• Welcome to MeraPahad Community Of Uttarakhand Lovers.
 

चरक संहिता का गढवाली अनुवाद , Garhwali Translation of Charak Samhita

Started by Bhishma Kukreti, January 07, 2021, 04:44:21 PM

Bhishma Kukreti



पित्त विकार लक्छण व उपचार


चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद   
खंड - १  सूत्रस्थानम ,  बीसवां      अध्याय  ( झट्ट से पित्त )   पद  १५  बिटेन १६   तक
  अनुवाद भाग -  १६२
गढ़वाळिम  सर्वाधिक पढ़े  जण  वळ एकमात्र लिख्वार-आचार्य  भीष्म कुकरेती
-
      !!!  म्यार गुरु  श्री व बडाश्री  स्व बलदेव प्रसाद कुकरेती तैं  समर्पित !!!
-
यूं सब बतयां , नि बतयां  पित्त विकार , या वैको   एक भाग क स्वाभाविक रूपन  , करतबों , व पित्तक लक्छण पछ्याणिक कुशल वैद 'पित्त इ च' निश्चय करदन।  जन गरमी , तीक्ष्णता , लघुता , चिकासक अधिकता नि  हूण , सफेद -लाल -काळ रंग छोड़ि हौर रंग , सड़ांद , कटु अर खट्टो रस हूण , यी पित्तक लक्छण छन।  निम्न कर्मोन  पित्तक पछ्याणक हूंदी -शारीरक जै जै स्थान म पित्त आश्रय लींद तै तै जगा पर दाह (जलन ), गरमी , पकण , पसीना ,क्लेदता , सड़ांद , खज्जि , स्राव-रागा , अर पित्त सामान गंध , वर्ण  अर रस समान उतपत्ति तै पित्त जाणो। 
ये पित्त तै शान्ति वास्ता मधुर , तिक्त , कषाय ,शीत  यपक्रमों से चिकित्सा हूंदी।  पित्त नाशक स्नेह विरेचन , प्रदेह , स्नान , मर्दन आदि क मात्रा समय देखि करण चयेंद।  वैद्य लोग पित्त शान्ति कुण विरेचन (मल साफ करण )  तै मुख्य साधन मणदन। यी आमाशय म पौंछि पित्त विकार तै  जड़ नाश करि भैर कौर दींद।  इन अवस्था म पित्त सम्पूर्ण शांत नि भि ह्वावो शरीर से पित्त रोग इन शांत ह्वे जांद जन भट्टी से आग निकाळण पर भट्टी ठंडी ह्वे जांद।  १५ - १६। 

-
*संवैधानिक चेतावनी : चरक संहिता पौढ़ी  थैला छाप वैद्य नि बणिन , अधिकृत वैद्य कु परामर्श अवश्य
संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस ,पृष्ठ  २४३   बिटेन २४४    तक
सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल ) 2021
शेष अग्वाड़ी  फाड़ीम

चरक संहिता कु  एकमात्र  विश्वसनीय गढ़वाली अनुवाद; चरक संहिता कु सर्वपर्थम गढ़वाली अनुवाद; ढांगू वळक चरक सहिता  क गढवाली अनुवाद , चरक संहिता म   रोग निदान , आयुर्वेदम   रोग निदान  , चरक संहिता क्वाथ निर्माण गढवाली  , चरक संहिता का प्रमाणिक गढ़वाली अनुवाद , हिमालयी लेखक द्वारा चरक संहिता अनुवाद , जसपुर (द्वारीखाल ) वाले का चरक संहिता अनुवाद

Bhishma Kukreti



२० कफ जन्य रोग

चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद   
खंड - १  सूत्रस्थानम ,  बीसवां      अध्याय  (  महारोगाध्याय  )   पद  १७ 
  अनुवाद भाग -  १६३
गढ़वाळिम  सर्वाधिक पढ़े  जण  वळ एकमात्र लिख्वार-आचार्य  भीष्म कुकरेती
-
      !!!  म्यार गुरु  श्री व बडाश्री  स्व बलदेव प्रसाद कुकरेती तैं  समर्पित !!!
-
कफजन्य रोग बीस ( २० छन ) , ऊं तै बतौंदा - भोजन नि करण पर बि तृप्ति अनुभव , तंद्रा , निंदक बिंडी आण , शरीर तै गिल्लो चिताण ,  सरैलम भारीपन  , अळगस आण ,मुकै  मिठास , मुक बिटेन लाळ चूण ,
कफ वमन , शरीर से मल अधिक बगण , कफक क्षय , जिकुड़ी भरीं भरीं , कंठ भर्युं भर्युं , धमनियों म अवरोध , गळगंड , अतिस्थूल , मंदाग्नि , उदर्द , श्वेत रंग की प्रतीति , मल , मूत्र अर नेत्रों म सफेदी , यी बीस कफजन्य रोग छन।  कफजन्य रोग असंख्य छन िखम प्रधान २० की गणत करे गे।  १७। 
-
*संवैधानिक चेतावनी : चरक संहिता पौढ़ी  थैला छाप वैद्य नि बणिन , अधिकृत वैद्य कु परामर्श अवश्य
संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस ,पृष्ठ   २४४   
सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल ) 2021
शेष अग्वाड़ी  फाड़ीम

