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Jauhar Valley Uttarakhand-जोहार घाटी

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, November 28, 2013, 08:55:49 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


Dosto

Our member Mr Keshav bhatt has recently visited Jauhar Valley.. He has given this information about Jauhar Valley.

Keshav Bhattजोहार घाटी से ऊँटा धूरा दर्रा के दोनों ओर -4 लगभग 4000मी. की ऊंचार्इ पर है मिलम गांव। कभी 500 मकानों का मिलम गांव अब खंडहर सा हो चुका है। बीते वक्त में गांव की गलियां भूलभूलैय्या सी थीं। इस गांव के बारे में कहावत थी कि, गांव में नर्इ दुल्हन के साथ परिवार का एक सदस्य कुछ माह तक रास्ता दिखाने के लिए रहता था। वक्त के बीतते-बीतते अब खिड़की-दरवाजों की बेहतरीन नक्काषी भी गायब दिखी। दरवाजों के साथ ही छत की बलिलयां भी ना जाने कहां लुप्त हो गर्इ थी। आलू के अलावा अब खेतों में जड़ी-बूटी भी उग रही थी।

मिलम में गोरी नदी के किनारे किलोमीटर भर वाला लंबा मैदान है। कभी इसमें गांव वाले खेती करते थे। वक्त गुजरने के साथ ही ये अब बंजर हो गया है। कुछ खेतों में आर्इटीबीपी के जवान वक्त काटने वास्ते आलू व अन्य कुछ उगाने की मेहनत कर लिया करते हैं। मिलम गांव के ज्यादातर परिवार बाहर ही बस गए हैं। मिलवाल, रावत, पांगती, धर्मषक्तु, निखुरपा, नित्वाल, धमोत के वंषज मिलम को सदियों पहले छोड़ चुके हैं। प्रवास पर अब बहुत कम परिवारों का ही आना हो पाता है।

M S Mehta

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


From - Keshav Bhatt

जोहार के बारह गांवों के हालात अब मेहमानदारी लायक भी नहीं रहे। कर्इ मकानों की सिर्फ दीवारें ही बचीं हैं। इन खंडहर हो चुके मकानों के अंदर अब खेती होती है। प्रवास पर आने वालों ने दूर गोरी किनारे के खेतों को आबाद करने के बजाय एक बेहतरीन उपाय निकाल खंडहर हो चुके मकानों के अंदर ही जड़ी-बूटी के साथ ही मौसमी सबिजयों की क्यारियां बना ली हैं। 1962 से पहले भारत का जब तिब्बत के साथ व्यापार होता था तब इन गांवों की चहल-पहल देखने वाली होती थी। बुजुर्ग बताते हैं कि मानसरोवर जाने के लिए ये मार्ग छोटा है लेकिन दर्रों की वजह से कर्इ कठिनाइयां आती हैं। पषिचमी तिब्बत की सबसे बड़ी मंडी ग्यानिमा जिसे खार्को के नाम से भी बुलाते थे यहां से 105 किमी की पैदल दूरी पर है। तब के जमाने में जुलार्इ व अगस्त दो माह के लिए इस मार्ग से व्यापारियों का कारवां चलता था। अब इस पढ़ाव में गहरी खामोषी पसर गर्इ है। गांव से लगभग तीनेक किलोमीटर की दूरी पर हरदयोल षिखर के वक्षस्थल पर ही है मिलम ग्लेषियर। नौ ग्लेषियरों से मिलकर करीब आधा किलोमीटर चौड़ा तथा 18 किमी लंबा बना है मिलम ग्लेषियर।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

अंधेरा घिरने लगा तो वापस गांव के ठिकाने को चले। इस बार सायद पांच परिवार ही मिलम में प्रवास पर आए थे। पहले मुनस्यारी के ल्वां, बिल्जू, टोला, मिलम, मर्तोली, बुर्फु, मापा, रेलकोट, छिलास आदि गांवों के हजारों सीमांतवासी अपने ग्रीश्मकालीन प्रवास के लिए उच्च हिमालयी क्षेत्रों में बसे अपने गांवों में जाने पर आलू, जम्बू, पल्थी, कालाजीरा आदि महत्वपूर्ण फसलों की बुआर्इ करते थे। जानवरों का चुगान बुग्यालों से हो जाता था। फसल और जानवर ही इनकी आर्थिकी का एक प्रमुख साधन होते थे। इन्हीं से उनके परिवार की गुजर-बसर अच्छे ढंग से हो जाती थी। लेकिन अब संसाधनों के अभाव के साथ ही इस दुरूह क्षेत्र में आने वाली परेषानियों को देख कम ही लोग जोहार में जाते हैं।



by Keshav Bhatt Bageshwar.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Keshav Bhatt 

जोहार घाटी से ऊँटा धूरा दर्रा के दोनों ओर-7

      ग्वा³ख नदी के उप्पर लकड़ी के बलिलयों के उप्पर टिन बिछाकर पुल बना मिला। बांर्इ तरफ से लसरगाड़ भी उफनाती हुर्इ ग्वा³ख नदी में समा रही थी। ऊंचार्इ की वजह से चलने की रफतार भी धीमी हो गर्इ थी। चलते-बैठते साम पांच बजे करीब बमरास पहुंचे तो तंबू तान दिए। बादल घिरने के साथ ही बूंदे गिरने लगी। आधा घंटा बरसने के बाद मेघों ने अपना रास्ता पकड़ा तो सुकून सा मिला। बमरास में रूकना उचित नहीं लगा। यहां पर उप्पर पहाड़ी काफी तीखी है। इन पहाडि़यों से इतने पत्थर टूट कर नीचे बिखरे थे कि वो पत्थर ही खुद में अच्छे खासे पहाढ़ प्रतीत हो रहे थे। मौसम साफ होने से थोड़ा भय कम जान पड़ा।

