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Bal Krishana Dhyani's Poem on Uttarakhand-कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, May 08, 2014, 08:15:59 AM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

लग्यां छन सब अपरा अपरा
लग्यां छन सब अपरा अपरा
अपरी जल्म भूमि थे बचाण बान
भूकी तिसी रैकी पड्यां छन अपरा
अपरी बोई भूमि थे बचाण बान
लग्यां छन सब अपरा अपरा
क्वी क्वी हुँदो इन बिरला रे
जैथे मातृभूमि की पीड़ा दिक जांदी
छटपट वैकु जियु तबै कै जाँदु
अपरू हाक मगणे ऊ भैर आन्दु
लग्यां छन सब अपरा अपरा
सैंण ना वै थे तब हुँदो
जल जंगल जमीन परी अपरी जब घात हुँदो
निकली पड़दा वा यखुला बाटा
हीटेदरी ऐंदा फिर ऐथर पैथर एक तबै व्है जाँदा
लग्यां छन सब अपरा अपरा
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

मेरी बात से ..........
मेरी बात से तू इतगा नराज ना व्है
बैठ मेर समण मे सै तू दूर ना जै
मेरी बात से ..........
ये निरबगि पोटगि का बणा
बल टक्का छंन हम थे कमणा
रोटलो चोंवल भूजि लेकि
ये पियारी भूकी पोटगि कू भूक मिटाणा
बात मेर समझ जै इतगा नराज ना व्है
बैठ मेर समण मे सै तू दूर ना जै
मेरी बात से ..........
शौक चढ़ी छे मिथे की मि ते थे छोड़ीकि जोलों
ते छोड़ीकि मि तू बता मि कन कै यखुली रोलों
यूँ ना सतों मिथे यूँ ना ये जिकुड़ी झुरो
तू ही रामी छे मेरी तू ही छे रौतेली
इतगा झूठ नखरा ना कैर सुदी नराज ना व्है
बैठ मेर समण मे सै तू दूर ना जै
मेरी बात से ..........
बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

मि उन्दु उन्दु विंथे बोलन्दो बल
मि उन्दु उन्दु विंथे बोलन्दो बल
वा फुंडे फुंडे किलै जांदी छे
गीत मेरा माया का
वा मेर दगडी किलै नि लगन्दी छे
मि उन्दु उन्दु विंथे बोलन्दो बल ..... .
विं बान मि कख कख नि रौड़ी बल
बस मि और्री मेरी ये जिकुडि ही जंणदि छे
आंख्युं मा बस्य मेरा सपुनिया ऊ
में दगडी तू किलै नि देक जांदि छे
मि उन्दु उन्दु विंथे बोलन्दो बल .....
लोक लाज की चिंता बल ...... अ.
तै थे बी नि मि थे बी छे
हाँ बोलदे अपरि गिचि से छुची
मि तै थे मंगणा कुन तेरो घार आच आनु छौं
मि उन्दु उन्दु विंथे बोलन्दो बल .....
वा फुंडे फुंडे किलै जांदी छे
गीत मेरा माया का
वा मेर दगडी किलै नि लगन्दी छे
मि उन्दु उन्दु विंथे बोलन्दो बल .....
बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

किलै कि समज मा नि ऐई
अबी बी मिथे मि
किलै कि समज मा नि ऐई
बिरदयूं ही रेगे मि
किलै कि खुद थे मि खोज नि पाई
अबी बी मिथे मि ........
ये आँखा बी नि छन मेरा
वे बी व्है गे अब बिराण
खोज्नु छे वै थे पैल मिथे
वैल खोजी दयाई पैल ऐ जमणा
अबी बी मिथे मि
कै पर करुलो मि भरोसा
जबै अपरि परी भरोसा नि राई
धोक दयूं छे मिल अपरि थे छकैकि
अब पछतानु छे तू अब किलै कि
अबी बी मिथे मि
देवों की भूमि छे वा मेरी पियारी
मि वै दगडी बी लाडा पियार नि कैर पाई
अब रिटनु छों मि यक्ला यकुलू
कख बी मिल अब धार नि पाई
अबी बी मिथे मि
बालकृष्ण डी ध्यानी
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