चरक संहिता कु  एकमात्र  विश्वसनीय गढ़वाली अनुवाद; चरक संहिता कु सर्वपर्थम गढ़वाली अनुवाद; ढांगू वळक चरक सहिता  क गढवाली अनुवाद , चरक संहिता म   रोग निदान , आयुर्वेदम   रोग निदान  , चरक संहिता क्वाथ निर्माण गढवाली  , चरक संहिता का प्रमाणिक गढ़वाली अनुवाद , हिमालयी लेखक द्वारा चरक संहिता अनुवाद , जसपुर (द्वारीखाल ) वाले का चरक संहिता अनुवाद

Bhishma Kukreti


कफ विकार : पहचान व निदान

कफ रोग पछ्याणक व चिकित्सा

चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद   
खंड - १  सूत्रस्थानम ,  बीसवां      अध्याय  (  महारोगाध्याय  )   पद   १८ बिटेन   तक
  अनुवाद भाग -  १६४
गढ़वाळिम  सर्वाधिक पढ़े  जण  वळ एकमात्र लिख्वार-आचार्य  भीष्म कुकरेती
-
      !!!  म्यार गुरु  श्री व बडाश्री  स्व बलदेव प्रसाद कुकरेती तैं  समर्पित !!!
-
यूं सब कफक विकार जु बुले गेन  या नि बुले गेन विकारों म सब या  भाग  , कफक स्वाभवाविक रूपन  , कार्योन , लक्छणोंन कुशल वैद  पछ्याणक करी संदेहरहित श्लेष्म विकार ही च को इन निश्चय करदो यथा - चिकास , शीतलता , सफेदी , भारीपन , मधुरता , पिछलता यी सब कफक रूप छन।  निम्न कार्यों कफक  पछ्याणक  हूंद -
शरीर क अवयवों म भितर छीरी (प्रवेश ) कफ सफेदी , शीतलता , खाज , जड़ता , भारपन , निष्क्रियता , खिन्नता , चिकनापन , अवरोध , मधुरता , देर म कार्य करण यी सब कफक कार्य छन।  यूं से कफ तै जणन चयेंद . ये कफ तैं शांत करणो कुण कटु ,तिक्त   , कसाय , तीखो , गरम अर रूखो उपक्रमन चिकत्सा करण  चयेंद।  मात्रा , समय  अनुसार स्वेद , वमन  , व्यायाम आदि श्लेषनाशक तत्वों प्रयोग करण चयेंद।  कफ तै शांत करणों कुण  वैद  वमन तै सबसे भलो उपक्रम मणदन।  वमन जल्दी से आमाशय म पौंची श्लेष्म तै जड़ से भैर कर दीन्द।  ये कफक पूर्ण शांत नि हूण पर बि शरीर क भितर अन्य कफ शांत ह्वे जांदन।  जन धान , जाऊ क खेत पाणी से भर्यां हूंदन अर जनि मींड टुटद तनि पुंगड़ सूको ह्वे जांद उनि कफक निकळण से कफ रोग खतम ह्वे जांद।  १८ - १९।
सबसे पैल रोगै परिक्षा करण  चैन्द,  फिर औषध की परीक्षा यांक पैंथर वैद चिकित्सा कारो।  जु  वैद बिन रॉक निश्चय करी चिकित्सा शुरू कर दींद भले इ वु औषध विज्ञान म प्रवीण ह्वावो , तब बि विकि सफलता निश्चित नी।  जु वैद  रोग की जानकारी लींद , औषध बि जणद दगड़म क्षेत्र , प्रकृति , मात्रा अर समय बि पछ्यणद वैक चिकित्सा सफल होली हि।  २० -२२।
रोगुं संक्छिप्त संख्या , युंकी जगा , साक्छात व प्रेरक कारण , आसन्देह , अनुबंधन , दोषुं स्थान , नाना प्रकार की रोग गणना , दोषुं अलग अलग रूप , स्वाभाविक कर्म , दोषुं पृथक पृथक शान्ति उपाय , यी सब महारोग अध्याय म भगवन पुनर्वसुन बोल यालिन।  २३ - २४।