ऊंटाधूरा दर्रे को पार करने के लिए सुबह जल्द ही बमरास से निकल पड़े। लगभग दो घंटे तक तिरछी चढ़ार्इ में कंकड़ों के पहाड़ में से होकर चलना हुवा। हमारे दाहिने ओर की ऊंची पहाडि़याें से टूटकर आए पत्थरों से बने पहाड़ में चलना काफी दु:खदायी हो रहा था। कभी कभार एक कदम आगे रखते तो फिसलकर दो कदम पीछे आ जाते। आगे दृष्य खुलता सा दिखा तो कदम तेजी से उठने लगे। योगेष आगे दूर से जल्दी आने का इषारा कर रहा था। सामने परी ताल था। लगभग 500 मी. की परिधी में फैला है खूबसूरत परीताल। इसकी खूबसूरती की वजह से इसका नाम सार्थक जान पड़ा। इस रास्ते से जब पहले व्यापारी तिब्बत को आते-जाते थे तब बमरास से परीताल के बीच के रास्ते को 'षीकनडानी की चढ़ार्इ के नाम से जानते थे। ऊंटाधूरा के दाहिनी ओर हल्की बर्फ की सफेदी दिख रही थी। परीताल की खूबसूरती देख मन में बात उठी की काष कल बमरास की जगह यहीं पढ़ाव डाला होता। यहां काफी देर तक बैठे रह गए।
      योगेष की सीटी ने उठने को मजबूर कर दिया। ये चलने का इषारा था। आगे कुछ समतल में चलने के बाद बांर्इ ओर से हमने ऊंटाधूरा की चढ़ार्इ में चलना षुरू किया। बर्फ की मार झेलते-झेलते इस पहाड़ के पत्थर भी टूटे व कमजोर से दिख रहे थे। आसमान में बादलों व सूर्य के बीच आंख-मिचौली चल रही थी। योगेष, संजय व मनोज आगे-आगे चल रहे थे। मैं और नीतिन धीरे-धीरे ऊंटा धूरा की चढ़ार्इ चढ़ रहे थे। ऊंटाधूरा की चढ़ार्इ मुषिकल से सवा मील की ही होगी, लेकिन ऊंचार्इ पर पतली हवा के कारण फेफड़ों को काफी काम करना पड़ रहा था।
      घंटे भर के बाद ऊंटाधूरा का टाप दिखने लगा था। इस बार दम भी फूलने लगा था। ज्यों-ज्यों हिमालय नजदीक आता दिखा, ऐसा लगा कि उन पर्वतों में भी आकाष छूने की एक होड़ मची है जो हिमालय के पास होते हुवे भी बर्फ से वंचित हैं। इन पहाड़ों से गुजरते वक्त अपने भीतर उनके अंष जो समाते चले जाते हैं उसे व्यक्त कर पाना गूंगे के गुड़ खाने जैसा है। बर्फमय जगत में इतना आकर्शण क्यों होता होगा! परीताल के उप्पर अचानक सूर्य व बादलों के समागम में इन्द्रधनुश उल्टा बना दिखा तो हम चिहुंके। पहली बार ये नजारा देखने को मिला। हमारी थकान कुछ पल के लिए काफूर हो गर्इ। वहीं बैठ गए ये नजारा देखने को। दूर योगेष सीटी  बजाते हुए खुषी से हाथ हिला रहा था। हमारी ओर से कोर्इ प्रतिक्रिया ना मिलने पर वो नीचे को आ गया। हम दोनों थोड़ा पस्त से हो गए थे। उसने और मनोज ने हमारा रूकसैक ले लिया। हमें थोड़ी राहत मिली। चाल में थोड़ी सी तेजी आ गर्इ। ना जाने क्यूं ये चढ़ार्इ अब मीठी सी लगने लगी थी।

