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Biggest Cloudburst incident in Kedarnath Uttarakhand-सबसे बड़ी आपदा उत्तराखंड में

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, June 22, 2013, 12:30:10 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

उत्तरकाशी: बीते वर्ष जून में आई आपदा को नौ महीने बीत चुके हैं, लेकिन पीड़ितों के सिर पर अभी भी छत नहीं है। हालांकि अब सरकार की ओर से पहली किश्त जारी हुई है। बावजूद इसके 56 परिवारों को मकान मिलने में अभी भी लंबा समय लगेगा। लिहाजा, आपदा में बेघर हुए परिवार अभी भी किराये के कमरों में रहने को मजबूर हैं।

बीते साल जून में आई आपदा में हजारों लोग बेघर हो गए थे। सरकारी के आंकड़ों के अनुसार 262 परिवार बेघर हुए थे। इन परिवारों के सिर पर नौ महीने से छत नहीं है। अब जाकर सरकार ने 206 परिवारों को डेढ़ लाख रुपये की पहली किश्त जारी की है। सरकार ने बेघर हुए परिवारों को पांच लाख रुपये देने की घोषणा की थी। नौ महीने तक प्रशासन सिर्फ सूचियां तैयार करने में ही जुटा रहा। इसके बाद भी 56 परिवारों को पहली किश्त भी जारी नहीं हो सकी। प्रशासन ने इनकी चयनित भूमि को अयोग्य बताते हुए इन परिवारों की किश्त रोक दी है। लिहाजा नई भूमि की व्यवस्था करने की लंबी प्रक्रिया के बाद ही इन परिवारों को पहली किश्त मिल सकेगी। वहीं, प्रशासन भवन निर्माण के लिए प्रस्तावित जमीन ना दिखा पाने के कारण 40 परिवारों को अपात्र घोषित कर चुका है। लिहाजा इन परिवारों को मजबूरन किराये के कमरों में ही खुद को समेटने की जद्दोजहद करनी पड़ रही है।

प्रक्रियाओं में उलझे

बेघर परिवारों को घर निर्माण के लिए पहली किश्त मिलने में कई प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ा। सरकार की घोषणा के बाद जिला प्रशासन की ओर से जारी सूची को विश्व बैंक की टीम ने स्वीकार करने से इन्कार कर दिया था। विश्व बैंक की टीम ने सभी बेघरों को घर देने की बात कही थी। लिहाजा जिला प्रशासन की ओर से दूसरी सूची बनाई गई। ऐसे में प्रभावितों को लगातार क्षेत्रीय राजस्व निरीक्षक से लेकर जिला प्रशासन के चक्कर काटने पड़े।

यूं गुजरे नौ महीने

- पहली सूची में थे केवल 30 परिवार

- दूसरी सूची में शामिल किए गए 302 परिवार।

- भूमि उपलब्ध ना करवाने पर 40 परिवारों को ठहराया गया अयोग्य।

- 56 परिवारों की भूमि को निर्माण के लिए अब बताया गया संवेदनशील।

- केवल 206 परिवारों को मिल सकी पहली किश्त।

'बेघर परिवारों को पहली किश्त जारी हो चुकी है। अन्य की भूमि का दाखिला खारिज होने पर किश्त का भुगतान कर दिया जाएगा। कोशिश की जा रही है कि भवन निर्माण का काम तेजी से हो सके'

- श्रीधर बाबू अंद्दाकी, जिलाधिकारी उत्तरकाशी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


मेरठ : उत्तराखंड आपदा में मारे गए और स्थायी रूप से लापता लोगों के आश्रितों को उप्र सरकार की ओर से दो लाख की धनराशि मिलेगी।

