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चरक संहिता का गढवाली अनुवाद , Garhwali Translation of Charak Samhita

Started by Bhishma Kukreti, January 07, 2021, 04:44:21 PM

Bhishma Kukreti

लवण रस गुण व लक्षण
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चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद   
खंड - १  सूत्रस्थानम , 26  th,  छब्बीसवां  अध्याय   (  भद्र काप्यीय  अध्याय   )   पद ४० (३ )   बिटेन   तक
  अनुवाद भाग -  २९८
गढ़वाळिम  सर्वाधिक पढ़े  जण  वळ एकमात्र लिख्वार-आचार्य  भीष्म कुकरेती
s = आधी अ
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      !!!  म्यार गुरु  श्री व बडाश्री  स्व बलदेव प्रसाद कुकरेती तैं  समर्पित !!!
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लवण रस पाचक, नरम बणान वळ, अग्निदोषक, तौळ लाण वळ , छेदन -भेदन करण वळ , तीक्ष्ण , मल लाण वळ , क्लेद/पीप  भेदन करंदेर , अधकपाळी रेचक करंदेर , वातनाशक, मल मूत्र  अवरोध नाशी, जखम जरा सि  बिंडी ह्वे जावो दुसर रस स्पष्ट नि हूंद।  थूक उतपन्न करद , कफ पिगळांद, मार्गों सोधन करद , सरैलक सब अवयवों तै कोमल करद , आहार म रूचि पैदा करद , आहार म सदा प्रयोग हूंद , भौत भारी नि हूंद , स्निग्ध अर उष्ण गुण वळ हूंद।
यु रस अधिक मात्रा म प्रयोग ह्वावो त पित्त कुपित ह्वे जांद, रक्त बढ़ जांद , तीस लगद ,संज्ञा नाश करद ,सरैल गरम करद , फड़द च , मांस गळांद ,कुष्ठों (मांश ढेला ) तै द्रवित करद, विष वर्धक च ,सूजन फड़द ,दांत गिरान्द , पुरुषत्व नास करद , इन्द्रियों जड़ करद   ।  झुर्री पैदा करद , बाळ सफेद करद , गंजा करद. यांक अतिरिक्त रक्त पित्त , अम्ल पित्त , विसर्प , वातरक्त , विचर्चिका , इन्द्रलुप्त आदि रोग पैदा हूंदन। ४० (३ ) I 

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*संवैधानिक चेतावनी : चरक संहिता पौढ़ी  थैला छाप वैद्य नि बणिन , अधिकृत वैद्य कु परामर्श अवश्य
संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस ,पृष्ठ   
सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल ) 2021
शेष अग्वाड़ी  फाड़ीम

चरक संहिता कु  एकमात्र  विश्वसनीय गढ़वाली अनुवाद; चरक संहिता कु सर्वपर्थम गढ़वाली अनुवाद; ढांगू वळक चरक सहिता  क गढवाली अनुवाद , चरक संहिता म   रोग निदान , आयुर्वेदम   रोग निदान  , चरक संहिता क्वाथ निर्माण गढवाली  , चरक संहिता का प्रमाणिक गढ़वाली अनुवाद , हिमालयी लेखक द्वारा चरक संहिता अनुवाद , जसपुर (द्वारीखाल ) वाले का चरक संहिता अनुवाद , आधुनिक गढ़वाली गद्य उदाहरण, गढ़वाली में अनुदित साहित्य लक्षण व चरित्र उदाहरण   , गढ़वाली गद्य का चरित्र , लक्षण , गढ़वाली गद्य में हिंदी , उर्दू , विदेशी शब्द, गढ़वाली गद्य परम्परा में अनुवाद , सरल भाषा में आयुर्वेद समझाना


