• Welcome to MeraPahad Community Of Uttarakhand Lovers.
 

Hydro Projects In Uttarakhand - उत्तराखंड मे बन रहे हाड्रो प्रोजेक्ट

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, June 09, 2008, 04:57:19 PM

उत्तराखंड मे बन रहे हाड्रो प्रोजेक्ट वरदान या अभिशाप ?

अभिशाप
21 (56.8%)
वरदान
10 (27%)
कह नहीं सकते
6 (16.2%)

Total Members Voted: 37

Voting closes: October 10, 2037, 04:59:09 PM

पंकज सिंह महर

फेसबुक पर No More Dam In Uttarakhand ... जागो उत्तराखंड सरकार पर हमारे एक सदस्य की कवितामय टिप्पणी

नै नाना ना ठुल,
बांध चाईने नै हमुन,
कैस बाधनोछा?
ऊ गंगा स, जैक वेग रोकना लिजि,
शिवज्यू कें ऊन पड़ो धरती में।
...बणुन च त रन आफ द रिवर बणाओ,
बिजुली बणुण का और ल तरीका छन,
सरकार और सरकार का लोगो,
ह्वै सकछ, उन तरीकान में ज्यादा डबल हुन।

ही ही ही, कोशिश करबेर ले देखो,
एक्के सोलर लालटेन कतुक डबलन में बेची जाली,
खाण छ त खाओ, लेकिन डबल खाओ,
हमारा जंगल, हमरी सभ्यता, हमरी जान त नि खाओ।

पंकज सिंह महर

यह बात सही है कि आज के दौर में ऊर्जा की अत्यन्त आवश्यकता है, वह भी तब जब आपका राज्य नया हो, वहां पर औद्योगिकीकरण की प्रक्रिया आरम्भ में हो। लेकिन हमारे हुक्मरानों को यह भी ध्यान में रखना चाहिये कि ऊर्जा के अन्य विकल्प हो सकते हैं, लेकिन नदियों के नहीं। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिये कि इन्हीं नदियों के किनारों पर ही उत्तराखण्ड की बसावटें हैं, इन्हीं नदियों के पानी से हमारे जंगल पल रहे हैं, जैव-विविधता इन्हीं नदियों के कारण इन्हीं के किनारे है। अगर इन नदियों का पानी सुरंगों में डाल दिया जायेगा तो क्या इससे इसके आस-पास की बसावटे और जंगल प्रभावित नहीं होंगे?

पंकज सिंह महर



जल विद्युत परियोजनाओं के लिये खोदी गई सुरंगों से घरों में पड़ी दरारें।

फोटो साभार- श्री वेद बडोला

पंकज सिंह महर

नैनीताल समाचार ने इस संबंध में एक विस्तृत रिपोर्ट पेश की है, निम्न लिंक पर

http://www.nainitalsamachar.in/these-types-of-initiatives-should-continue/

साथ में उत्तराखण्ड में निर्माणाधीन योजनाओं को डाट के माध्यम से नक्शे में दर्शाया है, जिससे पूरा नक्शा भरा पड़ा है