उत्तराखंड आपदा में मृतकों के आश्रितों को मिलेंगे 2 लाख

पिछले साल 16-17 जून को उत्तराखंड के केदारनाथ, रामबाड़ा, गौरीकुंड, सोनप्रयाग, गोविंदघाट एवं उत्तराखंड के अन्य स्थानों में आई भीषण जल प्रलय और महाविनाश में यूपी के भी अनेक लोग मारे गए थे। अनेक लापता हो गए थे, जिनका अभी तक भी कुछ पता नहीं चला है। उत्तराखंड आपदा में मारे गए एवं स्थायी रूप से लापता व्यक्तियों के आश्रितों अथवा उनके उत्तराधिकारियों को दो लाख रुपए की अनुग्रह राशि यूपी सरकार ने देने का निर्णय लिया है। यह धनराशि केंद्र सरकार द्वारा प्रधानमंत्री आपदा राहत कोष से उपलब्ध धनराशि दो लाख एवं केंद्र सरकार द्वारा एसडीआएएफ मद से मिली धनराशि डेढ़ लाख रुपए के अतिरिक्त होगी।

इसके लिए गृह सचिव संजय प्रसाद ने मेरठ समेत सभी जिलों से सूची तलब की है। जिलाधिकारियों को आदेश दिए गए हैं कि उत्तराखंड की प्राकृतिक आपदा में मारे गए और लापता लोगों के आश्रितों की सूची शासन द्वारा नामित नोडल अधिकारी को भेज दें।

http://www.jagran.com/uttar-pradesh/meerut-city-11099374.html

विनोद सिंह गढ़िया

केदारघाटी आपदा से कुछ दिन पूर्व।



Kedarnath Valley before disaster.

Ajay Pandey

उत्तराखंड में आयी आपदा के पीडितो को बीमा कंपनी द्वारा मुआवजा देने में दस्तावेजो कि मांग क्यों
कल में एक खबर देख रहा था etv  उत्तरप्रदेश उत्तराखंड के कार्यक्रम अपना उत्तराखंड में की उत्तराखंड में आयी आपदा के पीड़ितों को बीमा का पैसा देने के लिए बीमा कंपनी ने लाइसेंस यानि की अनुरक्ति लाने की मांग की बीमा कंपनी को यह समझना चाहिए की कितनी मुश्किल से इस आपदा में जान
बचाई होगी उन्होंने तो लाइसेंस कहीं बह गया होगा अब वो लाइसेंस कहाँ से लाएंगे यह बीमा उत्तरकाशी की जिला पंचायत ने करवाया था इसमें ५० लाख का रिस्क कवर था जान माल का नुकसान होने पर उस रिस्क कवर को देने के लिए भी बीमा कंपनी को दस्तावेज चाहिए बीमा कंपनी के पास अभिलेख भी तो होगा उन बीमित व्यक्तियों का नहीं तो वो आजतक उन्हें प्रीमियम की रसीद कैसे देखती थी बीमा के जमा पैंसो की प्रविष्टि कैसे हो रही थी मेरा कहना बीमा कंपनी से येही है की बीमा कंपनी को एक बार अपने रजिस्टर और अभिलेखों को फिर से देखना चाहिए और बीमा कंपनी को उनके रिस्क कवर का पैसा दे देना चाहिए उनसे इस तरह लाइसेंस की मांग नहीं करनी चाहिए और ना ही उन्हें ऐसे चक्कर कटवाने चाहिए उन्होंने बड़ी मुश्किल से इस आपदा में अपनी जान बचाई है ऐसे में उनका लाइसेंस भी बह गया होगा अब वो उसे दुबारा कहाँ ढूढेंगे वह भी अपना जीवन बनाना चाहते हैं ऐसे बीमा कंपनी को चाहिए की वह अपने अभिलेखों को देखकर उन्हें रिस्क कवर का भुगतान करे इससे वह अपना जल्द जीवन बसा सकेंगे अगर बीमा कंपनी उनके इस मुश्किल हालातों में मदद नहीं करेगी तो ये उनके साथ अन्याय होगा और बीमा कंपनी को समझना चाहिए की उन्होंने भी बड़ी मुश्किल से अपनी जान बचाई है ऐसे में उनसे दस्तावेज माँगना गलत है इसके लिए चक्कर कटाना भी अन्याय होगा जिला पंचायत उत्तरकाशी को भी इसमें दखल देनी चाहिए क्योंकि बीमा उसने कराया था इससे उनको मुआवजा जल्द मिलेगा अगर बीमा कंपनी और जिला पंचायत ये नहीं करते तो ये आपदा पीडितो के साथ अन्याय होगा
जय उत्तराखंड
धन्यवाद
अजय पाण्डेय
सदस्य मेरा पहाड़

