पर भुला त्वेतै यु क्या होई ,

अपरी बोली भाषा बिसरी गैई ,

स्यु बोलदु ,फॉरगेट ओल्ड डेज ,

नाउ आई ऍम गोइंग अनादर वेज ,

मैन ब्वाली भुला तू अब बदलीगी ,

अपरी सौ सभ्यता भी बिसरिगी ,

गोरु बाखरा हमुन दगड़ी चरैन ,

स्कूल भी गाँव माँ हम कठ्ठी रैन ,

स्यु बोलदु, नाव वी हैव एवेरी थिंग ,

आई कैन बाई नाव एवरी थिंग ,

मैन बोली भुला स्यु त सब ठीक छ .

पर तेरा मन मा कतै सकूंन  निछ ,

तभी त पहाड़ आज खाली छ होणु ,

दानु प्राणी यख बिपदा मा छ रोणु ,

हम घर्या लोगु तै नि दिखावा शान .

नितर हमुन भी बौण भैर चली जाण ,

तुम्हारा ब्वे बाबु कु हम रखदा ध्यान ,

अर तुम छाँ कि,किलै यथगा गुमान .

अपरी जन्म भूमि कु करा तुम मान ,

जन्म भूमि होंदी जन माँ का समान ,

बौंण भैर जैकी खूब पावा मान सम्मान ,

कभी भी अपरी बोली भाषा नि भुलान ,

औणु अपरू सदा तुम यख करदी रवा  ,

अपरी संस्क्रती तै कभी न भुलावा ,

तब तै भुला का समझ मा बात आई ,

मन ही मन मा स्यु बहुत पछताई ,

बोल्दु भेजी मैं तै तुम माफ़ करयान ,

आज बीटी सदा मैं यु रखुलू ध्यान ,

जै सी नि घटु कभी मात्री भूमि कु मान ,

अपरी संस्क्रती तै सदा याद रखुलू ,

अपरी बोली भाषा कु सदा मान करलू ,

तब द्वि लब्ज मैन ब्वाल्या अंडर स्टैंड नॉऊ ,

स्यु बोल्दु भेजी अब ता मैं कभी न भुलोउ ,

मैंन बोली ओके भुला थैंक्यु बाय बाय ,

अबकी बार अपरा घौर तू जल्दी आई ,

अबकी बार अफु अफु इकुली नि आई ,

बाल बच्चों कै भी एक बार गढ़वाल दिखाई ,

द्वारा रचित >भगवान् सिंह जायाड़ा

  आबूधाबी (यू .ए .ई .)

दिनांक >14 /02/2013

http://pahadidagadyaa.blogspot.com/

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

From - भगवान सिंह जयाड़ा ****यु कनु बदलाव *****
नि सुणेदी कखी गोरु की घाडुली ।
नि बजदी कखी ग्येरू की बांसुरी ।।
हर्ची गैन कखी घर की जांदुरी ।
कख हरिची होली घर बुणी मांदुरी ।।
बांजी पड़ीग्यन गोंऊ की ऊखल्यारी ।
रतब्याण माँ उठदी थई बेटी ब्वारी ।।
हर्ची गैन कखी अब ऊ झुमैलू गीत ।
हर्ची गैई कखी उ मनिख्यों की प्रीत ।।
नि लगदी अब बैखारू की कछड़ी ।
ह्युंद की रातू बैठदा था कभी दगडी ।।
हर्ची गैई कखी कौथग्यारू की टोली ।
खेला मेला होन या दीपावली ,होली ।।
तीज त्योहारु की रौनक भी नि रैगी  ।
हर्ची उलार यख देखा कनु बक्त एगी ।।
भली लगादी थई घस्यार्यों की टोली ।
हेंसुणु खेलणु और मुंड मा गडोली ।।
ब्याखुनी कु घर ओंदा गोरू की लैन ।
उ पूराणा दिन नि जाणी कख गैन ।।
मौसम बदल्न्यु छ ,बदलगी यख हवा।
विनती छ मेरी सभी मिली जुली रवा ।।
अपणी संस्क्रती सी  बिमुख  नि होवा ।
पुराणी सभ्यता अपरी कुछ त बचावा ।।
नि सुणेदी कखी गोरु की घाडुली ।
नि बजदी कखी ग्येरू की बांसुरी ।।

