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Poems & Article by Dr Anil Karki- डॉ.अनिल कार्की के लेख और कवितायें

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, August 13, 2015, 11:03:20 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

अनिल कुमार कार्की

अनुनाद पर आए इसलेखक ने शुरूआत में ही बड़ी हमलावर मुद्रा में लोकभाषाओं के नए लिख्‍वारों को हिंदी विभागों और अकादमिक समुदायों से दूर रहकर लिखने की सलाह दी है । हमारे विभागों और अकादमिक समुदायों ने शायद नई ऊर्जाओं और सम्‍भावनाओं के लिए इतनी जगह कभी बनाई ही नहीं कि वे उसमें अपने होने के मायने खोज पाएं। नए वक्‍़त की इन नई ज़मीनों के बारे में बिना ढंग से जाने हम सिर्फ़ तय कर दी गई किताबों को पढ़ाने में रह गए,जबकि उनकी हमसे उम्‍मीदें कुछ और ज्‍़यादा की थीं... कुछ और ज्‍़यादा की हैं। मुझे गहरा अहसास है कि यह मोहभंग अकादमिक शिक्षण के लिए एक संकटग्रस्‍त भविष्‍य की आहट है। यह सिर्फ़ यहां नहीं हो रहा है- दिल्‍ली, बनारस, इलाहाबाद, भोपाल, मुम्‍बई, जयपुर...कहीं कम-कहीं ज्‍़यादा...पर सभी जगह हो रहा होगा।
अनिल कुमार कार्की डी.एस.बी. परिसर के हिंदी विभाग में शोधछात्र है। ''हिंदी की लम्‍बी कविताएं:शिल्‍प एवं विचार'' उसका शोधविषय है। कभी-कभी अबूझ बीहड़ता लेकिन वैचारिक रूप से हमेशा काफी हलचलों से भरा एक नौजवान....जिसे अपने रास्‍ते अभी तय करने हैं। दुनिया को अभी और खुलना है उसके जीवन में। हिंदी-युग्‍म की कविता प्रतियोगिता में वह पंकज बिष्‍ट और अनामिका द्वारा पुरस्‍कृत है यानी औपचारिक रूप से दिल्‍ली भी देख आया है। समकालीन यथार्थ और विचारधाराओं से बख़ूबी परिचित है। सुपरिचित युवा कवि महेश पुनेठा के सम्‍पर्क से आकर मेरा विद्यार्थी बना और अब मुझे अकसर ही कई-कई बहसतलब बातों में मुब्तिला रखता है, जो एक शोधार्थी के लिए अच्‍छा  लक्षण है। उसका लिखा यह कच्‍चा-पक्‍का लेख उसी की तरह बीहड़ और वाचाल किंतु एक निश्चित वैचारिक दिशा में जाता लेख है। अनुनाद इस लेख को लोकभाषाओं और उनकी कविता पर निरन्‍तर कुछ न कुछ छापते रहने की आकांक्षा के रूप में प्रस्‍तुत कर रहा है। अनुनाद तक आने वाले कवियों-आलोचकों-पाठकों से मेरा अनुरोध हैं कि इस कड़ी को आगे बढ़ाने में अनुनाद को सहयोग दें।     

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

तोड़ देंगे जंगलों का मौन / अनिल कार्की


वो नहीं करंगे इन्तजार सूरज आने का
बल्कि अल-सुबह ही 
वे कुहरे की चादर चीरकर 
भेड़ों के डोरे खोल देंगे
और चल देंगे जंगल की तरफ,
तब भेड़ों के खांकर बजेंगे जंगलों के बीच
खनन-मनन वाली धुनों में
दूर किसी पहाड़ पर
कुहरे के भीतर गूंजेंगी
शाश्वत खिलखिलाहटें
और बजेंगी
घस्यारिनों की दरातियाँ
धीरे-धीरे ही छटकेगा
कुहरा
आवाजें और साफ
और हमारे करीब होती जायेंगी
एक दिन
ठीक उसी वक्त धार पर चढ़ेगा सूरज
और बिखेर देगा
ढलानों पर
मोतियों की तरह
रौशनी का घड़ा
-
ईमेल- anilsingh.karki@gmail.com
-

