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Let Us Know Fact About Our Culture - आएये पता करे अपनी संस्कृति के तथ्य

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, February 08, 2008, 04:02:31 PM

हेम पन्त

पिथौरागढ की बात आयी है तो दो शब्द अपनी तरफ से जोडना चाहता हूँ. मोस्टा देवता का यह मन्दिर चन्डाक नामक जगह पर है, जहां से शहर का विहंगम सीन दिखता है.....

नकुलेश्वर मन्दिर आठगांव शिलिंग क्षेत्र में डाबरी नामक गांव के पास है, जहां बहुत ही सुन्दर धारे (पानी के श्रोत) हैं.


Quote from: M S Mehta on February 22, 2008, 04:55:23 PM


PITHORAGARH.

किंवदन्ती के अनुसार जब कभी भी सूखा पड़े तब मोस्ता देवता को संतुष्ट करने के लिये समुदाय द्वारा धन जमाकर एक यज्ञ का आयोजन करने पर वर्षा अवश्य होती थी। यह कार्य आज भी जारी है। (मोस्ता देवता नेपाल में भगवान शिव का ही नाम है जिनका एक मंदिर पास में ही स्थित है।)
पिथौरागढ़ का संबंध पांडवों से भी है जो अपने 14 वर्ष के वनवास के दौरान इस क्षेत्र में आये थे। पिथौरागढ़ में सबसे छोटे पांडव नकुल को समर्पित एक मंदिर भी है।


पंकज सिंह महर


पिथौरागढ़

पिथौरागढ़ का पुराना नाम सोरघाटी है। सोर शब्द का अर्थ होता है-- सरोबर। यहाँ पर माना जाता है कि पहले इस घाटी में सात सरोवर थे। दिन-प्रतिदिन सरोवरों का पानी सूखता चला गया और यहाँ पर पठारी भूमि का जन्म हुआ। पठारी भूमी होने के कारण इसका नाम पिथौरागढ़ पड़ा। पर अधिकांश लोगों का मानना है कि यहाँ राय पिथौरा की राजधानी थी। उन्हीं के नाम से इस जगह का नाम पिथौरागढ़ पड़ा। राय पिथौरा ने नेपाल से कई बार टक्कर ली थी। यही राजा पृथ्वीशाह के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

पंकज सिंह महर

पिथौरागढ़ के इतिहास का एक अन्य विवादास्पद वर्णन है। एटकिंस के अनुसार, चंद वंश के एक सामंत पीरू गोसाई ने पिथौरागढ़ की स्थापना की। ऐसा लगता है कि चंद वंश के राजा भारती चंद के शासनकाल (वर्ष 1437 से 1450) में उसके पुत्र रत्न चंद ने नेपाल के राजा दोती को परास्त कर सौर घाटी पर कब्जा कर लिया एवं वर्ष 1449 में इसे कुमाऊं या कुर्मांचल में मिला लिया। उसी के शासनकाल में पीरू या पृथ्वी गोसांई ने पिथौरागढ़ नाम से यहां एक किला बनाया। किले के नाम पर ही बाद में इसका नाम पिथौरागढ़ हुआ।

पंकज सिंह महर

कहीं जाने पर यदि पानी का भरा घड़ा मिला तो शगुन माना जाता है और खाली घड़ा मिलने अपशगुन माना जाता है। इसके अलावा छींकने पर भी अपशगुन माना जाता है।

पंकज सिंह महर

कहीं आने-जाने के लिये दिशाओं का बहुत ख्याल रखा जाता है, जिसके लिये निम्न श्लोक भी लिखा जाता है-
उत्तरे बुध भौमे च रवि शुक्रे तु पश्चिमे।
पूर्वे शनि सोमे च दक्षिणे तु वृहस्पति॥

मंगल, बुधवार को उत्तर यात्रा, रविवार व शुक्रवार को पश्चिम न जाना, शनिवार और सोमवार को पूर्व की यात्रा और वृहस्पति को दक्षिण दिशा की यात्रा का निषेध है।

पंकज सिंह महर

इस पर भी बहुत विचार किया जाता है, कि कौन सी तिथि पैठ है और कौन सी अपैठ है, कहीं जाने या किसी भी मांगलिक कार्य करने से पहले पंचांग देखना जरुरी माना जाता है।