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

न मिली छत न हुआ विस्थापन

गोपेश्वर: आपदा के नौ महीने बाद भी 163 गांव के पीड़ितों को अभी तक न तो छत मिली और न ही उनका विस्थापन हो पाया पाई है। इसके अलावा जिन लोगों की सरकार ने सुध ली तो उनमें मात्र पांच गांव के विस्थापन की फाइल शासन से लौटकर नहीं आई है।

चमोली जिले में वर्ष 2013 में आई आपदा से 84 और गांव तबाह होकर विस्थापन की श्रेणी के गांवों की संख्या बढ़कर 163 हो गई, लेकिन प्रशासन आपदा प्रभावितों के विस्थापन को लेकर भूमि चयन तक नहीं कर पाया। जिला प्रशासन ने मात्र पांच गांव के लिए भूमि चयन कर विस्थापन का प्रस्ताव शासन को भेजा है, मगर ये फाइलें शासन स्तर पर ही लटकी हुई है और पीड़ित बिना छत के घरबार छोड़कर दर दर की ठोकरें खा रहे हैं। पहाड़ों की परिस्थितियों के मद्देनजर प्री फेब्रिकेटेड हट को पहले ही आपदा पीड़ितों ने लेने से इन्कार कर दिया था। अब टेंट तिरपाल तक भी उन्हें भटकना पड़ रहा है।

ये है विस्थापन का प्रस्ताव

पलेठी गांव- भूमि चयन पास ही के तोक में, धनराशि- 66.50 लाख

सरतोली गांव- पास ही के तोक में, धनराशि 77 लाख

लस्यारी गांव- पास ही के तोक में, धनराशि 18.50 लाख

छिनका चमेली- डिडोली में वन पंचायत की भूमि में धनराशि 526 लाख

फरकंडे- पास ही वन पंचायत की भूमि में धनराशि 24.50 लाख

ये है स्थिति

विस्थापन की श्रेणी में गांव- 163

पूर्ण क्षतिग्रस्त भवनों की संख्या- 536

आंशिक क्षतिग्रस्त भवन- 1210

बेघर परिवार- 536

पुर्नवास की स्थिति- भूमि की तलाश जारी

प्री फेब्रिकेटेड हट- एक भी नहीं

मुआवजे की स्थिति-369 लोगों को प्रथम किश्त

विस्थापन के लिए प्रक्रिया चल रही है। पांच गांवों के विस्थापन की फाइल शासन को भेजी गई है। जबकि अन्य गांवों का सर्वे कर विस्थापन के लिए भूमि चयन हो रहा हे।

नंदकिशोर जोशी, जिला आपदा प्रबंधन अधिकारी
http://www.jagran.com/uttarakhand/chamoli-11176216.html

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720



आशियाने का इंतजार


उत्तारकाशी: आपदा में बेघर हो चुके लोगों को अभी छत नहीं मिल सकी है। प्रशासन के आंकड़ों के अनुसार ऐसे 262 परिवारों के लिए नए घर बनाने हैं। इस प्रक्रिया में कई पेंच आड़े आ रहे हैं। इसके चलते नए आशियानों का इंतजार लंबा होता जा रहा है।