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Anil Karki
2 hrs · Edited ·

कुमाउँनी कविता का समृद्ध तेवर 'जनकवि गिर्दा' और 'दुर्गेश पंत' जी द्वारा संपादित शिखरों के स्वर से आज आप लोगों के लिए दुर्गेश पन्त की कविता एक 'एक फोतई । एक जिंदगी' का भावानुवाद । यह किताब सन् 1969 में छप के आ गयी थी शायद कविता एक आद साल पहले की रही होगी । मुझे कुमाउनी कविता धारा में यह कविता एक बड़े मोड़ की तरह लगती है ।

एक वास्कट। एक जिंदगी।

किसी किसी समय
मैं सोचता हूँ
यह पैबन्द लगी
वास्कट
खूँटी में टांक दूँ

फिर ख़याल आता है
इससे क्या होगा?
फ़टी वास्कट
फटक मारती हुयी उछल के
फिर से मेरे कन्धों में आ धमकेगी

बटन तो सब टूट गए हैं
खाली बटनकाजों के आँख से घूरेगी
मेरी तरफ

मुझे डराएगी
फर फर फर उड़ते हुए
फटा अस्तर दिखायेगी

बताओ क्या करूँ ?
इसका इलाज भी तो नहीं कोई
मजबूरी है
इस दुनिया में मरना ही नहीं
जिन्दा रहना भी जरूरी है।

-दुर्गेश पंत
अनुवाद अनिल कार्की

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Anil Karki
August 19 at 9:12am 

नाग
मेरा ब्लॉक बेरीनाग नामक जगह पिथौरागढ़ में पड़ता हैं यहाँ करीब दर्जन भर गावों के नाम विभिन्न नागों के नाम से है कई लोगों के ग्राम देवता नाग है । और तो और मेरे पोस्ट आफिस मुवानी में एक जगह है । स्यापचिर (सांप द्वारा दो हिस्सों में जमीन को चीर देना) यह एक पुराना मिथक है कि वहां एक सांप ने एक जमीनी विवाद सुलझाया । अब इस जगह पर नाग देवता की पूजा होती है ।
खैर जो भी हो नाग उन आदिम जातियों में से एक है जिनका गण चिह्न नाग रहा होगा । दुनिया की बलसाली शक्तियां और जातियाँ भले ही आदिम जीवन शैली को समूल खत्म कर दे पर लोक की स्मृतियों में से उसे नहीं मिटा सकते । धरती के हिस्सों में भी उनका दावा बना रहेगा । मैं उन सरल कोटिश पुरखों को नमन करता हूँ

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Anil Karki
August 16 at 8:12pm
कुमाउँनी कविता का समृद्ध तेवर 'जनकवि गिर्दा' और 'दुर्गेश पंत' जी द्वारा संपादित शिखरों के स्वर से आज आप लोगों के लिए दुर्गेश पन्त की कविता एक 'एक फोतई । एक जिंदगी' का भावानुवाद । यह किताब सन् 1969 में छप के आ गयी थी शायद कविता एक आद साल पहले की रही होगी । मुझे कुमाउनी कविता धारा में यह कविता एक बड़े मोड़ की तरह लगती है ।

एक वास्कट। एक जिंदगी।

किसी किसी समय
मैं सोचता हूँ
यह पैबन्द लगी
वास्कट
खूँटी में टांक दूँ

फिर ख़याल आता है
इससे क्या होगा?
फ़टी वास्कट
फटक मारती हुयी उछल के
फिर से मेरे कन्धों में आ धमकेगी