द्वारा रचित >भगवान सिंह जायाड़ा
  दिनांक >14 /02 /2013
— with Rajpal Panwar and 28 others. Photo: ****यु कनु बदलाव ***** नि सुणेदी कखी गोरु की घाडुली । नि बजदी कखी ग्येरू की बांसुरी ।। हर्ची गैन कखी घर की जांदुरी । कख हरिची होली घर बुणी मांदुरी ।। बांजी पड़ीग्यन गोंऊ की ऊखल्यारी । रतब्याण माँ उठदी थई बेटी ब्वारी ।। हर्ची गैन कखी अब ऊ झुमैलू गीत । हर्ची गैई कखी उ मनिख्यों की प्रीत ।। नि लगदी अब बैखारू की कछड़ी । ह्युंद की रातू बैठदा था कभी दगडी ।। हर्ची गैई कखी कौथग्यारू की टोली । खेला मेला होन या दीपावली ,होली ।। तीज त्योहारु की रौनक भी नि रैगी  । हर्ची उलार यख देखा कनु बक्त एगी ।। भली लगादी थई घस्यार्यों की टोली । हेंसुणु खेलणु और मुंड मा गडोली ।। ब्याखुनी कु घर ओंदा गोरू की लैन । उ पूराणा दिन नि जाणी कख गैन ।। मौसम बदल्न्यु छ ,बदलगी यख हवा। विनती छ मेरी सभी मिली जुली रवा ।। अपणी संस्क्रती सी  बिमुख  नि होवा । पुराणी सभ्यता अपरी कुछ त बचावा ।। नि सुणेदी कखी गोरु की घाडुली । नि बजदी कखी ग्येरू की बांसुरी ।। द्वारा रचितभगवान सिंह जायाड़ा दिनांक >14 /02 /2013" height="403" width="403">
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

भगवान सिंह जयाड़ा इस फोटो को देख कर मन में अनायास ही कुछ शब्द उभर आये ,जिन को गढ़वाली कबिता के रूप में प्रस्तुत कर रहा हूँ ,,,
****हरीं डाली बुटली******
हरी भरी डाली कन लगदी प्यारी ,
डाली बुटली छन जिंदगी हमारी ,
कन भलू ठंड़ू युंकी जडु कु पाणी ,
जै पिकैं खुश व्हॆ जांदू हर प्राणी ,
डांडी कांठ्यों देखा लगदी हरी भरी ,
युंका बिना सरी प्रक्रति  छ अधूरी ,
ताज़ी हवा पाणी देंदा हम सबूकू ,
पर्यावरण की रक्षा करदा हमूकू ,
बच्चों का समान यूँ देखा भाला ,
नि काटा यूँ ,सदा सैंता सँभाला ,
बरखा पाणी भी सब यूँ की देंण ,
पडलु सूखू यख  ,तब क्या पेण ,
तरशली धरती तब पाणी बिन,
जन तडफदी बिन पाणी मीन ,
जल जंगल  जमीन देव सामान ,
न छेड़ा यूँ तै करा सदा सम्मान ,
जंगल हमारा जब बच्यां राला ,
सुख समिर्धि स्यू सबुकू ल्याला ,
हरी भरी डाली कन लगदी प्यारी ,
डाली बुटली छन जिंदगी हमारी ,

द्वारा रचित >भगवान सिंह जयाड़ा
दिनांक >10 ,02 ,2013
फोटो सौजन्य >एक्स्प्लोर दी नेचर — with Puja Jayara Kumain and 28 others. Photo: इस फोटो को देख कर मन में अनायास ही कुछ शब्द उभर आये ,जिन को गढ़वाली कबिता के रूप में प्रस्तुत कर रहा हूँ ,,, ****हरीं डाली बुटली****** हरी भरी डाली कन लगदी प्यारी , डाली बुटली छन जिंदगी हमारी , कन भलू ठंड़ू युंकी जडु कु पाणी , जै पिकैं खुश व्हॆ जांदू हर प्राणी , डांडी कांठ्यों देखा लगदी हरी भरी , युंका बिना सरी प्रक्रति  छ अधूरी , ताज़ी हवा पाणी देंदा हम सबूकू , पर्यावरण की रक्षा करदा हमूकू , बच्चों का समान यूँ देखा भाला , नि काटा यूँ ,सदा सैंता सँभाला , बरखा पाणी भी सब यूँ की देंण , पडलु सूखू यख  ,तब क्या पेण , तरशली धरती तब पाणी बिन, जन तडफदी बिन पाणी मीन , जल जंगल  जमीन देव सामान , न छेड़ा यूँ तै करा सदा सम्मान , जंगल हमारा जब बच्यां राला , सुख समिर्धि स्यू सबुकू ल्याला , हरी भरी डाली कन लगदी प्यारी , डाली बुटली छन जिंदगी हमारी , द्वारा रचितभगवान सिंह जयाड़ा दिनांक >10 ,02 ,2013 फोटो सौजन्य >एक्स्प्लोर दी नेचर" height="403" width="403">

