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Mahabharat & Ramayan - उत्तराखंड में महाभारत एव रामायण से जुड़े स्थान एव तथ्य

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, July 08, 2008, 03:19:14 PM

पंकज सिंह महर

लाखामण्डल

महाभारत काल मे युवराज दुर्योधन का नाम इस क्षेत्र में बड़े आदर के साथ लिया जाता है और यहां के कई मंदिर उन्हें समर्पित हैं। आज भी कई गांवो में लकड़ी के बने सुन्दर मन्दिर युवराज दुर्योधन और उसके साथी कर्ण को समर्पित है।
दुर्योधन के मित्र कर्ण को भी यहां के लोग बहुत आदर देते हैं। टोन्स घाटी के क्षेत्र नेवार और देवड़ा में आज भी कर्ण को समर्पित मंदिर विद्यमान हैं। 
यहां की किंवदन्तियो के अनुसार युवराज दुर्योधन कश्मीर और कुल्लू घाटी की यात्रा से लौटते हुए हनोल नामक जगह पर पहुँचा, जो जौनसार का एक भाग है। वह यहां की सुन्दरता पर मोहित हुआ और इस मनोरम क्षेत्र को महाषु देवता से मांगा। महाषु देवता ने वरदान स्वरूप जौनसार क्षेत्र दुर्योधन को दे दिया और साथ में वचन लिया कि वह अपनी प्रजा की अच्छी तरह से देखभाल करेगा। इसलिए आज भी कई गांवो में लकड़ी के बने सुन्दर मन्दिर युवराज दुर्योधन और उसके साथी कर्ण को समर्पित है।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

रामायण के तथ्य

पौडी गडवाल मे मन्सार एक जगह है जहाँ कहा जाता है की सीता माता राम जी से मिलन बाद मे उन्हें जंगल मे छोड़ा गया था और यही से सीता माता धरती मे समां गयी ! यहाँ पर मेला भी लगता है !

पंकज सिंह महर

केदारनाथ

कालान्तर द्वापर युग में महाभारत युद्ध के उपरान्त गोत्र हत्या के पाप से पाण्डव अत्यन्त दुःखी हुए और वेदव्यासजी की आज्ञा से केदारक्षेत्र में भगवान शंकर के दर्शनार्थ आये। शिव गोत्रघाती पाण्डवों को प्रत्यक्ष दर्शन नही देना चाहते थे। अतएव वे मायामय महिष का रूप धारण कर केदार अंचल में विचरण करने लगे, बुद्धि योग से पाण्डवों ने जाना कि यही शिव है। तो वे मायावी महिष रूप धारी भगवान शिव का पीछा करने लगे, महिष रूपी शिव भूमिगत होने लगे तो पाण्डवो ने दौडकर महिष की पूंछ पकड ली और अति आर्तवाणी से भगवान शिव की स्तुति करने लगे। पाण्डवो की स्तुति से प्रसन्न होकर उसी महिष के पृष्ठ भाग के रूप में भगवान शंकर वहां स्थित हुए एवं भूमि में विलीन भगवान का श्रीमुख नेपाल में पशुपतिनाथ के रूप में प्रकट हुआ -

तद्रूपेण स्थित स्तत्र भक्तवत्सल नाम भाक
नयपाले शिरोभाग गतस्तद्रूपतस्थितः(शि0पु0
)


आकाशवाणी हुई कि हे पाण्डवों मेरे इसी स्वरूप की पूजा से तुम्हारे मनोरथ पूर्ण होंगे। तदन्तर पाण्डवों ने इसी स्वरूप की विधिवत पूजा की, तथा गोत्र हत्या के पाप से मुक्त हुए और भगवान केदारनाथजी के विशाल एवं भव्य मन्दिर का निर्माण किया। तबसे भगवान आशुतोष केदारनाथ में दिव्य ज्योर्तिलिंग के रूप में आसीन हो गये। वर्तमान में भी उनका केदारक्षेत्र में वास है 

Risky Pathak

भगवान् वेदव्यास ने स्कन्द पुराण के एक भाग केदार खंड(Garhwaal) में इस प्रदेश का भूगोल और इतिहास का विस्तार से वर्णन किया है|

Risky Pathak

भगवान् राम वनवास काल में गुरु वशिष्ट, अरुधती के साथ हिमदाय पर्वत की गुफा में रहे, वहा के किरात लोगो की तरह उन्हें भी कला कम्बल पहनकर रहना पड़ता था|