बटन तो सब टूट गए हैं
खाली बटनकाजों के आँख से घूरेगी
मेरी तरफ

मुझे डराएगी
फर फर फर उड़ते हुए
फटा अस्तर दिखायेगी

बताओ क्या करूँ ?
इसका इलाज भी तो नहीं कोई
मजबूरी है
इस दुनिया में मरना ही नहीं
जिन्दा रहना भी जरूरी है।

-दुर्गेश पंत
अनुवाद अनिल कार्की

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Anil Karki with Shamsher Singh Bisht and 36 others
September 26 at 8:00pm ·

ये क्या माजरा है कोई बता सकता है । कुमाउँनी साहित्य फेस्टविल हो रहा है पता नहीं कैसा जो होगा। पत्रकार मित्र रोहित जोशी से इस बारे में पहले ही सुन चुका था एक वीडियो भी देखा शयेर भी कर रहा हूँ और साथ में इसी मुद्दे पर लिखी 'कवि होने से पहले' लम्बी कविता का एक अंश भी दे रहा हूँ स्टैण्ड मेरा साफ़ है इस तरह के कार्यक्रमों को लेकर। बाँकी आपका क्या स्टैण्ड है मैं नहीं जानता ।


'मैंने धार पार घास को जाती
पहाड़ी स्त्री का पेट देखा
बों दमामे सा पुष्ट उभर कर आगे आया हुआ
लगा यों ही नहीं कहता था
केशव अनुरागी
ढोल को ब्रह्माण्ड

लेकिन मैं डर गया हूँ इस वक्त
इसलिए कि वह इतनी दूर से
यहाँ आ पहुंचे हैं
हमारी कविता और सतरंगे जीवन को
पर्यटक बनके देखने
लार छोड़ते हुए
वे अपनी ऊब को थूक देंगे
हमारे पहाड़ पर
कविता के बहाने

मैं डर गया हूँ इसलिये नहीं कि
अब क्या होगा हमारे पहाड़ का
बल्कि इसलिए कि
वह क्या का क्या बना डालेंगे इसे

मैं जो अपने लोगों का मुँह लगाया कवि हूँ
मुझे जरूरत ही क्या है
दूसरे की बारात में नाचने की
यहीं मारूँगा फसक
यहीं हूँगा जो भी होना है मुझे

लेकिन झूट नहीं बोलूंगा
साथ नहीं छोड़ूंगा
कवि होने से पहले
मेरा पहाड़ी होना बचा रहे
बचा रहे मेरा पहाड़
उसके बखडुवे बकैत बचे रहें
पाखुड़ी-जांगड़ी में तात बची रही

धुनि में आग बची रहे
कवि होने से पहले बचा रहे
चौमास
मंडुवा गोडती जँभाधूत औरतें बची रहें
बचे रहे उनके मजबूत कुमथले
बाईस पुल्ले हरे घास के भी
बची रहे उनकी अग्निशिखा के फूल सी
लपट वाली जिजीविषा
अपनी वनफूली महक के साथ

मेरा कवि होना
कवि बने रहना उतना जरूरी नहीं है
जितना की बचे रहना
पहाड़ी स्त्री के पेट से बों दमामे जैसा
उदर से बाहर झांकते
रतनुवा का
असल क्रिसान के चेले का
असल फसकबाज
भविष्य का'

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Anil Karki
September 22 at 8:52am ·

नैनताल की नन्दा देवी झांकरका सैम
मेरि छु हैंसणि बाणी लोग खानी भैम

अनुवाद -
नैनीताल में नन्दा देवी और झांकर अल्मोड़े के भगवान सैम
मेरी तो हंसते रहने की आदत है तुम क्यों करते हो वहम