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Keshav Bhatt  जोहार घाटी से ऊँटा धूरा दर्रा के दोनों ओर - 6
सुबह नाष्ता करने के बाद 4040 मी. की उंचार्इ पर दुंग को चल पड़े। दुंग यहां से लगभग 12 किमी है। रास्ता धीरे-धीरे उंचार्र्इ लिए है। अब यहां गोरी नदी से बिछड़ना हो गया। इस रास्ते में तिब्बत से आ रही ग्वा³ख नदी के साथ-साथ उप्पर-नीचे होते हुए रास्ता है। तिब्बत के सरहदों की परवाह किए बिना ये नदी मस्तानी चाल में बह रही थी। इस नदी को गनसूखा गाढ़ भी यहां कह रहे थे।
      रास्ते में नदी के पास भरलों का झुंड अठखेलियां करता दिखा। रास्ते को ठीक करते पीडब्लूडी के दो बुढ़े-जवान भी मिले। लोहे का पुल पार कर हम नदी के दूसरी ओर आ गए। उप्पर दूर दुंग की जगह दिखार्इ देने लगी। दुंग पहुंचते ही एक जवान ने हमारी तलाषी की कार्यवाही पूरी की। यहां के इंचार्ज रमेष साहब बड़ी ही गर्मजोषी से मिले। हमें एक कमरा देने के बाद उन्होंने मीठी नाराजगी जताते हुए षिकायत की कि यदि सुबह मिलम पोस्ट को अपनी रवानगी की सूचना दे देते तो हम लोग नीचे तक आप लोगों को लेने आ जाते। हमारे मलारी अभियान की वजह वो आंखिर तक तलाषने में जुटे रहे। जबकि हम उन्हें आष्वस्त करते  ही रह गए कि गढ़वाल व कुमाऊं के इस दर्रे को पार करने के साथ ही यहां के इतिहास को देखना-समझना भर ही हमारी साहसिक यात्रा का उदेष्य है। लेकिन यहां बार्डर में तैनात पोस्टें हमें अंत तक सरकारी चुगुलखोर ही समझती रहीं। उन्हें ये डर लंबे वक्त तक सालता रहा कि हम ना जाने क्या कुछ चुगली सरकार से कर दें।
    षाम को जवान बालीबाल खेलने लगे तो हमारे साथियों ने भी एक-आध हाथ आजमा ही लिए। सुबह रमेष साहब से विदा ली। वो बुढ़ा दुंग की तरफ की रैकी कर आ रहे थे। उन्होंने हमें बताया कि हमारे दल के रवाना होने की जानकारी आगे हैड क्वाटर में भेज दी है। मौसम ठीक है। हम धीरे-धीरे बुढ़ा दुंग की चढ़ार्इ में बढ़ने लगे। हरी मखमली घास से थकान भी गायब हो जा रही थी। बीच में एक बड़े नाले ने रास्ता ही गायब कर दिया था उसे सकुषल पार कर बुढ़ा दुंग पहुंचे। 1998 में गाइड के बीमार होने पर हमें यहीं बूढ़ा दुंग से वापस लौटना पड़ा था। आज यहां पहुंचने पर खुषी हुर्इ कि वो अधूरी यात्रा अब पूरी होगी।   
मनोज ने सामने की ओर हाथ उठाकर बताया कि वो बमरास है। हमें दुंग से बमरास लगभग नौ  किमी. बताया गया।  लेकिन बमरास पहुचने पर लगा कि इसे दुंग से लगभग छह किमी ही होना चाहिए। बुढ़ा दुंग से आगे सिमलडांडी तक का रास्ता बुग्याली घास से पटा हल्का समतल सा है। सामने तिब्बत की ओर का पहाड़ बड़ा ही आकर्शक दिखा। एक रोमांच...... हम महान तिब्बत के बगल में हैं। तिब्बत..... एक अदभुत... रहस्मयी लोक। कर्इ किस्से सुने थे तिब्बत के..... यहां के लोग लंबे-चौड़े होते हैं। अकसर हवा में भी उड़ते हैं। यहां लामा अदभुत षकितयों वाले होते हैं। लेकिन ये किस्से मात्र किस्से ही रह गए। तिब्बत के षांति प्रिय लोगों को चीन ने चैन से कभी जीने ही नहीं दिया। लाखों लोगों के नरसंहार के बाद भी चीन की प्यास बुझी नहीं है। एक षांत पवित्र देष का जो हाल चीन ने किया है उससे पूरी दुनिया वाकिफ होने के बाद भी चुप है! तिब्बत में कब्जे के बाद वर्तमान दलार्इ लामा को 1959 में तिब्बत छोड़ भारत की षरण लेनी पड़ी। जिसकी खार चीन ने 1962 में भारत के साथ युद्व छेड़ कर निकाली। तिब्बत क्या था और अब क्या हो गया है, इस बारे में खुद दलार्इ लामा ने अपनी आत्मकथा 'मेरा देष निकाला में अदभुत मार्मिक व सच्चा वर्णन किया है। 

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Keshav Bhatt  जोहार घाटी से ऊँटा धूरा दर्रा के दोनों ओर-5