बीते साल जून की आपदा में जिले के विभिन्न हिस्सों में 350 परिवार बेघर हो गए थे। सरकार की ओर से ऐसे परिवारों के भवनों को पूर्ण क्षतिग्रस्त की श्रेणी में मानते हुए मुख्यमंत्री विवेकाधीन कोष से दो लाख रुपये प्रति परिवार को आर्थिक सहायता दी। इसके बाद इन परिवारों के लिए फेब्रिकेटेड भवन बनाने की घोषणा की गई। कुछ ही समय बाद इस योजना में फेरबदल करते पांच लाख रुपये सीधे प्रभावित परिवार को दिए जाने की घोषणा की गई। विश्व बैंक से मिली धनराशि से फेब्रिकेटेड भवनों के निर्माण का भी विकल्प रखा गया। अन्य को दो लाख रुपये पहले मिलने वाली आर्थिक सहायता के साथ ही पांच लाख रुपये भुगतान की प्रक्रिया शुरू की गई। इस प्रक्रिया में भवन स्वामी को खुद ही जमीन तलाश कर अपने लिए भवन तैयार करना है। ऐसे में जमीन की तलाश से लेकर भुगतान के लिए कलक्ट्रेट व तहसील के चक्कर काटने के बावजूद अभी तक सभी लोगों को इसका लाभ नहीं मिल सका है। वहीं फेब्रिकेटेड भवन बनाने में भी सुरक्षित जगह की उपलब्धता के साथ ही कई पेंच सामने आ रहे हैं। इसके चलते आपदा के नौ माह पूरे होने पर एक भी बेघर परिवार का भवन तैयार नहीं हो सका है। वहीं कई ऐसे बेघर परिवार भी हैं जो प्रशासन की सूची में नहीं हैं। ऐसे चालीस से अधिक बेघर परिवार अब भी रोजाना सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं।

कुल बेघर परिवार- 350

आर्थिक सहायता- 7 करोड़ रुपये

भवन के लिए चयनित- 262 परिवार

भवन तैयार हुए- शून्य

'जिले में बेघर हुए परिवारों में अधिकांश ने जमीन उपलब्ध करवा दी है और उनके लिए भवन निर्माण शुरू भी कर दिया है, जबकि वंचित रह गए कुछ परिवार सामान्य औपचारिकताएं पूरी कर लें तो उनके लिए भी प्रक्रिया शुरू कर दी जाएगी।

बीके मिश्रा, एडीएम, उत्तारकाशी।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

कोई नहीं उठा रहा पहाड़ की पीड़ा का बीड़ा

सियासी दल पुनर्वास से काट रहे कन्नी
आपदा को उत्तराखंड में बड़ा मुद्दा बताने वाले सियासी दल उसके मार्मिक पहलु पुनर्वास से कन्नी काटते रहे हैं।

बरस दर बरस पहाड़ों को झकझोरने वाली आपदा से दरक चुके सैंकड़ों गांव हर चुनाव से पहले सियासत का केंद्र बिंदू तो जरूर बनते हैं, लेकिन उनके पुनर्वास की थाह कोई नहीं लेता।

पहाड़ की पीड़ा सियासी भाषणों में तो जरूर झलकती है, लेकिन पुनर्वास की राह ताक रहे गांवों की सुध अब तक किसी ने नहीं ली।

337 गांवों का पुनर्वास बरसों से लटका
राज्य में प्राकृतिक आपदा से प्रभावित कुल 337 गांवों का पुनर्वास बरसों से लटका है जिसपर सिर्फ हर चुनाव दल सियासी मुद्दा बनाता रहा हैं।

हकीकत में अब तक भाजपा और कांग्रेस की प्रदेश में रही सरकारों ने किसी एक गांव का पुनर्वास नहीं किया। जून 16 के बाद राज्य में आई प्राकृतिक आपदा से 103 नए गांव जुड़े हैं जबकि उससे पहले 224 गांव बरसों से पुनर्वास का इंतजार कर रहे हैं।

कार्ययोजना तैयार ही नहीं
गांवों के पुनर्वास के लिए सरकार ने धरातल पर अब तक कोई ठोस कार्यवाही नहीं की है। आपदा के साय में गांवों में रहने को मजबूर जनता को आखिर बसाया कहां जाएगा इसकी कार्ययोजना तैयार ही नहीं हुई।,

पुनर्वास पर वोटों की राजनीति तो हो रही है लेकिन आपदा की मार झल रहे

पुनर्वास के दावों की खुल चुकी है पोल
जून 2013 में आई आपदा के बाद राज्य सरकार ने गांवों के पुनर्वास के लिए केंद्र से वित्तीय मदद मांगी।