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

उत्तराखंड से हिंदी साहित्य में नयी पौध :
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दो कवयित्रियाँ : स्वाति मेलकानी और नूतन डिमरी गैरोला
दो कथाकार : अजय कन्याल और अनिल कार्की
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1. स्वाति मेलकानी : जन्म : २९ अप्रैल, १९८४ (नैनीताल)
कविता संग्रह 'जब मैं जिन्दा होती हूँ' पर भारतीय ज्ञानपीठ का युवा नवलेखन पुरस्कार
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नदी हूँ मैं
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बरसाती नाले की तरह/ तीव्र है तुम्हारा प्यार/
चलो नाला नहीं/ झरना कह देती हूँ/
अचानक फूट पड़ता है/ और मैं/ ढलान की/
कमजोर घास को पकड़कर/ किसी तरह/
खुद को बचा पाती हूँ...
चेतना की/ जाने कितनी परतों के नीचे/ झाँकने पर
मैं जानती हूँ/ मैंने भी चाहा है तुम्हें/ निरंतर/
प्रवाह कम नहीं मुझमें भी/ पर/
तुम मुझे बाढ़ बनाना चाहते हो/
और मैं/ नदी हूँ...

2. नूतन डिमरी गैरोला : जन्म : १० जुलाई (देहरादून)
स्त्री रोग विशेषज्ञ. कुछ पत्रिकाओं में कविताएँ प्रकाशित
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कुछ खोए हुए लोग
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वो लोग खोए हुए थे/
वो जिन्दा थे/ ये एक संशय था/
वो मरे भी थे/ ये पता न था/
वो आए थे/ क्योंकि उनका जन्म हुआ था/
वो जिधर डूबे थे/ उस ओर/ वक़्त की खुरचन थी/ शिकन थी/
भूख थी
धरती सूरज चाँद तारे थे/ गगन था
सदी अपने में से कुछ खोए हुए लोगों को
घटा देना चाहती थी/
जो उपस्थित नहीं थे गिनती के वक़्त...

3. अजय कन्याल : युवा कथाकार, कवि और बेहतरीन छायाकार
पिथोरागढ़ में अध्यापन, यात्रा का पैशन
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बैतड़ी जिले का भीम बहादुर
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कई बरस पहले जब वो छोटा-सा था तो अपने दल के साथ यहाँ आया था ।
कुमाऊँ और नेपाल के बीच रोटी-बेटी के रिश्ते की यह पहली कड़ी थी ।
यानी रोटी का रिश्ता ।
नेपाल से कई लोग अपने दल बना कर रोजगार के सिलसिले में भारत की तरफ को आते हैं । भाषा और संस्कृति की समानता इस व्यवहार को सहजता देती है ।
नेपाल और भारत की सीमा पिथौरागढ़ और चम्पावत जिले में काली नदी के द्वारा तय होती है । इस नदी के दोनों तरफ बसे गाँव एक दूसरे के साथ वैवाहिक सम्बन्ध भी रखते हैं और व्यापारिक भी ।
भीमबहादुर दस वर्ष की उम्र में नेपाल के बैतड़ी जिले के किसी गाँव से कुमाऊँ के एक सुदूर गाँव में आ गया था ।
उसकी माँ नहीं थी इसलिए बाप उसे अपने साथ ले आया था ।
लाल गालोँ और बहती हुई नाक वाला वो दस वर्षीय नेपाली बालक अक्सर पिता का हाथ बँटाता नजर आता । पर कभी पिता के हाथों किसी शरारत की सजा खा या जिद पूरी न होने पर रोता तो फिर उसका पिता उसके सर पर अपनी नेपाली रंगीन टोपी रख देता और भीम खिलखिलाने लगता ।
उन दोनों पिता पुत्र के बीच का अपनापन गाँव वालों को उसकी माँ के खालीपन का एहसास कराता ।
बरसात खत्म हो चुकी थी और नेपाल से आये मजदूरों के दल अपने घर लौटने लगे थे । पर भीम और उसके पिता कहाँ जाते ?
जमीन का बहुत छोटा-सा टुकड़ा उन्हें अपने देश बुला सकने को पर्याप्त नहीं था और न ही
दस वर्षीय बालक को पाँच दिन पैदल चलने की इच्छा थी.
काम पर्याप्त उपलब्ध था और भीम का मन भी रम गया था. वे दोनों वापस नहीं गए.
(बिखरी हुई कहानियाँ से साभार)

