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शिवानी "गौरा पन्त" - हिन्दी साहित्य का एक चमकता सितारा

Started by हेम पन्त, June 21, 2008, 01:25:25 PM

हेम पन्त


कुमाऊँनी समाज पर लिखने वाले रचनाकारों में शिवानी अग्रणी लेखिका हैं. गौरा पंत 'शिवानी' का जन्म 17 अक्टूबर, 1923 को विजयादशमी के दिन राजकोट (गुजरात) में हुआ। आधुनिक अग्रगामी विचारों के समर्थक पिता श्री अश्विनीकुमार पाण्डे राजकोट स्थित राजकुमार कॉलेज के प्रिंसिपल थे, जो कालांतर में माणबदर और रामपुर की रियासतों में दीवान भी रहे। माता और पिता दोनों ही विद्वान संगीतप्रेमी और कई भाषाओं के ज्ञाता थे। साहित्य और संगीत के प्रति एक गहरा रुझान 'शिवानी' को उनसे ही मिला। शिवानी जी के पितामह संस्कृत के प्रकांड विद्वान पं. हरिराम पाण्डे, जो बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में धर्मोपदेशक थे, परम्परानिष्ठ और कट्टर सनातनी थे। महामना मदनमोहन मालवीय से उनकी गहन मैत्री थी। वे प्रायः अल्मोड़ा तथा बनारस में रहते थे, अतः अपनी बड़ी बहन तथा भाई के साथ शिवानी जी का बचपन भी दादाजी की छत्रछाया में उक्त स्थानों पर बीता, किशोरावस्था शान्तिनिकेतन में और युवावस्था अपने शिक्षाविद् पति के साथ उत्तर प्रदेश के विभिन्न भागों में। पति के असामयिक निधन के बाद वे लम्बे समय तक लखनऊ में रहीं और अन्तिम समय में दिल्ली में अपनी बेटियों तथा अमेरिका में बसे पुत्र के परिवार के बीच अधिक समय बिताया। उनके लेखन तथा व्यक्तित्व में उदारवादिता और परम्परानिष्ठता का जो अद्भुत मेल है, उनकी जड़ें, इसी विविधतापूर्ण जीवन में थीं।

हेम पन्त

शिवानी की पहली रचना अल्मोड़ा से निकलनेवाली 'नटखट' नामक एक बाल पत्रिका में छपी थी। तब वे मात्र बारह वर्ष की थीं। इसके बाद वे मालवीय जी की सलाह पर पढ़ने के लिए अपनी बड़ी बहन जयंती तथा भाई त्रिभुवन के साथ शान्तिनिकेतन भेजी गईं, जहाँ स्कूल तथा कॉलेज की पत्रिकाओं में बांग्ला में उनकी रचनाएँ नियमित रूप से छपती रहीं। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर उन्हें 'गोरा' पुकारते थे। उनकी ही सलाह, कि हर लेखक को मातृभाषा में ही लेखन करना चाहिए, को शिरोधार्य कर उन्होंने हिन्दी में लिखना प्रारम्भ किया। 'शिवानी' की एक लघु रचना 'मैं मुर्गा हूँ' 1951 में 'धर्मयुग' में छपी थी। इसके बाद आई उनकी कहानी 'लाल हवेली' और तब से जो लेखन-क्रम शुरू हुआ, उनके जीवन के अन्तिम दिनों तक अनवरत चलता रहा।

हेम पन्त

1982 में शिवानी जी को पद्मश्री से अलंकृत किया गया। उपन्यास, कहानी, व्यक्तिचित्र, बाल उपन्यास और संस्मरणों के अतिरिक्त, लखनऊ से निकलनेवाले पत्र 'स्वतन्त्र भारत' के लिए 'शिवानी' ने वर्षों तक एक चर्चित स्तम्भ 'वातायन' भी लिखा। उनके लखनऊ स्थित आवास-66 गुलस्ताँ कालोनी के द्वार लेखकों, कलाकारों, साहित्य-प्रेमियों के साथ समाज के हर वर्ग से जुड़े उनके पाठकों के लिए सदैव खुले रहे। 21 मार्च, 2003 को दिल्ली में 79 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ।

Anubhav / अनुभव उपाध्याय


हेम पन्त

शिवानी जी के लिखे गये कई उपन्यास, कहानी संग्रह, संस्मरण व यात्रा वर्णन हिन्दी साहित्य में एक विशिष्ट स्थान रखते हैं. उनकी रचनाओं में कुमाऊनी, बांग्ला तथा गुजराती सहित अन्य भाषाओं का भी पुट मिलता है. मुख्यतः महिलाओं पर केन्द्रित उनकी कहानियां बहुत अधिक पसंद की जाती हैं. शिवानी जी का सर्वाधिक चर्चित कहानी संग्रह "करिये छिमा" है. इस कहानी संग्रह की शीर्षक कहानी पहाड की एक परित्यक्त महिला पर आधारित है.

हेम पन्त

शिवानी जी की कुछ प्रसिद्ध रचनाएं-
आमादेर शान्तिनिकेतन, एक थी रामरती, कृष्णकली, कालिंदी, चौदह फेरे, चिरस्वयंवरा, कैंजा, चल खुसरो घर आपने, स्मृति-कलश, सुरंगमा, करिये छिमा, विप्रलब्धा...


