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Uttarakhand Education System - उत्तराखण्ड की शिक्षा प्रणाली

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, April 10, 2008, 07:31:02 PM

पंकज सिंह महर

निधि सागर, देहरादून रोजाना छह घंटे की पढ़ाई के लिए एक तो भारी भरकम ट्यूशन फीस, ऊपर से कोचिंग के नाम पर और मोटी रकम और वह भी स्कूल टाइम में ही। तर्क भी ऐसा दिया जा रहा कि अभिभावकों के न तो गले उतर रहा और न ही वे विरोध कर पा रहे हैं। वाह भई, बड़ी दूर की कौड़ी निकाल कर लाए हैं पब्लिक स्कूल। जी हां, राजधानी के कुछ पब्लिक स्कूलों में यह इस तरह का खेल चल रहा है। पब्लिक स्कूलों के इस तरह के खेल से अभिभावक ही नहीं राज्य सरकार भी परेशान है। सरकार इन्हें ढर्रे पर लाने के प्रयास कर थक हार गई, पर स्कूल प्रबंधन हैं कि मनमानी से बाज आते नहीं दिख रहे हैं। अभी तक आमतौर पर इन स्कूलों में मनमाफिक फीस लेने की शिकायतें अभिभावकों की तरफ से मिलती रहीं, लेकिन अब इन स्कूलों में स्कूल टाइमिंग में ही कोचिंग कराना सामने आया है और वह भी एक्सट्रा रकम लेकर। टयूशन फीस, लाइब्रेरी फीस और कंप्यूटर फीस के नाम पर अच्छा-खासा शुल्क लेने वाले कुछ पब्लिक स्कूलों ने अब आईआईटी और मेडिकल स्कूलों की प्रवेश परीक्षा के लिए कोचिंग भी शुरू कर दी है। स्कूलों की यह पहल उनके ही लिए सोने पर सुहागा साबित हो रही है। वह इस मायने में कि कोचिंग क्लास के लिए स्कूल प्रबंधन को अलग से समय नहीं निकालना पड़ रहा है, बल्कि स्कूल समय में ही कोचिंग दी जा रही है। ऊपर से कोचिंग फीस अलग से मिल रही है। कनाट प्लेस स्थित चिल्ड्रेंस एकेडमी और डालनवाला क्षेत्र में स्थित दून इंटरनेशनल स्कूल में 11वीं और 12वीं के छात्रों को स्कूल समय पर ही एक प्राइवेट कोचिंग इंस्टीट्यूट द्वारा मैथ्स, बॉयोलॉजी, फिजिक्स व कैमिस्ट्री जैसे विषय पढ़ाए जा रहे हैं। चिल्ड्रेंस एकेडमी में एक अगस्त से शुरू हो चुकी इन कक्षाओं में छात्रों को प्रत्येक दिन ढाई घंटे पढ़ाया जा रहा है। इसी के साथ रविवार के दिन भी छात्रों को यह कक्षाएं लेनी आवश्यक हैं। रविवार को कोचिंग क्लास का समय ढाई घंटे से बढ़ा कर छह घंटे का रखा गया है। बताया गया कि 11वीं के छात्रों के लिए इस कोर्स की अवधि एक अगस्त 2008 से अप्रैल 2010 और 12वीं के लिए एक अगस्त 2008 से अप्रैल 2009 तक तय की गई है। इसकी एवज में छात्र-छात्राओं को सालाना 15 हजार रुपये देने हैं। यानि हर महीने 1250 रुपये हर महीना अतिरिक्त शुल्क देना होगा। स्कूल प्रशासन 12वीं की बोर्ड परीक्षाओं के बाद मुफ्त क्रेश कोर्स करवाने के साथ ही स्टडी मैटेरियल उपलब्ध करवाने का दावा कर रहा है। स्कूल की प्रधानाचार्य किरन कश्यप का इस बारे में कहना है कि प्रतियोगी परीक्षाओं और बोर्ड के परीक्षा पैटर्न में भिन्नता होने की वजह से बच्चों के सामने बड़ी समस्या खड़ी होती है। इसको देखते हुए इस प्रकार की कोचिंग शुरू की गई है। उनका कहना है कि टाइममैनेजमेंट के तहत ही स्कूल अवधि में कोचिंग दी जा रही है। दून इंटरनेशनल स्कूल में भी इस तरह की कोचिंग चल रही है। स्कूल के कोआर्डिनेटर दिनेश बड़थ्वाल ने बताया कि इसके पीछे मकसद कोटा जैसी कोचिंग दून के छात्रों को उपलब्ध कराना है ताकि छात्रों का समय और पैसा दोनों ही बच सकें। वह बताते हैं कि इस साल बारहवीं के टॉपर छात्रों ने स्कूल में ही यह कोचिंग ले कर इतनी सफलता प्राप्त की है।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Day before, I was watching a new in ETV, where small children were shown carrying School furnitures etc. How can we expect of good education standards from our Govt.