अब बीसवां अध्याय समाप्त।  =======================



-
*संवैधानिक चेतावनी : चरक संहिता पौढ़ी  थैला छाप वैद्य नि बणिन , अधिकृत वैद्य कु परामर्श अवश्य
संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस ,पृष्ठ   २४४  बिटेन    तक
सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल ) 2021
शेष अग्वाड़ी  फाड़ीम

चरक संहिता कु  एकमात्र  विश्वसनीय गढ़वाली अनुवाद; चरक संहिता कु सर्वपर्थम गढ़वाली अनुवाद; ढांगू वळक चरक सहिता  क गढवाली अनुवाद , चरक संहिता म   रोग निदान , आयुर्वेदम   रोग निदान  , चरक संहिता क्वाथ निर्माण गढवाली  , चरक संहिता का प्रमाणिक गढ़वाली अनुवाद , हिमालयी लेखक द्वारा चरक संहिता अनुवाद , जसपुर (द्वारीखाल ) वाले का चरक संहिता अनुवाद , कफकफ विकार : पच्चाण व निदान  का पाठ 

Bhishma Kukreti

निन्दित पुरुष (शरीर से )

चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद   
खंड - १  सूत्रस्थानम ,  इक्कीसवां   अध्याय  (  अष्टौनिंदितीय अध्याय   )   पद  १  बिटेन ३   तक
  अनुवाद भाग -  १६५
गढ़वाळिम  सर्वाधिक पढ़े  जण  वळ एकमात्र लिख्वार-आचार्य  भीष्म कुकरेती
-
      !!!  म्यार गुरु  श्री व बडाश्री  स्व बलदेव प्रसाद कुकरेती तैं  समर्पित !!!
-
एक अगनै 'अष्टौनिंदितीय अध्याय'  की व्याख्या करला जन भगवान आत्रेयन बोली छौ। १ , २।
ये लोकम शरीर संबंधित (मन की बात पृथक ) आठ लोग निन्दित मने जांदन -
अतिदीर्घ ,
अतिह्रस्व
अतिलोमा (बिंडी बाळ वळ )
अलोमा (बिलकुल बाळ हीण )
अतिकृष्ण  (अति काळो )
अतिगौर (अति ग्वारो )
अतिस्थूल (भौत म्वाटो )
अतिकृश ( भौत पतळु ) ३। 
 

-
*संवैधानिक चेतावनी : चरक संहिता पौढ़ी  थैला छाप वैद्य नि बणिन , अधिकृत वैद्य कु परामर्श अवश्य
संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस ,पृष्ठ  २४६   
सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल ) 2021
शेष अग्वाड़ी  फाड़ीम

चरक संहिता कु  एकमात्र  विश्वसनीय गढ़वाली अनुवाद; चरक संहिता कु सर्वपर्थम गढ़वाली अनुवाद; ढांगू वळक चरक सहिता  क गढवाली अनुवाद , चरक संहिता म   रोग निदान , आयुर्वेदम   रोग निदान  , चरक संहिता क्वाथ निर्माण गढवाली  , चरक संहिता का प्रमाणिक गढ़वाली अनुवाद , हिमालयी लेखक द्वारा चरक संहिता अनुवाद , जसपुर (द्वारीखाल ) वाले का चरक संहिता अनुवाद