Bhishma Kukreti

कटु रस गुण व लक्षण
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चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद   
खंड - १  सूत्रस्थानम , 26  th,  छब्बीसवां  अध्याय   (  भद्र काप्यीय  अध्याय   )   पद  ४० (४ )
  अनुवाद भाग -  २९९
गढ़वाळिम  सर्वाधिक पढ़े  जण  वळ एकमात्र लिख्वार-आचार्य  भीष्म कुकरेती
s = आधी अ
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      !!!  म्यार गुरु  श्री व बडाश्री  स्व बलदेव प्रसाद कुकरेती तैं  समर्पित !!!
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कटु रस मुख शोधन करद , अग्नि बढ़ांद , खायुं भोजन सुकान्द , नाक बिटेन कफ बगांद, आंख्युं म आंसू लांद ,इन्द्रिय उत्तेजित करद ,अलसक , सूजन , उदर्द , स्नेह ,पसीना , क्वेद ,मल नाश करद।  कृमियों मारद , मांश की स्थूलता कम करद. खायुं भोजनक रेचन करद , खज्जि मिटांद , व्रण बिठांद , भरद च. जम्युं रक्त तै तुड़द , संधि बंधनों तै छेदन करद ,मार्ग साफ़ करद , कफ शांत करद।  रुक्ष , उष्ण व लघु हूंद।
यु रस अधिक मात्राम सेवन ह्वावो तो कटु पुरुषत्व नाश करद।  रस अर वीर्य प्रभाव से संज्ञानाश करद।  ग्लानि उतपन्न करद।  अवतल करद , निर्बल करद , मूर्छित करद , सरैल सुकान्द , अन्धकार लांद , चक्कर लांद , गौळम जलन , ताप ज्वर करद , बल कम करद , तीस उतपन्न करद. वायु अग्नि गुण की अधिकता से चक्कर , मुख हूंठ , म जलन , कंपकंपी , चुभन की दर्द , मेदन जन पीड़ा , खुट -हाथ , पार्श्व , पसली म , पीठम वात विकार ह्वे जांद। ४० (४ ) ।  .


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*संवैधानिक चेतावनी : चरक संहिता पौढ़ी  थैला छाप वैद्य नि बणिन , अधिकृत वैद्य कु परामर्श अवश्य
संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस ,पृष्ठ   ३०६ -३०७
सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल ) 2021
शेष अग्वाड़ी  फाड़ीम

चरक संहिता कु  एकमात्र  विश्वसनीय गढ़वाली अनुवाद; चरक संहिता कु सर्वपर्थम गढ़वाली अनुवाद; ढांगू वळक चरक सहिता  क गढवाली अनुवाद , चरक संहिता म   रोग निदान , आयुर्वेदम   रोग निदान  , चरक संहिता क्वाथ निर्माण गढवाली  , चरक संहिता का प्रमाणिक गढ़वाली अनुवाद , हिमालयी लेखक द्वारा चरक संहिता अनुवाद , जसपुर (द्वारीखाल ) वाले का चरक संहिता अनुवाद , आधुनिक गढ़वाली गद्य उदाहरण, गढ़वाली में अनुदित साहित्य लक्षण व चरित्र उदाहरण   , गढ़वाली गद्य का चरित्र , लक्षण , गढ़वाली गद्य में हिंदी , उर्दू , विदेशी शब्द, गढ़वाली गद्य परम्परा में अनुवाद , सरल भाषा में आयुर्वेद समझाना


Bhishma Kukreti


तिक्त (तीखा ) रस लक्षण व गुण
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चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद   
खंड - १  सूत्रस्थानम , 26  th,  छब्बीसवां  अध्याय   (  भद्र काप्यीय  अध्याय   )   पद ४० (५) 
  अनुवाद भाग -  ३००
गढ़वाळिम  सर्वाधिक पढ़े  जण  वळ एकमात्र लिख्वार-आचार्य  भीष्म कुकरेती
s = आधी अ
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      !!!  म्यार गुरु  श्री व बडाश्री  स्व बलदेव प्रसाद कुकरेती तैं  समर्पित !!!
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तिक्त(तीखा , मरचण्या ) रस अपण आप म अरूचिकारक हूंद किन्तु दुसर  भोजन म रूचि उतपन्न करद।  इलै आरोचकनाशी च।  विषनाशक , कृमिनाशक , मूर्छा , जलन , खज्जी , कोढ़ अर तीस शांत करंदेर च।  त्वचा मांस तै स्थिर करण वळ च।  ज्वर नाशक व अग्नि दीपक च. पाचक , दूध शोधक , लेखन करण वळ , क्वेद , मेद , वसा , मजा , लसीका , पूय , स्वेद , मूत ,मल , पित्त , कफ सुकान्द , रूखो , शीत व लघु हूंद । 
तिक्त रस अधिक प्रयोग से रुक्ष , कर्कश , विशद स्वभाव हूण से रस , रक्त , मांस ,मेद , अस्थि, मज्जा , शुक्र क शोषण करद।  स्रोततों म खरता उतपन्न करद , बल प्रदान करद , मोटापा कम करद , हर्ष क क्षय करद, संज्ञा नाश करद ,चक्कर लांद , मुख सूक जान्द , अन्य वात  रोगुं  तै जन्म दीन्द। ४० (५ ) । 


