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Mahabharat & Ramayan - उत्तराखंड में महाभारत एव रामायण से जुड़े स्थान एव तथ्य

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, July 08, 2008, 03:19:14 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


Sri Panchleshwarnath Mahadev Mandir
Village-Pacheoli, Laksar,District-Dehradun, Uttarakhand-247663
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It is believed that the Pandavas spent their maximum time in the near by area of Laksar during their exile. Sri Panchleshwarnath Mahadev Mandir, Pacheoli therefore is an important temple. Then again this is the only place where the Ganges flows westwards

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गुप्‍तकाशी-

गुप्‍तकाशी का वहीं महत्‍व है जो महत्‍व काशी का है। यहां गंगा और यमुना नदियां आपस में मिलती है। ऐसा माना जाता है कि महाभारत के युद्ध के बाद पांण्‍डव भगवान शिव से मिलना चाहते थे और उनसे आर्शीवाद प्राप्‍त करना चाहते हैं। लेकिन भगवान शिव पांडवों से मिलना नहीं चाहते थे इसलिए वह गुप्‍ताकाशी से केदारनाथ चले गए। गुप्‍तकाशी समुद्र तल से 1319 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यह एक स्‍तूप नाला पर स्थित है जो कि ऊखीमठ के समीप स्थित है। कुछ स्‍थानीय निवासी इसे राणा नल के नाम से बुलाते हैं। इसके अलावा पुराना विश्‍वनाथ मंदिर, अराधनेश्रवर मंदिर और मणिकारनिक कुंड गुप्‍तकाशी के प्रमुख आकर्षण केन्‍द्र है।

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कर्णप्रयाग
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कर्णप्रयाग का नाम कर्ण पर है जो महाभारत का एक केंद्रीय पात्र था। उसका जन्म कुंती के गर्भ से हुआ था और इस प्रकार वह पांडवों का बड़ा भाई था। यह महान योद्धा तथा दुखांत नायक कुरूक्षेत्र के युद्ध में कौरवों के पक्ष से लड़ा। एक किंबदंती के अनुसार आज जहां कर्ण को समर्पित मंदिर है, वह स्थान कभी जल के अंदर था और मात्र कर्णशिला नामक एक पत्थर की नोक जल के बाहर थी। कुरूक्षेत्र युद्ध के बाद भगवान कृष्ण ने कर्ण का दाह संस्कार कर्णशिला पर अपनी हथेली का संतुलन बनाये रखकर किया था। एक दूसरी कहावतानुसार कर्ण यहां अपने पिता सूर्य की आराधना किया करता था। यह भी कहा जाता है कि यहां देवी गंगा तथा भगवान शिव ने कर्ण को साक्षात दर्शन दिया था।

पौराणिक रूप से कर्णप्रयाग की संबद्धता उमा देवी (पार्वती) से भी है। उन्हें समर्पित कर्णप्रयाग के मंदिर की स्थापना 8वीं सदी में आदि शंकराचार्य द्वारा पहले हो चुकी थी। कहावत है कि उमा का जन्म डिमरी ब्राह्मणों के घर संक्रीसेरा के एक खेत में हुआ था, जो बद्रीनाथ के अधिकृत पुजारी थे और इन्हें ही उसका मायका माना जाता है तथा कपरीपट्टी गांव का शिव मंदिर उनकी ससुराल होती है।

कर्णप्रयाग नंदा देवी की पौराणिक कथा से भी जुड़ा हैं; नौटी गांव जहां से नंद राज जाट यात्रा आरंभ होती है इसके समीप है। गढ़वाल के राजपरिवारों के राजगुरू नौटियालों का मूल घर नौटी का छोटा गांव कठिन नंद राज जाट यात्रा के लिये प्रसिद्ध है, जो 12 वर्षों में एक बार आयोजित होती है तथा कुंभ मेला की तरह महत्त्वपूर्ण मानी जाती है। यह यात्रा नंदा देवी को समर्पित है जो गढ़वाल एवं कुमाऊं की ईष्ट देवी हैं। नंदा देवी को पार्वती का अन्य रूप माना जाता है, जिसका उत्तरांचल के लोगों के हृदय में एक विशिष्ट स्थान है जो अनुपम भक्ति तथा स्नेह की प्रेरणा देता है। नंदाष्टमी के दिन देवी को अपने ससुराल – हिमालय में भगवान शिव के घर – ले जाने के लिये राज जाट आयोजित की जाती है तथा क्षेत्र के अनेकों नंदा देवी मंदिरों में विशेष पूजा होती है।