तर ऊ हैरी का आँखा कैका छन
पछाँण बी मि छों
में से अजाण बी मि छों
कदगा .... २ खोज मि मिथे
यख हरच्युं बी मि छों
टूटी गे छे वे धागा
विं परी अल्जी गेढ बी मि छों
ऊ उंदरु का बाटू बी मि छों
ऊ उकालो को चढ़े बी मि छों
ये मौल्यार ये फुल्यार मेरा छन
ये भुकी और्री तिसी बी मि छौं
ये पोटगी को सुकसुकहाट बी मि छों
औरी वैकि कबलाहट बी मि छों
सुख बी मेरा दुःख बी मेरा छन
हैंसदी आँखि मेरी रुंदरी बी मेरी च
सबी का सबी यख मेरा छन
तर ऊ हैरी का आँखा कैका छन
बालकृष्ण डी ध्यानी
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किलै कि समज मा नि ऐई
अबी बी मिथे मि
किलै कि समज मा नि ऐई
बिरदयूं ही रेगे मि
किलै कि खुद थे मि खोज नि पाई
अबी बी मिथे मि ........
ये आँखा बी नि छन मेरा
वे बी व्है गे अब बिराण
खोज्नु छे वै थे पैल मिथे
वैल खोजी दयाई पैल ऐ जमणा
अबी बी मिथे मि
कै पर करुलो मि भरोसा
जबै अपरि परी भरोसा नि राई
धोक दयूं छे मिल अपरि थे छकैकि
अब पछतानु छे तू अब किलै कि
अबी बी मिथे मि
देवों की भूमि छे वा मेरी पियारी
मि वै दगडी बी लाडा पियार नि कैर पाई
अब रिटनु छों मि यक्ला यकुलू
कख बी मिल अब धार नि पाई
अबी बी मिथे मि
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Bhishma Kukreti
2 hrs
फ्यूंलड़ी (श्रृंगारिक गढ़वाली कविता )
-
रचना -- शिव प्रसाद पोखरियाल ( जन्म - 1940, पोखरी , पौ . ग . )
Poetry by - Shiv Prasad Pokhariyal
( विभिन्न युग की गढ़वाली कविताएँ श्रृंखला )
-
इंटरनेट प्रस्तुति और व्याख्या - भीष्म कुकरेती
फ्यूंलड़ी त्वै देखि औंद याद यो मन मा
तेरो मेरो साथ छयो पैल्या जनम मा।
गोरी मुखडी मा जब घुँघट खैंचदि तू
धोतिन उठड्यूं दबै कि मुलमुल हंसदि तू
झिलमिल फूली को झिमलाट नाक मा। तेरो मेरो साथ छयो पैल्या जनम मा।
मुंडि कि घुंघर्याळी लटुली सुरजी सि किरणी
बिगरैलि खुटोंकि हिटैइ डांड्यू की सि हिरणी
छुण छुण चूड़ियों को छमणाट हत्यों मा , बतौणु छौ हत्यों मा। तेरो मेरो साथ ....
उलर्यों दगड्यों दगड़ि कौथिग जान्दि तू
फररा फर फर बथौं मा दुशलि उडाँदि तू
झलकदि मछलि बतौणि छ कान मा बतौणी छ कानुमा। तेरो मेरो साथ ....
डाँड्युं मा दगड्यों दगड़ी घास कु जब जांदि तू
छुण - छुण - छुण - छुण दथड़ि का छुणका बजांदि तू
रसीला गीत बतौणा छैं डाँड्युं मा , बतौणा छैं डाँड्युं मा। तेरो मेरो साथ ...
पुंगड्यों की भीट्यूं बैठिक , जब खुट्यों हिलांदि तू
केळा सि कुंगळी फिलियों तैं धोतिन ढकांदि तू
देखिकि आंख्युं को सरमाणु मनमा बतौणु छ मनमा। तेरो मेरो साथ ...
पाणि कि गागरि लेकि जब उकाळि कु आंदि तू
देखिकि मि झट बौगा ह्वे कि मुखडि फर्काँदि तू
धौंपेलि को फेर बतौणु छ पीठि मा , बतौणु छ पीठि मा। तेरो मेरो साथ ...

