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Shri 1008 Mool Narayan Story - भगवान् मूल नारायण (नंदा देवी के भतीजे) की कथा

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, May 18, 2008, 03:43:02 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

मूल नारायण भगवान् के बालको ( बजैण एव नौलिंग ) का जनम संस्कार

तो इस प्रकार से भगवन मूल नारायण जी के अब दो पुत्र होते है!  रीति के अनुसार भगवान् मूल नारायण जी इन दोनों बालको का पाचवे दिन जोशी पंडित जी के यहाँ नक्षत्र देखने हेतु जाते है ! पंडित जी दोनों बालको का ग्रह नक्षत्र देखेते है और मूल नारायण भगवान् को बातें है की की आपके दोनों बालक दो बड़े अवतारी है !

तो इस प्रकार दोनों बालक का नामकरण संस्कार की तैयारी होती है!  तब मूल नारायण भगवान् सार देवी देवताओ को निमंत्रण भेजते है ! हिमालय से नंदा देवी भी वहाँ पहुचती है और साथ मे नंदा देवी के गान भी साथ मे आते है!

पंडित जी के अनुसार जो बालक बाज के पेडो के बीच यानी शिखर मे पैदा हुवा है उसका नाम " बजैण" और जो पचार के नौले के प्रकट हुवा उसका नाम नौलिंग रखा गया !

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भगवान् श्री १००८ बजैण एव नौलिग़ जी की शिक्षा प्रारम्भ ================================================================

इस प्रकार ये दोनों बालक अब इस पावन ( शिखर) धरती पर धीरे -२ बड़े होने लगते है और तब शिक्षा का समय भी आ जाता है !  मूल नारायण जी इन दोनों बालको को स्वयं बुक्साडी और अन्य विधियाये सिखाते है ! 
इन विधियाओ मे परांगत होने के बाद भगवान् मूल नारायण जी इन दोनों बालको के आगे की विधियाओ के बारे मे सोचते है! तब सोचते है इन दोनों बालको को काशी एव तीर्थ राज प्रयाग भेजने की सोचते है !




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भगवान् मूल नारायण जी का बजैण एव नौलिंग जी को अग्रिम शिक्षा के लिए काशी भेजना
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इस प्रकार से ये दोनों बालक काशी विश्वनाथ  ने लिए प्रस्थान करते है और भगवान् इन दोनों बालको के साथ कुछ अपने गणों को भी इनकी रक्षा हेतु भेजते है ! रास्ते मे कई कठिनायो सामना करने के बाद के काशी पहुचते है !

ये दोनों बालक तब काशी मे १४ विधायाये सीखते है! वहाँ इनकी माता सारंगी को पुत्रो के याद सताती है !  शिक्षा के पूरा होने पर ये दोनों बालक पुनः एक लंबे समय बाद शिखर पहुचते है !  शिखर पहुचते ही इनका भव्य सवागत होता है और ये दोनों अपने शिक्षा का अनुभव अपने माता पिता से साथ बाटते है


इन बालको ने निम्न लिखित विद्या इस काशी पीठ से ग्रहण किया

१) काशी गुरु के द्वारा - " राम विद्या"
२) शंकराचार्य गुरु के द्वारा -  " राक्षस विद्या"

इनके अलावा -

१)  चार वेद
२) चौदह शास्त्र
३)  अठारह पुराण
४)  दस कर्म
५)  सोलह को खडग विधा
६ ) बारह भगवत
७)  बुक्सान की विधा
८)  सभा मोहनी 
९)  त्रिया मोहनी
१०) संगीत विद्या एव अभिनय कला
११) निर्त्य विद्या
१२) नौ व्याकरण 



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बैजण एव नौलिंग जी का गुरु गोरख नाथ से गोरख ठिंगा प्राप्त करने के लिए तपस्या ============================================================

इस प्रकार से काशी के विद्या ग्रहण करने के बाद ये बालक अपने पिता मूल नारायण जी के कहते है की वे गुरु मुंड बनना चाहते है जिसके लिए उन्हें गुरु गोरख नाथ जी के पास जाना था! मूल नारायण जी इन दोनों बालको की इसके लिए मना करते है ! लेकिन इन बालक के जिद करने पर वे इनको गुरु गोरख नाथ जी के पास भेजने के लिए तैयार हो जाते है लेकिन साथ ही उनको चेतावनी भी देते है की गुरु उनको छल भी सकते है !