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*संवैधानिक चेतावनी : चरक संहिता पौढ़ी  थैला छाप वैद्य नि बणिन , अधिकृत वैद्य कु परामर्श अवश्य
संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस ,पृष्ठ   ३०७
सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल ) 2021
शेष अग्वाड़ी  फाड़ीम

चरक संहिता कु  एकमात्र  विश्वसनीय गढ़वाली अनुवाद; चरक संहिता कु सर्वपर्थम गढ़वाली अनुवाद; ढांगू वळक चरक सहिता  क गढवाली अनुवाद , चरक संहिता म   रोग निदान , आयुर्वेदम   रोग निदान  , चरक संहिता क्वाथ निर्माण गढवाली  , चरक संहिता का प्रमाणिक गढ़वाली अनुवाद , हिमालयी लेखक द्वारा चरक संहिता अनुवाद , जसपुर (द्वारीखाल ) वाले का चरक संहिता अनुवाद , आधुनिक गढ़वाली गद्य उदाहरण, गढ़वाली में अनुदित साहित्य लक्षण व चरित्र उदाहरण   , गढ़वाली गद्य का चरित्र , लक्षण , गढ़वाली गद्य में हिंदी , उर्दू , विदेशी शब्द, गढ़वाली गद्य परम्परा में अनुवाद , सरल भाषा में आयुर्वेद समझाना


Bhishma Kukreti

कषाय रस लक्षण व गुण
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चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद   
खंड - १  सूत्रस्थानम , 26  th,  छब्बीसवां  अध्याय   (  भद्र काप्यीय  अध्याय   )   पद  ४० (6 ) 
  अनुवाद भाग -  ३०१
गढ़वाळिम  सर्वाधिक पढ़े  जण  वळ एकमात्र लिख्वार-आचार्य  भीष्म कुकरेती
s = आधी अ
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      !!!  म्यार गुरु  श्री व बडाश्री  स्व बलदेव प्रसाद कुकरेती तैं  समर्पित !!!
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कषाय रस (कसैला ) संशमन करण वळ , संग्राहक , संधारक , व्रण/फोड़ा  क पीड़न करण वळ , व्रण तै सुकाण वळ , स्तंबन , कफ , रक्त , पित्तनाशक , शरीरम क्लेद चूसण वळ , रुखो , शीत अर गुरु च।  जु यू  रस बिंडी सेवन ह्वावो त मुख सुकै दींद , हृदय पीड़ित कर दीन्द , उदर म वायु फुलाव पैदा कर दींदो , वाणी जड़ कर दीन्द , स्रोतों तै बंद कर दीन्द , कृष्णता लायी दीन्द , पुरुषत्व नष्ट करद , अन्न अवरोध कोरी पचन करांद , वात्त , मूत , मल , शुक्र बंद कर दींद , रोक दीन्द , शरीर तै कृष्ण कर दीन्द , म्लान करद , तीस लगांद , जकड़न पैदा करद।  खर , विशद, रुखो  हूण से पक्षवध , हनुग्रह , मान्यग्रह , पृष्ठग्रह , अप्तानक , अर्दित आदि वात रोग ह्वे जांदन।  ४० (६ ) । 


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*संवैधानिक चेतावनी : चरक संहिता पौढ़ी  थैला छाप वैद्य नि बणिन , अधिकृत वैद्य कु परामर्श अवश्य
संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस ,पृष्ठ   ३०८
सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल ) 2021
शेष अग्वाड़ी  फाड़ीम

चरक संहिता कु  एकमात्र  विश्वसनीय गढ़वाली अनुवाद; चरक संहिता कु सर्वपर्थम गढ़वाली अनुवाद; ढांगू वळक चरक सहिता  क गढवाली अनुवाद , चरक संहिता म   रोग निदान , आयुर्वेदम   रोग निदान  , चरक संहिता क्वाथ निर्माण गढवाली  , चरक संहिता का प्रमाणिक गढ़वाली अनुवाद , हिमालयी लेखक द्वारा चरक संहिता अनुवाद , जसपुर (द्वारीखाल ) वाले का चरक संहिता अनुवाद , आधुनिक गढ़वाली गद्य उदाहरण, गढ़वाली में अनुदित साहित्य लक्षण व चरित्र उदाहरण   , गढ़वाली गद्य का चरित्र , लक्षण , गढ़वाली गद्य में हिंदी , उर्दू , विदेशी शब्द, गढ़वाली गद्य परम्परा में अनुवाद , सरल भाषा में आयुर्वेद समझाना