4. अनिल कार्की जन्म : २५ जून, १९८६ पिथोरागढ़
कुमाऊँ विश्वविद्यालय से 'छायावादोत्तर हिंदी कविताओं में रचनाविधान तथा विचारधारा' पर पीएच. डी.
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मथुरिया की बकरी
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शाम के झुटपुटे अँधेरे में वह लड़खड़ाता हुआ टार्च पकड़कर आ रहा है और पल्ले गाँव के लोग टार्च की बेतरतीब हिलते फोकस से समझ गए हैं की मथुरिया ही होगा. नजदीक पहुँच कर उसने कहा, "मेरी बकरी खो गयी है, बताओ तो आज कौन-कौन घस्यारे घास काटने गए थे जंगल ? अगर तुमने कहीं देखा तो बताओ. मैं दिन भर परेशान हो गया हूँ." घस्यारियों ने छज्जों से बाहर देखकर बोला, "नहीं-नहीं बाबज्यू, हमने नहीं देखी! हाँ, दानसिंह को जरूर देखा था पातली गढ़ा के पास बढ़ियाठ कंधे में रखकर लकड़ियों को जा रहे थे, क्या पता उन्होंने देखा हो." यह सुनते ही मथुरिया ने टार्च के बटन पर अपना बूढ़ा बेतरतीब कटा-फटा अंगूठा जमाया और पल्ले गाँव के मल्धार तक का रास्ता तय करते हुए अपने बचपन के मित्र दानसिंह के आँगन में पहुँचा. दानसिंह पहले से ही अपने आँगन में खड़ा था. जैसे ही मथुरिया दानसिंह के आँगन में पहुंचा, दानसिंह ने मथुरिया की तरफ लपककर गर्मजोशी के साथ नमस्कार-पुरस्कार हुई और फिर मथुरिया से पहले आँखर यही कहे दानसिंह ने, "बकरी खोई होगी आज है ना! तू भी यार... क्या बार है आज ?"
मथुरिया अपनी ही भाषा में बोला – 'मनलबार!
'हाँ, आज मंगलबार है' – दानसिंह ने जोर देकर कहा. 'ये भी कोई बार है अपने बचपन के मित्र के घर जाने का, बुधवार को ही आ जाता!'...
('भ्यासकथा तथा अन्य कहानियाँ' से साभार)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Anil Karki
September 17 at 12:44am ·

कवि रंजीत वर्मा की कविता मैं इसे चुपचाप पढ़ गया हूँ बिना हल्ले के

औरंगजेब रहेगा लेकिन आप नहीं रहेंगे

मैं खड़ा हूं औरंगजेब रोड पर
औरंगजेब की क्रूरता यहां कराहती है
तेज भागते हजार पहियों के नीचे
अब इन पहियों के नीचे
एपीजे अब्दुल कलाम की मृदुलता होगी
अब यहां मृदुलता की कराह सुनाई देगी

तो क्या अब इस बदली कराह से
तेज भागते पहियों को आराम मिलेगा
कोई गिरेगा कभी टकरा कर या फिसल कर
तो उसे चोट पहले से कम आएगी
क्या उसकी हड्डियां नहीं टूटेंगी
क्या भिखारियों को यहां
दूसरी सड़कों के मुकाबले ज्यादा भीख मिलेगी
क्या कलाम साहब के नाम
हो जाने से यह औरंगजेब रोड
किसी भटकते राही को अचानक रास्ता बताने लगेगा
क्या यहां अब कभी कोई वारदात नहीं होगी
क्या बच्चों के लिए यह
घास से भरे मैदान की तरह हो जाएगा
क्या औरंगजेब से सड़क छीन लिये जाने के बाद
समाज से कट्टरता खत्म हो जाएगी
तो क्या इस समाज में जो भी कट्टरता थी
वह सिर्फ इसलिए थी
कि दिल्ली में एक सड़क का नाम औरंगजेब रोड था
क्या एक सड़क पर से नाम मिटा देने भर से
सत्रहवीं शताब्दी का उत्तरार्ध मिट जाएगा इतिहास से