कमरे में पहुंचे तो हमारा साथी गाइड मनोज किसी बुजुर्ग से बतिया रहा था। उनकी गप में हम भी षरीक हो लिए। जोहार के कुछ किस्से सुनाने की बात पर वो अंदर गए और 'राजुला-मालूषाही की जर्द लगी किताब से धूल झाड़ते हुए आते दिखे। 'जोहार घाटी के भी कुछ किस्से हैं इसमें..... हमारे दादा सुनाया करते थे.... सुनोगे। हमने हामी भरी तो वो सुनाने लगे......
''मल्ला जोहार में सदियों पहले दो गिरोह रहते थे। एक गिरोह का हल्दुवा तो दूसरे गिरोह का पिंगलुवा नेता था। मल्ला जोहार इन दोनों नेताओं में आधा-आधा बटा था। मापा के उप्पर हल्दुवा और नीचे लस्पा तक पिंगलुवा के हिस्से में था। उस जमाने में जोहार का दर्रे के बारे में कुछ पता नहीं था। वो खुला नहीं था। एक बार गोरी नदी के उदगम स्थान के पहाड़ से एक विषाल पक्षी पैदा हुआ। उसके पंख इतने लंबे थे कि उपर उड़ते-उड़ते लसपा गांव के नीचे मापांग-दापांग की तंग घाटी में अटक जाने के कारण वह वहां से उपर की ओर लौट जाता था। वो भयानक पंक्षी अपने पंजों से आदमियों को उठा ले जाता था। उसने हल्दुवा-पिंगलुवा सहित तमाम लोगों को खा कर बसितयों को उजाड़ बना दिया था।
      उस जमाने में जोहार के उस पार हुंणदेष की लपथेल नामक गुफा में एक लामा रहता था। उसे षकिया लामा कहते थे। वो दिन भर भगवान का भजन करता था और षाम को गुफा में लौट जाता था। उसकी सेवा में एक व्यकित रहा करता था। उस पर प्रसन्न होकर लामा ने उसे अस्त्र-षस्त्रों से सजिजत कर उस विषाल पक्षी को मार कर क्षेत्र को आबाद करने भेज दिया। उसके साथ अपना एक षिश्य भी रास्ता दिखाने के लिए भेज दिया। लपथेल से थोड़ी दूर चलने के बाद वह षिश्य कुत्ता बन गया। उस स्थान का नाम खिंगरू रखा गया। कुछ दूर जाकर वह दोलथांग (बारहसिंगा) बन गया। उस स्थान का नाम दोलथांग पड़ गया। आगे चल कर टोपीढंू (भालू) हो गया तो उस स्थान का नाम टोपीढूंगा कहा जाने लगा। आगे ऊंट बन गया जिसे ऊंटाधुरा कहा जाने लगा। आगे वो दु³ (बाघ) बन गया। हल्दुवा-पिंगलुवा के इलाके में आकर वो समगांऊ (खरगोष) बन गया। इन्हीं नामों से आज भी वे स्थान हैं।
      वहां उस व्यकित ने उजाड़ घरों व मानव कंकालों को देखा तो वो विचलित होकर इधर-उधर घूमने लगा। तभी उसे एक बुढि़या मिली। उसने सारी करूण कथा का बखान करते हुए कहा कि आज उसकी बारी है और कल उसकी बारी आएगी। उस व्यकित ने बड़े-बड़े पत्थर आग में गरम कर अपने गादे (पहनने वाला लंबा लबादा) में छिपा लिए। पक्षी ने उस इलाके में आने के बाद उन्हें खाने के लिए ज्यों ही मुंह खोला उसने पक्षी के मुंह में सारे गरम पत्थर डाल दिये। पक्षी उन्हें आहार समझकर निगलता गया। उसके पेट में इतने पत्थर भर गए कि उसका पेट फूट गया। उन पत्थरों के आज भी मिलम में होने की बाद कही जाती है। उस व्यकित ने तब वहां आग जलाकर लोगों को बसाने का काम षुरू कर दिया। तब वहां नमक नहीं होता था। उसने लामा के पास जाकर विनती की तो लामा ने अपनी षकित से लपथेल में नमक पैदा कर दिया। कहते हैं कि नमक पैदा करने की षकित का प्रयोग करने के बाद वह षकितहीन हो गया और फिर कभी गुफा से बाहर नही आया। आज भी लपथेल में नमकीन चटटाने मिलती हैं।
      वापस आने के बाद उस व्यकित ने जोहार इलाके को आबाद करवाया और षकिया लामा की पूजा को प्रचलित किया। और तभी से इस क्षेत्र के लोगों को षौका कहा जाने लगा। इन्हीं की संतान में एक सुनपति षौका हुआ जिसने मंदाकिनी के निकटवर्ती क्षेत्र को बसा कर तिजारती घाटों को खुलवाया। हांलाकि उसकी कोर्इ संतान नहीं रही लेकिन सुनपति षौका व उसकी वीरतापूर्ण कहानियां इस क्षेत्र में आज भी सुनार्इ जाती हैं। उसकी पुत्री की प्रेम गाथा को ही 'राजूला-मालूषाही के नाम से जाना जाता है। आगे फिर लंबी कहानी है। यहां का काफी वर्णन है उस प्रेम कथा में। हम राजूला-मालूषाही का किस्सा भी सुनना चाहते थे लेकिन काफी रात हो गर्इ थी। Photo: जोहार घाटी से ऊँटा धूरा दर्रा के दोनों ओर-5 कमरे में पहुंचे तो हमारा साथी गाइड मनोज किसी बुजुर्ग से बतिया रहा था। उनकी गप में हम भी षरीक हो लिए। जोहार के कुछ किस्से सुनाने की बात पर वो अंदर गए और 'राजुला-मालूषाही की जर्द लगी किताब से धूल झाड़ते हुए आते दिखे। 'जोहार घाटी के भी कुछ किस्से हैं इसमें..... हमारे दादा सुनाया करते थे.... सुनोगे। हमने हामी भरी तो वो सुनाने लगे...... ''मल्ला जोहार में सदियों पहले दो गिरोह रहते थे। एक गिरोह का हल्दुवा तो दूसरे गिरोह का पिंगलुवा नेता था। मल्ला जोहार इन दोनों नेताओं में आधा-आधा बटा था। मापा के उप्पर हल्दुवा और नीचे लस्पा तक पिंगलुवा के हिस्से में था। उस जमाने में जोहार का दर्रे के बारे में कुछ पता नहीं था। वो खुला नहीं था। एक बार गोरी नदी के उदगम स्थान के पहाड़ से एक विषाल पक्षी पैदा हुआ। उसके पंख इतने लंबे थे कि उपर उड़ते-उड़ते लसपा गांव के नीचे मापांग-दापांग की तंग घाटी में अटक जाने के कारण वह वहां से उपर की ओर लौट जाता था। वो भयानक पंक्षी अपने पंजों से आदमियों को उठा ले जाता था। उसने हल्दुवा-पिंगलुवा सहित तमाम लोगों को खा कर बसितयों को उजाड़ बना दिया था। उस जमाने में जोहार के उस पार हुंणदेष की लपथेल नामक गुफा में एक लामा रहता था। उसे षकिया लामा कहते थे। वो दिन भर भगवान का भजन करता था और षाम को गुफा में लौट जाता था। उसकी सेवा में एक व्यकित रहा करता था। उस पर प्रसन्न होकर लामा ने उसे अस्त्र-षस्त्रों से सजिजत कर उस विषाल पक्षी को मार कर क्षेत्र को आबाद करने भेज दिया। उसके साथ अपना एक षिश्य भी रास्ता दिखाने के लिए भेज दिया। लपथेल से थोड़ी दूर चलने के बाद वह षिश्य कुत्ता बन गया। उस स्थान का नाम खिंगरू रखा गया। कुछ दूर जाकर वह दोलथांग (बारहसिंगा) बन गया। उस स्थान का नाम दोलथांग पड़ गया। आगे चल कर टोपीढंू (भालू) हो गया तो उस स्थान का नाम टोपीढूंगा कहा जाने लगा। आगे ऊंट बन गया जिसे ऊंटाधुरा कहा जाने लगा। आगे वो दु³ (बाघ) बन गया। हल्दुवा-पिंगलुवा के इलाके में आकर वो समगांऊ (खरगोष) बन गया। इन्हीं नामों से आज भी वे स्थान हैं। वहां उस व्यकित ने उजाड़ घरों व मानव कंकालों को देखा तो वो विचलित होकर इधर-उधर घूमने लगा। तभी उसे एक बुढि़या मिली। उसने सारी करूण कथा का बखान करते हुए कहा कि आज उसकी बारी है और कल उसकी बारी आएगी। उस व्यकित ने बड़े-बड़े पत्थर आग में गरम कर अपने गादे (पहनने वाला लंबा लबादा) में छिपा लिए। पक्षी ने उस इलाके में आने के बाद उन्हें खाने के लिए ज्यों ही मुंह खोला उसने पक्षी के मुंह में सारे गरम पत्थर डाल दिये। पक्षी उन्हें आहार समझकर निगलता गया। उसके पेट में इतने पत्थर भर गए कि उसका पेट फूट गया। उन पत्थरों के आज भी मिलम में होने की बाद कही जाती है। उस व्यकित ने तब वहां आग जलाकर लोगों को बसाने का काम षुरू कर दिया। तब वहां नमक नहीं होता था। उसने लामा के पास जाकर विनती की तो लामा ने अपनी षकित से लपथेल में नमक पैदा कर दिया। कहते हैं कि नमक पैदा करने की षकित का प्रयोग करने के बाद वह षकितहीन हो गया और फिर कभी गुफा से बाहर नही आया। आज भी लपथेल में नमकीन चटटाने मिलती हैं। वापस आने के बाद उस व्यकित ने जोहार इलाके को आबाद करवाया और षकिया लामा की पूजा को प्रचलित किया। और तभी से इस क्षेत्र के लोगों को षौका कहा जाने लगा। इन्हीं की संतान में एक सुनपति षौका हुआ जिसने मंदाकिनी के निकटवर्ती क्षेत्र को बसा कर तिजारती घाटों को खुलवाया। हांलाकि उसकी कोर्इ संतान नहीं रही लेकिन सुनपति षौका व उसकी वीरतापूर्ण कहानियां इस क्षेत्र में आज भी सुनार्इ जाती हैं। उसकी पुत्री की प्रेम गाथा को ही 'राजूला-मालूषाही के नाम से जाना जाता है। आगे फिर लंबी कहानी है। यहां का काफी वर्णन है उस प्रेम कथा में। हम राजूला-मालूषाही का किस्सा भी सुनना चाहते थे लेकिन काफी रात हो गर्इ थी।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Keshav Bhatt  जोहार घाटी से ऊँटा धूरा दर्रा के दोनों ओर -3

