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Pauri: A Cultural City Of Uttarakhand - पौड़ी: एक सांस्कृतिक शहर

Started by पंकज सिंह महर, May 14, 2008, 01:14:57 PM

पंकज सिंह महर


पंकज सिंह महर


पंकज सिंह महर



मंडाखाल छतरी

मंडाखाल सड़क के ठीक पीछे सर्वोच्च स्थल पर एक छोटा घिरा क्षेत्र है और एक छोटा ढांचा इसके केंद्र में स्थित है। सम्पूर्ण क्षेत्र घेरे के अंदर है। यह केवल पौड़ी शहर का एक विस्तृत दृश्य ही प्रस्तुत नहीं करता (जब रात में सम्पूर्ण पहाड़ियों पर बत्तियां जली होती हैं तो यहां का दृश्य सुंदर दिखता है) वरन् पृष्ठ भूमि में हिमालयी ऋंखला की एक परत भी दिखता है। शाम को आने के लिये यह एक अच्छी जगह है, पर्वतों के बर्फ के ऊपर सूर्यास्त होना निहारें तथा धीरे-धीरे बत्तियों का जलना देखते रहें।



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इनडोर (आंतरिक) स्टेडियम के पीछे

पौड़ी का गौरव, यह स्टेडियम, रांसी रोड पर स्थित है। अगर आप सीमा के इर्द-गिर्द जायें तो एक आनंददायक स्थल पायेंगे। गंगवादसूई घाटी आपके सामने अपने सुनहरे, पीले तथा हरे चबूतरी खेतों के साथ फैली दिखती है, मानो स्वर्ग की ओर विशाल सीढ़ियां हों। कुछ दूरी पर ही स्टेडियम के बाद लवर्स प्वाइंट है, एक छोटा ढांचा जो समान दृश्य उपस्थित करता है।


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मुमुक्षु शरणास्थली

पौड़ी शहर से थोड़ी बाहर देवप्रयाग सड़क पर यह नवनिर्मित भू-संपदा है। उसके कमरे के बरामदे हिमालयी ऋंखला के सामने पड़ते हैं। शाम को यहां बैठकर चाय की चुस्की लेते हुए आप सूर्यास्त का अद्भुत नजारा देख सकते हैं जो अब तक शायद आपने नहीं देखा होगा। जैसे ही सूर्य नीचे ढलता है, यह पर्वत वर्फों पर हलचल फैला देता है जो नारंगी, बैंगनी एवं पीले रंग की दैवी छाया के रूप में बदलता–सा दिखता है।



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जांड्राजोल


पौड़ी के ऊपर, 6,500 फूट की ऊंचाई पर स्थित, जांड्राजोल एक सुंदर जगह है। गढ़वाली भाषा में जंड्रा पत्थर की चक्की को कहते हैं। इस जगह का नाम इसलिये पड़ा क्योंकि इस पहाड़ी का आकार जांड्रा जैसा है। यहां से आप हिमालय की चोटियों, फैली घाटियों और पहाड़ियों में जड़े सुंदर गांवों के दृश्य का आनंद ले सकते हैं। पहुंचने के लिये रांसी से आधा किलोमीटर चलना पड़ेगा।

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रांसी स्टेडियम

यह स्टेडियम पौड़ी का सर्वोच्च स्थान है और एशिया में दूसरा सर्वोच्च स्टेडियम है। हाल में इसका इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है, पर निकट भविष्य में इसके पुनरूद्धार की योजना है। तब तक यह देवदार पेड़ों के बीच परिवारों के लिये एक आदर्श पिकनिक स्थल बना रहेगा। एक सिरे पर आप गंगवादसूई घाटी का सुंदर दृश्य देखते हैं तो दूसरे सिरे तक पेड़ों के बीच टहल सकते हैं। यहां क्रिकेट खेल आयोजित करने के लिए काफी जगह है और खुली हवा में इस स्थान का आनंद उठाया जा सकता है।

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धारा रोड पर, पौड़ी के सर्वाधिक ऐतिहासिक स्थलों में से एक छोटे पत्थर का ढांचा स्थित है। यह स्थल प्राकृतिक जल का स्रोत हुआ करता था (हिंदी में धारा के अनुसार इसका नाम धारा रोड पड़ा)। कभी यह जनसमुदाय के लिये प्रमुख जल स्रोत था और यहां पानी नाग देवता मंदिर से एक गुल (पत्थर की नाली) द्वारा पहुंचता था। इस जगह तक बस पड़ाव से नीचे एक कच्चा रास्ता हुआ करता था जहां कुछ झोपड़ियां स्थित थीं। इस जल-स्रोत की आधारशिला पौड़ी के सहायक आयुक्त हेनरी हेडली द्वारा वर्ष 1844 में रखी गयी, यह तथ्य दो शिलालेखों (पत्थरों पर खुदा) है, एक बाहर और दूसरा अंदर। छोटे गुफा जैसे ढांचे के अंदर एक अन्य शिलालेख का आशय अपठनीय है। यद्यपि एक स्थानीय इतिहासकार के अनुसार खुदाई में एक राजा का वर्णन है, जिसने इस क्षेत्र में एक विशाल शिव मंदिर की स्थापना की थी। पौड़ी तक सड़कों के आ जाने से जलापूर्ति करने वाला गुल नष्ट हो गया। वहां एक नाली डालकर जलापूर्ति सुनिश्चित किया गया। फिर भी अनेकानेक छोटी-छोटी नालियां लगा देने से पानी सूख गया।