Bhishma Kukreti

अति स्थूल व्यक्ति लक्षण
अथवा
बिंडी म्वाटो  व्यक्ति  लक्छण

चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद   
खंड - १  सूत्रस्थानम ,  इक्कीसवां   अध्याय  (  अष्टौनिंदितीय अध्याय   )   पद  ४  बिटेन  १०  तक
  अनुवाद भाग -  १६६
गढ़वाळिम  सर्वाधिक पढ़े  जण  वळ एकमात्र लिख्वार-आचार्य  भीष्म कुकरेती
-
      !!!  म्यार गुरु  श्री व बडाश्री  स्व बलदेव प्रसाद कुकरेती तैं  समर्पित !!!
-
यूं आठों व्यक्तियों मदे अतिस्थूल अर अतिकृष सबसे अधिक निंदनीय ( अफु तै नुकसानदायी)   हूंदन। अतिस्थूल व्यक्तिक -
आयु कम हूंदी
बुढ़ापा जल्दी आंद ,
मैथुन म कठिनता ,
दुर्बलता ,
सरैल म दुर्गंध ,
अस्यौ (पसीना ) भौत आंद ,
भूक -बिंडी लगद
तीस बिंडी लगद ,
यी आठ दोष हूंदन। 
या अतिस्थूलता बिंडी भोजन से , गुरु , मधुर , शीत , स्निग्ध पदार्थों सेवन से , व्यायाम नि करण से , मैथुन नि करण से , दिन म सीण से , नित्य बेफिकर रौण से , अति स्थूल ब्वे बाब से।  हूंदन .
अतिस्थूल व्यक्ति क मेद बढ़न से मेद इ बड़द अर अन्य धातु नि बड़दान।  इलै विषम धातु हूण से आयु कम हूंदी।  मेदक सुकुमार शिथिल व भारी हूण  से बुढ़ापा जल्दी आंद , शुक्र कम हूण से , मेद द्वारा शुक्रवाःनियों पर रुक्का से मैथुन म कठिनाई हूंद।  विषम धातुन कमजोरी , मेद दोषन,  मेद स्वभावन , अधिक अस्यौ हूणन दुर्गंध , मेडक श्लेष्मा से मिलण पर , सड़नन , भौत हूण से , भारी हूण से ,परिश्रम सहन  नि कर सकण से पसीना भौत आंद।  अग्नि प्रबल हूण से , कोष्ठ म वायु की अधिकता से भूक तीस बिंडी लगद।  ४। 
मेद क द्वारा स्रोत्रों रुक जाण से ,वायु कोष्ठक आश्रय लेकि  गति करद यां से अग्नि तै तेज करद अर भोजन तै शुष्क कर दींद ।  ये से अग्नि आहार तै शीघ्र जीर्ण (पचै  दीण ) कर दींद ,अर हौर भोजन की इच्छा हूण मिसे जांद। आहार कालक अतिक्रमणन कई रोग पैदा हूंदन। यी अग्नि विशेषकर वायु तै उपद्रव करण वळ हूंदन।  जन आग जंगल जळै दींद तनि अग्नि व वायु स्थूल व्यक्ति तै दुःख पौंछाँद।  मेद वृद्धिन वायु , पित्त , कफ भयानक रोगों तै उतपन्न कौरि जीवन कम करद।  मेदक अति  वृद्धि से व्यक्तिक पूठ , दुदल , पुटुक बढ़ जांदन।  शरीर क आकर  बेडोल व उत्साह कमजोर पोड जांदन।  इन व्यक्ति तै अतिस्थूल बुल्दन।  यी मेदस्वी व्यक्ति क दोष , कारण अर लक्षण बोल ऐन।  एक अगनै अतिक्रिश की चर्चा ह्वेलि।  ५ - १०
-
*संवैधानिक चेतावनी : चरक संहिता पौढ़ी  थैला छाप वैद्य नि बणिन , अधिकृत वैद्य कु परामर्श अवश्य
संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस ,पृष्ठ  २४७   बिटेन २४८    तक
सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल ) 2021
शेष अग्वाड़ी  फाड़ीम

चरक संहिता कु  एकमात्र  विश्वसनीय गढ़वाली अनुवाद; चरक संहिता कु सर्वपर्थम गढ़वाली अनुवाद; ढांगू वळक चरक सहिता  क गढवाली अनुवाद , चरक संहिता म   रोग निदान , आयुर्वेदम   रोग निदान  , चरक संहिता क्वाथ निर्माण गढवाली  , चरक संहिता का प्रमाणिक गढ़वाली अनुवाद , हिमालयी लेखक द्वारा चरक संहिता अनुवाद , जसपुर (द्वारीखाल ) वाले का चरक संहिता अनुवाद

Bhishma Kukreti


अतिकृश (पतळो )  व्यक्ति लक्छण

चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद   
खंड - १  सूत्रस्थानम ,  इक्कीसवां   अध्याय  (  अष्टौनिंदितीय अध्याय   )   पद ११   बिटेन  १७  तक
  अनुवाद भाग -  १६७
गढ़वाळिम  सर्वाधिक पढ़े  जण  वळ एकमात्र लिख्वार-आचार्य  भीष्म कुकरेती
-
      !!!  म्यार गुरु  श्री व बडाश्री  स्व बलदेव प्रसाद कुकरेती तैं  समर्पित !!!
-