जोहार, व्यास, दारमा तथा गढ़वाल के हिमालय से सटे ऊंचार्इ वाले र्इलाकाेंं में भेड-बकरियों के मांस को सूखा कर माला बना संभाल दिया जाता है, ताकि जरूरत के वक्त भोजन आदि के काम आ सके। सदियों पहले इन घाटियों में रचे-बसे लोगों का बारहों मास यहीं रहना होता था। आज की तरह तब जाड़ों में नीचे को आना नहीं हो पाता था। जाड़ा हो या बर्फबारी इन सभी हालातों से बचाव के लिए उन्होंने अपने तरीके निकाले थे। लगभग छह माह, अप्रैल से सितंबर मध्य तक के खुषगवार मौसम में यहां जिंदगी काफी तेजी से दौड़ती थी। खेती-बाड़ी, जानवरों के चारे की व्यवस्था के साथ ही तिब्बत की मंडी में व्यापार के लिए भाग-दौड़ में ही छह माह गुजर जाते। गर्मियों में वक्त निकाल कर भेड़-बकरियों के मांस को छोटे-छोटे टुकड़ों में सूखा कर माला बना दी जाती थी। यही सूखा मांस बर्फिले दिनों में काम आता था। अक्टूबर से मार्च तक ये घाटियां बर्फ से लदकद हो एक नजर में हिमालय का सा आभास कराने वाली हुवी। ये छह महीने जोहार वासियों के लिए काफी कश्टकारी होने वाले हुए। गर्मियों में छह माह तक की गर्इ मेहनत के बलबूते ही इन्होंने ये बर्फिले छह मास काटने हुए।
      अगले दिन मिलम गांव के लिए सुबह ही निकल पड़े। मार्तोली से नीचे नर्इ बन रही सड़क तक तीखा ढलान है। सामने बुफर्ू गांव भी वीरान व खंडहर सा दिख रहा था। सड़क के किनारे बनी झोपड़ी नुमा दुकान के बाहर एक परिवार मीट की माला बनाकर उसे सुखाने में व्यस्त था। गोरी नदी की फुंफकार की वजह से उन्हें गप्पे मारने के लिए आपस में जोर-जोर से बोलना पड़ रहा था। रात के सूखे मीट को याद कर हम मुस्कुराते हुए आगे बढ़े। बफर्ू के नीचे सड़क के लिए बुग्याल काटे जा रहे थे। सड़क काटने की वजह से इन बुग्यालों का सौन्दर्य अटपटा सा लग रहा था।
दूर सामने मापा गांव भी सूनसान अपनी जगह पर ही था। बिल्जू के उस पार गनघर उंचार्इ पर दिखा। पांछू गांव के बगल में पांचू नदी नीचे गोरी से मिलने के लिए दौड़ सी लगाती महसूस हुवी। बिल्जू गांव में घनष्यामके वहां दिन का भोजन लिया। घनष्याम बिल्जवाल ने बातचीत में बताया कि वो लोग सितंबर के अंत में चले जाते हैं नीचे दुम्मर या फिर मुनस्यारी को। अप्रेल में ही वापस आना हो पाता है। उस वक्त अकसर गांव बर्फ से ढके मिलते हैं। गुजर-बसर चल रही है। अब सड़क बन रही है..... कब तक बनेगी मालूम नहीं....... क्या पता फिर कुछ ठीक हो जाए यहां भी तो एक दुकान ही चला लुंगा।
      भोजन के बाद कुछ देर आराम करने के बाद फिर मिलम गांव की राह पकड़ी। बुग्याली रास्ते में पैदल चलने का एहसास नर्इ बन रही सड़क ने छीन लिया। नीचे दूर एक टूटा बुल्डोजर दिखा। सड़क के लिए बुग्यालों को काट रहे इस बुल्डोजर पर प्रकृति ने अपना गुस्सा बखूबी उतारा था। मिलम गांव से पहले तिब्बत से आने वाली कोलिंगाणा नदी बौखलाती हुर्इ सी मिली। कोलिंगाणा के आतंक से नदी पर बना पुल कांपता सा दिखा। मिलम पहुंचने में सांझ हो गर्इ। यहां आर्इटीबीपी के पास अपने पहुंचने की सूचना देनी जरूरी है। आर्इटीबीपी को जब हमारे मलारी अभियान का पता लगा तो वो आनाकानी करने लगे। उनका व्यवहार देख एक पल के लिए लगा कि हम किसी तहसील में कोर्इ प्रमाण पत्र बनाने के लिए गए हों और घाघ बाबू हमें दूसरा कानून जबरदस्ती लादने के लिए जोर जबरदस्ती करने पर आमदा हो। उन्होंने हमें आगे के लिए परमिषन देने से ही मना कर दिया। जब हम अपनी जिद्व में कि, 'इस परमिट में परमिषन ना दिए जाने का कारण लिख दो पर अड़ गए तो यहां तैनात इंस्पेक्टर ने एक तरीके से अपना फरमान ही सुना दिया कि..... 'उप्पर काफी बर्फ आर्इ है अभी लांग रूट पैटोलिंग पार्टी आ ही रही है बड़ी मुषिकल से..... तुम सब बर्फ में फंस जाओगे तो हम सभी के लिए भी प्रोब्लम हो जाएगी..... अब तुमने जाना ही है तो एक बार फिर सोच लो....।  