-
( साभार --शैलवाणी , अंग्वाळ )
Poetry Copyright@ Poet
Copyright @ Bhishma Kukreti interpretation if any

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


Bhishma Kukreti
Yesterday at 6:30pm
हमरो हक हमम द्या ( गढ़वाली कविता -)
रचना -- तोताराम ढौंडियाल ( जन्म - 1940 , बांसी , ढौंडियालस्यूं , पौ 'ग )
Poetry by - Totaram Dhoundiyal
( विभिन्न युग की गढ़वाली कविताएँ श्रृंखला )
-
इंटरनेट प्रस्तुति और व्याख्या - भीष्म कुकरेती
हमारी कूड़ि इ काखम्
कुळै डाळीइ जड़म्
लीसै तैं टंग्युं गिलास
एक छ्वटु नौनु
अपणी ब्वै कि तिडीं खुट्यूं तैं
एक बूँद लीसो ल्याणू कनु प्रयास
चट्टाआं .....छक्कड़ अर जुर्माना पड़ि गे
वु ननो भिवरी कै भयम पड़ि गे
जनो बिजोग पड़ि गे
वैका बुबाम बुनु वो -
यो सरय्या जंगळ ठ्यकादारम बिक्युं,
हमर हक यख नी !
अरे ! ... ! जौं जंगळऊं तैं दादा , पड़दादूँ बटि
नाती -नंतान , पूति -संतान नौना सि छां सैंतणा !
आज हम बिना पुछ्याँ
कलकत्ताs सेठम कनकै बिकाणा ?
यख हमरो हक कख छ ?
क्य ई वन नीति छ ?
त जन नीति क्य छ ?
टक लगै सुणि ल्या !
हमरो हक हमम द्या !
तब रैली यूँ जंगलुँ की अंद्वार ,
निथर जिद्दम होलू खंद्वार !

-
( साभार --शैलवाणी , अंग्वाळ )
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Jitendra Rai with Bhishma Kukreti and 20 others.
2 hrs ·
रूप रंग
Jitendra Rai
तेरु यु रूप रंग तेरा ये रूप रंग
ढली जालू ढल जायेगा
अर् ये रूप रंग क और इस रूप रंग के
भंवरा भी उड़ी जाला भँवरे भी उड़ जायेंगे
पर अपड़ा मन कु किन्तु अपने मन का
रंग रूप रंग रूप
नि बदली कबि। न बदलना कभी
उड़दा पंछी भी त्यारू उड़ते पंछी भी तेरी
छैल खोजदा आला परछाई खोजते आएंगे।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

अब भी बड़ा सकूं है
अब भी बड़ा सकूं है
उस मेरे भूले गाँव में
उस पिपल की छांव में
उन कागज की यादों की नाव में
अब भी बड़ा सकूं है ......
याद आते ही वो मैं उस संग झूम जाता हूँ
अपने को कहाँ हूँ मैं ये तुरंत भूल जाता हूँ
गोते खता हूँ उस अविस्मरणीय पल में
सुखद अनुभूति पाता हूँ रोते मेरे दो नयन से
अब भी बड़ा सकूं है ......
हर पल साथ धड़कता है वो मेरे दिल के धड़कन जैसा
स्वास को जब छूती सुगंध उसकी मेरी जिंदगी में लग जाता तड़का
महक उठता है पूरा आलम गुलशन मेरा वो सारा खिल जाता
सौंधी सी मिटटी से लिपे जब कोई मेरा यहां मेरे गले मिल जाता
अब भी बड़ा सकूं है ......
अभी मैं मचल जाता हूँ अब भी मै खूब तड़पता हूँ
अब भी एक अँधेरे से कोने बैठ खुद पर मैं खूब भड़कता हूँ
कौन सा जिंदगी का मोड़ था वो जब छूटा मेरा वो अपना
एक सपने को पाने को मैं रोज यूँ ही जब बिखर जाता हूँ
अब भी बड़ा सकूं है ......
बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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