रुखो खान -पानन , उपवासन , कम खाण से , स्नेहन , स्वेदन , वमन , विरेचन आदि क्रियाओं अतियोग से उपस्थित मल मूत्र व निंद  वेग रुकण से , स्नेह मर्दन बगैर उबटन  का रोज स्नान से , स्वभावन , बुढ़ापा द्वारा , रोगुं जनित कमजोरी, मिथ्याहार -विहार से , क्रोध करण से व्यक्ति पतळु  ह्वे जांद। 
लक्छण -
परिश्रम , अतिशय भर पेट भोजन , भौत सर्दी -गरमी , मैथुन यूं सब तै पतळ मनिख सहन नि कौर सकद। 
प्लीहा , कास , क्षय , श्वास , गुल्म , अर्श , उदर रोग , अर ग्रहणी रोग शीघ्र चिपटदन। 
नितम्ब , ग्रीवा वउदर सूख जंदन।  शरीर पर धमनियों जाळ दिखेण मिसे जांदन। त्वचा व अस्थियों ढांचा दिखेंद।  ग्रंथियां मोटी मोटि ह्वे जांदन।  इन व्यक्ति तै अतिकृश व्यक्ति बुल्दन।  अति स्थूल व अति कृष व्यक्ति सदा कमजोर रौंदन इलै सदा देखभाल आवश्यक च।  स्थूलता व कृशता म कृशता श्रेष्ठ च।  रोग से स्थूल व्यक्ति ही अधिक तंग हूंद।  यदि स्थूल पुरुष की संतर्पण   करे जाव त स्थूलता बड़द अर अर असंतर्पण कौरे जाव तो वो सहन नि कौर स्कड।  ११ -१७।

-
*संवैधानिक चेतावनी : चरक संहिता पौढ़ी  थैला छाप वैद्य नि बणिन , अधिकृत वैद्य कु परामर्श अवश्य
संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस ,पृष्ठ  २४९   
सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल ) 2021
शेष अग्वाड़ी  फाड़ीम

चरक संहिता कु  एकमात्र  विश्वसनीय गढ़वाली अनुवाद; चरक संहिता कु सर्वपर्थम गढ़वाली अनुवाद; ढांगू वळक चरक सहिता  क गढवाली अनुवाद , चरक संहिता म   रोग निदान , आयुर्वेदम   रोग निदान  , चरक संहिता क्वाथ निर्माण गढवाली  , चरक संहिता का प्रमाणिक गढ़वाली अनुवाद , हिमालयी लेखक द्वारा चरक संहिता अनुवाद , जसपुर (द्वारीखाल ) वाले का चरक संहिता अनुवाद

Bhishma Kukreti

 
मोटापा दूर करणो  उपाय

चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद   
खंड - १  सूत्रस्थानम ,  इक्कीसवां   अध्याय  (  अष्टौनिंदितीय अध्याय   )   १८ पद   २८ बिटेन   तक
  अनुवाद भाग -  १६८
गढ़वाळिम  सर्वाधिक पढ़े  जण  वळ एकमात्र लिख्वार-आचार्य  भीष्म कुकरेती
-
      !!!  म्यार गुरु  श्री व बडाश्री  स्व बलदेव प्रसाद कुकरेती तैं  समर्पित !!!
-
जै वयक्ति मांश पेशियाँ प्रमाण म उन्नत छन , शरीर संघटन ठीक ह्वावो इंडियां बलवती होवन वैपर रोग नि घुस सकद।  जु व्यक्ति भूक , तीस , घाम सहन कर साको जड्डू , व्यायाम तै सहन कौर साको , न कम न बिंडी भोजन पचै साको , जैपर बुढ़ापा समौ पर आवो वु  व्यक्ति उचित शरीर बनावट वळ व्यक्ति च।  १८ - १९।
स्थूल व्यक्तियों तै पतळ करणो कुण भारी अर अतर्पण   क्रिया उचित च।  पतळ  तै म्वाटो होणै कुण लघु व संतर्पण  क्रिया उचित च। 
अति स्थूल चिकित्सा याने पतळ हूणो चिकित्सा -
वातनाशक खान पान , कफ , मेद नाशक खान पान , रूखी व गरम वस्तियां (आंत साफ़ करणो क्रिया ) ; तीखो व रूखो उबटन , गिलोय ,नागर मोठा  त्रिफला , कु क्वाथ ; तक्रारिष्ट सेवन , मधु उपयोग ; वायविड़ंग सोंठ; छार , कान्त , लौह भस्म  शहद दगड़ ;जौ , औंळा उपयोग सही च।  विल्व , अरणी , सोना , पाठ , पाटला , काश्मीरी क क्वाथ म मधु प्रक्षेप करी पीण ; अरणी रस्क दगड़ शिलाजीत क उपयोग ; नीवार धान्य ,प्रियंगु , सांवक , छुद्रजव , जौ , कंगनी , कोदो धान्य , मूंग , कुल्थी , हरड़ की दाल , परवल , औंळा दगड़ खाणो द्यावो।  शाद युक्त पाणि पीण चयेंद। अनुपान (औषधि क ऊपर या संग  खये जाण  वळ ) कुण मेद , मांश , व कफ नाशकारी अरिष्टों तै अति स्थूलता नष्ट करणो  प्रयोग करण चयेंद।  स्थूलता कम करण वळ इच्छाधारी तै रात म बिजण , मैथुन , परिश्रम चिंता नि करण तै क्रम से शनि शनि बढ़ान चयेंद।  २० -२८। 