योजना आयोग ने सरकार के पुनर्वास प्लान को इसलिए खारिज किया था क्योंकि उसमें यह तक स्पष्ट नहीं था कि पुनर्वास होगा कैसे।

बसाये जाने वाले गांवों के लिए भूमि तक चिन्हित नहीं थी। भूर्गीय सर्वेक्षण, मौजूदा आबादी की स्थिति जैसी कार्ययोजना सरकार नहीं दे पाई।

प्राकृतिक आपदा से प्रभावित ग्राम का पुनर्वास
जनपद - गांव
चमोली - 61
बागेश्वर - 42
पौड़ी - 26
अल्मोड़ा - 9
नैनीताल - 6
पिथौरागढ़ - 129
टिहरी - 27
उत्तरकाशी - 8
रुद्रप्रयाग - 16
देहरादून - 2
यूएस नगर - 1
चंपावत - 10
हरिद्वार - 0
खतरे के साए में हैं 103 गांव
यूं तो सभी 337 गांव खतरे के साए में हैं, लेकिन जून 2013 की आपदा के बाद रुद्रप्रयाग, पिथौरागढ़ और चमोली के कई गांव भूस्खलन जोन, भू धंसाव और नदी कटाव की जद में हैं।

यहां पहाड़ अधिक संवेदनशील हैं, जहां 103 गांव चिन्हित किये गए हैं। पुनर्वास तो दूर अभी भू गर्भीय रिपोर्ट अभी तक तैयार नहीं हुई। जिन्हें हटाया भी गया उनके लिए भी स्थाई पुनर्वास का विकल्प देने के बजाए किराये के मकानों में ठहराया गया है।

चमोली - 12
पौड़ी - 7
पिथौरागढ़ - 58
टिहरी - 8
उत्तरकाशी - 2
रुद्रप्रयाग - 15
चंपावत - 1
(source amar ujala)


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

लुट गया आपदा पीड़ित किरायदारों का हक

जून 2013 में आई आपदा ने देहरादून जिले में हजारों घरों को नुकसान पहुंचाया। किसी का घर बह गया तो किसी की पूरी गृहस्थी मलबे में समा गई।

एक भी किरायेदार आपदा पीड़ित नहीं
इनमें कई किरायेदार भी थे। लेकिन प्रशासन ने जब आपदा राहत राशि बांटी तो उसे एक भी किरायेदार आपदा पीड़ित नहीं मिला।

जबकि एक अनुमान के मुताबिक राजधानी में दो लाख से अधिक किरायेदार रहते हैं। इनमें से अधिकतर आपदा प्रभावित इलाकों में रहते हैं। आपदा राहत राशि बांटने में जिला प्रशासन ने जमकर बंदरबांट की है।

एक को भी राहत राशि नहीं दी गई
इसका एक उदाहरण यह भी है कि सैकड़ों आपदा पीड़ित किरायेदारों में से एक को भी राहत राशि नहीं दी गई है। हालांकि शासनादेश में स्पष्ट प्रावधान है कि आपदा पीड़ित किरायेदारों को नुकसान पर मुआवजा उन्हें ही दिया जाए।

लेकिन पंडितवाड़ी, गल्जवाड़ी, माजरा, नेहरू कॉलोनी, मेहूंवाला माफी, धर्मपुर, बंजारावाला आदि क्षेत्रों में जून 2013 में आई आपदा के बाद राहत के नाम पर जो चेक बांटे गए उनमें एक भी किरायेदार नहीं है।

रजिस्ट्रार कानूनगो प्रेम सिंह साफ कहते हैं कि हमारे पास आपदा प्रभावित किराएदारों की सूची नहीं है। लेखपालों ने हमें जो रिपोर्ट दी उसी के हिसाब से प्रभावितों को चेक दे दिए गए।

आपदा राहत के नहीं बांटे 38 लाख रुपए
वित्तीय वर्ष 2013-14 में आपदा मद में जिले को तीन करोड़ 35 लाख रुपए मिले। इसमें से 38 लाख 48 हजार 807 रुपए प्रभावितों को वितरित नहीं किए गए।

