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Poems & Article by Dr Anil Karki- डॉ.अनिल कार्की के लेख और कवितायें

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, August 13, 2015, 11:03:20 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

‪#‎नैनीसार‬
शासनकि बन्दूक
(बाबा नागर्जुन की कविता 'शासन की बन्दूक' का भावानुवाद )
ठाड़ी हैरे दबै भेर गौं वालनकि हूक
अगास है ठुलि है रे शासनकि बन्दूक
गोरिख्या राज गुमान में सबै थूको रे थूक
नस्स में काणि हैरे शासनकि बन्दूक ।
बड़ि गो लाटपन दस गुना यूकेडी ले मूक
धन्य धन्य हो धन्य हो शासनकि बन्दूक
सत्त ले घायल छू अहिंसा ले ग्ये चूक
जां-तां दगण लागि रे शासनकि बन्दूक
ईजमाटी बेचणा की हरु कैं लागि रे भूक
बाल न बांको कर सकलि शासनकि बन्दूक।।
------------अनिल कार्की

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

‪#‎नैनीसार‬ पर परदेश के दलाल के नाम एक कविता
(कविता का मतलब हमेशा तालियों का बजना ही नहीं, हथियारों का उठना और दरातीयों का खनकना भी होता है)
हे महराज !
धन्य राजा
धन्य नर-नरायण
इन्द्र का इनरासन
आशन क्या प्रशासन
प्रशासन क्या शासन हुआ
तुम्हारा सिंहासन
नाच हुए जहाँ
किसम -किसम के
अमला-तुलबा लस्कर हुआ
जिले का कल्कटर
जमीन का अमीन
पट्टी का पट्वारी
गाँव के पंच-पधान
घाट के खबीश-मसाण
अतरिये चमचे जवान हुए
तुम्हारे भगत
तैंतीस कोटी
झोला छाप
मुरझाये फूल
मंगखदुए हाथ
खुली खाप वाले तुम सब
तुम्हारा रकत दुगलवा है रे।
तुम अपने ही लोगों के लिये
दरवाजों पर कुकरीबाघ
सिरहाने में साँप
और खिड़कियोें पर स्याव
की तरह दुबके हो
पालक के पत्ते सी तुम्हारी
चटवा जीब
जिन्दल, अण्डानी, अम्बानी टाटा के
पैताले साफ कर रही है।
रलकाये जबड़े तुम्हारे
ढ़ूढ़ रहे हैं हडि़क
तुम चील गिद्धों के दगडि़ये
तुम मैंसखात लोग
दूर देश से
आण-बाण
बाउंसर-फाउंसर
ले आये हो
हमारी धड़ पकड़ को
अरे सुन रे!
नियम के राजा
शक्ति के राजा
क्या तेरी ठसक
और क्या हमारी कसक रे
देखना तू भी।
जोबन के दिन चार होते हैं
और उछ्लियाट के आधे
हिमाल का बरफ
देवदार की डाल
गेंडे की खाल
कभी बूढ़ी नहीं होती
बड़ीयाठ की धार
नहीं होती कभी कुंद
देखना छटेगी
छटेगी ही धुन्द
खुलेगा अगास
खेल ले सरग पर हुच्या
बना रह स्याव
कहता रह
मंडुआ, झिंगोरा, गहत,
हूंकता रह
और बेचेते रह
ईजा-माटी
डाँडी- काँठी !
कह ही देना
उस जिन्दल से
आयेंगे जल्द ही
चीमड़ प्राणों वाले
होंसिया पहाड़ी
और उनके देश-परदेश गये
बच्चे
तेरे बाउंसर फाउंसरों को भगाने के लिये
धार के ढूंगें-पत्थर ही भौत है
पहाड़ पहाड़ है रे
केवल जमीन नी है
अमला-तुलबा लस्कर
पट्वारी और अमीन नी है
याद रख।
आँख खोल और देख
पंछी फैला रहे पाँख
दमुवे ताप रहे आँच
हिंया कि चिन्गारी से
उम्रें सुलगा रही हुक्का
घस्यारिनें ढू़ँढ रही
रस्सीयाँ और दरातियाँ
बच्चे गा रहे हैं गीत
जाड़ा जाने को है
और सरसों खिल रही है आहिस्ता-आहिस्ता
जल्द फूटेगा
पहाड़ी कण्ठों से
ऋतुरैण
देखना रे
दलाल
बुरूँज के कोफे
जल्द खिलेंगे लाल।
Anil Karki