http://hi.wikipedia.org/wik

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KASHIPUR -

उत्तराखंड के काशीपुर को कभी गोविशान के नाम से जाना जाता था और यहाँ पर स्तिथ द्रोना सागर नामक किले पर पांडवों को गुरु द्रोणा चर्या ने तीर अंदाजी की शिक्षा दी थी. गुरु दक्षिणा मैं गुरु द्रोणा चार्या के कहने पर भीम ने इस शिव लिंग की स्थापना की थी जिसे बाद मैं भीम शंकर लिंग कहा गया. इस मन्दिर को अब मोंटेह्श्वर मन्दिर के नाम से जाना जाता है. भारत मैं असाम नासिक के बाद काशीपुर मैं भीम द्वारा स्थापित इस मन्दिर की दूर दूर तक मान्यता है

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हेम पन्त

किशन नेगी, जैंती । अज्ञातवास के दौरान पांडवों की शरण स्थली रहा प्रसिद्ध पौराणिक धाम ऐड़द्यो धाम ग्रामीणों की बार-बार मांग के बावजूद आज तक रोड, पानी, बिजली से महरूम है।

लाखों लोगों की आस्था का केन्द्र में वैसे तो वर्ष भर पूजा-अर्चना चलती रहती है। वहीं सावन के महीने इससे जुड़े 42 गांवों द्वारा यहां 22 दिन की बैसी का आयोजन कर विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। लेकिन जिला अल्मोड़ा के इस पौराणिक मंदिर में आज तक मोटर मार्ग ने बनने से ग्रामीणों को भारी दिक्कत का सामना करना पड़ता है।

स्कंदपुराण के मानस खण्ड के अनुसार वनवास के दौरान देवीधूरा, भीमा देवी एवं ऐड़द्यो में पांडवों ने पड़ाव डाला। जिसके स्मृति चिह्न आज भी मौजूद है। मसलन ऐड़द्यो में विद्यमान त्रिशूल (बरसीगाजा) जिससे पांडवों ने दासक राक्षस समेत तमाम आतताइयों का वध किया था। साथ ही देवीधूरा में भीम द्वारा गदा से तोड़ी भीम शिला एवं भीमा देवी में विशाल प्रस्तर शिला पर पदचिह्न, बरसीगाजा के पुजारी रघुनंदन भट्ट के अनुसार जो भी सच्ची श्रद्धा से इसकी पूजा करता है। उसकी मनोकामना पूर्ण होती है।

इसी तरह यहां स्थित कालालिंग जिस पर ग्रामीण घर का नया अनाज, फल-फूल व दूध, दही का चढ़ावा कर मनौतियां मांगते है। साथ ही पौराणिक तपस्थली सिद्ध माटी जहां स्थित सिद्धेश्वर महादेवी एवं राज राजेश्वरी का भव्य मंदिर है। इसके अलावा वर्षो पूर्व श्रमदान से बने दर्जनों धर्मशालाएं इस बात का प्रतीक है यहां श्रद्धालुओं की असीम आस्था है। बावजूद इसके यहां पेयजल योजना मंजूरी के बावजूद वर्षो से अधर में है। साथ ही रोड, बिजली व यात्रियों के लिए अन्य सुविधाएं न होने के कारण धार्मिक महत्व का यह स्थल आज तक उपेक्षित है।

renu rawat

mera sasural pauri jile ke sitonsiyu patti mai hai.. kehte hai ki sita ji  dharti mai yahi samayi thi isliye is jagah ko sitonsiyu kaha jaata hai.

or yahan bade tree (peid)_ bhi kam hote hai.uske baare mai logo ka kehna hai ki jab sita ji dharti mai sama rahi thi to ram ji ke hath mai unke baal aaye the, isliye yahan jhadiya jyada hoti hai..