Bhishma Kukreti


रस , वीर्य , उप वीर्य अर विपाक म रस भेद

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चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद   
खंड - १  सूत्रस्थानम , 26  th,  छब्बीसवां  अध्याय   (  भद्र काप्यीय  अध्याय   )   पद  ४१  बिटेन  ४४  तक
  अनुवाद भाग -  ३०२
गढ़वाळिम  सर्वाधिक पढ़े  जण  वळ एकमात्र लिख्वार-आचार्य  भीष्म कुकरेती
s = आधी अ
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      !!!  म्यार गुरु  श्री व बडाश्री  स्व बलदेव प्रसाद कुकरेती तैं  समर्पित !!!
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ये प्रकारन यी छह रस पृथक पृथक या द्वी या तीन या परस्पर मिलिक सही मात्राम सेवन से सब प्राणी मात्र तै आरोग्य पुष्टि देकि उपकार करदन।  इलै बुद्धिमान व्यक्ति तै यूं तैं सम्यक प्रकारम सेवन करण चयेंद।  ४१। 
रसानुसारी द्रव्यों का वीर्य - जु  द्रव्य रस अर विपाकम मधुर ह्वावो वै तै शीतवीर्य समजण चयेंद, जु द्रव्य रस अर पाकम अम्ल ह्वावो  वै तै उप वीर्य समजण चयेंद , जु द्रव्य रस अर पाक म कटु  ह्वावो वो भि उप वीर्य च । जु  द्रव्य रस अर विपाकम विरोधी नि ह्वावन इकजनि होवन ऊंक गुणो जांच रस से इ करण चयेंद।  पर अपवाद बि च. जखम रस समान ह्वावन तखम विपाक से गुणुं ज्ञान हूंद।  जनकि दूध अर घी मधुर रस  अर मधुर विपाक छन अर यूंको वीर्य बि शीत च।  इनि चव्य अर चित्रक रस अर विपाक म कटु छन इलै यूंको वीर्य उष्ण हूंद।  इनि  वैद्य अन्य रसों तै बि दिशा निर्देश से समज जांद।  किलैकि रसानुसार गुण छन।  ४२-४४। 


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*संवैधानिक चेतावनी : चरक संहिता पौढ़ी  थैला छाप वैद्य नि बणिन , अधिकृत वैद्य कु परामर्श अवश्य
संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस ,पृष्ठ  ३०८-  ३०९
सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल ) 2021
शेष अग्वाड़ी  फाड़ीम

चरक संहिता कु  एकमात्र  विश्वसनीय गढ़वाली अनुवाद; चरक संहिता कु सर्वपर्थम गढ़वाली अनुवाद; ढांगू वळक चरक सहिता  क गढवाली अनुवाद , चरक संहिता म   रोग निदान , आयुर्वेदम   रोग निदान  , चरक संहिता क्वाथ निर्माण गढवाली  , चरक संहिता का प्रमाणिक गढ़वाली अनुवाद , हिमालयी लेखक द्वारा चरक संहिता अनुवाद , जसपुर (द्वारीखाल ) वाले का चरक संहिता अनुवाद , आधुनिक गढ़वाली गद्य उदाहरण, गढ़वाली में अनुदित साहित्य लक्षण व चरित्र उदाहरण   , गढ़वाली गद्य का चरित्र , लक्षण , गढ़वाली गद्य में हिंदी , उर्दू , विदेशी शब्द, गढ़वाली गद्य परम्परा में अनुवाद , सरल भाषा में आयुर्वेद समझाना


