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Pauri: A Cultural City Of Uttarakhand - पौड़ी: एक सांस्कृतिक शहर

Started by पंकज सिंह महर, May 14, 2008, 01:14:57 PM

पंकज सिंह महर

घड़ियाली का संबंध स्थानीय देवी-देवताओं से है जैसे कि नागारिया नरसिंह, गोरिल या निरंकार। देवी और पांडव वर्त ढोल और दमाऊं की धुन पर गाये जाते हैं। बजाने वालों को दास या औजी कहा जाता है जो कि पारंपरिक तौर पर दर्जी होते हैं। मंडान रचाना अब पौड़ी में कम हो गया है। परंतु लोग उन दिनों को याद करते है जब सम्पूर्ण समुदाय रात-भर रूक कर इसे देखता, जब स्थानीय देवी-देवता नर्तकों को वशीभूत कर लेते और वे नर्तक अचेत होकर केवल नाचते ही नहीं वरन्, वैसे कारनामे कर डालते जो किसी साधारण सजीव व्यक्ति के बस का नहीं होता था।

      लोकगीत के विषय साधारणत: लोगों की वीरता का बखान होता, जैसे कि एक छोटी लड़की के बारे में बूमकाल कलिंका गीत, जिसमें उस लड़की ने गोरखों के आक्रमण पर उन्हें चेतावनी दी थी या तीलू रतेली के बारे में जिसे कत्यूरी वंश से यातना मिली थी।

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पौड़ी में संगीत के बारे में चर्चा पूरी नहीं हो सकती नरेन्द्र सिंह नेगी के बिना, जो पौड़ी के लोकप्रिय लोगों में से हैं, जिन्होंने गढ़वाली गीत की ओर सम्पूर्ण भारत के बृहत्तर श्रोताओं का ध्यान आकृष्ट कराया। इस गीतकार ने इस परंपरागत कला को गहराई एवं दिशा दी, गढवाल के प्राकृतिक सौंदर्य के साथ-साथ स्थानीय लोगों के जीवन, उनकी समस्यायें एवं संघर्षों तथा सामाजिक लगाव का भी वर्णन किया, जिसने सदियों से लोगों को एक साथ बांध रखा है।
       अगस्त 12, 1950 को नरेंद्र सिंह नेगी का जन्म पौड़ी गांव में हुआ। वर्ष 1970 से उन्होंने आकाशवाणी लखनऊ में गीत गाना आरंभ किया। लोगों ने उनकी आवाज को पहचाना एवं उनके गायन-शैली की सराहना की। वर्ष 1982 में उन्होंने अपना प्रथम ऑडियो कैसेट 'देब्रा हरची गैनी' के नाम से जारी किया। उन्हें लगातार सफलता मिली और तब से उन्हें कई राज्य एवं राष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हुए। उसके बाद उन्होंने कई वीडियो एलबम जारी किये। उन्होंने गायक एवं संगीत-निर्देशक के रूप में कई गढ़वाली फिल्मों में; यथा, चक्रचाल तथा कौधिग में अपनी प्रतिभा स्थापित की। वे पौड़ी में रहते हैं।

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वास्तुकला

अपने ऐतिहासिक विकास के अनुरूप पौड़ी की तीन विशिष्ट वास्तु कलात्मक शैली हैं। प्रथम शैली गढ़वाली है। अब भी ऐसे कुछ घरों को देखा जा सकता है, पर उनमें से अधिकांश ढह से गये हैं और इन्हें गिराकर आधुनिक निर्माणों से स्थानान्तरित किया जा रहा है। परंपरागत गढ़वाली घरों की खुरदुरी पथरीली दीवारों को एक साथ जोड़ने के लिये उड़द की दाल एवं चूने के मिश्रण का इस्तेमाल होता था। दरवाजों, खिड़कियों, बरामदों तथा बालकनियों में लकड़ी का इस्तेमाल होता है जो यहां बहुतायत में है। खोली कहे जाने वाले प्रमुख प्रवेश द्वार पर भारी नक्काशी होती थी, जिसके ऊपरी भाग के केंद्र में गणेश की खुदाई की सजावट थी जिसे 'खोली का गणेश' कहा जाता है। अधिक संपन्न परिवारों में भारी खुदाई के साथ कमल के आकार के खंभे होते थे जिन्हें तिबारी कहा जाता था। दरवाजों एवं खिड़कियों पर एक ही शैली की खुदाई है जिसे पंक्तियों के ढांचों में दुहराया गया है। घर की ऊपरी मंजिल पर सामने एक बालकनी होती है, जिसे निमदारी कहते हैं। यहीं गढ़वाली काष्ठकला का कुछ सुंदरतम उदाहरण देखा जा सकता है।