हुक्का बू

हमारे प्रदेश की शिक्षा नीति के बारे में क्या कहना! प्राइमरी स्कूल बन गये हैं बाल होटल

नातियो,
        प्राइमरी शिक्षा ही किसी छात्र का भविष्य तय करती है, लेकिन केन्द्र सरकार की मिड डे मील योजना ने इन स्कूलों को होटल बनाकर रख दिया है। वैसे भी अब सरकारी प्राइमरी स्कूल में या तो गरी़ब तबके के ही छात्र आते है क्योंकि जो भी सक्षम आदमी है वह गांव-घरों में खुले अंग्रेजी स्कूलों में अपने बच्चों को पढ़ाना अपनी शान समझ्ते हैं, भले ही वहां गांव के प्राइमरी स्कूल से भी दोयम दर्जे की पढ़ाई होती है। क्योंकि प्राइमरी स्कूल में पढ़ाने वाला शिक्षक कम से कम B A, BTC  तो होता है और उसी गांव में अंग्रेजी स्कूल के टीचर और मैडम इंटर पास बेरोजगार ही होते हैं।
     अब बात प्राइमरी स्कूलों की शिक्षा प्रणाली की।  बेचारा वहां का मास्टर स्वीपर भी खुद है, चौकीदार भी खुद है, राशन लाने वाला भी वह और मास्टर तो है ही। हमारा शासन तंत्र पता नहीं क्यों इस बात को नहीं समझ पाता है कि प्राइमरी स्कूलों में जो सुविधायें दी जानी चाहिये, वह क्यों नहीं दी जाती हैं? वहां के मास्टर को सबसे पहले आकर स्कूल खोलना है, बच्चों के लिये पानी भरना है, दरियां बिछानी हैं, श्यामपट साफ करने हैं, झाडू लगाना है और मिड डे मील के लिये भोजन माता को राशन देना है, इस सब के अतिरिक्त उसे कई तरह के कागजात भी तैयार करने होते हैं। अगर वह इन सब कामों को छात्रों से कराये तो लोगों को आपत्ति है कि हमारे बच्चों से काम कराया जा रहा है और अगर वह खुद करे तो कहा जाता है कि पढ़ाता नहीं है। सोचने की बात यह है कि इतने सारे कामों को वह कैसे करे। जहां पर दो-तीन अध्यापक हैं वहां तो ठीक है, लेकिन हमारे प्रदेश के और खासतौर पर पहाड़ों में एकल अध्यापक ही प्राथमिक स्कूलों में हैं। बच्चों का ध्यान सिर्फ और सिर्फ भात पकने तक ही सीमित रह गया है। गरीब लोग बच्चों को इसलिये ही स्कूल भेजते हैं कि कम से कम उनका बच्चा एक टैम तो पेट भर सके।
        इन सब दुश्वारियों को देखते हुये सरकार को प्राथमिक स्कूलों में एक चौकीदार/चपरासी आवश्यक रुप से नियुक्त करना चाहिये। तभी इन स्कूलों का ध्येय वाक्य " शिक्षार्थ आइये, सेवार्थ जाइये" सिद्ध हो पायेगा। नहीं तो मास्टर साहब यह सब काम करने में रह जायेंगे और बच्चे भात का इंतजार करने में।

