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पहाड़ की नारी पर कविता : POEM FOR PAHADI WOMEN

Started by Meena Pandey, January 31, 2008, 10:15:10 AM

Meena Pandey

अंगद

तुम पराजित होने देना
पैर से लिपटकर
भोतिक सृष्ठी के उपक्रम!   
पर तुम न पराजित होना
यदि बोझिल परिस्तिथिया
पलायन को करे विवश
तुम मत घबराना
डट जाना
तुम अंगद बन जाना !   

Meena Pandey

सम्पूर्ण की ओर

जग की धुंध से
हजारो कदम दूर ले जायगा
सम्पूर्ण की ओर तुम्हारा एक कदम!
कोई भी वस्तु
जब होती है पूर्ण
सबसे पहले आवरण छोडती है
शायद उसी के भीतर से
जाता है एक मार्ग
सम्पूर्ण की ओर!

पंकज सिंह महर

मीना जी बहुत सुन्दर रचनायें हैं, खासतौर पर "अंगद" शीर्षक की कविता पहाड़ के नौजवानों के लिये निश्चत रुप से प्रेरणादायक है।

हेम पन्त

वाह! वाह! बहुत सुन्दर कविता है...
चंद शब्दों में बडी गहरी बात छुपी है... जैसे गागर में सागर...


Quote from: Meena pandey on May 01, 2008, 05:21:01 PM
ये गर्मिया

ये गर्मिया बोझिल है!
जलते है हाथ, पैर, मन!

हथेली भर पानी से
धोती हूँ उद्विग्न मन
नही मिटती
अकेलेपन की उमस!

बर्फ की सिलिया
सर्द हवा और
भीगी सडको पर 
लोटते तुम!
वो सर्दिया बेशक अच्छी थी !


Risky Pathak

Achhi Kavita hai...

Quote from: Meena pandey on May 01, 2008, 05:26:24 PM
अंगद

तुम पराजित होने देना
पैर से लिपटकर
भोतिक सृष्ठी के उपक्रम!  
पर तुम न पराजित होना
यदि बोझिल परिस्तिथिया
पलायन को करे विवश
तुम मत घबराना
डट जाना
तुम अंगद बन जाना !   



hem

मैंने मीना जी की कवितायें आज पहली बार पढीं |यह गर्व की बात है कि  इतनी प्रतिभावान कवियत्री फॉरम की सदस्य है | मेरी शुभकामनाएं हैं | आशा है भविष्य में भी रचनाएं पढ़ने को मिलेंगी |

Good poems.  Meena jee kya aap sirf pahad kee Naaree per hee kavitaye likhatee hai?  Kuch pahad ke Fauzi bhaiyon per bhee likha hai kya?  if yes pl. post. Thanx
NAMO NARAYAN

Meena Pandey

कारगिल के दिन और रात

दुश्मनों के मनसूबे उखाड़ फैकने की बाते
क्या कारगिल के दिन होंगे क्या कारगिल के राते

शायद धमाको के बीच याद आती हो खिलखिलाहट
चोंका देने वाली होती होगी हर आहाट
कभी अकेले मे तस्वीर किसी अपने की
याद दिलाती होगी उनके नन्हें नन्हें सपनो की
उस वीराने मे शुकुन देती होंगी घर की यादे
क्या कारगिल के दिन होंगे क्या कारगिल की राते !

दुश्मनों के मनसूबे उखाड़ फैकने की बाते
क्या कारगिल के दिन होंगे क्या कारगिल के राते !

कभी प्यार कभी चेहरे से  आग बरसती होगी
कभी बंदूक कभी हाथो मे कलम होती होगी
एक नजर डाली होगी उसने सपनो पर अरमानों पर
आंखे तर हो जाती होंगी लिखते हुए ख़त के उत्तर
लड़ते लड़ते ऐसे ही एक दिन रुक गई होंगी सांसे
क्या कारगिल के दिन होंगे क्या कारगिल की राते !

(ye kavita maine kargil ki ladai ke samay likhi thi. isiliye  kavita mai utne maturity to nahi thi fir bhi feelings ke level per apko shayad pasand aye)

Anubhav / अनुभव उपाध्याय

Great work Meena aap to shuruwaat se bahut badhiya likhti ho.

+1 karma aapko.