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

द्रोणा सागर : KASHIPUR AREA OF UTTARAKHAND

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चैती मेला स्थल से काशीपुर की ओर २ किलोमीटर आगे नगर से लगभग जुड़ा हुआ एक महत्वपूर्ण ताल द्रोण सागर है।  पांडवों से इस ताल का सम्बन्ध बताया जाता है कि गुरु द्रोण ने यहीं रहकर अपने शिष्यों को धनुर्विद्या की शिक्षा दी थी।  ताल के किनारे एक पक्के टीले पर गुरु द्रोण की एक प्रतिमा है, ऐतिहासिक व धार्मिक दृष्टिकोण से यह विशिष्ट पर्यटन स्थल है।

http://tdil.mit.gov.in/coilnet/ignca/utrn0048.htm#girital

Devbhoomi,Uttarakhand

काक्भुन्शुडीताल
चमोली जनपदमैं५३५० मी की ऊंचाई पर जोशीमठ  के ठीक सामने पूर्व की ओर हाथी पर्वत कीघाटी मैं लहभग एक वर्ग किमी छेत्र मैं काक्भुन्शुडीताल का विस्तार है!
जन शुर्ती हैकि-रामायण मैं उदद्रित महापंडित काक्भुशुंडी ने रामभक्त जटाऊ को इसी स्थानपर राम-महिमा सुने थी!संयोग वस् आज भी काक्भुशुंडी और जटाऊ रुपी दोपर्वतों के मध्य पुस्तक के पृष्ठों के सदिर्स्य परतदार चट्टानेताल उत्तर-पूर्वी छोर पर दृष्टि गोचर होती है!इस ताल मैं पहुँचने के दोनों मार्गअत्यंत दुरूह और पश्त्साद्य हैं,अथ ताल का पौराणिक महत्व होते हुए भी बहुतकम पर्यटक यहाँ पहुँचने का साहस कर पाते हैं !

Devbhoomi,Uttarakhand

बाणासुर किला

2 किलोमीटर पैदल यात्रा सहित लोहाघाट से 7 किलोमीटर दूर।

इस किले का नाम रावण के वंशज तथा बली के पुत्र, हजार हाथों वाले राक्षस बाणासुर के नाम पर पड़ा है। बाणासुर एक शक्तिशाली एवं भयानक असुर तथा भगवान शिव का उपासक था।


बाणासुर की पुत्री ऊषा, सपने में ही भगवान श्रीकृष्ण के पौत्र अनिरूद्घ के प्रति आसक्त हो गयी। अपनी सखियों की सहायता से उसने द्वारका से अनिरूद्ध का अपहरण करा लिया तथा गुप्त रूप से उससे विवाह कर लिया। जब बाणासुर को इसका पता चला तो उसने अनिरूद्ध को इसी किला मे बंदी बनाकर सांपों के साथ बांध दिया जिसके कारण भगवान श्रीकृष्ण ने उस पर बड़ी सेना के साथ आक्रमण कर दिया। युद्ध कई वर्षों तक चला और ऊहा-पोह में समाप्त हुआ क्योंकि भगवान शिव ने बाणासुर की सहायता की। उस युद्ध में कई देवों एवं असुरों को मरने से उनके खून से पृथ्वी लाल हो गई और यही कारण है कि लोहाघाट के आस-पास की भूमि लाल है तथा उनके खून से एक धारा बह चली और यही लोहावती नदी है।

युद्ध के ऊहा-पोह की स्थिति तब समाप्त हुई जब भगवान शिव के आग्रह पर भगवान श्रीकृष्ण ने बाणासुर के चार हाथ काटकर उसे जीवन दान दे दिया। भगवान श्रीकृष्ण, ऊषा का विवाह अनिरूद्ध से कराकर द्वारका ले गये। बाणासुर ने हिमालय की ओर जाकर भगवान शिव की आराधना में शेष जीवन अर्पण कर दिया।



समुद्र से 1,920 मीटर ऊपर स्थित इस किले का निर्माण मध्यकालीन युग में हुआ माना जाता है, यद्यपि बाणासुर की कथा संभवत: किले के निर्माण से पहले ही उस स्थान से संबद्ध था। इसी स्थान से लोहावती नदी का उद्गम हुआ तथा किले से हिमालय का मनोरम दृश्य देखा जा सकता है जो इसकी खड़ी चढ़ाई को देखने योग्य बना देता है।