Risky Pathak

मेरे गाँव(लछीमा) के प्राईमरी स्कूल का हाल

मास्टर-२ (दिलीप सिंह, दीपा पाठक(बहिन जी))
१,२,३ कक्षा की पढाई एक साथ फील्ड में मिटटी में बैठकर|
४,५ कक्षा की पढाई कमरे में फटी हुई टाट में|

भोजन बनाने का कार्य आनंद पाठक को| भोजन में दलिया, कभी कभार काजू, किसमिस आदि भी|

स्कूल में साफ़ सफाई का कार्य छात्रो द्वारा किया जाता है|

खीमसिंह रावत

हमारी शिक्षा प्रणाली में उतना दोष नही है जितना हम लोग समझते हैं / असल में समस्या तो यह है की कर्मचारी वर्ग पर जवाब देही नही है / पब्लिक स्कूल में जो शिक्षक होते है उनका शिक्षा का स्तर क्या है १० वी या १२ वी फ़िर भी वे बच्चो को अच्छा पड़ते है/ क्यो / सरकार प्राथमिक विद्यालयो में भी शिक्षक बी टी सी होते है फ़िर भी बच्चो को उस ढंग से नही पढाते है जैसा उनको प्रशिक्षण दिया गया है/ सरकारी पदाधिकारी है कौन क्या कर सकता है/ मुझे तो हैरानी तब हुई जब सरकारी अध्यापको के बच्चे पब्लिक स्कूल में पढ़ने जाते है/ एक और बानगी देखिये अभिभावकों की/
जब बच्चा सरकारी स्कूल में पढ़ने जाता है तो बिना बाल बनाये, बिना पालिस का जूता,  घर  के दरवाजे तक भी उसको नही छोड़ने नही जाते है,
अब वाही बच्चा जब पब्लिक स्कूल में जाता है- बालो में कंघी करेगे, कपडे साफ पहनायेगे, स्कूल के गेट तक छोड़ने जायेगें , लेन भी जायेगे