माता - पिता की अनुमति लेकर फिर से ये दोनों बालक गुरु गोरख नाथ के आश्रम के लिए प्रस्थान करते है! रास्ते मे कई कठिनायो का सामना करने के बाद ये गुरु के आश्रम मे पहुचते है ! गुरु  अपने विवेक जी यह पता लगा लेते है के ये दोनों बालक उनके पास आ रहे है और क्यो ना इनकी परीक्षा लिया जाय ! तब गुरु गोरख नाथ अपना आश्रम को सूखा बना कर अपना ध्यान मे बैठ जाते है ! ये बालक भी अपने निश्चय मे अटल थे ! इन बालको ने गुरु गोरख नाथ की धूनी को पुताई कर वहाँ फिर से आग जलाई और छह महीने बीत गए गुरु अभी भी ध्यान मे थे और ये बालक भी इन्तेजार मे गुरु के ध्यान के टूटने की ! तब बजेंन जी नौलिंग जी के कहते है की अभी तक गुरु जी ध्यान से नही जागे ! अचानक गुरु का ध्यान टूटता है और ये दोनों बालक गुरु के चरणों मे गिर जाते है और तब गुरु इन दोनों को गुरु मुंड बनाने के लिए स्वीकार कर लेते है !

अब ये बालक १२ वर्षो के तपस्या मी मे बैठ जाते है इनके शरीर मे दीमक ने मिटी की परत बना दी ! कितने सावन आए, धूप, गर्मी भी इन बालको के तपस्या मे बाधा न बन सकी ! अंत मे गुरु प्रसन्न होकर इन बालको को गोरख ठिंगा एव वसुन्धरा प्रदान करने के लिए तैयार हो जाते है ! लेकिन गुरु के मन मे फिर से सोच आता है की इन बालको का एक बार फिर से परीक्षा ली जाय! गुरु ने इन्हे कहा की मैं आप लोगो की तपस्या से प्रसन्न हूँ लेकिन आप लोगो को एक और परीक्षा पास करनी होगी !

गुरु ने कहा की उन्हें ४० सेर की एक चांदी की चांदनी ( झालर) को किसी पहाड़ के ऊँचे स्थान पर ले जाकर ७ समुन्द्र के बराबर पानी से धोकर और सुखा कर उनको देना है !  यह एक अति कठिन तपस्या थी! दोनों बालक इस परीक्षा के लिए तैयार हो जाते है और और चांदी की खन्द्रा को लेकर किसी ऊँचे पहाड़ के लिए चले जाते है !

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बालको का नंदा देवी को याद करना ====================================

अब ये बालक अति कठिनाई मे थे इन्होने ने नंदा देवी को सहायता के याद करते है ! नंदा देवी तुरुंत वहाँ आकर अपनी शक्ति से बहुत तीज वर्षा करती है जिससे ये बालक इस खन्द्रा को धोते है और सुखाने के लिए फिर से नंदा देवी अपनी शक्ति से तीज धूप वहाँ पैदा करती है जिससे के की ये बालक इस खन्द्रा को सुखाने मैं सफल हो जाते है !  इस प्रकार से ये दोनों अवतारी बालक इस परीक्षा को पास कर लेते है और गुरु इन्हे गोरख ठिंगा प्रदान करते है !

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बजैण एव नौलिंग बालको का गुरु गोरख नाथ के आश्रम से "गोरख ठिंगा" लेकर उत्तराखंड की ओर वापस प्रस्थान _________________________________________________________________________________

कई कठिन कठिनायो एव अति कठिन तप से पास होकर ये बालक गुरु गोरखनाथ से गोरख ठिंगा एव वसुंधरा लेकर उत्तरकाण्ड की देव भूमि के लिए वापस प्रस्थान करते है!  सर्व प्रथम ये बालक बद्रीनाथ के धाम के लिए निकलते है !

पैदल चलते -२ ये बालक हरिद्वार से होकर ऋषिकेश के लिए आगे बड़ते है ! ऋषिकेश मे पहुचकर ये वहाँ स्नान करना के बाद पूजा अर्चना करते है और तब बद्रीनाथ के लिए आगे बड़ते है ! हिमालय के कठिन रास्तों के आगे बदने के बाद ये आख़िर बद्रीनाथ पहुच गए !


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गोरु गोरख नाथ का छल ===========================================================

गुरु गोरखनाथ को इन दोनों बालको को वसुंधरा एव गोरख ठिंगा प्रदान करने के बाद दिमाग मे कुछ छल आया उन्होंने ने सोचा की वसुंधरा एव गोरख  ठिंगा इन दोनों बालको को देने के बाद उनकी शक्ति कम हो जायेगी ! तो इन्होने अपने गणों को बद्रीनाथ मे इन बालको के पहुचने के पहले भेज दिया !