उन्चास साल शासन करने के बाद
1707 में जब उसकी मृत्यु हुई
पूरी दुनिया की संपत्ति का पच्चीस प्रतिशत
अकेले औरंगजेब के शाही खजाने में था
फिर भी वह अपना खर्च राजकोष के पैसे से नहीं
बल्कि कुरआन लिख कर और टोपियां सिल कर चलाता था
यह थी कट्टरता उसकी
क्या यह कट्टरता वर्तमान निजाम दिखा सकता है
कभी चाय बेचते थे यह कोई बात नहीं
बात तो तब है जब वह आज भी चाय बेच कर
अपना खर्च चलाएं
सच पूछिए तो देश को ऐसे
राजनेताओं की जरूरत भी है
आखिरकार भारत एक गरीब मुल्क है
आज भारत सरकार के खजाने में
पूरी दुनिया के खजाने का पच्चीस प्रतिशत नहीं
एकाध प्रतिशत है मुश्किल से

सवाल यह भी है कि
अगर किसी शासक के नाम पर कोई रोड हो सकता है
तो औरंगजेब के नाम पर क्यों नहीं
फिर भी अगर आप ऐसा नहीं करते हैं तो
जाहिर है कि इतिहास को लेकर आपका नजरिया सांप्रदायिक है
आप इतिहास को हिंदू और मुसलमान समझ रहे हैं
1925 के बाद जो पैदा की है आपने यह दृष्टि
वह औरंगजेब के दरबार में बैठे
पंडित जगन्नाथ के पास नहीं थी
वह तो पूरे इत्मीनान से
काव्यशास्त्र मीमांसा 'रसगंगाधर'
साथ ही 'गंगालहरी' 'लक्ष्मीलहरी' 'अमृतलहरी'
और भी न जाने कितना कुछ रच रहे थे
फिर भी औरंगजेब के मन में उनकी हत्या करने का
विचार कभी आया तक नहीं
जबकि भाषा संस्कृति और विचार के मामले में
पंडित जगन्नाथ उलटी वाणी ही बोल रहे थे
आपके लोग कहां बर्दाश्त कर पाते हैं
अलग हट कर बोलने वालों को
हत्यारों की तरह पेश आते हैं वो ऐसे लोगों के साथ

अब्दुल कलाम निर्मम नहीं थे
इसलिए कि उन्हें निर्मम होने की जरूरत नहीं थी
लेकिन उनके द्वारा तैयार किया गया मिसाइल
बिना निर्मम हुए नहीं चलाया जा सकता है
औरंगजेब की आधी जिंदगी घोड़े पर बीती थी
साइकिल पर नहीं
उसके अंदर घोड़े की तरह खून दौड़ता था
और फिर हाथ में लहराती चमकती नंगी तलवार से
निर्ममता नहीं तो क्या करुणा टपकेगी
चाहे वह शिवाजी की तलवार हो या वह
लक्ष्मीबाई की ही तलवार क्यों न हो
निर्ममता और चपलता ही उन्हें दुश्मनों के वार से बचा सकती थी
मध्ययुगीन काल की राजनीति थी वह
अदालतें भी दरबार में ही लगती थी
फैसले वही सुनाता था
जिसकी तलवार के आगे कोई टिक नहीं पाता था
यानी कि वह जो सिंहासन पर बैठा होता था