यह ये भी वर्णन मिलता है कि हिमालय निवासी किरात, कम्बोज और हून जातियों से रजा रघु का युद्ध हुआ|           

Risky Pathak

महाभारत काल में किरात, कम्बोज और हून जातियों की तीन शक्तिया मिलती है| रजा सुबाहु श्रीपुर में (श्रीनगर) में, विराट कालसी के निकट में,  और बाणासुर उखीमठ में राज्य करते थे| 
Quote from: Himanshu Pathak on July 08, 2008, 09:02:31 PM
भगवान् वेदव्यास ने स्कन्द पुराण के एक भाग केदार खंड(Garhwaal) में इस प्रदेश का भूगोल और इतिहास का विस्तार से वर्णन किया है|

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


सीतावनी

यह जगह रामनगर मे पावालगढ़ और लेधरा के मध्य मे है जो की सीतावानी के नाम से जाना जाता है ! कहा जाता है की त्रेता युग मे सीता माता ने यहाँ पर तप किया था ! यह स्थान बाल्मीकि आश्रम के नाम से भी जाना जाता है ! सीतावनी और कौशकी (कोसी) नदी के मध्य एक अशोक का रमणीक बन है जहाँ सप्त ऋषि और राजा सत्यब्रत ने तप किया था ! दूसरी मान्यता यह भी है कि विश्वामित्र के कहने पर भगवान् राम एव लक्ष्मण यहाँ पर आए थे !

सीता माता को यह जगह अच्छा लगा उन्होंने राम भगवान् से कहा कि उन्हें बैशाख हर साल यहाँ आना चहिये !

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

कुकुछीना

यह स्थान भी महाभारत से सम्बन्ध रखता है ! कहा जाता है कि जब पांडव स्वर्गारोहण हेतु इस स्थान से हिमालय की ओर जा रहे थे ! उनके साथ चलने वाला एक कुत्ता ( जिसे सथानीय भाषा मे कुकुर कहते है)   इस स्थान से उनसे अलग हो गया ! तभी इस स्थान का नाम कुकुछीना पड़ा !

दूसरी मान्यता की कौरव पांडवो का पीछा करते आए थे इसी लिए इस स्थान का नाम कुकुछीना

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Mukteshwar (Nainital)

Mukteshwar has served as a retreat and also carries much religious significance. According to local belief and folklore the Pandavas as well as many gods and Devtas of the Hindu pantheon have graced it with their presence.

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मुनि की रेती : रामायण SE LINK

मुनि की रेती तथा आस-पास के क्षेत्र रामायण के नायक भगवान राम तथा उनके भाइयों के पौराणिक कथाओं से भरे हैं। वास्तव में, कई मंदिरों तथा ऐतिहासिक स्थलों का नाम राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न के नाम पर रखा गया है। यहां तक कि इस शहर का नाम भी इन्हीं पौराणिक कथाओं से जुड़ा है।

ऐसा कहा जाता है कि भगवान राम ने लंका में रावण को पराजित कर अयोध्या में कई वर्षो तक शासन किया और बाद में अपना राज्य अपने उत्तराधिकारियों को सौंप कर तपस्या के लिए उत्तराखंड की यात्रा की। प्राचीन शत्रुघ्न मंदिर के प्रमुख पुजारी गोपाल दत्त आचार्य के अनुसार जब भगवान राम इस क्षेत्र में आये तो उनके साथ उनके भाई तथा गुरु वशिष्ठ भी थे। गुरु वशिष्ठ के आदर भाव के लिए कई ऋषि-मुनि उनके पीछे चल पडे, चूंकि इस क्षेत्र की बालु (रेती) ने उनका स्वागत किया, तभी से यह मुनि की रेती कहलाने लगा।

शालीग्राम वैष्णव ने उत्तराखंड रहस्य के 13वें पृष्ट पर वर्णन किया है कि रैम्या मुनि ने मौन रहकर यहां गंगा के किनारे तपस्या की । उनके मौन तपस्या के कारण इसका नाम मौन की रेती तथा बाद में समय के साथ-साथ यह धीरे-धीरे मुनि की रेती कहलाने लगा।

आचार्य के अनुसार, इस शहर का वर्णन स्कन्द पुराण के केदार खण्ड में भी मिलता है।