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बजैण एव नौलिंग द्वारा बद्रीनाथ पर्वत को हिलाना
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[b]बजैण एव नौलिंग द्वारा बद्रीनाथ पर्वत को हिलाना _________________________________________________________________________________________________________________________________

जब ये दोनों बालक बद्रीनाथ मे पहुचते है इनके पूर्व वहाँ गुरु गोरख नाथ के दूत पहुच चुके होते है ! अतः वहाँ इन दोनोए बालको के स्वागत के लिए जहाँ देवताओ ने पूर वरसाने प्रराभ कर दिए वही दूसरी ओर बद्रीनाथ मे गुरु गोरखनाथ के भक्तो ने  षड्यंत्र रचना शुरू कर दिया !

कहा जाता है की बालक रास्ते मे गिरने वाले आकर्षक फूलों के अचानक खेलने लग जाते है ! तब ये फूलों से खेलने मे व्यस्त हो गए तो उनको यह भी पता नही चलता है की हमने गुरु " गोरख ठिंगा" एव " वसुंधरा"(जिसे इन्होने ने वर्षो के तपस्या करके गुरु गोरख नाथ से अर्जित किया था) उन्होंने इन्हे कहाँ पर रख दिया ! भाग्य से गुरु गोरखनाथ के गणों को केवल " वसुंधरा" दिखायी दी " जिसे इन गणों ने बद्रीनाथ के छत मे छिपा दिया !

उधर ये दोनों बालक वसुंधरा एव गुरु गोरख ठिंगा को खोजने लगते  तो उनको गुरु गोरख ठिंगा तो मिल जाती है परन्तु " वसुंधरा" नही मिलती है! वसुंधरा को दूड़ने और उसका प्राप्त न होने पर ये बालक प्रारम्भ मे बहुत घबरा जाते है परन्तु बाद मे उन्होंने वहाँ पर उपस्थित देवताओ से पूछा कि " वसुंधरा" किसने छिपा दिया, तब देवताओ ने सारी बात बता दी और वसुंधरा के छत पर छिपा देने कि बात भी वे बता देते है !

जब ये बालक देवताओ के बद्रीनाथ मन्दिर के छत से वसुंधरा निकाल कर लाने की बात देवताओ से कहते है परन्तु देवता इस पर अपनी असमर्थता व्यक्त कि तो ये दोनों बालक बहुत गुस्सा हो गए और उन्होंने ने गुरु गोरख नाथ ठिंगा कि शकित से "  बद्रीनाथ पर्वत" को हिलाना प्रारम्भ कर दिया जिसे बद्रीनाथ मन्दिर भी हिलने लग गया !

अब ये सब देखकर गुरु गोरख नाथ के गण जिन्होंने ने यह वसुंधरा छुपाया था, भयभीत होने लगे ! तब सभी देवताओ ने इन दोनों बालको के चरणों मे विनती करने लगे ! तब तक बद्रीनाथ पर्वत एक और ज्यादा झुका हुवा है !  फिर ये वसुंधरा इन बालको को ये गण मन्दिर के निकाल के दे देते है !अब ये बालक बद्रीनाथ मन्दिर मे पूजा अर्चना करते है
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देवताओं के फिर से इन बालको के साथ छल करना
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देवताओ ने अपनी हार का बदला लेने के लिए फिर से इन बालको बदला लेने कि कार्यवाही करना शुरू कर दिया ! अचानक बजैण जी के पीछे उन्होंने जादू पठवा  लगा दिया जिसे बालक बजैण जी के हाथ मे पकड़ा हुवा " गुरु गोरख ठिंगा " उड़ने लगता है ! यह बात तुरुंत बजैण जी नौलिंग जी को बता देते है! तब भगवान् नौलिंग जी " गुरु गोरख ठिंगा" अपने हाथ मे पकड़ लेते है, क्योकि नौलिंग जी को इस विद्या का ज्ञान ज्यादे था ! यह वही विद्या थी " बुकसाड़ी" जो इन्होने ने काशी से सीखी थी !

कहा जाता है कि तब ये दोनों बालक " गुरु गोरख ठिंगा " एव " वसुंधरा" को सुरुक्षित रखते हुए बद्रीनाथ की सीमा से बाहर निकाल आए !

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720



बजैण एव नौलिंग का नैनीताल होते शिखर तब कि यात्रा

पतित पावन बद्रीनारायण के पावन धाम के बाद इस रमणीक क्षेत्र से धीरे -२ आगे बढ कर ये दोनों अशी - वंशी अवतारी बालक नैनीताल मे पहुचते है ! बद्रीनाथ धाम से नैनीताल कि पैदल यात्रा अत्यन्त मनोहारी है ! तब ये बालक भी तब प्रकृति के सौन्दर्य का अनुभव लेते हुए नैनीताल पहुचते है ! नैना देवी कि पूजा करने के बाद ये अल्मोड़ा शहर पहुचते है जहाँ ये नंदा देवी के मन्दिर मे पूजा करने के बाद दूसरे दिन बागनाथ मन्दिर बागेश्वर के लिए प्रस्थान करते है !