Bhishma Kukreti

रस अर  द्रव्य द्रव्य म गुण  भेद
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चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद   
खंड - १  सूत्रस्थानम , 26  th,  छब्बीसवां  अध्याय   (  भद्र काप्यीय  अध्याय   )   पद  ४५  बिटेन   तक
  अनुवाद भाग -  ३०३
गढ़वाळिम  सर्वाधिक पढ़े  जण  वळ एकमात्र लिख्वार-आचार्य  भीष्म कुकरेती
s = आधी अ
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      !!!  म्यार गुरु  श्री व बडाश्री  स्व बलदेव प्रसाद कुकरेती तैं  समर्पित !!!
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कबि कबि मधुर ,    कषाय  , तिक्त रस बि उष्णवीर्य ह्वे जांदन।  जनकि  बिल्वादि महापंचमूल तिक्त अर कषाय  हूण पर बि उष्ण वीर्य हूंद अर जलचर पशुओं मांस मधुर हूण पर उष्णवीर्य हूंदन। सैंधव लूण  उष्ण वीर्य ना अर  औंळा खट्टो हूण पर बि  उष्ण वीर्य नी।  आकड़ा , अगरु , गिलोय टिकट रस हूण पर बि 'उष्ण वीर्य' छन।  अम्ल रस म क्वी द्रव्य नमक अर  क्वी रेचक छन।  जनकि कैथ अम्ल हूण पर संग्राही अर रेचक च।  पिप्पली अर सोठ कटु हूण पर बि परिकवर्द्धक हूंद किलैकि विपाक मधुर च।  अर उन कटु रस अदृश्य हूंद।  कषाय स्तम्भनकारक व शीतवीर्य हूंद।  पर हरड़  क कषाय रस रेचक अर  उष्ण वीर्य हूंद।  इलै रस देखि सब द्रव्यों रस नि समजण  चयेंद।  रस्क समानता हूण पर द्रव्य द्रव्य म गुणभेद हूंदन।  ४५-४९। 


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*संवैधानिक चेतावनी : चरक संहिता पौढ़ी  थैला छाप वैद्य नि बणिन , अधिकृत वैद्य कु परामर्श अवश्य
संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस ,पृष्ठ   ३०९-३१०
सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल ) 2021
शेष अग्वाड़ी  फाड़ीम

चरक संहिता कु  एकमात्र  विश्वसनीय गढ़वाली अनुवाद; चरक संहिता कु सर्वपर्थम गढ़वाली अनुवाद; ढांगू वळक चरक सहिता  क गढवाली अनुवाद , चरक संहिता म   रोग निदान , आयुर्वेदम   रोग निदान  , चरक संहिता क्वाथ निर्माण गढवाली  , चरक संहिता का प्रमाणिक गढ़वाली अनुवाद , हिमालयी लेखक द्वारा चरक संहिता अनुवाद , जसपुर (द्वारीखाल ) वाले का चरक संहिता अनुवाद , आधुनिक गढ़वाली गद्य उदाहरण, गढ़वाली में अनुदित साहित्य लक्षण व चरित्र उदाहरण   , गढ़वाली गद्य का चरित्र , लक्षण , गढ़वाली गद्य में हिंदी , उर्दू , विदेशी शब्द, गढ़वाली गद्य परम्परा में अनुवाद , सरल भाषा में आयुर्वेद समझाना


Bhishma Kukreti


रसों का  उच्चतम , उच्च , अवर गुण
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चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद   
खंड - १  सूत्रस्थानम , 26  th,  छब्बीसवां  अध्याय   (  भद्र काप्यीय  अध्याय   )   पद  ५०  बिटेन  ५३  तक
  अनुवाद भाग -  ३०४
गढ़वाळिम  सर्वाधिक पढ़े  जण  वळ एकमात्र लिख्वार-आचार्य  भीष्म कुकरेती
s = आधी अ
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      !!!  म्यार गुरु  श्री व बडाश्री  स्व बलदेव प्रसाद कुकरेती तैं  समर्पित !!!
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यूं मदे कषाय , कटु अर तिक्त रस रुखा रस छन।  यूं मदे  कषाय रुक्षतम , कटु रस रुक्षतर  अर तिक्त  रुक्ष हूंदन।  उनि लवण उष्णतम , अम्ल उष्णतर अर कटु  उष्ण हूंदन।  मधुर रस स्निघ्धतम , अम्ल सनिघतर , अर लवण स्निग्ध हूंदन।  शैत्य धर्मानुसार कषाय रस मध्यम , स्वादु रस उत्कृष्ट अर तिक्त रस अवर रस छन।  गुरुता दृष्टि से मधुर रस गुरुतम ,  कषाय रस गुरुतर अर लवण गुरु छन।  लघु गुण दृष्टि से अम्ल रस लघुतम , कटु लघुतर अर तिक्त रस लघु हूंदन।  कुछ आचार्य गण लवण तैं सबसे लघु मणदन।  किलैकि अम्ल म पृथ्वी च।  लवण म जल कारण च।  इलै पृथ्वीजन्य का मुकाबला म जल जन्य हळकी ही ह्वेलि।  इलै भूतो हिसाब से गौरव या लाघव  का ज्ञान नि करण  चयेंद।  किलैकि जल की अधिकता से  जनम्यां रस , पृथ्वी की अधिकता से जनम्यां  कषाय रस से गुरु हूंदन।  इखम गुरु त्व  से लघु मने गे।  वास्तव म ये मतभेद म विरोध बि नी।  किलैकि लवण तै अवर मणदन।  जु अम्ल , कटु तिक्त , लवण तै गुरु मणदन।  वो  गुरुता की दृष्टि से दिखदान।  वो लघु दृष्टि से दिखडन तो लघु हूंद।  द्वी इ गुरुत्व का महत्व समजदन।५०- ५३। 