नहींं तो एक-आध दिन यहीं रहो और वापस हो जाओ। बाद में हमारी जामा-तलाषी ली गर्इ। कागजी कार्यवाही पूरी करने के बाद हम गांव की फिंजा में भागे। हमारे गार्र्इड मनोज ने गांव में एक परिवार में हमारी व्यवस्था कर दी। थोड़ा सुकून मिला। चाय पीकर बाहर गांव की भूलभूलैय्या को देखने निकले। Photo: जोहार घाटी से ऊँटा धूरा दर्रा के दोनों ओर -3 जोहार, व्यास, दारमा तथा गढ़वाल के हिमालय से सटे ऊंचार्इ वाले र्इलाकाेंं में भेड-बकरियों के मांस को सूखा कर माला बना संभाल दिया जाता है, ताकि जरूरत के वक्त भोजन आदि के काम आ सके। सदियों पहले इन घाटियों में रचे-बसे लोगों का बारहों मास यहीं रहना होता था। आज की तरह तब जाड़ों में नीचे को आना नहीं हो पाता था। जाड़ा हो या बर्फबारी इन सभी हालातों से बचाव के लिए उन्होंने अपने तरीके निकाले थे। लगभग छह माह, अप्रैल से सितंबर मध्य तक के खुषगवार मौसम में यहां जिंदगी काफी तेजी से दौड़ती थी। खेती-बाड़ी, जानवरों के चारे की व्यवस्था के साथ ही तिब्बत की मंडी में व्यापार के लिए भाग-दौड़ में ही छह माह गुजर जाते। गर्मियों में वक्त निकाल कर भेड़-बकरियों के मांस को छोटे-छोटे टुकड़ों में सूखा कर माला बना दी जाती थी। यही सूखा मांस बर्फिले दिनों में काम आता था। अक्टूबर से मार्च तक ये घाटियां बर्फ से लदकद हो एक नजर में हिमालय का सा आभास कराने वाली हुवी। ये छह महीने जोहार वासियों के लिए काफी कश्टकारी होने वाले हुए। गर्मियों में छह माह तक की गर्इ मेहनत के बलबूते ही इन्होंने ये बर्फिले छह मास काटने हुए। अगले दिन मिलम गांव के लिए सुबह ही निकल पड़े। मार्तोली से नीचे नर्इ बन रही सड़क तक तीखा ढलान है। सामने बुफर्ू गांव भी वीरान व खंडहर सा दिख रहा था। सड़क के किनारे बनी झोपड़ी नुमा दुकान के बाहर एक परिवार मीट की माला बनाकर उसे सुखाने में व्यस्त था। गोरी नदी की फुंफकार की वजह से उन्हें गप्पे मारने के लिए आपस में जोर-जोर से बोलना पड़ रहा था। रात के सूखे मीट को याद कर हम मुस्कुराते हुए आगे बढ़े। बफर्ू के नीचे सड़क के लिए बुग्याल काटे जा रहे थे। सड़क काटने की वजह से इन बुग्यालों का सौन्दर्य अटपटा सा लग रहा था। दूर सामने मापा गांव भी सूनसान अपनी जगह पर ही था। बिल्जू के उस पार गनघर उंचार्इ पर दिखा। पांछू गांव के बगल में पांचू नदी नीचे गोरी से मिलने के लिए दौड़ सी लगाती महसूस हुवी। बिल्जू गांव में घनष्यामके वहां दिन का भोजन लिया। घनष्याम बिल्जवाल ने बातचीत में बताया कि वो लोग सितंबर के अंत में चले जाते हैं नीचे दुम्मर या फिर मुनस्यारी को। अप्रेल में ही वापस आना हो पाता है। उस वक्त अकसर गांव बर्फ से ढके मिलते हैं। गुजर-बसर चल रही है। अब सड़क बन रही है..... कब तक बनेगी मालूम नहीं....... क्या पता फिर कुछ ठीक हो जाए यहां भी तो एक दुकान ही चला लुंगा। भोजन के बाद कुछ देर आराम करने के बाद फिर मिलम गांव की राह पकड़ी। बुग्याली रास्ते में पैदल चलने का एहसास नर्इ बन रही सड़क ने छीन लिया। नीचे दूर एक टूटा बुल्डोजर दिखा। सड़क के लिए बुग्यालों को काट रहे इस बुल्डोजर पर प्रकृति ने अपना गुस्सा बखूबी उतारा था। मिलम गांव से पहले तिब्बत से आने वाली कोलिंगाणा नदी बौखलाती हुर्इ सी मिली। कोलिंगाणा के आतंक से नदी पर बना पुल कांपता सा दिखा। मिलम पहुंचने में सांझ हो गर्इ। यहां आर्इटीबीपी के पास अपने पहुंचने की सूचना देनी जरूरी है। आर्इटीबीपी को जब हमारे मलारी अभियान का पता लगा तो वो आनाकानी करने लगे। उनका व्यवहार देख एक पल के लिए लगा कि हम किसी तहसील में कोर्इ प्रमाण पत्र बनाने के लिए गए हों और घाघ बाबू हमें दूसरा कानून जबरदस्ती लादने के लिए जोर जबरदस्ती करने पर आमदा हो। उन्होंने हमें आगे के लिए परमिषन देने से ही मना कर दिया। जब हम अपनी जिद्व में कि, 'इस परमिट में परमिषन ना दिए जाने का कारण लिख दो पर अड़ गए तो यहां तैनात इंस्पेक्टर ने एक तरीके से अपना फरमान ही सुना दिया कि..... 'उप्पर काफी बर्फ आर्इ है अभी लांग रूट पैटोलिंग पार्टी आ ही रही है बड़ी मुषिकल से..... तुम सब बर्फ में फंस जाओगे तो हम सभी के लिए भी प्रोब्लम हो जाएगी..... अब तुमने जाना ही है तो एक बार फिर सोच लो....।  नहींं तो एक-आध दिन यहीं रहो और वापस हो जाओ। बाद में हमारी जामा-तलाषी ली गर्इ। कागजी कार्यवाही पूरी करने के बाद हम गांव की फिंजा में भागे। हमारे गार्र्इड मनोज ने गांव में एक परिवार में हमारी व्यवस्था कर दी। थोड़ा सुकून मिला। चाय पीकर बाहर गांव की भूलभूलैय्या को देखने निकले।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