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

From -भगवान सिंह जयाड़ा

यह भी एक पहलु है ,हमारी आजादी का ,
इतने सालों में भी यह क्या है ,
भूख से लाचार यह बच्चे क्यों है ,
अमीर, गरीबी में क्यों इतनी खाई ,
किसी को दो बक्त रोटी नहीं है ,
और कोई खा रहा है रसमलाई ,
गरीबी का मंजर जब ख़त्म होगा ,
तभी भारत अशली गणतंत्र होगा ,

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

भगवान सिंह जयाड़ा 
बौड़ी आवा घौर

बौड़ी आवा घौर, बुबोउ यथगा नि रुलावा |
हाल ब्वे बाबू का ,अपरा तुम देखि जावा ||
           आंखी तरसीज्ञन हमारी, यख बाटू हेरी हेरी |
           झट पट कई आवा घौर, अब नि करा देरी ||
पाल्या सैंति बड़ा करी तुम, पढाई लिखाई |
दुनिया मा चलण कु, तुमतै रस्ता दिखाई ||
            सोची थौउ बुढापा मा, हमारी सेवा कराला |
           पर क्या जानण थौउ यख यकुली ही मरला ||
दिन रात लग्यां रंदा यख हम सदा  सास |
कब आला हमारा बौडी यख हमारा पास ||
             खेई बई बुन्गड़ी सब, अब बान्न्जी व्हेगी |
             रचैई बसैई कूड़ी भी अब ,सब सूनी व्हेगी ||
किले हमकू तुम सभी ,यना रूठी गैया |
यकुला बुढया माँ बाप ,गौउ मा छोड़ी गैया ||
               बिमुख यन न ,अपरि जन्म भूमि सी होवा ||
               औणु जाणु राखा यख ,यथ्गा बिमुख नि होवा ||
बौडी आवा घौर बुबोउ यथगा नि रुलावा |
हाल ब्वे बाबू का अपरा तुम देखि जावा ||

द्वारा रचित >भगवान सिंह जयाड़ा
दिनांक >३.०९.२०१२
http://pahadidagadyaa.blogspot.com/

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

भगवान सिंह जयाड़ा मेरा नजरिया मा गौउ कु बिकाश ही देश कु असली बिकाश छ ,,,         
            गौउ माँ बदलाव
समय बदली साधन बदल्या ,बद्लिगी सरू समाज |
बदलाव की आंधी माँ यख ,होणु छ नयु आगाज ||
नई नई शुख सुबिधा देखा,अब गौउ गौउ माँ ऐज्ञन |
पुराणी वाली सब बात ,अब यख सम्लौन्या रैज्ञन ||
घरु घरु माँ देखा सब सुबिधा ,शैरू वाली व्हेज्ञन |
अब त गौउ माँ हमारा  ,सभी शहरी सुबिधा ऐज्ञन |
खाणु राणु बद्लिगी सब कुछ ,बद्लिगी जीवन शैली |
अब सब कुछ बद्लिगी ,नि रै कुछ जन थोऊ पैली ||
क्य नि छ गौउ माँ आज ,सब शुख सुबिधा व्हेगन |
खाण कमौंण की यख ,नई नई शुख सुबिधा ऐज्ञान ||
गौउ गौउ मा शैर बाजारू की सी ,यख रौनक एई छ |
सभी जरूरत की चिज्युँन ,यख दूकान सदा सजी  छ ||
बिजली और टेलीफोन की लेंन ,गौउ गौउ मा बिछी छ |
इन्टरनेट और मोबाइल की सुबिधा सभी जगा पौंछी छ|| 
सब का हाथ माँ मोबाइल ,सरी दुनिया सी जुडयूं छ |
खबर सार सारी  दुनिया की ,पल पल की राख्न्युनु छ||
सड़क्यों का गौउ गौउ माँ ,कना जाल बिछयां छन |
गौउ जुडीज्ञन आपस माँ ,दूरी घटीज्ञन सभी खुशी छन ||
गौउ गौउ माँ स्कूल खुलिग्या ,कोलेज सब जगा व्हेज्ञन |
पढ़ा लिखा अ खूब ,पैली वाली बात अब यख नि रैज्ञन ||
बड़ा बड़ा आई टी संस्थान अब यख घर माँ ही खुलिज्ञन |
बिकाश का बड़ा रस्ता आज,हमारा पहाड़ माँ भी ऐज्ञन||
बस बिकाश कु फायदा ,अब हम तै उठौण की जरूरत छ |
पहाड़ कु पिछ्णुपन कै,दूर करण कु शिक्षा की जरूरत छ ||
   
