• Welcome to MeraPahad Community Of Uttarakhand Lovers.
 

Balli Singh Cheema' Poem - बल्ली सिंह चीमा जी की कविताये

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, February 22, 2013, 11:25:44 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

दोस्तों,

इस टॉपिक में हम प्रस्तुत कर रहे है एक प्रख्यात कवि श्री बल्ली सिंह चीमा जी कुछ कविताये! बल्ली जी ने  उत्तराखंड राज्य आन्दोलन के दौरान भी काफी महतवपूर्ण कविताये लिखी! उत्तराखण्ड आन्दोलन रहा हो या राज्य बनने से पूर्व शराब विरोधी आन्दोलन बल्ली सिंह अपनी कविताओं के साथ जनता के बीच मौजूद रहे |बल्ली सिंह चीमा अब स्थायी रूप से गांव -मडैया तहसील -बाजपुर ऊधमसिंहनगर जनपद में रच -बस गए है!
ले मशालें चल पड़े हैं लोग मेरे गाँव के -बल्ली सिंह चीमा

जन्म: 02 सितंबर 1952
जन्म स्थान- चीमाखुर्द गाँव,चभाल तहसील, अमृतसर ज़िला, पंजाब, भारत

बल्ली सिंह चीमा देश भर के कविता मंचों ,विश्ववद्यालयों में कविता पाठ करने के साथ -साथ देश की प्रतिष्ठित पत्र -पत्रिकाओं में अपनी रचनाओं के साथ उपस्थित रहते हैं |बल्ली सिंह चीमा अपने गीतों में कहीं कहीं छंद का अतिक्रमण भी करते हैं | कृतियाँ -ख़ामोशी के खिलाफ़ [गीत /गजल 1980] जमीन से उठती आवाज़ [गज़ल संग्रह 1990] तय करो किस ओर  [कविता संग्रह -गीत /गज़ल 1998] अभी हाल ही में जयपुर में 7 अगस्त को कविता कोष सम्मान से बल्ली सिंह चीमा को सम्मानित किया गया है |वर्ष 2004में देवभूमि रतन सम्मान मँसूरी उत्तराखण्ड, वर्ष 2005 में कुमांऊ गौरव सम्मान हल्द्वानी ,2006 में पर्वतीय शिरोमणि सम्मान देहरादून से बल्ली सिंह चीमा को सम्मानित किया जा चुका है |बल्ली सिंह चीमा ने स्नातक के समकक्ष प्रभाकर की डिग्री गुरुनानक विश्वविद्यालय अमृतसर से हासिल किया है!

Here is one of the most popular Poem of Balli Singh Cheema ji.

ले मशालें चल पड़े हैं लोग मेरे गाँव के -बल्ली सिंह चीमा

ले मशालें चल पड़े हैं लोग मेरे गाँव के ।
अब अँधेरा जीत लेंगे लोग मेरे गाँव के ।

कह रही है झोपडी औ' पूछते हैं खेत भी,
कब तलक लुटते रहेंगे लोग मेरे गाँव के ।

बिन लड़े कुछ भी यहाँ मिलता नहीं ये जानकर,
अब लड़ाई लड़ रहे हैं लोग मेरे गाँव के ।

कफ़न बाँधे हैं सिरों पर हाथ में तलवार है,
ढूँढने निकले हैं दुश्मन लोग मेरे गाँव के ।

हर रुकावट चीख़ती है ठोकरों की मार से,
बेडि़याँ खनका रहे हैं लोग मेरे गाँव के ।

दे रहे हैं देख लो अब वो सदा-ए-इंक़लाब,
हाथ में परचम लिए हैं लोग मेरे गाँव के ।

एकता से बल मिला है झोपड़ी की साँस को,
आँधियों से लड़ रहे हैं लोग मेरे गाँव के ।

तेलंगाना जी उठेगा देश के हर गाँव में,
अब गुरिल्ले ही बनेंगे लोग मेरे गाँव में ।

देख 'बल्ली' जो सुबह फीकी दिखे है आजकल,
लाल रंग उसमें भरेंगे लोग मेरे गाँव के ।

--------

M S Mehta

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Balli Singh Cheema's Poem on Nainital

लोग करते हैं बहुत तारीफ़ नैनीताल की ।
चल मनाएँगे वहीं पर छुट्टियाँ इस साल की ।

लोग रोनी सूरतें लेकर यहाँ आते नहीं,
रूठना भी है मना वादी में नैनीताल की !