From  -
Keshav Bhatt
जोहार घाटी से ऊँटा धूरा दर्रा के दोनों ओर- 8

कुछ ही देर बाद हम सभी ऊंटाधूरा के टाप पर थे। दूर तक फैले पठार अपनी ओर खींचते से लगे। यहां से नंदा देवी की चोटी का भव्य नजारा दिख रहा था। नीचे गंगपानी में छोटी-बड़ी दर्जनों झीलें आकर्शक लग रही थीं। दाहिने ओर 'जयंती धूरा पास' तिब्बत की फिर से याद दिलाने लगा। ऊंटाधूरा, जयंती धूरा व किंगरी-बिंगरी तीन कठिन दरोर्ं को पार कर व्यापारी तिब्बत व्यापार के लिए आया-जाया करते थे। अब वहां इनर लार्इन तक फौंज ही गस्त पर जाती हैं।
हवाएं तीखी होने लगी तो गंगपानी के उतार को चले। घंटेभर बाद गंगपानी में थे। फौंज ने अपने लिए एक जगह रूकने का पढ़ाव बनाया था। यहां पर फौंजी टैंट बेतरतीब ढंग से गिरा पड़ा था। इस जगह पर ज्यादातर पैटोलिंग पार्टियां रूका करती हैं। तुफान या ठंड से सायद इस जगह को छोड़ने की जल्दी में वो टैंट को गिरा आगे चल दिए होंगे। यहां रूकने के लिए सकून सा दिखा तो कुछ देर ठहर गए। तसल्ली से भोजन किया। थकान अब दूर हो चुकी थी। टोपी ढूंगा अब यहां से करीब चार किमी दूर था। ढलान में छोटे से नाले के साथ चलता आढ़े-तिरछे बुग्याली रास्ते के साथ चलने में एक अलग ही मजा आ रहा था। लौंका नामक जगह के पास रास्ते के अगल-बगल खरगोष के बिल से दिखे। अचानक एक बिल से बाहर निकल दो पावों में खड़ा खरगोष से मिलता सा एक जीव हमें बड़ी ही उत्सुकता से देख रहा था। ये फिया था। हमारे नजदीक आने पर वो बिल में घुस गया। कुछ देर बाद कर्इ सारे फिया बिलों से बाहर निकल आ हमें कोतुहल से टकटकी लगा देखने लगे।
नीचे गिर्थी नदी के किनारे टोपी ढूंगा पढ़ाव दिखने लगा था। 4850 मीं की ऊंचार्इ पर टोपीढूंगा दो दर्रों के बीच में है। भारत-तिब्बत व्यापार के लिए तब यहीं से ही जाया जाता था। दोराहे पर पहुंचे। दांर्इ तरफ का रास्ते से ही हमें अगले दिन बावन बैंड की चढ़ार्इ नापनी थी। पहाड़ में घुमावदार रास्ते के बावन मोड़ों की वजह से ही इस रास्ते का नाम बावन बैंड पड़ गया। बांए ओर के ढलान की ओर बढ़े तो दूर पढ़ाव में से लकड़ी जलने का धुंवा उप्पर उठ धुंध में समाते दिखा।
      आर्इटीबीपी कैम्प में पहुंच आवाज लगार्इ तो दो जवान बाहर आए। हमें अचानक इस जगह में सामने देख वो सकते में से आ गए। जाहिर था कि पिछली दुंग पोस्ट ने उन्हें हमारे बारे में सूचना नहीं दी या फिर इन तक सूचना नहीं पहुंच सकी। यहां पोस्ट प्रभारी षिव कुमार सिंह की असमजस की सिथति को देख हमने अपने परमिट व अन्य कागजात दिखाए तो उन्हें थोड़ी राहत सी मिली। हमारे टैंट लगाने की बात पर उन्होंने  टाइगर बैरक में हमारे दल को ठहरने की इजाजत दे दी। बैरक में अभी हमने सामान रखा ही था कि पोस्ट प्रभारी पांच-छह हथियार बंद सैनिकों के साथ हमें घेर कर खड़े हो गए। इस तरह का व्यवहार हमारे समझ से परे था। हमारी तलाषी लेने के बाद हमें किनारे खड़ा कर दिया गया। सैनिकों ने हमारे रूकसैक व सामान की तलाषी ली। एक-एक सामान की बड़ी ही बारिकी से तलाषी लेने के बाद कुछ भी आपत्तिजनक सामान ना मिलने पर उन्होंने अपनी तनी बंदूकें नीचे कर ली।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जोहार घाटी से ऊँटा धूरा दर्रा के दोनों ओर-9