हौस्पिटल की सुभिदा भी ,अब सभी जगा मिली जाली |
पैली की तरोऊ अब ,जनता दुःख तख्लिफ माँ नि राली ||
बस कमी छ त यख अब , रोजगार  पहाड़ माँ कब आलू |
बस कुछ दिनु माँ जल्दी ,वेकु भी रास्ता निकली जालू||
जब पहाड़ कु बच्चा ,अपरा पहाड़ माँ बेरोजगार नि रालु |
वे दिन उत्तराखंड ,सच माँ खुशहाल राज्य व्हेई जालू ||
रुकी जालू मनखी ,पहाड़ माँ ही सदानी कु व्हेई जालू |
पलायन कु यु सिलसिला, यख सदानी कु रुकी जालू || 
समय बदली साधन बदल्या ,बद्लिगी सरू समाज |
बदलाव की आंधी माँ यख ,होणु छ नयु आगाज ||

रचियता >भगवन सिंह जयड़ा
दिनांक >३१.०८.२०१२ 
http://pahadidagadyaa.blogspot.com/ — with Parashar Gaur and 18 others. Photo: मेरा नजरिया मा गौउ कु बिकाश ही देश कु असली बिकाश छ ,,, गौउ माँ बदलाव समय बदली साधन बदल्या ,बद्लिगी सरू समाज | बदलाव की आंधी माँ यख ,होणु छ नयु आगाज || नई नई शुख सुबिधा देखा,अब गौउ गौउ माँ ऐज्ञन | पुराणी वाली सब बात ,अब यख सम्लौन्या रैज्ञन || घरु घरु माँ देखा सब सुबिधा ,शैरू वाली व्हेज्ञन | अब त गौउ माँ हमारा  ,सभी शहरी सुबिधा ऐज्ञन | खाणु राणु बद्लिगी सब कुछ ,बद्लिगी जीवन शैली | अब सब कुछ बद्लिगी ,नि रै कुछ जन थोऊ पैली || क्य नि छ गौउ माँ आज ,सब शुख सुबिधा व्हेगन | खाण कमौंण की यख ,नई नई शुख सुबिधा ऐज्ञान || गौउ गौउ मा शैर बाजारू की सी ,यख रौनक एई छ | सभी जरूरत की चिज्युँन ,यख दूकान सदा सजी  छ || बिजली और टेलीफोन की लेंन ,गौउ गौउ मा बिछी छ | इन्टरनेट और मोबाइल की सुबिधा सभी जगा पौंछी छ|| सब का हाथ माँ मोबाइल ,सरी दुनिया सी जुडयूं छ | खबर सार सारी  दुनिया की ,पल पल की राख्न्युनु छ|| सड़क्यों का गौउ गौउ माँ ,कना जाल बिछयां छन | गौउ जुडीज्ञन आपस माँ ,दूरी घटीज्ञन सभी खुशी छन || गौउ गौउ माँ स्कूल खुलिग्या ,कोलेज सब जगा व्हेज्ञन | पढ़ा लिखा अ खूब ,पैली वाली बात अब यख नि रैज्ञन || बड़ा बड़ा आई टी संस्थान अब यख घर माँ ही खुलिज्ञन | बिकाश का बड़ा रस्ता आज,हमारा पहाड़ माँ भी ऐज्ञन|| बस बिकाश कु फायदा ,अब हम तै उठौण की जरूरत छ | पहाड़ कु पिछ्णुपन कै,दूर करण कु शिक्षा की जरूरत छ || हौस्पिटल की सुभिदा भी ,अब सभी जगा मिली जाली | पैली की तरोऊ अब ,जनता दुःख तख्लिफ माँ नि राली || बस कमी छ त यख अब , रोजगार  पहाड़ माँ कब आलू | बस कुछ दिनु माँ जल्दी ,वेकु भी रास्ता निकली जालू|| जब पहाड़ कु बच्चा ,अपरा पहाड़ माँ बेरोजगार नि रालु | वे दिन उत्तराखंड ,सच माँ खुशहाल राज्य व्हेई जालू || रुकी जालू मनखी ,पहाड़ माँ ही सदानी कु व्हेई जालू | पलायन कु यु सिलसिला, यख सदानी कु रुकी जालू || समय बदली साधन बदल्या ,बद्लिगी सरू समाज | बदलाव की आंधी माँ यख ,होणु छ नयु आगाज || रचियताभगवन सिंह जयड़ा दिनांक >३१.०८.२०१२ http://pahadidagadyaa.blogspot.com/" height="403" width="843">