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दीवालगीरों को थामे खंभों ने कारीगरों को अपना कौशल प्रदर्शित करने का भरपूर मौका दिया है। घर का प्रमुख प्रवेश द्वार आंगन ले जाता था जिसके इर्द-गिर्द अन्य कमरे बने होते। पंवार राजाओं द्वारा संरक्षित लकड़ी की नक्काशी का कार्य प्रत्येक गांव में निम्न जाति के लोगों द्वारा किया जाता था और पीढ़ी-दर-पीढ़ी यह कौशल पनपता रहा। दुर्भाग्य वश, कुछ समय बाद जीविकार्जन की अत्यावश्यकता एवं संरक्षण के अभाव का नतीजा यह हुआ कि अपने परंपरागत पेशे में लगे कारीगरों की संख्या कम होती गयी। वास्तुकला की दूसरी शैली अंग्रेजों के समय आयी। इस शैली की विशेषता थी, कोरे पत्थर की दीवारें सजावट से पूरी दूरी रखते हुए तथा ढलें लहरियादार टिन की छतें। शिमला तथा मसूरी जैसे पहाड़ी स्थलों पर तथा अन्यत्र सामान्य हैं। इनके कुछ सुंदर उदाहरण पौड़ी में देखे जा सकते है यथा जिलाधिकारी का कार्यालय, मेथडिस्ट चर्च, गढ़वाल मंडल आयुक्त का घर तथा कार्यालय और पुराना जेल।


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पौड़ी के मूल वासियों के विषय में बहुत जानकारी नहीं है और कहा जाता है कि प्राचीन काल में यहां ऋषियों, मुनियों का वास होता था। बाकी गढ़वाल के समान पौड़ी के मूल वासी कोल, कीरत और खासा थे। उसके पश्चात् उत्तर-भारत के मैदानी क्षेत्रों से ब्राह्मणों और राजपूतों ने आकर यहां घर बसाया।
       पौड़ी में आने वाला दूसरा जत्था अंग्रेजों का था। इसी समय से पौड़ी का एक छोटे गांव से एक शहर में विकास होना शुरू होने लगा। गढ़वाल का नागरिक प्रशासनिक कार्यालय यहां होने के कारण, पौड़ी में कई सरकारी कार्यालयों का निर्माण हुआ, जिसका परिणाम था कि इन निर्माणों में कार्यरत श्रमिक भी यहां बस गये। इनमें मूलरूप से अंग्रेज अधिकारी एवं गढ़वाली शामिल थे जो इन कार्यालयों में अपनी सेवा या उत्पादित वस्तु की आपूर्ति करते थे। जैसे-जैसे ग्रामीण शिक्षित होने लगे, वे भी सरकार द्वारा नियोजित कर लिये गये। वर्ष 1882 में अपने हिमालयन गजेटियर में ई. टी. एटकिंस  ने एक अमरीकी एपिस्कोपल मेथडिस्ट मिशन होने का जिक्र किया है जो चोपरा में स्थित था एवं एक स्कूल भी चलाता था।



       

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लोग अब भी वह दिन याद करते हैं जब पौड़ी में 4 फीट तक बर्फ पड़ा करती थी तथा अत्यधिक ठंढ से बचने के लिये लोग 'परंपरागत ऊन का लावा' पहना करते थे। पुरूष एवं महिलायें दोनों ही यह पहनते थे।

       परंपरागत रूप से पुरूष कुर्त्ता चूड़ीदार पायजामाबंद गले के ऊनी कोट के नीचे पहनते थे। इसे पूर्ण कर देता था एक गढ़वाली टोपी। वास्तव में एक पुरानी कहावत है जिसके सिर पर टोपी नहीं, वह नंगा, जो टोपी के महल को दर्शाता है। महिलाएं धोती, पडगा (12x9 फीट कपड़े का एक टुकड़ा, जो कार्यरत महिलाएं अपने कमर के इर्द-गिर्द बांधा करती थी) तथा इसके ऊपर एक ब्लाऊज या कुर्ता पहनती थी। यहां सिर ढकने की परंपरा नहीं है पर बोझ उठाते समय पड़गे को सिर पर रख लेती थी।




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पौड़ी का चर्च

परंपरागत भोजन में शामिल है बाड़ी एक मीठा रहित हलवा जो गुड़ के साथ खाया जाता है; दाल, चावल एवं गेहूं से बना असका जो चटनी के साथ खाया जाता है; चैनसूई एक कढ़ी जो उड़द की दाल से बनती है; फानू आहार दाल से बनी कढ़ी; आलू की थैंची जो छोटे-छोटे आलू से बनता है तथा चिचिंदा झंगोरी एवं दही से तैयार किया गया। जब समय कठिन था और लोग जमीन पर आधारित थे तब वे बिच्छु बूटी का साग या बुरांस के फूलों से बने सलाद, प्याज तथा मूली के पत्ते, सरसों के बीजों से तैयार कर नमक के साथ खाते थे।

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मध्य-हिमालय क्षेत्र के कंडोलिया पहाड़ियों की ढलान पर पौड़ी अवस्थित है। यह हिमालयी क्षेत्र का मनोरम दृश्य उपस्थित करता है जिसमें बंदरपूंछ, गंगोत्री, भरत कांधी, जुनली, केदार कांडा, सतोपंथ, हाथीघोड़ी पर्वत, चौखंबा, कुमलिंग, माना पर्वत, केदार गुंबज, द्रोणागिरि शिखर, त्रिशूल, नंदघूंटी, रोमनी तथा पंचुली ऋंखला शामिल हैं।

      पौड़ी की स्वास्थ्यप्रद जलवायु सभी प्रकार के पेड़-पौधों के लिये लाभदायक है। शहर के ऊपर पहाड़ियों पर देवदार, बलूत, अखरोट एवं बुरांस के जंगल हैं। जबकि स्थानीय पेड़ों में चीड़, देवदार, मोरपंखी, ऊटी, पहियां (स्थानीय रूप से पवित्र) एवं खाड़िक आदि शामिल हैं।