सामान खोल हमने अपने-अपने कोने तय कर अपने बिस्तर तान दिए। कुछ देर बाद बाहर से आवाजें आने लगी। बाहर कुछ जवान बालीबाल खेल रहे थे। हमारे साथी भी उनके साथ खेल में मगन हो लिए। मौसम घिरने लगा तो मैच समाप्त हो गया। हम बैरक में बैठ कल के रूट के बारे में जरूरी जानकारी व निर्देष आपस में सांझा कर रहे थे। बैरक में एक जवान के साथ कम्पनी हवालदार मेजर (सीएचएम) आए और यहां पर रात के नियम बताने लगे। हमें बताया गया कि रात में यदि बाहर निकलो तो डयूटी पर जवान तुमसे कोड पूछेगा। सही नहीं बताने पर वो तुम्हें दुष्मन समझ गोली भी मार सकता है। आज का कोड होगा 'कुसुम ध्यान रखना। ये बताने के बाद साहब बैरक से जाते हुए कहते चले गए कि खाना तैयार है बर्तन समेत फालन हो जाओ। यहां फौंज के रूखे व्यवहार से भूख का एहसास कम होने के बाद भी ऊंचार्इ में होने की वजह से थोड़ा बहुत भोजन लेने की मजबूरी थी। हमारे साथी एक अजीब सी उलझन में दिखे। हम तो इस क्षेत्र में सदियों पहले आवाजाही के साहसिक व जोखिम भरे मार्ग में टै्रकिंग के लिए ही आए थे। लेकिन ना जाने क्यों फौंज के रूखे होने का सा अहसास हम सभी को हो रहा था। सायद उन्हें हमारे आने से खुषी नहीं हो रही थी।
खाना ले चुकने के बाद यहां तैनात युवा सब इंस्पेक्टर षिव कुमार सिंह ने अपने बैरक में बैठने का बुलावा भेजा। मैं और योगेष वहां गए। बुखारी की आंच से कमरा काफी गर्म हो रहा था। षिव कुमार व सीएचएम हमारे आने के उदेष्य बावत बातों ही बातों में खुफिया जानकारी सी लेने लगे। सीएसएम साहब ने कहना षुरू किया कि तुम्हें तो हमारे जवानों ने लौंका के पास से ही घेरे में ले हमें सूचना कर दी थी। और इधर हमने भी तुम्हें घेर लिया था। हमें समझ में नहीं आ रहा था कि वो हमें क्यों अपनी सफार्इ दे रहे हैं। जबकि हमें तो कहीं कोर्इ मिला ही नहीं। यहां भी पोस्ट में सब अंदर आराम फरमा रहे थे। सायद वो जताने की कोषिष कर रहे थे कि वो आराम नहीं बलिक डयूटी में मुस्तैद थे। काफी देर बाद वो आष्वस्त हो पाए कि हम सिर्फ साहसिक अभियान पर ही आए हैं। आत्मीय होने के बाद षिव कुमार कहने लगे, 'यहां फौंज की जिंदगी काफी मुषिकल भरी है। कल मैं भी तुम्हारे दल के साथ ही चलूंगा। अगले हफ्ते एक एक्जाम भी है। उसमें यदि निकल गया तो इनकम टैक्स आफीसर बन जाऊंगा। वो नौकरी जरा आराम की रहेगी। यहां झमेले काफी हैं। षिव कुमार से ही हमने आगे के रूट की जानकारी ले ली। बैरक में पहुंचे तो अन्य साथी चुपचाप बैठे मिले। वो कुछ सषंकित थे कि हमारे ये लीडर उन्हें कहीं किसी मुसीबत में तो नहीं डाल देते हैं इस बार। हमने उन्हें बताया कि सुबह षिव साहब भी हमारे साथ हैं आगे की कोर्इ परेषानी अब नहीं रही।
सोते समय लपथल पढ़ाव तक पहुंचने की चर्चा हुवी। टोपीढूंगा से आगे गिर्थी नदी पर पुल नही था। यहां पर सदियों से नदी पर अल्पार्इन ग्लेषियर बना है। तीखे व खड़े पहाड़ों के जड़ में बहती गिर्थी नदी तक सूरज की रोषनी नहीं पहुंचने की वजह से ही यह छोटा सा ग्लेषियर यहां पर पुल का काम कर रहा था। यहां तैनात जवानों व साहसिक यात्री सदियों से इसी ग्लेषियर नुमा पुल से ही आवाजाही किया करते थे।
गिर्थी पार करते ही बावन बैंड की खड़ी चढ़ार्इ से सामना होता है। इस खड़ी चढ़ार्इ में रास्ता सर्पाकार है, बावन मोड़ पार करने के बाद जम्बूउडयार से लूली पकड़ तक तीन किमी तक की चढ़ार्इ है। लगभग 18हजार फीट की ऊंचार्इ पर खिंगरू ला दर्रा पार करने के बाद लपथल तक उतार है। रास्ते में छयूडाग, कालीमाटी नाम पढ़ाव हैं लेकिन इन पढ़ावों में रूकना कम ही हो पाता है। कालीमाटी में झरने व मखमली घासके मैदान हैं। यहां फिया काफी हैं। ग्रामीण बताते हैं कि इसके मांस को दवा के रूप में खाने की कुप्रथा व फरवाली खाल के कारण इसका षिकार होते रहता है। लपथल इस साहसिक यात्रा का मध्य पढ़ाव है। लपथल 4150 मी. की ऊंचार्इ पर है। लपथल के बारे में कहा जाता है कि हिमालय पर्वत बनने से पहले यहां जो टेथिस सागर था उसमें पाये जाने वाले षैवाल, मछलियों व वनस्पतियों के जीवाष्म यहां मिलते हैं।







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