बागेश्वर मे भगवान् बागनाथ के मन्दिर मे पुहुच कर ये दोनों भाई बागनाथ भगवान् के दर्शन करते है! रात्री विश्राम करते हुए ये दोनों भाई प्रातः उठकर नदी सरयू मे स्नान करे है तथा ठीक सूर्योदय को पानी चदते है ! इसके बाद बागनाथ मन्दिर मे पूजा करने के बाद ये दोनों भाई पवित्र धाम शिखर के लिए प्रस्थान करते है ! 

बागेश्वर के कुछ दूरी तक तो भगवान् बजैण एव नौलिंग सरयू नदी के किनारे-२ प्रातः काल की अत्यन्त सुख देने वाली सुंदर धूप के सरयू तट आनंद लेते हुए आगे बड़ते है !

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बजैण एव नौलिंग जी का दुग पट्टी मे पहुचना
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ये बालक देखने मे अति सुंदर भगवन राम - लक्ष्मण की जोड़ी की तरह नगर एव ग्रामवासियों के लिए अत्यन्त आकर्षण के केंदर बन जाते है! इधर दुग पट्टी मी जब इनका प्रवेश होता है तो शरद ऋतू की अत्यन्त मोहक प्रकृति से इनका सौन्दर्य मिलकर अत्यन्त आकर्षक हो जाता है !

जिस पुगर नदी के किनारे -२ ये दोनों अवतारी बालक आगे बड़ते है यह नदी बाद मी बालीघाट मे सरयू नदी के मिल जाती है! वही से सरयू की जलराशी भी दूनी हो जाती है ! ये बालक चलते -२ अपने पिता भगवान् " मूल नारायण" की चौकी पर पहुच जाते है ! इस प्रकार से ये बालक अब आगे बड़ते रहते है !

अब ये बालक भेष बदलने की विधा का प्रयोग करते हुए जोगी का रूप धारण कर लेते है ! नाट्य विद्या का वयाहारिक रूप के प्रयोग कर ये लोग चौकी मे न बैठ कर, गाव -२ मे घूमते हुए आगे बड़ते है !

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नाकुरी पट्टी मे प्रवेश ( जारती, पपोली एव रीमा का इलाका जो रंगीली नाकुरी के नाम से भी जाना जाता है
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चमत्कार दिखाना शुरू
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अब ये अवतारी बालक नौकुरी पट्टी मे पहुचते है इस समय तक इन बालको को आदर जायद और तिरस्कार कम मिला था! परन्तु ये नाकुरी पट्टी के सुकाली गाव मे प्रवेश करते है, तो ये अचानक गणेश सुरकाली की घरवाली की दृष्टि इन पर पड़ती है ! यह जोगियों के चिड्ती थी तो उसके जोर-२ चिलाना प्रारम्भ कर दिया कि " अरे जोगियों ! और आ गए ये जोगी! इस साल के जैसे जोगी हमने कभी नही देखे और सालो कम जोगी आते थे इस साल तो हद ही हो गयी ! इस बरस जितना आनाज हो रहा है हमारे खेती मे आधा तो इनको ही देना पड़ रहा है ! ऐसा कहते हुए गोठ मे दूध दुहने के लिए चली जाती है  और जाते -२ कह जाती है " पहले मै दूध दुहने का काम क्यो न  कर लू, तुम जोगियों का सत्कार बाद मे देख लूगी ! पहले इधर - उधर घूम आवो !

उस महिला का व्यहार बजैण जी को अच्छा नही लगा! खैर नौलिग़ जी भी क्रोधित थे परन्तु बजैण भगवन को रोष ( अधिक क्रोध) आ आया ! तब गणेश सुरकाली कि औरत अचानक क्या देखती है कि गाय के एक थन से दूध और एक से खूने आने लगता है वह गोठ मे अपने पति को आवाज लगाने लगती है और कहती है कि इन जोगियों को यहाँ से हटा दो गाय के एक थान से खून आ रहा है !