अर्द्धनंगे ज़िस्म हैं या रंग-बिरंगी तितलियाँ,
पूछती है आप ही से 'माल' नैनीताल की !

ताल तल्ली हो कि मल्ली चहकती है हर जगह,
मुस्कराती और लजाती शाम नैनीताल की !

चमचमाती रोशनी में रात थी नंगे बदन,
झिलमिलाती, गुनगुनाती झील नैनीताल की !

अब यहाँ, पल में वहाँ, कब किस पे बरसें, क्या ख़बर,
बदलियाँ भी हैं फ़रेबी यार नैनीताल की !

ख़ूबसूरत जेब हो तो हर नगर सुन्दर लगे,
जेब खाली हो तो ना कर बात नैनीताल की  !


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बर्फ़ से ढक गया है पहाड़ी नगर BY बल्ली सिंह चीमा
बर्फ़ से ढक गया है पहाड़ी नगर ।
चाँदी-चाँदी हुए हैं ये पत्थर के घर ।

ख़ूबसूरत नज़ारे बुलाते हैं आ,
मैं परेशान हूँ पहले देखूँ किधर ।

तेरे दाँतों-सी सुन्दर सफ़ेदी लिए,
रास्ते मुस्कराए मुझे देखकर ।

तेरे चेहरे-से सुन्दर मकानों में ही,
काश होता सनम एक अपना भी घर ।

चूमकर पैर पगडंडियाँ हँस पड़ीं,
तू गिरेगा नहीं देख इतना न डर ।

ठण्डी-ठण्डी हवाएँ गले से मिलीं,
और कहने लगीं हो सुहाना सफ़र ।

चीड़ के पेड़ कुहरे में उड़ते लगें,
टहनियाँ हैं या उड़ते परिन्दों के पर ।

दिल है मेरा भी तेरी तरह फूल-सा,
इस पे होने लगा मौसमों का असर ।

मुस्कराते हुए ये हँसी वादियाँ,
कह रही हैं हमें देखिएगा इधर ।

बर्फ़ की सीढ़ियाँ, बर्फ़ की चोटियाँ,
हैं बुलाती हमें आइएगा इधर ।

तेरी जुल्फ़ों-सी काली नहीं रात ये,
है बिछी चाँदनी देखता हूँ जिधर ।

काली नज़रों से, यारो ! बचाओ इन्हें,
इन पहाड़ों पे जन्नत है आती नज़र ।

ज़िन्दगी ख़ूबसूरत पहाड़न लगे,
साथ तेरा हो और हो पहाड़ी सफ़र ।

हम मिले अर्थ जीवन ने पाए नए,
देख 'बल्ली' का चेहरा गया निखर ।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

ये किसको ख़बर थी कि ये बात होगी
By - बल्ली सिंह चीमा


ये किसको ख़बर थी कि ये बात होगी
पकी खेतियों पर भी बरसात होगी

ये सूखे हुए खेत कहते हैं मुझसे
सुना था कि सावन में बरसात होगी
 
ये सावन भी जब सावनों-सा नहीं है
तो फिर कैसे कह दूँ कि बरसात होगी
 
उमड़ते हुए बादलो! ये बताओ
कि रिमझिम की भाषा में कब बात होगी

उसूलों को जीवन में शामिल भी रखना
कभी बेअसूलों से फिर बात होगी

अँधेरे हो तुम तो उजाले हैं हम भी
कभी न कभी तो मुलाक़ात होगी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

तय करो किस ओर हो तुम -  बल्ली सिंह चीमा


तय करो किस ओर हो तुम तय करो किस ओर हो ।
आदमी के पक्ष में हो या कि आदमखोर हो ।।

ख़ुद को पसीने में भिगोना ही नहीं है ज़िन्दगी,
रेंग कर मर-मर कर जीना ही नहीं है ज़िन्दगी,
कुछ करो कि ज़िन्दगी की डोर न कमज़ोर हो ।
तय करो किस ओर हो तुम तय करो किस ओर हो ।।

खोलो आँखें फँस न जाना तुम सुनहरे जाल में,
भेड़िए भी घूमते हैं आदमी की खाल में,
ज़िन्दगी का गीत हो या मौत का कोई शोर हो ।
तय करो किस ओर हो तुम तय करो किस ओर हो ।।