-
*संवैधानिक चेतावनी : चरक संहिता पौढ़ी  थैला छाप वैद्य नि बणिन , अधिकृत वैद्य कु परामर्श अवश्य
संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस ,पृष्ठ  २४९    बिटेन  २५१   तक
सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल ) 2021
शेष अग्वाड़ी  फाड़ीम

चरक संहिता कु  एकमात्र  विश्वसनीय गढ़वाली अनुवाद; चरक संहिता कु सर्वपर्थम गढ़वाली अनुवाद; ढांगू वळक चरक सहिता  क गढवाली अनुवाद , चरक संहिता म   रोग निदान , आयुर्वेदम   रोग निदान  , चरक संहिता क्वाथ निर्माण गढवाली  , चरक संहिता का प्रमाणिक गढ़वाली अनुवाद , हिमालयी लेखक द्वारा चरक संहिता अनुवाद , जसपुर (द्वारीखाल ) वाले का चरक संहिता अनुवाद

Bhishma Kukreti



अति कृश (अति पतळ )   रोग दूर करणो  उपाय [/color]

चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद   
खंड - १  सूत्रस्थानम ,  इक्कीसवां   अध्याय  (  अष्टौनिंदितीय अध्याय   )   पद २९   बिटेन ३४    तक
  अनुवाद भाग -  १६९
गढ़वाळिम  सर्वाधिक पढ़े  जण  वळ एकमात्र लिख्वार-आचार्य  भीष्म कुकरेती
-
      !!!  म्यार गुरु  श्री व बडाश्री  स्व बलदेव प्रसाद कुकरेती तैं  समर्पित !!!
-
कृश रोग की चिकित्सा -
रात अर दिन म सीण , सदा प्रसन्न रौण , गद्दादार दिसाणम बैठण अर  सीण , मन से अचिंतित , शान्ति, चिंता नि करण , मैथुन नि करण , शर्म नि करण , इच्छित वस्तुओं दर्शन करण ; नयो अन्न  , नयो मद्य ,ग्राम्य व जलचर प्राणियों मांस , दूध , दही , घी , गन्ना , चौंळ ,मांश , ग्यूंक भोजन  , स्निग्ध  वस्ति ; रोज तेल  मर्दन , स्निग्ध   उबटन , सुगंध  युक्त स्नान , सुगंधित  माला धारण करण , सफेद वस्त्र धारण , समय पर वातादि दोष दूर करण , रसायन वा बाजीकरण योग प्रयोग , करी कृश रोग दूर हूंदन , मोटापा आंद , रोज बेफिक्री से , समर्पित  संतर्पण क्रिया से , अधिक सीण  से व्यक्ति सुंगर जन पुष्ट ह्वे जांद। 

-
*संवैधानिक चेतावनी : चरक संहिता पौढ़ी  थैला छाप वैद्य नि बणिन , अधिकृत वैद्य कु परामर्श अवश्य
संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस ,पृष्ठ   २५१  बिटेन    तक
सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल ) 2021
शेष अग्वाड़ी  फाड़ीम