इतने मे दूसरी घटना घटित हो जाती है, क्या होता है कि इस झालू गाय का मालू बछड़ा गोठ से ( लकड़ी व मिटटी से बनी सतह जिसे पाल कहते है) फाड़कर अन्दर फटकने लगता है और देखते -२ मालू बछड़ा छत के पाथर तोड़ते हए पाख मे फटकने लगता है !  तब बजैण जी अपने मंत्र कि शक्ति से उस बछड़े को अपनी झोले मे डाल देते है! यह करतब देखर गणेश सुरकाली कि औरत हैरत हो जाती है और एकत्रित ग्रामीण जनों के द्वारा कारण पूछे जाने पर क्रोधित हो जाती जाती है !

तब गणेश सुरकाली कि घरवाली भगवान् के क्षमा मागती है रोने लगती है जोगी के रूप मे ये दोनों बालक ( भगवान्) इसे माफ़ कर देते है !

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अब स्पूटिक शिलाखंड मे जोगी कि भेष भूषा उतार कर, पूर्व परिधान पहन कर दोनों बालको का बैठ कर खूब बातें करना

हरी पिंगली सुंदर दानु के एक सुंदर स्थान मे उस सुंदर स्पूटिक शिलाखंड मे बैठ कर दोनों बालक दुग पट्टी एव नाकुरी पट्टी के अनेक गावो मे घूमने के बाद का अनुभव एक दूसरे से बाटते है !

इस प्रकार से नौलिंग जी और बजैण जी आपस मे बातें करते रहते है  ! तब नौलिंग जी नाकुरी पट्टी के गावो के नाम बोल देते है !  ये इस प्रकार से है , भाटनी कोट, खल्दोदी, बल्दोदी, तुपेड़, कउली, महरगाड, दर्सिंग, होराली, गदेरा उस पार डपटी, शेरी, उत्तर दुग, जरमानी, पद्ग्योदा, महारोदी, इधर किदाई, पचार, मोहरी, जारती, पपोली, उदियार, सुरकाली, बाफिला वाग, उदियूदा, सियोनी गाव, कुरोली, बैकोदी आदि.     

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अब दोनों बालको का अपने माता पिता के पास शिखर पहुचना
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गुरु गोरख नाथ ठिंगा एव वसुंधरा को बेहद कठिनायो के प्राप्त कर अब ये बालक बजैण एव नौलिंग जी अपने माता - पिता (मूल नारायण जी एव माता सारंगी) के पास शिखर मे पहुचते है!  बजैण जी कहते है कि " धरती पर सारे संसार मे यदि बसा सुंदर स्थान यदि कोई है तो यह शिखर है"

इस प्रकार ये दोनों अपनी यात्रा एव तपस्या का अनुभव अपने माता पिता को बाटते है !



THIS IS THE PHOTO OF SHIKHAR...






इस प्रकार से इन दोनों अवतारी बालक की विद्या पूरी हो चुकी होती है, अब भगवान् मूल नारायण जी और भी सामाजिक, व्योहारिक चीजो के बारे मे इन बालको को जानकारी देते है! इसके अलावा भगवान् मूल नारायण जी इन दोनों बालको को कई इलाको मे हो रहे अत्याचारों के बारे मे जानकारी दे और इन बालको के कहते है अब प्रजा के हित मे इन अत्याचारों मिटाने ले लिए अवतार लेना होगा!

मूल नारायण जी इन बालको को बताते है की भानार क्षेत्र मे एक चनौला ब्रह्मण और उसकी पत्नी का अत्याचार फैला हुवा है जो भोली भाली गरीब जनता को शोषण करते है और उनको आपस मे लडाते है ! जिसके लिए बड़े पुत्र बजैण को इनका अत्याचार समाप्त करना होगा !  यानी बजैण जी को भानर क्षेत्र मे अवतार लेना होगा !

दूसरी तरफ़ सनगाड़ की जनता एक " सनगडिया" राक्षस के आतंक से भयभीत है और लोगो के जीना इस विशाल काय राक्षस ने हरान किया हुवा है! उसकी जटाए इतनी बड़ी की जब यह राक्षस चलता है तो वहः की भूमि पेड तक टूट जाते है और उसका शरीर इतना विशाल काय की इसके चलने पर धरती हिल जाती है और इसके दांत इतने बड़े मानो आसमान छू रहा हो!  तो नौलिंग जी को इस राक्षस को अंत करना था! यह एक बहुत ही कठिन काम था !

यहाँ पर नौलिंग जी कहते है कि वे अपने भाई कि मदद करना चाहते है तब मूल नारायण जी कहते है कि यह काम बजैण जी ही करंगे और आप सनगडिया को अत्याचार खत्म करने कि योजना बनाओ !

तब ये दोनों बालक अपने पिता जी के अनुसार जनहित मे अपना -२ कार्य शुरू कर देते है !