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Cereals Of Uttarakhand - उत्तराखंड मे पैदा होने वाले खाद्यान

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, January 25, 2008, 01:40:59 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


ALCHHI
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I remember my childhood days.

Kheto mai log alchi (ek prakar seasional aanaj) boya karte the. Jise log namak milakar khaate the ! Wah ab pahado se gayab ho chuka hai !



Devbhoomi,Uttarakhand

पर्वतीय क्षेत्र में पहली बार उगाई गयी पीली शिमला मिर्च

लोहाघाट(चंपावत): कृषि विज्ञान केन्द्र द्वारा पर्वतीय क्षेत्र में पहली बार पीली शिमला मिर्च पैदा कर नई उपलब्धि अर्जित की है। केन्द्र के सब्जी वैज्ञानिक डा. एके सिंह द्वारा किए गए शोध के बाद विकसित की गई इस शिमला मिर्च को रविवार को जनता के लिए उपलब्ध कराया गया।

अपने अथक प्रयासों से पहाड़ में पहली बार इस किस्म की शिमला मिर्च पैदा करने वाले सब्जी वैज्ञानिक डा. सिंह ने बताया कि गहरे पीले रग की यह मिर्च पोषक तत्वों से भरपूर होने के साथ फाईव स्टार होटलों एवं बड़े घरानों के लिए उपयोगी है। दिल्ली आदि स्थानों में यह डेढ़ सौ रुपये किलो की दर से बेची जा रही है। इस मिर्च को चाउमिन, बर्गर, पीजा, सूप, सलाद आदि के रूप में प्रयोग किया जा सकता है।

Devbhoomi,Uttarakhand

    

कृषि और पशुपालन राज्य के 80 प्रतिशत लोगों का मुख्य आधार है जो राज्य के सकल घरेलू उत्पाद (जी डी पी) का 30 प्रतिशत है। राज्य के कुल भूमि क्षेत्रफल 5348300 का 15 प्रतिशत भाग कृषि के अंतर्गत है।

पारिस्थितिक अस्थिरता और पर्यावरणीय विविधता के कारण राज्य के अधिकांश भाग में कृषि जीविका बन गया है, ऊधमसिंह नगर और हरिद्वार को छोड़कर जहां कृषि बाजार के लिए उत्पादित होता है खासकर निर्यात बाजार के लिए।

लोगों के पास जमीन  बहुत कम है। 65 प्रतिशत लोगों के पास जमीन 1 हैक्टर से कम है। पहाड़ी क्षेत्रों में लोगों के पास औसतन 0.779 हैक्टर जमीन है जबकि मैदानी भागों में 1.276 हैक्टर है।

पहाड़ी क्षेत्रों में सीढ़ीनुमा खेतों में खेती होती है। खेत छोटे-छोटे होते हैं जिसकी उपजाऊ क्षमता कम ही होता है। राज्य में ज्यादा फसल उगाने के बावजूद राज्य के उत्पादन (अनाज, दलहन इत्यादि) से खाद्य मूल्य के कुल खर्च का लगभग 40 प्रतिशत ही भरपाइ हो पाता है, शेष 60 प्रतिशत बाहर से आयात करना पड़ता है।

मुख्य फसल हैं- धान, गेहूं, मक्का, सोयाबीन और दाल। उत्तरांचल में फसल उगाने की तीव्रता 163.79 है, जो देश के औसत से कहीं अधिक है। कृषि अधिकांशतः वर्षा पर निर्भर है, लेकिन सिंचाई के लिए उचित व्यवस्था कर कृषि उत्पादकता बढ़ायी जा सकती है।

राज्य में काफी मात्रा में फलों (2004 में 5 लाख टन) एवं सब्जियों (2004 में 3.8 लाख टन) का उत्पादन होता है जिसका प्रसंस्करण और विवणन राज्य के बाहर भी किया जा सकता है जिससे फसल कटाई के बाद के क्रिया कलापों एवं विपणन ढ़ांचा में कम निवेश की जरुरत होगी।

राज्य के कृषि की वर्तमान अवस्था से किसानों को कम आय होती है और लोगों के लिए पूंजी अटकाव की स्थिति आ जाती है।

Devbhoomi,Uttarakhand


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Devbhoomi,Uttarakhand


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720



Madhua... Ke Khet..

This Cereal is mostly produced in Himalayan Belt. . India as well as Nepal..  In uttarakhand also this is produced largely.


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                 गहथ दाल

गढ़वाल के किसान सदियों से अपने खेतों में विविधतापूर्ण फसलें उगाते हैं। यहां की फसलों का विशेष महत्व है। दलहनी फसलों की बात करें, तो गहथ सबसे उपयोगी है। इसे दाल ही नहीं, दवा के रूप में प्रयोग किया जाता है। पथरी के रोगियों के लिए तो रामबाण की तरह है।

गहथ को लगभग 1500 से 2000 मीटर तक की ऊंचाई पर यह फसल उगाई जाती है। इसमें खास बात यह है कि कम पानी वाली तथा पथरीली जमीन पर ही इसका अछा उत्पादन  होता है। पर्वतीय अंचलों में गहथ को सिर्फ दाल के तौर पर ही भोजन में शामिल नहीं किया जाता, बल्कि इसके कई गुण भी हैं।, लेकिन चिंता की कोई बात नहीं, क्योंकि हर घर में गहथ है।

पहाड़ी घरों में गहथ की दाल तो बनती ही है, कई अन्य पकवान भी तैयार किए जाते हैं। इनमें गथ्वाणी और फाणा मुख्य हैं। यह शीतकालीन में उर्जा पैदा करने वाली दाल है। जुकाम-खांसी के इलाज के लिए गढ़वाल के लोग गहथ की पकोड़ियां बनाकर खिलाते हैं।

गढ़वाल से गहथ का अभिन्न रिश्ता है। गहथ से पथरी रोग के इलाज की जानकारी के पीछे गढ़वाली किसानों का पारंपरिक ज्ञान है। पुराने समय में पहाड़ों में जब लोग घरों का निर्माण करते थे, तो पथरीली जमीन होने के कारण खासी परेशानी होती थीं। उस समय विस्फोटक नहीं हुआ करते थे। ऐसे में पत्थरों को तोड़ने के लिए उन्हें लकड़ी के ढेर से दबा दिया जाता था तथा आग लगा दी जाती थी। बाद में गर्म पत्थर पर गहथ का गरम-गरम पानी डाला जाता था, तो पत्थर के टुकड़े हो जाते थे। गावं के लोगो ने पथरी रोग पर भी गहथ के पानी का प्रयोग शुरू किया,

तो फयादा मिलाता रहा। बताते है कि एक महीने तक गहथ का रस पीने तथा दाल खाने से पुरानी पथरी भी टूटकर  मूत्र विसर्जन के साथ निकल जाती है। गुर्दे की पथरी के लिए तो रामबाण है। गहथ के पौधों व फलियों के सूखे अवशेष पशुओं के लिए उत्तम चारा है।

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