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*संवैधानिक चेतावनी : चरक संहिता पौढ़ी  थैला छाप वैद्य नि बणिन , अधिकृत वैद्य कु परामर्श अवश्य
संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस ,पृष्ठ  ३१०-  ३११
सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल ) 2021
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चरक संहिता कु  एकमात्र  विश्वसनीय गढ़वाली अनुवाद; चरक संहिता कु सर्वपर्थम गढ़वाली अनुवाद; ढांगू वळक चरक सहिता  क गढवाली अनुवाद , चरक संहिता म   रोग निदान , आयुर्वेदम   रोग निदान  , चरक संहिता क्वाथ निर्माण गढवाली  , चरक संहिता का प्रमाणिक गढ़वाली अनुवाद , हिमालयी लेखक द्वारा चरक संहिता अनुवाद , जसपुर (द्वारीखाल ) वाले का चरक संहिता अनुवाद , आधुनिक गढ़वाली गद्य उदाहरण, गढ़वाली में अनुदित साहित्य लक्षण व चरित्र उदाहरण   , गढ़वाली गद्य का चरित्र , लक्षण , गढ़वाली गद्य में हिंदी , उर्दू , विदेशी शब्द, गढ़वाली गद्य परम्परा में अनुवाद , सरल भाषा में आयुर्वेद समझाना


Bhishma Kukreti


रस म विपाक चर्चा
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चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद   
खंड - १  सूत्रस्थानम , 26  th,  छब्बीसवां  अध्याय   (  भद्र काप्यीय  अध्याय   )   पद  ५४  बिटेन  ६०  तक
  अनुवाद भाग -  ३०५
गढ़वाळिम  सर्वाधिक पढ़े  जण  वळ एकमात्र लिख्वार-आचार्य  भीष्म कुकरेती
s = आधी अ
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      !!!  म्यार गुरु  श्री व बडाश्री  स्व बलदेव प्रसाद कुकरेती तैं  समर्पित !!!
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विपाक - यांक अगवाड़ी  चर्चा  होलि।  कटु , तिक्त , कषाय रसों आधारभूत द्रव्यों का विपाक अधिकतर कटु हूंद।  िप्पली कटु रस हूण पर बि कटु हूंद अर पिप्पली कटु रस हूण पर विपाक म मधुर च।  अम्ल रस्क अम्ल अर मधुर  लवण रस क मधुर विपाक हूंद।  मधुर , अम्ल व लवण रस तिनि स्निग्ध छन इलै वायु , मल मूत्र तै निकाळण  म सुखी से सहायक हूंदन।  कटु , कषाय , तिक्त   रुखा हूंदन इलै वात , मल , मूत्र , शुक्र तै भैर  निकळन म कठिनाई दींदन।  जै द्रव्य क विपाक कटु हूंद वो वीर्यनाशी , मल -मूत्र अवरोधक  अर  वायुकारक हूंदन।  जै द्रव्य क विपाक मधुर हूंद स्यु मल मूत्र रेचक अर कफ व शुक्र वर्धक हूंद।  जै द्रव्य क विपाक अम्ल हूंद वो पित्तकारक , मल मोटर रेचक व वीर्य नाशी हूंद . यूं विपाकों म मधुर विपाक गुरु , कटु व अम्ल विपाक लघु हूंदन . विपाक का अल्पत्व व बहुत्व द्रव्य क का रस रुपया गुण की अधिकता व न्यूनता पर निर्भर करद . उदाहरण गन्ना क रस म मधुर अधिक च तो विपाक  बि  मधुर हूंद।  जैमा मध्यम होलु विपाक म बि मध्य ही होलु, न्यून म विपाक न्यून ही होलु ।  प्रत्येक पदार्थ क विपाक वैका रस  परिमाण पर निर्भर  करद।  ५४-६०। 