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

‪#‎नानिसार‬
बाबा नागार्जुन की कविता का कुमाऊनी भवानुवाद अनिल कार्की ।
पें मैं तुमर पत्त लगूण ही
घुमन्यूं
सार सार दिन
और सारि सारि रात
ऊनि वाल् बखतक
आजाद रणबांकुरों काँ छा रे तुम?
दबी कुचली मैसपन क तराणहारो
काँ छा रे तुम?
आ भुला मेरी सामणी
मैं तुमन कैं भुक्की दियूंल
मैं तुमरि भुक्की ल्यूंल
आओ रे
खेत क किसाण, अधिया कमूण वालो
आओ रे ज्वान-जमानो
आओ रे
खड़िया खान क ध्याड़ी मजूरों
आओ रे
सिडकुल
फैक्ट्री क कामगारों
कैम्पस और कालेज क लौंडो
न्य न्य कुशल मास्टरो।
होय पें
तुमरा भीतरत
तैयार हुन लागिरांन
उणी भखतक
लिबरेटर
पैक भड़ ।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


Anil Karki
March 18 at 1:39pm ·
Prahlad Mehra दाज्यू का गाना याद आ रहा है खुचाँग हो रही है ।
ब्वारी भूली जा स्कूली दिन
हाथ में घड़ी लटि में रिबिन
सुणि ले ब्वारी खोली बेर कान
बहुमत मतलब
बहुका मत सास को मिलेगा
और सरकार बनी रहेगी
हरदा ये कैसी होली खेलाई

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बुरा न मानो होली है
कुमाऊँ के कवि गौर्दा की राष्ट्रीय आंदोलन में लिखी एक होली की पुनर्रचना ।
होली -1
(नोट -कल घोड़े में लिखी जायेगी)
सब भक्तन की वाट लगायी
होरी अजब खेलाई कन्हाई
माल लिया और विजय भगाया
भारत को टोपी पहनाई
काम विदेशी मूरत साजी
मुहर स्वदेशी बनाई
भक्तन नाच नचाई
सब भक्तन की वाट लगायी
कन्हाई होरी अजब खेलाई
भगुवे रंग से भर पिचकारी
पुलिस की वर्दी बौराई
छोड़ के कच्चा खाकी
पेंट अंग्रेजी सिलाई
वक्कालों को भांग पिलाई
आवारा परिषद के बच्चे
गुंडे चेंपू और उच्चके
बड़बोले सन्तन की भकताई
सन्तन के संग रास रचाई
माँ की धी की सब समझायी
सब भक्तन की वाट लगायी
कन्हाई अजब होरी खेलाई

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Anil Karki
March 20, 2013 ·
हाँ ये सच है
बहुत ऊँचे पहाड़ों पर चड़ कर
चाहता हूँ कि जोर से
धाद मारू
मेरे अपने वाशिंदों को
कि आओ अपनी जमीन देखें
देखें कि
पूरब से उत्तर तक कितना फैले हैं हम
जहगें हमारी हैं सारी
और कितने बेहद हैं हम अपनी हद में रहते हुए भी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

डॉ अनिल कार्की की नई कविता- उत्तराखंड के ताजा राजनैतिक हालात पर!
....
मैंने पूछा
रंगत आ रही है?
कैसा चिता रहे हो ?
असज तो नी हो री ?
तबीयत तो ठीक है ना?
उसने कहा
आशीर्वाद है गुरु
सब बढ़िया चल रहा है
द्यो देप्त
पितर नातर
सब खुश है
बस महाराज
नेता भुति गये हैं
और जनता कुनि गयी है
कुछों को गेस्ट बना के भभरिया दिया है
कुछ भक्त बनकर मुनी गये हैं
रही सही कसर
कोट वाले निकाल दे रहे हैं
वे नेतोओं को शनत्याने और घर्याने के लिए
जैसे ही मन्त्र फूक रहे हैं
नेता उचक के संविधान के साथ ही उनकी फूक को
पेंट की पीछे वाली जेब में डाल दे रहे हैं
मैंने कहा
आजकल धिनाली क्या है ?
उसने कहा
गुरु महराज
हमारी गाय तो सोलह बार
ब्या चुकी है
हर बार दूध सूख जा रहा है
बछड़े ही बछड़े पैदा हो रहे हैं
क्या करूं केर बिगड़ गयी है
किसी दिन चलते फिरते मर जाएगी
अभी भी मरगल्ली सी चल फिर रही है
हाड़ ही हाड़ रह गये है
मैंने कहा
चिंता न करो
कुर्सी फिर जल्द ब्याने वाली है राज्य की
ख़ूब धीनाली होगी
हर साल जत्काल
हर साल बहार
उसने कहा
महाराज !
फिर कोई सांड पलेगा
हमारी महेनत पर
कुर्सी जब जब ब्याई है
सांड ही पैदा हुए हैं
Anil Karki शानदार भाई !!