शिक्षा को जवाब देही बनाया जाय और रोज्गारौन्न्मुख हो

पंकज सिंह महर

शिक्षकों का प्रशिक्षण राज्य में बुनियादी और माध्यमिक शिक्षा की गुणवत्ता के लिए शिक्षकों को प्रशिक्षित करने की योजना अच्छा कदम है, लेकिन इस कार्य को व्यवस्थित करने से कन्नी काट रहे शिक्षा महकमे को दुरुस्त करने की जरूरत है। बीते दो सालों में सरकार ने इस महत्वपूर्ण योजना की प्रगति का जायजा लेना तक मुनासिब नहीं समझा। सिर्फ महकमे के अफसरों पर इस महत्वपूर्ण कार्य को छोड़ने की वजह से एससीईआरटी में वित्तीय अनियमितता की शिकायतें सिर उठा रही हैं। शिक्षा का स्तर सुधारने के लिए केंद्र सरकार भी शिक्षकों के प्रशिक्षण पर जोर दे रही है। यही वजह है कि राज्य के प्रस्ताव के आधार पर एससीईआरटी को करीब एक करोड़ 35 लाख की राशि जारी की गई। शिक्षक प्रशिक्षण के लिए ख्यातिलब्ध शिक्षण संस्था इग्नू से दो साल पहले करार भी किया जा चुका है, इसके बावजूद करार पर अमल नहीं हो पाया। ध्यान देने की बात यह है कि बोर्ड रिजल्ट की घोषणा के मौके पर शिक्षा मंत्रालय ने शिक्षकों के प्रशिक्षण को बतौर उपलब्धि गिनाया था। इग्नू के माध्यम से प्राइमरी से लेकर माध्यमिक स्तर पर शिक्षकों के साथ ही प्रधानाचार्यो को भी प्रशिक्षण देने की अनूठी योजना के क्रियान्वयन की हकीकत सामने आ गई है और इस मामले में मंत्रालय अपने मुंह मियां मिट्ठू साबित हो तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। दिलचस्प है कि मंत्रालय को भी प्रशिक्षण में हो रही हीलाहवाली की भनक नहीं लग पाई। पहले चरण में करीब दस हजार शिक्षकों को प्रशिक्षित किया जाना था। दो साल की अवधि में प्राइमरी ही नहीं, माध्यमिक स्कूलों के सैकड़ों शिक्षक अब तक प्रशिक्षित हो जाते। इसका असर स्कूलों के शैक्षिक वातावरण में सुधार के रूप में दिखाई पड़ सकता था। राज्य में सीबीएसई पैटर्न लागू करने के बाद प्रशिक्षण की उपयोगिता शिद्दत से महसूस की जा रही है। स्कूलों में पठन-पाठन को रोचक व छात्रोपयोगी बनाया जाना चाहिए। शिक्षक संगठनों की भागीदारी से योजना को बेहतर ढंग से अमल में लाया जा सकता है, लेकिन इच्छाशक्ति के अभाव में शिक्षक प्रशिक्षण आधा-अधूरा रहने का खामियाजा आखिरकार देश के भावी कर्णधारों को ही उठाना पड़ेगा।

खीमसिंह रावत

School Nagachulakhal Tall Salt, Salt Block

मैं व्यथित हूँ शिक्षा के स्तर से
बयां करूँ क्या अपनी पाठशाला का
जहाँ कक्षायें पांच हैं पर अध्यापक एक
पाठशाला की जिम्मेदारियों से
सरकारी आदेशों  k भार से
समय से पहले बूढा होता अध्यापक
कर भी नही पता पढाने का श्री गणेश
अभी तक नही समझ सका वह
शासन प्रशासन का आदेश
जन गणना, गाँव गणना, पशु गणना,
और सालों साल मत गणना, 
होते इसी अध्यापक को निर्देश
मैंने सोचा चलो पूछें हाल चाल
मर्साब नमस्कार, सब कुशल मंगल
जवाब दे नही पता रुआं सा जाता है
मर्साब उवाच:-
दर्द एक हो तो बताऊँ
यहाँ एक में अनेक समाये  है
कैंसर के दर्द से भी भयंकर
एकल अध्यापक का दर्द है
फ़िर भी सुनाता हूँ आपबीती
समय पर पाठशाला खोलता हूँ
तब बच्चे नही मैं ही होता हूँ
प्रथम कर्तव्य की आहुति से
बच्चों की राह  मैं ताकता हूँ
शिवगण कहूँ या फ़िर राम सेना
किसी तरह प्रार्थना करा देता हूँ
एक एक की उपस्थिति लेकर
कक्षाओं को नही सजा पाता हूँ
मेरी कलम, दवात, कापी किताब
मर्साब वह लिखता है न पढ़ता है
मर्साब पेशाब जाऊँ, वह मुझे मारता है
सुनते सुनते सिर पकड़ लेता हूँ
फ़िर दिन के भोजन के लिए
बच्चो की गिनती करता हूँ
हिसाब लगाकर चावल दाल
लकडी पानी का इंतजाम करता हूँ
इसी चक्कर में मध्यांतर हो  जाता है
मध्यांतर के बाद थक जाता हूँ
राम सेना शांत कैसे रहे
कुर्सी पर पीठ टिका देता हूँ
कभी कभी मुझे लगता है
सरकार की ओर से नियुक्त
प्रशिक्षित ग्वाला हूँ
जो पेड़ की छाँव में बैठा
भेड़ बकरियों को ही चारा रहा
अपनी विवशस्तता पर आंसू
बरबस यों ही पी लेता हूँ