सूट और लंगोटियों के बीच युद्ध होगा ज़रूर,
झोपड़ों और कोठियों के बीच युद्ध होगा ज़रूर,
इससे पहले युद्ध शुरू हो, तय करो किस ओर हो ।
तय करो किस ओर हो तुम तय करो किस ओर हो ।।

तय करो किस ओर हो तुम तय करो किस ओर हो ।
आदमी के पक्ष में हो या कि आदमखोर हो ।।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

धूप से सर्दियों में ख़फ़ा कौन है BY बल्ली सिंह चीमा
धूप से सर्दियों में ख़फ़ा कौन है ?
उन दरख़्तों के नीचे खड़ा कौन है ?

बह रही हो जहाँ कूलरों की हवा,
पीपलों को वहाँ पूछता कौन है ?

तेरी जुल्फ़ों तले बैठकर यूँ लगा,
अब दरख़्तों तले बैठता कौन है ?

आप जैसा हँसी हमसफ़र हो अगर,
जा रहे हैं कहाँ सोचता कौन है ?

रात कैसे कटी और कहाँ पर कटी,
अजनबी शहर में पूछता कौन है ?

आप भी बावफ़ा 'बल्ली' भी बेगुनाह,
सारे किस्से में फिर बेगुनाह कौन है ?


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जैसे जिंदगी के साथ / बल्ली सिंह चीमा

गम और खुशी मिलते हैं जैसे जिंदगी के साथ,
कुछ होश भी दे दो मुझे , इस बेखुदी के साथ।

आती नहीं है आज भी बनियागिरी हमें,
कुछ दे दिया या ले लिया हमने खुशी के साथ।

कुछ हो भी गया हो तो खुदा खैर करे,
मिलते हैं आजकल वो बडी बेरूखी के साथ।

बल्ली बफा और इश्क की बातें हवा में हुई,
वो भी किसी के साथ हैं , मैं भी किसी के साथ।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

ऐसा भी हो सकता है BY बल्ली सिंह चीमा
साज़िश में वो ख़ुद शामिल हो, ऐसा भी हो सकता है,
मरने वाला ही क़ातिल हो, ऐसा भी हो सकता है ।

आज तुम्हारी मंज़िल हूँ मैं, मेरी मंज़िल और कोई,
कल को अपनी इक मंज़िल हो, ऐसा भी हो सकता है ।

साहिल की चाहत हे लेकिन, तैर रहा हूँ बीचों-बीच,
मंझधारों में ही साहिल हो, ऐसा भी हो सकता है ।

तेरे दिल की धडकन मुझको लगे है अपनी-अपनी-सी,
तेरा दिल ही मेरा दिल हो, ऐसा भी हो सकता है ।

जीवन भर भटका हूँ 'बल्ली', मंज़िल हाथ नहीं आई,
मेरे पैरों में मंज़िल हो ऐसा भी हो सकता है ।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

हिलाओ पूँछ तो करता है प्यार अमरीका / बल्ली सिंह चीमा
हिलाओ पूँछ तो करता है प्यार अमरीका ।
झुकाओ सिर को तो देगा उधार अमरीका ।
बड़ी हसीन हो बाज़ारियत को अपनाओ,
तुम्हारे हुस्न को देगा निखार अमरीका ।

बराबरी की या रोटी की बात मत करना,
समाजवाद से खाता है ख़ार अमरीका ।
आतंकवाद बताता है जनसंघर्षों को,
मुशर्रफ़ों से तो करता है प्यार अमरीका ।

ये लोकतंत्र बहाली तो इक तमाशा है,
बना हुआ है हक़ीक़त में ज़ार अमरीका ।
विरोधियों को तो लेता है आड़े हाथों वह,
पर मिट्ठूओं पे करे जाँ निसार अमरीका ।

प्रचण्ड क्रान्ति का योद्धा या उग्रवादी है,
सच्चाई क्या है करेगा विचार अमरीका ।
तेरे वुजूद से दुनिया को बहुत ख़तरा है,
यह बात बोल के करता है वार अमरीका ।

स्वाभिमान गँवाकर उदार हाथों से,
जो एक माँगो तो देता है चार अमरीका ।
हरेक देश को निर्देश रोज़ देता है,
ख़ुदा कहो या कहो थानेदार अमरीका ।