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


Anil Karki
April 29 at 11:54am ·
गुरुवर शैलेश मटियानी की एक कहानी है..प्रेतमुक्ति, सुयाल नदी के किनारे की, जिसमें किशनराम और केवलानन्द पंडित की कथा है ....संभव हो आपने पढ़ी हो. यदि हाँ तो, बस उसी कथा की उत्तरकथा है 'दिलबर गुरु' (इस दुसाहस के लिए क्षमा)
दिलबर गुरु
दिलबर राम अम्बादत्त का पुस्तैनी नौकर था, जिसका दादा किशन राम अम्बादत्त के दादा केवलानंद जोशी का हल जोतते हुए मर गया. केवलानन्द ने किशन राम को अन्त तक यह कहते हुए हल जोतने के काम में लगाये रखा था कि वह मरते वक्त किशन राम का हाथ गाय के पूँछ में देकर बैतरणी तार देगा, परन्तु ऐसा न हुआ, जैसे ही किशन राम ने प्राण त्यागे, केवलानन्द ने दो लोगों को भेजकर किशन के बेटे धनराम को उसके मालाकोट से बुला लिया और उसे दो नाली जमीन देकर फिर से हल जोतने के काम में लगा दिया। धनराम भी अम्बादत्त के बाप दादाओं का हल जोतते हुए एक दिन मर गया और अब मरने की बारी थी दिलबर राम की। भीतर की बात यह है कि दिलबर केवल जात से ही हरिजन है पर नैन नक्स में वह अम्बादत्त का छोटा भाई लगता है, लम्बा, रौबिला चेहरा और साफ़ सुथरा भी। कम बोलता था और चुपचाप रहता था। बस चिलैली तो खसियों को ही लगी रहती हैं, सामने से गुजरा नहीं कि उसे चिड़ाने के लिये कहने लगते ''दिलबर गुरु राम राम!'' एक बार ठाकुर लछम सिंह ने ही जबरन बिठा के दिलबर से कहा था, कब तक करेगा रे तुम्हारा खानदान इस बामण की सेवा चाकरी? तेरा बूबू किशनुआ भौत मायादार आदमी था। तेरी आमा चनुली तेरे बाप को पेट में ले माईके चली गई और फिर कभी लौटी ही नहीं। इस केवलानन्द ने तेरे बूबू को यह झूठ बोल दिया कि तेरी आमा दूसरे घर चली चली गई । बेचरा किशनवा, जीवन भर तेरी आमा के लिये तरसता रहा। हल जोतते-जोतते बीच. में ही बैल रोककर पूछने लगता था कि ''गुरू मेरे प्रेत को मुक्ती कैसे मिलेगी? केवलानन्द कहता अरे मैं तेरा तर्पण कर दूगाँ तू चिन्ता न कर मुक्ति हो जाएगी । जिस दिन तेरा बूबू मरा, इन्होंने उसे छूवा तक नहीं, दो दिन तक उसकी लाश गाँव के लोगों ने पोरिया के रखी थी, जब तेरा बाप आया तब जा के बेचारे को अग्नि मिली।'' दिलबर चुपचाप सुनता रहा और फिर लम्बी सांस लेकर बोला ''छोड़ो हो लछम दा, पुरानी बातों से क्या करना, अपना दिल साफ होना चहिए बस'' तो लछम सिंह ने टोक दिया ''ठीक है मान लिया भुला पुरानी बातों से कुछ नहीं लेना, पर यार तेरी इतनी उम्र हो गई ब्याह कर ले, एक वारिस और मिल जायेगा तो बामण के परिवार को हल जोतने लिये.'' बात बुरी तरह चुभ गई दिलबर को, मन हुआ कि एक झापड़ लगा ही दे, पर लिहाज आ गया । बस इतना ही बोल पाया ''लछम दा अब आईन्दा मुझसे इस तरह की बात न करना।'' लछम सिंह ने मजे ले लिये ''क्यों रे भुला। कहीं पण्डिताईन पर दिल ता नहीं आ गया तेरा।'' इस बार दिलबर उठ के चल दिया और लछम सिंह के ठहाके उसका पीछा करने लगे।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Anil Karki shared his photo.
April 26 at 1:09pm ·
भानुराम कुमाउनी की प्रसिद्ध गायिका कबूतरी देवी के गुरु रहे ! भानुराम सुकोटी का निधन 6 जनवरी 2016 को हुआ। वे उन गुमनाम पुरखे गायकों और वादकों में थे जिनकी अपनी एक अलग ठसक थी। भानुराम ने ठाकुर सुखवासी उर्फ बुँलाकी राम को अपना शास्त्रीय संगीत का गुरू माना। गुरुभाई देव राम उर्फ देविया उस्ताद को लोक गायन का। मंच, माईक और अखबारों से दूर रहने वाले भानुराम सुकोटी जी मूलतः तबला वादक थे। सितार और हारमोनियम भी बजाते थे। पिता लालू राम उर्फ राम जी और माता शान्ति देवी के घर उनका जन्म 1938 के सावन महीने में (तारीख वो खुद भी नहीं जानते थे) वड्डा, पिथौरागढ़ के सुकोट में हुआ इसीलिए वे अपने नाम के आगे सुकोटी लगाते थे। पहले पहल भानुराम ने ही यह अपने नाम के आगे सुकोटी लगाया था यह उपनाम ही एक तरह से विद्रोह था भानुराम का पहाड़ी अभिजातीय जातियों के विरूद्ध।
भानुराम ने संगीत के लोक और शास्त्रीय पक्ष को डूब के छुवा, गाने के साथ ही उन्होंने अपने निर्गुण भजनों में गुरु का बखान किया है। उन भजनों में कहीं भी किसी का मुक्तमना स्तुतिबंधन नहीं किया, सवाल ही खड़े किये और आडम्बरों पर चोट भी की हैं।
जवान भानुराम में सन्त कवियों सा वेग यों ही सहज नहीं था उनके भजनों में एक भयानक अन्तरद्वंद्व से उपजता जातीय विसंगतियों के बीच पलते युवा का अवचेेतन स्पष्ट दिखाई देता है। भनुराम का व्यतित्व इन्हीं अन्तविर्रोधों के बीच पला बड़ा और बना, यहीं कारण हैं कि वे घस्यारों, हलियों और ग्वालों का गिदार हैं।
उनकी प्रेम भावना हिंदी के कवि जायसी से मिलती है . अगर पहाड़ का रंगीला चौमास देखना है तो वो अद्भुद चौमास आपका भानुराम जी के यहीं मिलेगा. दूसरी महत्वपूर्ण बात यह पुस्तक जातीय रूप से तलछट जीवन जीने को अभिशप्त उस तपके की पहली संमग्र किताब होगी ..तीसरी बात यह कि इस किताब के बहाने कुमाउनी साहित्य केंद्र से बाहर लोकगीतकारों के साहित्य पर चर्चा की जा सकती है.....आभार आशा है इस किताब को पढ़ते हुए आपको अच्छा लगेगा