जबकि सैकड़ों आपदा प्रभावितों को राहत राशि मिली ही नहीं है। कई प्रभावित राहत राशि के लिए तहसील और डीएम दफ्तर के चक्कर काट रहे हैं।

यह है शासनादेश
आपदा प्रभावितों की पूरी और सही पहचान के बाद ही स्वीकृत राहत सहायता राशि दी जाए। राहत राशि के वितरण में किसी तरह की अनियमितता एवं दोहराव की स्थिति पाये जाने पर संबंधित जिलाधिकारी उत्तरदायी होंगे।

शासन ने समस्त जिलाधिकारियों को जारी शासनादेश में चेताया था कि कई किरायेदार राहत राशि से वंचित रह जाते हैं। ऐसे लोगों को चिह्नित कर मुआवजा दिया जाए। http://www.dehradun.amarujala.com/news/city-news-dun/uttarakhand-floods-118/

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

सुस्ती पड़ सकती है भारी

जागरण संवाददाता, पौड़ी: पहाड़ों में बीते वर्ष दैवीय आपदा के दौरान भीषण तबाही का कारण बनी अलकनंदा नदी का खौफनाक मंजर किसी से छिपा नहीं है। जन धन की हानि तो हुई ही, नदी के रौद्र रूप ने भी अपने मूल स्थान को छोड़कर आबादी वाले क्षेत्रों की ओर रुख कर भविष्य की चिंता बढ़ा दी, लेकिन इतना कुछ होने के बाद भी डैमेज कंट्रोल पर सरकार की सुस्ती पर भूगर्भ शास्त्री व पर्यावरणविद् चिंतित हैं। उनके मुताबिक दो माह बाद फिर बरसाती सीजन शुरूहोगा ऐसे में यदि जल्दी ही डैजेम कंट्रोल में तेजी नहीं लाई गई तो स्थिति और भी भयावह हो सकती है।

गत वर्ष जून माह में दैवीय आपदा से पहाड़ों में अलकनंदा नदी के साथ ही उसकी सहायक नदियों ने जो कहर बरपाया, उसके निशान सालों तक मिट नही पाएंगे। कई लोगों की अकाल ही मौत तो हुई तो गांवों के गांव भी उजड़ गए। नदी का विकराल रूप ऐसा कि कहीं बाढ़ ने तबाही मचाई तो कहीं नदियों ने अपना मूल स्थान छोड़कर आबादी वाले क्षेत्रों के नीचे कटान शुरू कर दिया है। तब से इन नदियों के मूल स्थान में तीन से चार फीट तक गाद, रेता-बजरी भरा होने के कारण नदियां अभी भी आबादी वाले क्षेत्रों के नीचे से गुजर कर भविष्य के खतरे का संकेत दे रही हैं। हालांकि कई स्थानों में सरकारी अमला डैमेज कंट्रोल में जुटा है, लेकिन इसकी सुस्त चाल से पर्यावरणविद् और भूगर्भशास्त्री चिंतित हैं।

इन स्थानों में डायवर्ट हुई थी नदी:

श्रीनगर, कर्णप्रयाग, पांडुकेश्वर, गोविंदघाट, नारायणबगड़, थराली, अलकापुरी के समीप, अगस्त्यमुनि।

'नदी को उसके मूल स्थान में लाना बहुत जरूरी है विशेषकर प्रभावित क्षेत्रों में। इसके लिए सरकार को जल्दी ही प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षा दीवार के साथ ही नदी के मूल में जमा रेता-बजरी को हटाना चाहिए।

डॉ. डीसी नैनवाल, भूगर्भशास्त्री।

'गत वर्ष की आपदा के बाद से अपना मूल स्थान छोड़ चुकी नदियों को प्रभावित क्षेत्रों में उनसके मूल स्थान में डावयर्ट करना होगा, नहीं तो यही लापरवाही फिर बड़ा खतरा बन सकती है।'

चंडी प्रसाद भट्ट, पर्यावरणविद्। http://www.jagran.com/uttarakhand/pauri-garhwal-11246613.html