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*संवैधानिक चेतावनी : चरक संहिता पौढ़ी  थैला छाप वैद्य नि बणिन , अधिकृत वैद्य कु परामर्श अवश्य
संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस ,पृष्ठ   ३११ - ३१२
सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल ) 2022 
शेष अग्वाड़ी  फाड़ीम

चरक संहिता कु  एकमात्र  विश्वसनीय गढ़वाली अनुवाद; चरक संहिता कु सर्वपर्थम गढ़वाली अनुवाद; ढांगू वळक चरक सहिता  क गढवाली अनुवाद , चरक संहिता म   रोग निदान , आयुर्वेदम   रोग निदान  , चरक संहिता क्वाथ निर्माण गढवाली  , चरक संहिता का प्रमाणिक गढ़वाली अनुवाद , हिमालयी लेखक द्वारा चरक संहिता अनुवाद , जसपुर (द्वारीखाल ) वाले का चरक संहिता अनुवाद , आधुनिक गढ़वाली गद्य उदाहरण, गढ़वाली में अनुदित साहित्य लक्षण व चरित्र उदाहरण   , गढ़वाली गद्य का चरित्र , लक्षण , गढ़वाली गद्य में हिंदी , उर्दू , विदेशी शब्द, गढ़वाली गद्य परम्परा में अनुवाद , सरल भाषा में आयुर्वेद समझाना


Bhishma Kukreti


वीर्य की परिभाषा
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चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद   
खंड - १  सूत्रस्थानम , 26  th,  छब्बीसवां  अध्याय   (  भद्र काप्यीय  अध्याय   )   पद  ६१  बिटेन  ६३  तक
  अनुवाद भाग -  ३०६
गढ़वाळिम  सर्वाधिक पढ़े  जण  वळ एकमात्र लिख्वार-आचार्य  भीष्म कुकरेती
s = आधी अ
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      !!!  म्यार गुरु  श्री व बडाश्री  स्व बलदेव प्रसाद कुकरेती तैं  समर्पित !!!
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क्वी आचार्य वीर्य का आठ प्रकार मणदन।  यथु - मृदु , तीखो , रूखो , लघु , स्निग्ध , उष्ण  अर शीतल।  क्वी आचार्य वीर्य तैं द्वी प्रकारौ मणदन - शीत अर उष्ण।  रस विपाक अर प्रभाव यूंक व्यतिरेक (अति विषमता ) जु द्रव्य क अंदर छुपीं शक्ति विशेष कार्य करद वैक नाम वीर्य च।  कार्यरहित वस्तु कुछ नि कर सकद. संपूर्ण क्रिया वीर्य  इ   ही हूंदन।
रस , वीर्य अर विपाक का पृथक पृथक लक्छण अब एक द्रव्य म चर्चा होली।  जीबक दगड़   कै  पदार्थक संबंध हूण से जु रस अनुभव हूंद स्यु रस वस्तु पचणो उपरान्त सरैलम कफ वृद्धि , पित्त वृद्धि , वीर्य वृद्धि , वात्त वृद्धि , आदि हूण से जु अनुभव हूंद वैक नाम विपाक हूंद।  वस्तु क (रसना से पािल व बाद म पचण  से ) सरैल से संबंध हूण  से वीर्य क ज्ञान हूंद।  अर जलचर प्राणियों का मांस का  जीबक दगड़  से सबंध स्थापित हूण से इ उष्णत्व  अनुभव  हूंद। मरचक   तीखोवीर्य  जइब स्पर्श से इ उष्णत्व  अनुभव ह्वे जांद।  मरचक अग्नि वर्धक दीपन क्रिया सरैल क संग संबंध हूण पर ज्ञात हूंद।  एक ज्ञान जीब से सबंध हूण पर तुरंत ह्वे जांद . विपाक ज्ञान कर्म से , वीर्य का ज्ञान सरैल म रौण  से , अर जीबि दगड़ संबंध हूण से हूंद।  रस प्रत्यक्ष छन , विपाक सदा परोक्ष अर  वीर्य अनुमान द्वारा ज्ञात हूंद।  जन सैंधव लूण शीत , वीर्य अर जलचर मांस उष्ण छन।  कखि कखि वीर्य प्रत्यक्ष द्वारा बि ज्ञान हूंद जनकि  राई चखि  ऊर्जा क ज्ञान ह्वे  जांद ।  यु वीर्य सहज अर कृत्रिम च , उड़द का भारपन व मूंग क लघुपन स्वाभवाव से  च।  लाजा को हळको पन यु कृत्रिम च।  ६१ -६३। 