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


Khim Ji,

The stituation is the same every where in UK. Thanx

Quote from: khimsrawat on August 26, 2008, 02:48:54 PM
School Nagachulakhal Tall Salt, Salt Block

मैं व्यथित हूँ शिक्षा के स्तर से
बयां करूँ क्या अपनी पाठशाला का
जहाँ कक्षायें पांच हैं पर अध्यापक एक
पाठशाला की जिम्मेदारियों से
सरकारी आदेशों  k भार से
समय से पहले बूढा होता अध्यापक
कर भी नही पता पढाने का श्री गणेश
अभी तक नही समझ सका वह
शासन प्रशासन का आदेश
जन गणना, गाँव गणना, पशु गणना,
और सालों साल मत गणना, 
होते इसी अध्यापक को निर्देश
मैंने सोचा चलो पूछें हाल चाल
मर्साब नमस्कार, सब कुशल मंगल
जवाब दे नही पता रुआं सा जाता है
मर्साब उवाच:-
दर्द एक हो तो बताऊँ
यहाँ एक में अनेक समाये  है
कैंसर के दर्द से भी भयंकर
एकल अध्यापक का दर्द है
फ़िर भी सुनाता हूँ आपबीती
समय पर पाठशाला खोलता हूँ
तब बच्चे नही मैं ही होता हूँ
प्रथम कर्तव्य की आहुति से
बच्चों की राह  मैं ताकता हूँ
शिवगण कहूँ या फ़िर राम सेना
किसी तरह प्रार्थना करा देता हूँ
एक एक की उपस्थिति लेकर
कक्षाओं को नही सजा पाता हूँ
मेरी कलम, दवात, कापी किताब
मर्साब वह लिखता है न पढ़ता है
मर्साब पेशाब जाऊँ, वह मुझे मारता है
सुनते सुनते सिर पकड़ लेता हूँ
फ़िर दिन के भोजन के लिए
बच्चो की गिनती करता हूँ
हिसाब लगाकर चावल दाल
लकडी पानी का इंतजाम करता हूँ
इसी चक्कर में मध्यांतर हो  जाता है
मध्यांतर के बाद थक जाता हूँ
राम सेना शांत कैसे रहे
कुर्सी पर पीठ टिका देता हूँ
कभी कभी मुझे लगता है
सरकार की ओर से नियुक्त
प्रशिक्षित ग्वाला हूँ
जो पेड़ की छाँव में बैठा
भेड़ बकरियों को ही चारा रहा
अपनी विवशस्तता पर आंसू
बरबस यों ही पी लेता हूँ