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Anil Karki

पहाड़ी फूल भिटौर मेरा पसंदीदा फूल है. अपनी मर्जी से खिलता है इन दिनों खिलने लगा है. इस समय भिटौर केवल फूल नहीं बल्कि एक प्रतीक भी है खाली होते पहाड़ों के एकान्तिक और लावारिश बंसत का (उमेश पुजारी की फोटो के साथ मेरी यह कविता 'लो भिटौर खिल गया बल' आप सब के लिए )
लो भिटौर खिल गया बल
जौं-मसूर के खेतों के बीच
थोड़ा सुफेद
थोड़ा लाल-गुलाबी रंग
थौड़ा पीला
थोड़ा हरापन लिये
थोड़ा शान्त
थोड़ा दहकन
थोड़़ा बसन्त
और भविष्य की उम्मीदों से भरा
थोड़ा डरा डारा
लुटते गौचर
सिमटते खेतों के दायरे में
बंजर करती शिरूघास वाली
सरकारी परिधि में
अकेला छटपटता हुआ
खालीपन के
झुरझुरिया एहसास में सिहरता
बचाता हुआ
हिमाल की ऋतुओं को
लो भिटौर खिला है बल
लो भिटौर खिला है बल
प्यासे खेतों की
बची 'आद' में
देश-परदेश गये
अपने सुवा-पंछीयों की याद में
जाते ह्यून
आते फागुन के बीच कहीं
अनमना सा बसन्त ओढ़े
ईजा की नराई के रंग सा
कुछ-कुछ उदास
बौज्यू की धुँवे सी पीली बूढ़ी आँख के भीतर
कुछ कुछ बनावटी गुस्से सा
भौजी की गात में
मिलन-बिछोह के स्मृतियों सा
अपने में रमे
गालों पर मैल के टाँटर लिये
सुड़कती नाक वाले
बच्चे की आँख सा
परदेसी दाज्यू के
मोबाईल सिग्नलों के बीच
कट कट के आती
आवाज में बसी मायूसी सा
कसक-पीड़
उदासी और हताशाओं के कुहरे के बीच
कुनमुनाते हुए
सीढ़ीदार खेतों के सीने में
हमारे हिमाल पर
लो भिटौर खिला है बल