चरक संहिता कु  एकमात्र  विश्वसनीय गढ़वाली अनुवाद; चरक संहिता कु सर्वपर्थम गढ़वाली अनुवाद; ढांगू वळक चरक सहिता  क गढवाली अनुवाद , चरक संहिता म   रोग निदान , आयुर्वेदम   रोग निदान  , चरक संहिता क्वाथ निर्माण गढवाली  , चरक संहिता का प्रमाणिक गढ़वाली अनुवाद , हिमालयी लेखक द्वारा चरक संहिता अनुवाद , जसपुर (द्वारीखाल ) वाले का चरक संहिता अनुवाद

Bhishma Kukreti



नींद का लक्छण व नींद क आवश्यकता   

चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद   
खंड - १  सूत्रस्थानम ,  इक्कीसवां   अध्याय  (  अष्टौनिंदितीय अध्याय   )   पद  ३५  बिटेन   तक
  अनुवाद भाग -  १७०
गढ़वाळिम  सर्वाधिक पढ़े  जण  वळ एकमात्र लिख्वार-आचार्य  भीष्म कुकरेती
-
      !!!  म्यार गुरु  श्री व बडाश्री  स्व बलदेव प्रसाद कुकरेती तैं  समर्पित !!!
-
जब मन से संयुक्त आत्मा निष्क्रिय ह्वे जा , इन्द्रियाँ क्रियां रहित ह्वे जावन तब व्यक्ति से जांद। जु विधिपूर्वक निंद (नींद ) का  सेवन करे जाव त , सुख , शरीरै पुष्टि  , बल , पुरुषत्व ज्ञान , अर जीवन निंदौ अधीन छन।  जु निंदक विधिपूर्वक सेवन करे जाव त दुःख , बलनाश , क्लीवता , अशान व मरण यी निंदक आधीन छन।  इलै सुख चाही  व्यक्ति तैं रातक दुसर  प्रख्य काल  , दिनम या संध्याकाल सीण बंद कर द्यावो।  यी निंदक मिथ्या योग छन।  जु नींद उचित सेवन ह्वावो त व्यक्ति सुख व वायु से इन युक्त हूंद जन सुख योगी तै तत्व ज्ञान प्राप्ति उपरान्त सुख हूंद। 
गीत गाणन कृश व्यक्ति , पढ़न से कृश , मद्यपान करण वळ , स्त्री सेवा करण वळ , विरोचन वमन कर्म म , मार्ग चलण से हुयान कमजोर , अतिसार से हुयान कृश , अजीर्ण रोगी , अजीर्ण रोगी , उरक्षत  रोगी , क्षीण ह्वावो , वृद्ध , बालक , कमजोर स्त्री , तृष्णा रोगी , शूल पीड़ित , श्वास से हुयान कमजोर , चोट लग्यां , मथि बिटेन लमड्यां , धतूरा आदि खाण से उन्मत , थक्यूँ , सवारी से थक्युं , रात म जगण से , क्रोध , सोग (शोक ) , भय से निष्क्रिय व्यक्तियों तैं सीण इ उचित च।  सि दिनम बि से सकदन।  दिन म सीण से यूंक धातु सम हूंदन , बल बड़द , कफ अंगों तै पुष्ट करद , अर वायु स्थिर हूंद। ३५ - ४२। 


-
*संवैधानिक चेतावनी : चरक संहिता पौढ़ी  थैला छाप वैद्य नि बणिन , अधिकृत वैद्य कु परामर्श अवश्य
संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस ,पृष्ठ   २५२  बिटेन  २५३   तक
सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल ) 2021
शेष अग्वाड़ी  फाड़ीम

चरक संहिता कु  एकमात्र  विश्वसनीय गढ़वाली अनुवाद; चरक संहिता कु सर्वपर्थम गढ़वाली अनुवाद; ढांगू वळक चरक सहिता  क गढवाली अनुवाद , चरक संहिता म   रोग निदान , आयुर्वेदम   रोग निदान  , चरक संहिता क्वाथ निर्माण गढवाली  , चरक संहिता का प्रमाणिक गढ़वाली अनुवाद , हिमालयी लेखक द्वारा चरक संहिता अनुवाद , जसपुर (द्वारीखाल ) वाले का चरक संहिता अनुवाद , आधुनिक गढ़वाली गद्य उदाहरण

