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Musical Instruments Of Uttarakhand - उत्तराखण्ड के लोक वाद्य यन्त्र

Started by पंकज सिंह महर, May 26, 2008, 12:00:41 PM

Pawan Pathak

बरसों से कुमाऊंनी लोक उत्सवों में भी हुड़के का हो रहा उपयोग
हुड़के के बिना नहीं होती कुमाऊं में जागर

अल्मोड़ा। लोक वाद्यों में हुड़का कुमाऊं में सर्वाधिक पसंद किया जाता है। स्थानीय देवी-देवताओं के जागर के साथ ही हुड़का विभिन्न उत्सवों, लोक गीतों और लोक नृत्यों में प्रयुक्त होने वाला मुख्य लोक वाद्य है। इसका मुख्य भाग लकड़ी का बना होता है, जिसे अंदर से खोखला कर दिया जाता है।
हुड़के के दोनों ओर के सिरे बकरे के आमाशय की झिल्ली से मढ़कर आपस में एक-दूसरे की डोरी से कस दिए जाते हैं। लकड़ी वाले भाग को स्थानीय बोली में नाई (नाली) कहते हैं। इसे बजाने के लिए कंधे पर लटकाने के लिए इसके बीच (कमर के पास) से कपड़े की पट्टी को डोरी से बांध दिया जाता है। हुड़का बजाते समय कपड़े की पट्टी का खिंचाव हुड़के की पुड़ी और डोरी पर पड़ता है, जिससे इसकी आवाज संतुलित की जाती है।
हुड़का जागर लगाने का एक प्रमुख वाद्य है।
कुमाऊं के लोक देवता गंगनाथ का जागर केवल हुड़के पर ही लगाया जाता है, जबकि बैसी में हुड़का प्रयोग में नहीं लाया जाता। अधिकतर तीन दिन से लेकर पांच दिन तक के जागर हुड़के पर ही लगाए जाते हैं। वरिष्ठ रंगकर्मी जुगल किशोर पेटशाली के मुताबिक हुड़के की नाली का निर्माण बरों, खिन अथवा खिमर की लकड़ी से होता है। मैदानी इलाकों में हुड़के की नाली इमली और जंगली बेर की लकड़ी से बनाया जाता है। झोड़ा, चांचरी, छपेली, हुड़किया बौल आदि लोकगीत हुड़के की थाप पर ही गाए जाते हैं।


Source- http://epaper.amarujala.com/svww_zoomart.php?Artname=20150408a_002115008&ileft=573&itop=872&zoomRatio=183&AN=20150408a_002115008

Pawan Pathak

कनार के भगवती मंदिर में बजता है बड़ा ढोल
अमर उजाला ब्यूरो
से तो कुमाऊं के मंदिरों में आयोजित होने वाले हर पूजा कार्यक्रम में ढोल-नगाड़ों का बड़ा महत्व है। शादी विवाह के समय भी ढोल नगाड़े ले जाने की परंपरा रही है। लोक देवताओं के अवतरण के समय इन ढोल- नगाड़ों से ही आह्वान किया जाता है। धारचूला तहसील के कनार स्थित भगवती मंदिर में माघ महीने की पूर्णिमा के दिन होने वाली पूजा के समय बड़ा ढोल बजाया जाता है। यह ढोल देवी को अर्पित होता है। इसे बजाने वाले वादक काफी कुशल होते हैं। बड़े ढोल का वजन 80 किलोग्राम होता है। ऐसे में दूसरे व्यक्ति की भी मदद ली जाती है।
यह ढोल तांबे का होता है। उसमें जानवर की खाल चढ़ाई जाती है। ढोल की आवाज को ज्यादा बुलंद करने के लिए उसमें घी भरा जाता है। ठीक इसी तरह छोटे ढोल भी होते हैं। उनमें भी पांच लीटर तक घी पड़ता है। इन ढोलों को बजाने के लिए बड़ी लकड़ी बनाई जाती हैं। जब मंदिर में ढोल बजता है तो उसकी आवाज बहुत दूर पहाड़ों तक गूंजती है।
कनार की देवी के इस ढोल को शादी विवाह में नहीं ले जाया जाता। कनार के बड़े ढोल को उमेद सिंह परिहार बजाते हैं। इस ढोल से निकलने वाले स्वरों से देवी भगवती प्रसन्न हो जाती है। बजाते समय वीर रस वाली धुन को प्राथमिकता दी जाती है।



Source-http://epaper.amarujala.com/svww_zoomart.php?Artname=20150409a_005115003&ileft=-5&itop=73&zoomRatio=130&AN=20150409a_005115003

Pawan Pathak

मशकबीन की धुन बिना छोलिया नृत्य है अधूरा
अमर उजाला ब्यूरो
अल्मोड़ा। मशकबीन पर्वतीय अंचल का प्रमुख लोकवाद्य है। मशकबीन खासतौर पर छोलिया नृत्य में बजने वाले बैंड के साथ ही मेलों में भी बजता है। मशकबीन के बगैर छोलिया नृत्य अधूरा है। कुमाऊं रेजीमेंट के बैंड में भी मशकबीन एक प्रमुख वाद्य के रूप में बजता है। पुरानी मशकबीनों के पीछे कंधे पर लटकने वाले तीनों पाइप (बीन) के जोड़ (छल्ले) हाथी के दांत के बने होते थे लेकिन अब हाथी के दांत के छल्ले नहीं मिलते। अब गिलट और पीतल के छल्ले का प्रयोग होता है।
मशकबीन का मुख्य भाग एक चमड़े की थैलीनुमा मशक होता है। इसमें पांच छेद करके चार छेदों में पिपरियां लगा दी जाती हैं। मशक को बजाते समय बगल में दबाया जाता है। बगल में दबाकर इसकी एक नली को मुंह में डाला जाता है। जिससे वादक मशक के अंदर लगातार हवा भरता रहता है। फूंक मारने वाली नली के भीतर पिपरी नहीं होती। दूसरी पिपरी से वादक बांसुरी की तरह आवश्यक धुन निकालते हैं। इस बांसुरी को चंडल कहते हैं। वादक जब मशक के अंदर हवा भरते हैं तो यह हवा चार जगह को विभाजित होती है। चंडल में जाने वाली हवा से बांसुरी की तर्ज पर धुनें बजती हैं। दूसरी हवा तीन पाइपों की तरफ जाती है, जो पीछे कंधे की तरफ लटकाए जाते हैं। इन पाइपों का उपयोग बांसुरी की तरह नहीं किया जाता। इनसे लगातार एक जैसा ही स्वर निकलता है, जो बांसुरी की तरह बजने वाली धुन के सौंदर्य को और भी बढ़ा देता है।
वरिष्ठ रंगकर्मी जुगल किशोर पेटशाली बताते हैं कि कुछ साल पहले तक यह धारणा भी थी कि मशकबीन एक विदेशी वाद्य है लेकिन जिस तरह यह वाद्य लंबे समय से पहाड़ का एक प्रमुख लोकवाद्य रहा है उससे लगता है यह प्राचीन समय से ही हमारा लोक वाद्य रहा है।


Source-http://epaper.amarujala.com/svww_zoomart.php?Artname=20150414a_004115006&ileft=-5&itop=444&zoomRatio=130&AN=20150414a_004115006