सूची बहुत लम्बी है. मैने इनमें से अधिकांश किताबें पढी हुयी हैं, इस आधार पर कह सकता हूँ कि शिवानी जी कहानियां पढने का एक 'चश्का' लग जाता है. मैं जब भी किसी बुक स्टाल पर जाता हूँ तो शिवानी की किताब के लिये अवश्य पूछता हूँ. अगर वहाँ मेरी नहीं पढी हुयी शिवानी की कोई किताब होती है तो मैं उसे जरूर खरीद लेता हूँ.

पंकज सिंह महर

1924 में राजकोट में जन्मी गौरा पंत 'शिवानी' को उनकी बहुचर्चित कृतियों सती, कृष्णकली, कालिंदी, अपराधिनी और चौदह फेरे के लिए हमेशा याद किया जाएगा. नारी संवेदनाओं को चित्रित करने वाला  शिवानी का पहला उपन्यास लाल दीवारें धर्मयुग में धारावाहिक रूप से प्रकाशित हुआ था.
     उन्होंने लगभग 35 उपन्यास लिखे और उनकी कहानी मणिमाला की हँसी को काफ़ी प्रसिद्धि मिली. शिवानी की शिक्षा दीक्षा पंडित मदनमोहन मालवीय की सलाह पर शांति निकेतन में हुई. इनकी दो पुत्रियाँ इरा पांडे और मृणाल पांडे भी लेखिकाएँ हैं. मृणाल पांडे तो दैनिक हिंदुस्तान की संपादक हैं.

श्रद्धांजलि

प्रसिद्ध लेखक कमलेश्वर ने शिवानी के निधन को एक बड़ा नुक़सान बताया है.

उनके लेखन की चर्चा करते हुए कमलेश्वर कहते हैं, "उनका लेखन ख़ासतौर से महत्वपूर्ण है क्योंकि क्योंकि हिंदी लेखन में प्रतिवाद की या स्त्रीवाद की या यों कहें कि हर तरह के हस्तक्षेप की भूमिका चल रही है."

कमलेश्वर के अनुसार शिवानी की भूमिका इससे अलग एक सकारात्मक दृष्टि लेकर चलनेवाली लेखिका की थी जिसकी परंपरा महादेवी वर्मा से शुरू होती है. वे कहते हैं कि शिवानी का लेखन विश्वास दिलाता था. उनका लेखन प्रतिवाद नहीं करता था बल्कि मनुष्य को और अपने समय को पढ़ने की कोशिश करता था.

पंकज सिंह महर

हिन्दी साहित्य में शिवानी एक जाना पहचाना नाम है। इन्होनें काफी सारे उपन्यास, कहानियाँ, आलेख और निबन्ध लिखकर हिन्दी साहित्य को अपना योगदान दिया है। इनके लेखन में भावों का सुन्दर चित्रण, भाषा की सादगी तो होती ही थी साथ ही साथ पहाड‌‌‌, वहाँ रहने वाले भोले भाले लोग और वहाँ की संस्कृति का जीता जागता वर्णन होता था। अगर आपने उनका लिखा साहित्य पढ‌ा है  तो समझ लीजिये कि कुमाऊँनी तो आप आसानी से समझ लेंगे क्योंकि उनके लेखन में कुमाऊँनी शब्दों और मुहावरों की भरमार रहती थी।
उनके शब्दों में,मेरा लेखन कोई कल्पना की उड‌ान नही, यह सच्चाई से जुड‌ा है
शिवानी का जन्म सन् १९२३ में सौराष्ट्र में हुआ, उनके पिता अश्विनी कुमार पांडे रामपुर स्टेट में दिवान थे, वह वायसराय के वार काउंसिल में मेम्बर भी थे। उनकी माता संस्कृत की विदूषी ही नही वरन लखनऊ महिला विधालय की प्रथम छात्रा भी थीं। १९३५ से १९४३ के मध्य उन्होने रविन्द्र नाथ टैगोर के शांति निकेतन में विधा अध्ययन किया और १९५३ में कलकत्ता से स्नातक की उपाधि प्राप्त की। उन्हें गुजराती, बंगाली, संस्कृत, अंग्रेजी और उर्दू का भी अच्छा ज्ञान था। उनके पति एस डी पंत शिक्षा विभाग में थे और दुर्भाग्य से काफी जवानी में उनका निधन हो गया था। शिवानी की तीन बेटियाँ (वीना, मृणाल पांडे, ईरा पांडे - मृणाल और ईरा भी जानी मानी लेखिका हैं) और एक बेटा (मुक्तेश पंत, बच्चों में सबसे छोटा और आजकल अमेरिका में) हैं। शादी के बाद शिवानी का ज्यादा वक्त कुमाऊँ की पहाडियों में ही बीता, बाद में वो लखनऊ में आकर रहने लगी। मार्च २००३ को नई दिल्ली में अपने बच्चों में दीदी के नाम से विख्यात इस ईजा (माँ) का देहांत हुआ।


साभार- http://sandbox.jitu.info/

Pushp

Had a chance to meet her during her last visit to Boston where she visited her son.
Very  lively family and a true example of simple living and high thinking.  Very very impressive personality she is.  Although not among us anymore physically but is always present through her books.  The way she has written you can feel it. Even if she  writes about deodar tree..you can feel their breeze.  You are lost in characters.  SUch effective is her writing.
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मोहन जोशी