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*संवैधानिक चेतावनी : चरक संहिता पौढ़ी  थैला छाप वैद्य नि बणिन , अधिकृत वैद्य कु परामर्श अवश्य
संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस ,पृष्ठ   ३१२ -३१३
सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल ) 2022
शेष अग्वाड़ी  फाड़ीम

चरक संहिता कु  एकमात्र  विश्वसनीय गढ़वाली अनुवाद; चरक संहिता कु सर्वपर्थम गढ़वाली अनुवाद; ढांगू वळक चरक सहिता  क गढवाली अनुवाद , चरक संहिता म   रोग निदान , आयुर्वेदम   रोग निदान  , चरक संहिता क्वाथ निर्माण गढवाली  , चरक संहिता का प्रमाणिक गढ़वाली अनुवाद , हिमालयी लेखक द्वारा चरक संहिता अनुवाद , जसपुर (द्वारीखाल ) वाले का चरक संहिता अनुवाद , आधुनिक गढ़वाली गद्य उदाहरण, गढ़वाली में अनुदित साहित्य लक्षण व चरित्र उदाहरण   , गढ़वाली गद्य का चरित्र , लक्षण , गढ़वाली गद्य में हिंदी , उर्दू , विदेशी शब्द, गढ़वाली गद्य परम्परा में अनुवाद , सरल भाषा में आयुर्वेद समझाना


Bhishma Kukreti


प्रभाव क्या हूंद रस विपाक दगड़ संबंध
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चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद   
खंड - १  सूत्रस्थानम , 26  th,  छब्बीसवां  अध्याय   (  भद्र काप्यीय  अध्याय   )   पद ६४   बिटेन ६९   तक
  अनुवाद भाग -  ३०७
गढ़वाळिम  सर्वाधिक पढ़े  जण  वळ एकमात्र लिख्वार-आचार्य  भीष्म कुकरेती
s = आधी अ
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      !!!  म्यार गुरु  श्री व बडाश्री  स्व बलदेव प्रसाद कुकरेती तैं  समर्पित !!!
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प्रभाव - जै स्थान पर रस , वीर्य अर विपाक का समानता हूण पर बि  कार्यम विशेषता उतपन्न हूंदी ह्वावो त वै  तैं प्रभाव बुल्दन। जन चित्रमूल क रस कटु , विपाक कटु अर  वीर्य उष्ण च , उनी जमालघोटा रस म कटु , विपाक कटु , पर जमालगोटा विरेचन करद , चित्रक नि करद ।  जु  विष विष तै नष्ट करद वैक कारण बि प्रभाव च।  मणियों धारण से विषनाश , शूल हरण आदि हून्दन। यी सब प्रभाव से इ हूंदन।  द्रव्य की या अचिन्त्य शक्ति च जैक बारा म बुले नि  सक्यांद।  क्वी द्रव्य अपण रस से , क्वी अपण वीर्य से त क्वी गुण से , क्वी विपाक से त क्वी प्रभाव से कार्य करदन। कै पदार्थ म रस आदिक बल समान होवु  त रस तै विपाक , रस अर विपाक तै वीर्य , रस , विपाक , वीर्य तैं प्रभाव अपण  स्वाभाविक रूप से जित लींद।  जन भैंसक चर्बी रस अर विपाक म मधुर च पर वीर्य उष्ण च , इलै मधुर रस क कार्य पित्त शमन नि करि , उष्ण वीर्य कार्य पित्त प्रकोप करद।  मदिक रस अर विपाक अम्ल च , वीर्य उष्ण च पर यी मद्य अपण प्रभाव से यूं  तिन्यूं  तै रद्द करि स्त्रियों म दूध उतपन्न करद।  अब तक विपाक , वीर्य , प्रभाव क वर्णन भली प्रकार ह्वे  गे।  ६४ -६९। 

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*संवैधानिक चेतावनी : चरक संहिता पौढ़ी  थैला छाप वैद्य नि बणिन , अधिकृत वैद्य कु परामर्श अवश्य
संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस ,पृष्ठ   ३१३ -३१४
सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल ) 2022
शेष अग्वाड़ी  फाड़ीम

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