संविधान की शपथ खाकर नहीं आया था
औरंगजेब शासन करने
न जनता के मताधिकार की कोई कल्पना थी उसके पास
मैग्नाकार्टा से वह पूरी तरह अनभिज्ञ था
जैसे उसका समकालीन शिवाजी अनभिज्ञ था
जैसे उसके समय की जनता अनभिज्ञ थी
मौलिक अधिकारों को तो खैर
औरंगजेब के मरने के बाद भी
ढाई सौ साल और इंतजार करना पड़ा
इस देश में आने के लिए
उस वक्त तो इन बातों को लेकर
कोई बहस भी नहीं चल रही थी जनपदों में
राजनीति सिर्फ राजा और उसके दरबार तक सीमित होती थी
बाहर षड्यंत्रों की कुछ खबरें ही होती थीं गप्प के लिए
जिनसे इतिहास के पन्ने रंग कर आपने
घोटाने की पूरी तैयारी कर रखी है स्कूलों में

औरंगजेब को जानना है तो
औरंगजेब के पास आपको जाना होगा
वह चल कर नहीं आएगा आपके पास सफाई देने

वह अपने भाइयों को मार कर पहुंचा था तख्त तक
नहीं मारता तो खुद मारा जाता अपने उन्हीं भाइयों के हाथों
लेकिन इस बात को याद रखिए कि
किसी दंगे में मासूमों को मार कर वह नहीं आया था
जैसा कि 2002 में किया आपने
न किसी मंदिर को गिरा कर पहुंचा था सत्ता तक
जैसे कि आप आए
बाबरी मस्जिद ढहाते हुए

मैं औरंगजेब के पक्ष में नहीं हूं
लेकिन रोड का नाम बदले जाने पर विचलित हूं

अपनी चौथी जन्म शताब्दी से सिर्फ तीन कदम दूर
औरंगजेब रोड पर दिखता है हमें औरंगजेब
टोपियां बेचता हुआ
लोगों को कुरआन की आयतें सुनाता हुआ
उसकी आवाज के पीछे
चार सौ साल की गहराई लिए
कोई तेज बवंडर सा आता सुनायी देता है हमें

आप सब चाहे एकतरफा वोट डाल दें
फिर भी आप औरंगजेब को इतिहास और स्मृति से
अपदस्थ नहीं कर सकते महोदय
आप किस रोड की बात कर रहे हैं
रोड तो कल भी रहेगा और उसके बाद भी
और औरंगजेब भी रहेगा
और हम भी रहेंगे पुकारने के लिए
बस आप कहीं नहीं होंगे महोदय

आपका समय इतना ही था
जैसे 1914 से 1919
प्रथम विश्वयुद्ध का समय
उसी तरह 2014 से 2019
आपका समय
इसके बाद आपका जाना तय है।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Anil Karki
August 31 at 9:18am · Edited ·

कन्नड़ लेखक डॉ माल्लेशप्पा जिनकी हत्या कर दी गयी है । इस खतरनाक समय में मेरी एक पुरानी कविता ।

एक दिन
एक किसी भी दिन मार दिया जाऊंगा मैं,
मुझे बचा लो
मैं तुम्हारी ही कविता का
अंतिम शब्द हूँ
और मुझे जीना है!

जैसे लहू में रंग होता है
जैसे जमीं में नमी होती है
मुझे जीना है
वैसे ही

मुझे बचाओ एक दिन वो मेरी ही नजरों के सामने
बना देंगे मुझे अपना सबसे प्यारा वफादार कुत्ता
वो मेरी पूँछ काट देंगे
इसलिए कि वो सीधी नहीं हो सकती
क्योंकि वह टेड़ी ही रहने को प्रतिबद्ध है
आज भी!

एक दिन, एक किसी भी दिन
वो मेरी आवाज बेच देंगे
एक दिन वो मेरी नज़र बेच देंगे
मेरी आँखों के समन्दरों पे वो उगा देंगे नागफनी
मुझे बचा लो मेरे बंधु!
मैं विश्व की सबसे संकटग्रस्त प्रजाति का
मुँहफट आदमी हूँ