पंकज सिंह महर

राज्य में शिक्षा की दर्जनों योजनाएं चल रही हैं। इन पर अरबों रुपये पानी की तरह बहाए जा रहे हैं। इसके बावजूद आलम यह है कि राज्य में 6 से 14 वर्ष तक के 22 हजार से अधिक बच्चे शिक्षा से वंचित हैं जबकि इनसे अधिक उम्र के निरक्षरों की संख्या आठ लाख है। ईजीएस केन्द्रों के बंद होने और सरकारी तंत्र की हीलाहवाली से पूरी शिक्षा व्यवस्था गड़बड़ा गयी है। रही-सही कसर शिक्षकों को गैर शैक्षणिक कार्यक्रमों में भेज देने से पूरी हो गयी है। विश्र्व साक्षरता दिवस पर जागरण ने प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था पर नजर डाली तो यह कागजों में अव्वल और हकीकत कुछ और नजर आयी। सर्व शिक्षा अभियान के तहत ही 2007-08 में 254 करोड़ रुपये खर्च हुए। 2008-09 में 274 करोड़ रुपये और खर्च होने हैं। पिछले सात वर्षो के लिए 600 से 700 करोड़ रुपये का बजट उपलब्ध हुआ था। इसके लिए मध्याह्न भोजन योजना, पहल, नींव, सतत शिक्षा कार्यक्रम, सतत् व्यापक मूल्यांकन, उपचारात्मक शिक्षण, विद्यालय कोटिकरण, समेकित शिक्षा, शिक्षक सहायक सामाग्री, स्कूल चलो अभियान, समर कैंप, विंटर कैंप, रेजिडेंसलिय ब्रिज कोर्स व नॉन रेजिडेंसियल ब्रिज कोर्स सहित दर्जनों योजनाएं चल रही हैं। साथ ही पायलट प्रोजक्ट के तहत कई और कार्यक्रम चल रहे हैं। शिक्षकों को शिक्षण की नई तकनीकी से अवगत कराने के लिए 10 दिवसीय बीआरसी व 10 दिवसीय सीआरसी स्तर पर प्रशिक्षण दिया जाता है। पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप के तहत पहल कार्यक्रम में कान्वेंट स्कूलों से वंचित बच्चों को शिक्षा देने का प्रावधान है। इसके बाद भी राज्य में छह से 14 वर्ष के 22 हजार से अधिक बच्चे शिक्षा ग्रहण करने से वंचित हैं। ईजीएस केन्द्र बंद होने से करीब 50 हजार बच्चों के समक्ष प्राथमिक शिक्षा हासिल करने का संकट उत्पन्न हो गया था। बावजूद इसके सरकार ने इसमें कोई दिलचस्पी नहीं दिखायी। अभी तक कुछ ही बच्चों को निकट के प्राथमिक विद्यालयों में भेजा गया है। विभाग शत प्रतिशत नामांकन करने का दावा हर वर्ष करता है। बावजूद इसके लचर व्यवस्था के चलते सफलता नहीं मिल रही है। शिक्षा विभाग के सामने नामांकित बच्चों के ठहराव भी एक जटिल समस्या है। राज्य में 15 से 35 आयु वर्ग में निरक्षरों की संख्या लगभग आठ लाख है। इसके लिए सतत् शिक्षा कार्यक्रम के तहत 319 नोडल व 3242 सतत शिक्षा केन्द्र खोले गये। इस पर स्वयं शिक्षा अधिकारी टिप्पणी करते हैं कि यह योजना करोड़ों रुपये पानी में बहाने के सिवाय कुछ नहीं है। रही-सही कसर शिक्षकों को गैर शिक्षण कार्य में जोत कर पूरी कर दी जाती है। बेसिक शिक्षकों को वर्ष भर जनगणना, मतगणना, पशुगणना, मतदाता पुनरीक्षण के अलावा दर्जनों अन्य कार्यो में लगाया जाता है। इस व्यवस्था से स्वयं शिक्षा निदेशक पुष्पा मानस भी चिंतित हैं। उनका कहना है कि इससे शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित होती है। उनका सुझाव है कि शिक्षकों के अलावा अन्य विभागों के कर्मचारियों को भी इस कार्य में लगाया जा सकता है। शिक्षा के क्षेत्र में इस अंधेरे के बावजूद मानस का दावा है कि राज्य शिक्षा के क्षेत्र में उन्नति कर रहा है। अच्छे परिणाम सामने आ रहे हैं। 

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


This is very true..

The standard of education is yet to be improved. Spending money is not the solution.