Rajneesh

जिस तरह से उत्तराखंड को वंहा की सरकार प्रगति के नाम पर ख़तम कर रही है   उसे देख कर लगता है अधिक से अधिक ३० साल की आयु और बाकी रह गई है उत्तराखंड   की उसके बाद तो सिर्फ बिजली भूमि नाम ही रह जाएगा उत्तराखंड का . लेकिन   सबसे बड़ी बात धयान देने वाली ये है की उत्तराखंड को जिस- तरह बाँध बनाने   के नाम से बेचा जा रहा है, वो नेताओ की सबसे बड़ी चाल है , कयोंकि बाँध   बनाने के लिए पानी की जरुरत होती है जो आज उत्तराखंड में नहीं है. और   सुरंगो को बनाने के लिए जो विस्फोट किये जा रहे है उनसे प्राकृतिक पानी के   स्रोत ख़तम हो चुके है जोशीमठ के कई गावो आज इन सुरंगो की वजह से ख़तम हो   चुके है.. कितने शर्म की बात है कुछ राज नेता अपने फायेदे के लिए उत्तराखंड   और वंहा के लोगों को बेचने से भी पीछे नहीं हट रहे है.. अगर सरकार को   उत्तराखंड में प्रगति की इतनी फिकर है तो क्यों नहीं उत्तराखंड के पर्यटन   को बढ़ावा देती है आज तक आपने कभी किसी चैनेल पर उत्तराखंड के पर्यटन की   धरोहर का प्रचार प्रसार नहीं देखा होगा? कयोंकि इसके लिए राजनेताओ को बड़ी   बड़ी कंपनियों से रिशवत नहीं मिलती है.. आज हमलोग उत्तराखंड के बहार रहते   है हमे लगता है इतना आसन थोड़े ही उत्तराखंड को ख़तम करना इस बात पर थोडा   धयान देना की कभी टिहरी के लोगों ने भी ऐसा ही सोचा था और आज पुराना टिहरी   पानी की गोद में समा चूका है.
और किस बात की बिजली की बातें हो रही है   आज इतना बड़ा बाँध उत्तराखंड में बनया गया लेकिन शायद ही बारह घंटे भी   लगातार बिजली आती हो उत्तराखंड में , पीने के लिए पानी ख़तम हो चूका है, और   आज भी टिहरी डाम से बिजली बनना अभी भी कोशो दूर है, और उसके बाद पांच सौ   जे जादा बाँध और बनाने बाकि है उत्तराखंड में.. आज भी टिहरी में कई बूढी   आँखों से पुरानी यादों के आंसूं निकलते है.. और टिहरी बाँध बनने के पीछे   ऐसे ही कुछ लोगों का हाथ था जो वंहा से बहार बस चुके थे जिन्होंने वंहा के   स्थानीय लोगों का साथ न देकर सरकार का साथ दिया कयोंकि वो जानते थे की उनको   उत्तराखंड में नहीं रहना है और अपनी जमीन के अवज में उनको लाखो रूपये की   जमीं देहरादून में मिल जाएगी अगर हर प्रवासी की सोच ऐसी होगी तो फीर   उत्तराखंड की आखिरी तस्वीर बनना सुरु हो चुकी है.. हमें साथ देना चाहिये   उत्तराखंड के स्थानीय लोगों का और उनकी आवज़ बननी चाहिए... .. अगर आपके के   अन्दर उत्तराखंड को लेकर थोड़ी बहुत भी भावनाए है तो इन नेताओ को इसे बेचने   से रोकना होगा वर्ना उत्तराखंड ख़तम होने में अब जादा देर नहीं है..


हुक्का बू

प्रश्न यह है कि इतने बांध बन जाने के बाद भी हमें मिला क्या? आज भी हमारे पर्वतीय क्षेत्र में ८-८ घंटे कटौती जारी है। देहरादून तक में २ घंटे की घोषित और लभग २ घंटे की अघोषित कटौती हो रही है। रुद्रपुर और हरिद्वार में उद्योगी परेशान हैं, कुछ सक्षम उद्यमियों ने यह भी प्रस्ताव रखा है कि अगर सरकार अनुमति दे दे तो फिर वे अपने स्तर पर निजी क्षेत्र से बिजली खरीद लेंगे।

फिर काये का ऊर्जा प्रदेश भाई? उ०प्र० के समय में स्वीकृत अधिकांश योजनायें भारत सरकार के उपक्रमों की हैं, जो १२ % बिजली ही उत्तराखण्ड को देते हैं,  क्योंकि पूर्ववर्ती राज्य होने के कारण उत्पादित बिजली में उ०प्र० का भी हिस्सा होता है।

जब बांध से सिर्फ उजाड़्ना ही है और देना कुछ नहीं है तो इस छोटे से राज्य की जैव तथा मानव विविधता के साथ खिलवाड़ क्यों किया जा रहा है?