Bhishma Kukreti


प्रमेह , स्थूलता   आदि निवारण उपाय

चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद   
खंड - १  सूत्रस्थानम , 23rd ,  त्याइसवौं   अध्याय  (  संतर्पणीय   अध्याय   )   पद  १२   बिटेन   २५ तक
  अनुवाद भाग -  १८२
गढ़वाळिम  सर्वाधिक पढ़े  जण  वळ एकमात्र लिख्वार-आचार्य  भीष्म कुकरेती
-
      !!!  म्यार गुरु  श्री व बडाश्री  स्व बलदेव प्रसाद कुकरेती तैं  समर्पित !!!
-
नागरमोथा, अमलतास,पाढ़ल , त्रिफला, गोखरू , खैरक बक्कल, नीमौ बक्कल, हल्दी, किनग्वड़, कूड़ा बक्कल, यूं औषधियों क्वाथ दोषानुसार सुबेर सुबेर रोज पीण से संतर्पणीय जन्य  रोग  दूर ह्वे जांदन। स्नेह साधन द्वारा त्वचा रोग निबट जांदन।  कूठ , गोमदाक मणि , हींग , क्रौंच पंछी क अस्थि , सोंठ , काली मर्च , पिपली , बच, वासा, इलायची , गोखरू , जवाण, पाषाणमेद, यूं सब तै छाच ,दही मंड , या खट्टा बैरक रसक दगड़ पीण से मूत्रकृच्छ, रोग मिटदन।  छांच अर हरड़  दगड़ या छांछ -त्रिफला प्रयोग से , प्रमेह म बतायां अरिष्टों उपयोगन प्रमेह आदि व्याधि समाप्त हूंदन।  सोंठ , काळी मर्च , पिप्पली , त्रिफला, मधु, वायविडिंग, जवाण , पाणिम घिस्युं अगर , घी  अर सत्तू , यूंक मंथ बणैक पेकि प्रमेह रोग खत्म हूंद।  सोंठ , काळी मर्च , पिपली , वायविडिंग , शोभांजन , त्रिफला , कुटकी , छुटि कटेरी,, बड़ी कटेरी , जवाण, हल्दी, किनग्वड़, पाढ़ल, अतीस, धणिया, चीतामूल , सुवर्चल, जीरो, हाऊबेर, यूंक चूरण लीण चयेंद।  अब चूरणक बरोबर घी , शहद , तेल सब बराबर मात्राम मिलाइ लीण चयेंद। एमा जौक सत्तू सोलहवां भाग मिलाइक खाण चयेंद। ये प्रकार से संतर्पण जन्य रोग मिटदन। प्रमेह, मूढ़वाल , कुष्ट, अर्श , कामला, प्लीहा , पांडुरोग , शोक, मूत्रकृछ, अरुचि , हृदय रोग, राज्यक्षमा,कास, श्वास, गौळौ अवरोध, कृमि ग्रहणी रोग ,श्वित्र रोग, , अतिस्थूल रोग मिटदन, जठराग्नि बड़द, अर स्मृति व बुद्धि बढ़द।  नित्य व्यायाम करण वळ , पैलौ  खाणक पचणो बाद ही खाणा खाण वळ , ग्यूं -जौ क भोजन करण वळ व्यक्ति संतर्पण रोगुं से मुक्त हूंद अर स्थूलता समाप्त हूंद ।१२- २५।   

-
*संवैधानिक चेतावनी : चरक संहिता पौढ़ी  थैला छाप वैद्य नि बणिन , अधिकृत वैद्य कु परामर्श अवश्य
संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस ,पृष्ठ   २६४
सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल ) 2021
शेष अग्वाड़ी  फाड़ीम

चरक संहिता कु  एकमात्र  विश्वसनीय गढ़वाली अनुवाद; चरक संहिता कु सर्वपर्थम गढ़वाली अनुवाद; ढांगू वळक चरक सहिता  क गढवाली अनुवाद , चरक संहिता म   रोग निदान , आयुर्वेदम   रोग निदान  , चरक संहिता क्वाथ निर्माण गढवाली  , चरक संहिता का प्रमाणिक गढ़वाली अनुवाद , हिमालयी लेखक द्वारा चरक संहिता अनुवाद , जसपुर (द्वारीखाल ) वाले का चरक संहिता अनुवाद , आधुनिक गढ़वाली गद्य उदाहरण, गढ़वाली में अनुदित साहित्य लक्षण व चरित्र उदाहरण   , गढ़वाली गद्य का चरित्र , लक्षण , गढ़वाली गद्य में हिंदी , उर्दू , विदेशी शब्द