सोमवार को कपड़ा खरीदना मना है।

श्राद्धों में नये कपडे़ नहीं बनाये जाते हैं तथा बाल काटने पर भी प्रतिबंध है।

पंकज सिंह महर

उत्तराखण्ड में वार और बिना वार का काफी ध्यान रखा जाता है, सोमवार, बुधवार, शुक्रवार और रविवार को किसी के घर जाने या बधाई आदि देने के लिये शुभ वार माना जाता है, जब कि मंगलवार, गुरुवार और शनिवार, इनके लिये अशुभ माने जाते हैं।
     कोई अपने घर में बिन-वार के दिन बुलाये भी तो कहा जाता है कि "आज वार न्हेतिन"

यदि किसी की मृत्यु हो जाय तो उनके घर में शोक व्यक्त करने के लिये मंगलवार, वृहस्पतिवार और शनिवार को ही जाया जाता है।

पंकज सिंह महर

जिसका जनेऊ संस्कार हो गया हो, उसके लिये त्रिकाल संध्या, प्रातः, मध्याह्न और सायंकाल सन्धया करने का नियम होता है। सन्धया-बधन में सर्वप्रथम आचमन, शिखाबंधन, न्यास, ध्यान, प्राणायाम, मार्जन. अधमर्षण, सूर्यार्धदान, उपस्थान और अंत में गायत्री जप करना होता है।

    अब त्रिकाल सन्धया करने वाले लोग कम हैं लेकिन कुछ लोग प्रातः सन्धया करते हैं।

पंकज सिंह महर

उत्तराखण्ड के कई मंदिरों में बकरे की बलि दी जाती है, बलिदान के समय बकरे को रोली लगाते हैं, उसको पुष्प चढ़ाते हैं और फिर उस पर पानी छिड़का (पनधार- पानी हाथ में लेकर सिर से पूंछ तक) जाता है और यह मंत्र बकरे के कान में पढ़ा जाता है-

             "अश्वं नैव, गजं नैव, सिंहं नैव च नैव च।
          अजा पुत्र बलिं दद्दात, देवो दुर्बल घातकः॥
अर्थात- हे बकरे! तू न हाथी है, न घोड़ा, न शेर, तू सिर्फ बकरे का बच्चा है, मैं तेरी बलि चढा़ता हूं, देवता दुर्बल का नाश करते हैं।

      पानी के छींटों से जब बकरा अपने को हिलाता है (बरक जाता है) तो माना जाता है कि देवता ने बलि को स्वीकार कर लिया है। तब खुखरी से या अन्य अस्त्र से उसकी गर्दन को काटा जाता है और उसकी पूंछ काटकर उसके मुंह में डाला जाता है।

हेम पन्त

बलि में काटे गये बकरे का पूंछ की तरफ का हिस्सा काटने वाले को और सिर का हिस्सा पूजा करने वाले पण्डित को दिया जाता है. शेष धड का भाग पूजा वाली जगह पर ही पका कर पूजा में शामिल लोगों के बीच प्रसाद की तरह खाया जाता है.

बकरे की जली हुयी खाल भी 'पंचोल' (तेल व मसाले में मिला कर) बनाकर प्रसाद के रूप में बंटती है.


Quote from: पंकज सिंह महर on May 07, 2008, 01:52:29 PM
उत्तराखण्ड के कई मंदिरों में बकरे की बलि दी जाती है, बलिदान के समय बकरे को रोली लगाते हैं, उसको पुष्प चढ़ाते हैं और फिर उस पर पानी छिड़का (पनधार- पानी हाथ में लेकर सिर से पूंछ तक) जाता है और यह मंत्र बकरे के कान में पढ़ा जाता है-

             "अश्वं नैव, गजं नैव, सिंहं नैव च नैव च।
          अजा पुत्र बलिं दद्दात, देवो दुर्बल घातकः॥
अर्थात- हे बकरे! तू न हाथी है, न घोड़ा, न शेर, तू सिर्फ बकरे का बच्चा है, मैं तेरी बलि चढा़ता हूं, देवता दुर्बल का नाश करते हैं।

      पानी के छींटों से जब बकरा अपने को हिलाता है (बरक जाता है) तो माना जाता है कि देवता ने बलि को स्वीकार कर लिया है। तब खुखरी से या अन्य अस्त्र से उसकी गर्दन को काटा जाता है और उसकी पूंछ काटकर उसके मुंह में डाला जाता है।