हुक्का बू

मजे की बात तो यह है कि यह बांध हैं किस चीज के, पानी के या पैसे के। मुझे तो लगता है कि कुछ पूंजीपतियों और कुछ राजनेताओं के लिये यह पैसे के बांध हैं। जिनका उत्तराखण्ड और उसके सरोकारों से कुछ लेना-देना नहीं है।

बिजली बनाने के और भी कई स्रोत हैं, उन पर भी विचार किया जाना चाहिये, भूकम्प की दृष्टि से पूरा उत्तराखण्ड संवेदनशील है। राजधानी गैरसैंण ले जाने की बात आई तो कहा जाता है, वहां भूकम्प आ जायेगा, लेकिन इन बांधों के जरिये पानी रोक, सुरंग बनाने के लिये विस्फोट कर पहाड़ों की जड़ो को हिलाया जा रहा है, बांधों में पानी भरकर कच्चे पहाड़ॊं को पानी पिलाया जा रहा है। बांध की दीवार ही तो आप भूकम्परोधी बना पाओगे, बांध के नीचे की जमीन और किनारों की जमीन जो कच्ची है (मध्य हिमालय होने के कारण उत्तराखण्ड के पहाड़ अभी प्रारम्भिक अवस्था में हैं) उसे पानी पिला कर कच्चा किया जा रहा है। एक छोटा सा भूकम्प भी इनको भरभरा कर गिरने से क्या रोक पायेगा?

एक और महत्वपूर्ण चीज, भगवान न करे कि कभी ऐसा हो, अगर किसी दिन इन बांधों से कोई आपदा आ गई तो उसकी प्रतिपूर्ति के लिये क्या बांध निर्माण कम्पनियों की जिम्मेदारी फिक्स की गई है या नही?

सुन्दर सिंह नेगी ने तो बहुत पहले ही यह कह दिया है अपनी कविता के माध्यम से कि.

"जिसे तुम विकास कहते हो, वही तो विनास है"।

अब अधिकतर लोग कवि की इस सोच को नकारात्मक कहते है लेकिन कवि जो सोचता है,लिखता है वह या तो उसके सामने हो रहा होता है या हो चुका होता है उससे आघे की वह जो बात कहता है, लिखता है वह कवि की भविष्य के लिए एक चेतना होती है।

सुन्दर सिंह नेगी

हलिया

ये कैसा ऊर्जा परदेश ठैरा हो?  बिजली कहो तो दिन में तो थोडी‌‌ आती है रात को पट्ट ठैरी।  अब दिन भर सब घर के बाहर ठैरे अपने-अपने काम धंधे में तो क्या फैदा उस बिजली का?  रात को भीतर काम ठैरा तो बिजली डिम हो जाने वाली ठैरी?  सोलर लैम्प जिंदाबाद्।  और देखो मजेदार बात बिजली का बिल गांव में जो ज्यादा आने वाल हुवा मेरे दगडिया जो दिल्ली में रह्ते हैं उनका कम्।  ये क्या ठैरा हो?  मेरी तो कुच्छ समझ में नहीं आ रहा।  सरकार कभी मेरे जैसे गरीब-गुर्दों के बारे में भी सोचेगी कि नहीं???     किसी भी बारे में तो सोचे।

हुक्का बू

कुछ दिनों पहले हिन्दुस्तान अखबार में एक समाचार पढ़कर दंग रह गया, उस समाचार का लब्बोलुआब यह था कि पांडुकेश्वर में जहां शीतकाल में कुबेर जी की मूर्ति रखी जाती है, उससे कुछ दूरी पर लामबगड़ में एक बांध परियोजना का काम चल रहा है। जिसने सारा पानी रोक दिया है, हालत यह है कि मंदिरों में रखी मूर्तियों को स्नान कराने के लिये भी पानी नहीं मिल पा रहा है।
और तो और किसी की मृत्यु हो जाने पर कुछ लोग शव को लेकर पांडुकेश्वर घाट पर आ जाते है और कुछ बांध कम्पनी से पानी छोड़ने की गुहार लगाने लामबगड़ जाते हैं। लामबगड़ से फिर पानी छोड़ा जाता है जो लगभग दो घंटे में पांडुकेश्वर पहुंचता है, उसके बाद ही अंतिम संस्कार हो पाता है।

इससे हम क्या समझे, क्या ऐसा विकास पाने के लिये हमने इतनी लम्बी लड़ाई लड़ी। जंगल से तो हमको पहले ही बेदखल कर दिया था, आज बांध माफियाओं के लिये हमें पानी से मरहूम किया जा रहा है। हो सकता है किसी दिन किसी भू माफिया को खुश करने के लिये हमें हमारे ही घर से निकाल दिया जाय।