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अडवानी, पौड़ी

देखने को घने देवदार, चीड़ एवं बुरूंश के जंगलों के बीच टहलते हुए आपको प्रकृति अवलोकन का अवसर अपने मूल रूप में प्राप्त होता है। पक्षी-प्रेमियों एवं जंगली जीवन के उत्सुक लोगों के लिये यहां बहुत कुछ है। इस स्थान से सीतोंसूईं एवं गंगवाडसूईं घाटियों का सुन्दर दृश्य अलौकिक है। यहां एक वन-विभाग का अतिथि गृह भी है। यहां से 2 किलोमीटर पैदल चलने पर रानीगढ़ आता है, जहां एक प्राचीन शिव मंदिर है। यहां से आप नई टिहरी एवं मसूरी के निकट की पहाड़ियों का दृश्य देख सकते हैं। इस स्थल पर एक किला होना बताया जाता है। पुराने जमाने में, पहाड़ियों से सहजता से चट्टानों को दुश्मनों पर लुढकाकर विजय प्राप्त कर ली जाती थी, क्योंकि दुश्मन चट्टानों से दब जाते थे।

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ज्वाल्पा देवी मंदिर (पौड़ी-कोटद्वार मार्ग पर पौड़ी से 33 किलोमीटर दूर।)

सड़क के नीचे आधा किलोमीटर की दूरी पर नायर या नवालिका नदी के किनारे ज्वालपा देवी को एक प्रधान सिद्धपीठ है। ऐसा कहा जाता है कि यह उसी जगह स्थति है जहां पुलोम राक्षस की पुत्री साची ने भगवान इन्द्र को पति के रूप में पाने के लिये घोर तपस्या की थी। उसके तप से प्रसन्न होकर देवी पार्वती ने प्रकट होकर उसे ऐसा वरदान दिया। उसके बाद साची इन्द्र देव की पत्नी बन गयीं। भक्तों का विश्वास है कि अगर सच्चे मन से आप यहां पूजा करें तो उसी प्रकार आपकी इच्छा पूरी होती है। स्कंद पुराण  के केदार खंड में वर्णित है कि ज्वालपा देवी अपने भक्तों को मुक्ति प्रदान करती हैं। यहां उनकी पूजा मातेश्वरी जावालेश्वरी के रूप में होती है। कुछ लोग मानते हैं कि यह देवी हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा में पूज्य ज्वालपा देवी ही हैं।
      पूजा का प्राचीन स्थल उतना ही पुराना है जैसा कि केदारनाथ एवं बद्रीनाथ मंदिरों का है जो आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित किये गये थे। वर्तमान मंदिर का निर्माण वर्ष 1872 में हुआ, जबकि मूर्ति स्वयंभू है। गर्भ गृह में काली (ज्वालपा देवी), लक्ष्मी, सरस्वती एवं भगवान शिव की प्राचीन प्रतिमाएं हैं। मंदिर में पीढ़ियों से एक अखंड ज्योति प्रज्वलित है। अपने भक्तों से चावल एवं सरसों तेल का प्रसाद देवी ग्रहण करती हैं। मंदिर समिति द्वारा धर्मशाला के पीछे भगवान शिव को समर्पित एक इससे छोटा मंदिर है।
      मंदिर का रख-रखाव एवं संचालन एक समिति द्वारा होता है जिसके सदस्य अंदथ्वाल परिवार के होते हैं जो पीढ़ियों से इस मंदिर के पुजारी होते आये हैं। वे पास के ही गांव अनेठ के वासी हैं। आज गांव में पारी-पारी प्रथा अनुसार गांव का प्रत्येक सदस्य वर्ष में तीन चार दिनों का पुजारी के कर्त्तव्य का निर्वाह करता है। यह समिति पास के एक संस्कृत विद्यालय तथा मंदिर परिसर में एक धर्मशाला का संचालन भी करती है। समिति एक पंजीकृत संगठन है तथा इसके अपव्यय का लेखा परीक्षण होता है।