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

भगवान सिंह जयाड़ा ####उत्तराखंड माँ बसगाल######
हे भगवान यु क्य छ उत्तराखंड माँ होणु |
किले छ मनिखी यख तकलीफ माँ रोणु ||
बसगाल शुरू होंदी ही यु सब क्या व्हेगी |
पहाडू माँ आपदोउ की यन आफत कैगी ||
घर पुगड़ी लोगु की सब बर्बाद व्हेज्ञन  |
पुर्खोऊ की जैजात देखा समलौन्या रैज्ञान ||
जन जीवन सरू अस्त ब्यस्त होयु छ सारू |
मनखी भटनणु छ यख दर दर कु मारू ||
रगड़ी भगड़ी देखा सभी क्या हाल व्हेग्या |
सडक्यों कै देखा ,अब खाली निशाँण रैग्या ||
बिपदा माँ भटकन्या छन यख लोग सारा |
खुला आसमान का नीश ,भूख का मारा ||
कुइ रोंदा बिलख्दा यख,जौंन अपुरा खोया |
कनी आपदा आई या ,मन सबू का रोया | 
जख करदा था हम देव्तावु सी बड़ी आश |
तै देव भूमि माँ कीलें होणु छ यनु बिनाश ||
कखी ना कखी यख माँ हमारी भूल छ |
क्या हमुन तोड़ी कुछ प्रक्रति कु वसूल छ ||
जै कै हम छोऊ समझंन्या अपुरु बिकास |
क्या स्यु त निछ करन्यू यनु बिनाश ||
हे भगवान यु क्य छ उत्तराखंड माँ होणु |
किले छ मनिखी यख तकलीफ माँ रोणु ||

द्वारा रचित >भगवान सिंह जयाड़ा
अबुधाबी (संयुक्त अरब अमीरात ) — with Veerendra Singh and 13 others. Photo: ####उत्तराखंड माँ बसगाल###### हे भगवान यु क्य छ उत्तराखंड माँ होणु | किले छ मनिखी यख तकलीफ माँ रोणु || बसगाल शुरू होंदी ही यु सब क्या व्हेगी | पहाडू माँ आपदोउ की यन आफत कैगी || घर पुगड़ी लोगु की सब बर्बाद व्हेज्ञन  | पुर्खोऊ की जैजात देखा समलौन्या रैज्ञान || जन जीवन सरू अस्त ब्यस्त होयु छ सारू | मनखी भटनणु छ यख दर दर कु मारू || रगड़ी भगड़ी देखा सभी क्या हाल व्हेग्या | सडक्यों कै देखा ,अब खाली निशाँण रैग्या || बिपदा माँ भटकन्या छन यख लोग सारा | खुला आसमान का नीश ,भूख का मारा || कुइ रोंदा बिलख्दा यख,जौंन अपुरा खोया | कनी आपदा आई या ,मन सबू का रोया | जख करदा था हम देव्तावु सी बड़ी आश | तै देव भूमि माँ कीलें होणु छ यनु बिनाश || कखी ना कखी यख माँ हमारी भूल छ | क्या हमुन तोड़ी कुछ प्रक्रति कु वसूल छ || जै कै हम छोऊ समझंन्या अपुरु बिकास | क्या स्यु त निछ करन्यू यनु बिनाश || हे भगवान यु क्य छ उत्तराखंड माँ होणु | किले छ मनिखी यख तकलीफ माँ रोणु || द्वारा रचितभगवान सिंह जयाड़ा अबुधाबी (संयुक्त अरब अमीरात )" height="335" width="403">