Quote from: धौंसिया.....! on September 09, 2008, 10:23:33 AM
राज्य में शिक्षा की दर्जनों योजनाएं चल रही हैं। इन पर अरबों रुपये पानी की तरह बहाए जा रहे हैं। इसके बावजूद आलम यह है कि राज्य में 6 से 14 वर्ष तक के 22 हजार से अधिक बच्चे शिक्षा से वंचित हैं जबकि इनसे अधिक उम्र के निरक्षरों की संख्या आठ लाख है। ईजीएस केन्द्रों के बंद होने और सरकारी तंत्र की हीलाहवाली से पूरी शिक्षा व्यवस्था गड़बड़ा गयी है। रही-सही कसर शिक्षकों को गैर शैक्षणिक कार्यक्रमों में भेज देने से पूरी हो गयी है। विश्र्व साक्षरता दिवस पर जागरण ने प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था पर नजर डाली तो यह कागजों में अव्वल और हकीकत कुछ और नजर आयी। सर्व शिक्षा अभियान के तहत ही 2007-08 में 254 करोड़ रुपये खर्च हुए। 2008-09 में 274 करोड़ रुपये और खर्च होने हैं। पिछले सात वर्षो के लिए 600 से 700 करोड़ रुपये का बजट उपलब्ध हुआ था। इसके लिए मध्याह्न भोजन योजना, पहल, नींव, सतत शिक्षा कार्यक्रम, सतत् व्यापक मूल्यांकन, उपचारात्मक शिक्षण, विद्यालय कोटिकरण, समेकित शिक्षा, शिक्षक सहायक सामाग्री, स्कूल चलो अभियान, समर कैंप, विंटर कैंप, रेजिडेंसलिय ब्रिज कोर्स व नॉन रेजिडेंसियल ब्रिज कोर्स सहित दर्जनों योजनाएं चल रही हैं। साथ ही पायलट प्रोजक्ट के तहत कई और कार्यक्रम चल रहे हैं। शिक्षकों को शिक्षण की नई तकनीकी से अवगत कराने के लिए 10 दिवसीय बीआरसी व 10 दिवसीय सीआरसी स्तर पर प्रशिक्षण दिया जाता है। पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप के तहत पहल कार्यक्रम में कान्वेंट स्कूलों से वंचित बच्चों को शिक्षा देने का प्रावधान है। इसके बाद भी राज्य में छह से 14 वर्ष के 22 हजार से अधिक बच्चे शिक्षा ग्रहण करने से वंचित हैं। ईजीएस केन्द्र बंद होने से करीब 50 हजार बच्चों के समक्ष प्राथमिक शिक्षा हासिल करने का संकट उत्पन्न हो गया था। बावजूद इसके सरकार ने इसमें कोई दिलचस्पी नहीं दिखायी। अभी तक कुछ ही बच्चों को निकट के प्राथमिक विद्यालयों में भेजा गया है। विभाग शत प्रतिशत नामांकन करने का दावा हर वर्ष करता है। बावजूद इसके लचर व्यवस्था के चलते सफलता नहीं मिल रही है। शिक्षा विभाग के सामने नामांकित बच्चों के ठहराव भी एक जटिल समस्या है। राज्य में 15 से 35 आयु वर्ग में निरक्षरों की संख्या लगभग आठ लाख है। इसके लिए सतत् शिक्षा कार्यक्रम के तहत 319 नोडल व 3242 सतत शिक्षा केन्द्र खोले गये। इस पर स्वयं शिक्षा अधिकारी टिप्पणी करते हैं कि यह योजना करोड़ों रुपये पानी में बहाने के सिवाय कुछ नहीं है। रही-सही कसर शिक्षकों को गैर शिक्षण कार्य में जोत कर पूरी कर दी जाती है। बेसिक शिक्षकों को वर्ष भर जनगणना, मतगणना, पशुगणना, मतदाता पुनरीक्षण के अलावा दर्जनों अन्य कार्यो में लगाया जाता है। इस व्यवस्था से स्वयं शिक्षा निदेशक पुष्पा मानस भी चिंतित हैं। उनका कहना है कि इससे शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित होती है। उनका सुझाव है कि शिक्षकों के अलावा अन्य विभागों के कर्मचारियों को भी इस कार्य में लगाया जा सकता है। शिक्षा के क्षेत्र में इस अंधेरे के बावजूद मानस का दावा है कि राज्य शिक्षा के क्षेत्र में उन्नति कर रहा है। अच्छे परिणाम सामने आ रहे हैं।