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Lets Recall Our Childhood Memories - आइये अपना बचपन याद करें

Started by हेम पन्त, July 17, 2008, 06:57:14 PM

हेम पन्त

पहाड में स्वाभाविक रूप से बडी "जुल्मी" ठण्ड पडती है.. रात को ओस/तुषार पडने पर पानी के ऊपर इसकी एक ठोस परत बन जाती है, जो शीशे की तरह लगता है. इसे "खांकर" कहा जाता है. हम लोग इसे बचपन में "ठण्डी" पुकारते थे.

स्कूल पहुंचते ही हम सबसे पहले खेतों में जाकर इसे उठाते थे. खूब चाव से इसका ठंडा पानी पीते. कीचड में लगी खांकर भी बडे चाव से खाते थे. बीमार पड्ने पर दवाई खाकर फिर यही सिलसिला चालू हो जाता था.

हेम पन्त

हमारे घर और स्कूल के बीच का रास्ता खेतों से गुजरता है. टाइम-पास के लिये हमारे पास एक अनोखा खेल था. जौं या गेहूँ की बालियों को जूते के पास से पैन्ट के अन्दर को डाल देते थे. 15-20 कदम चलने पर यही बाली सरकते हुए ऊपर बेल्ट के पास पहुँच जाती है. है ना अजूबा?




Risky Pathak

बारिश के दिनों में जब डाव(ओले) पड़ते थे तो डाव उठाकर खाया करते थे, बड़ा आनंद आता था|

इसी तरह ह्यून के दिनों में मना करने पर भी बाहर आना और जब ह्यू पड़ रहा होता था, उसको मिलाकर  एक आकार देना मूर्ति के   रूप में|

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


I remember by childhood days, we used to wait eagerly for local fairs. But now night fair in many places have stopped due to people creating problem after consuming liquor.



Risky Pathak

जैसे आपने बचपन में देखा है जो परिवार देश से गाँव जाते है, वो वह सब इष्ट देवता, ग्राम देवता, आदि मंदिरों में पूजा करके आते है|

इसी तरह हमारा परिवार भी जब साल में १ बार पहाड़ जाता था तो हम भी सभी मंदिरों में पूजा करके आते थे|

इसी से प्रेरणा लेकर हम बच्चो ने भी गाँव में जाकर घर से थोडी दूर अपना मन्दिर बना दिया| मन्दिर जो था बस गाड़ से पत्थर लाके १ छोटा घर सा बना दिया| उसके पास का एरिया साफ़ करके परिकर्मा के लिए बना दिया| आसपास तुलसी आदि के पेड़ भी उगा दिए| गाड़ से १ बान बना दिया, और उस बान को मन्दिर के साथ १ पन्ह्याव से जोड़ दिया|
इन सब कार्यो करने में बहोत मजा आता था|
पूरा दिन घर से बाहर रहकर हम यही करते थे|

जब १ बार मन्दिर बन गया, उसके बाद हर साल वहा जाके पूजा करते थे| कोई पुजारी बनता था, कोई ढोली, कोई रिस्यार, कोई पौरु| फ़िर घर से दूध, दही, तेल, चावल, आटा इत्यादि  सामग्री लेजाकर के वहा पंचामृत , चौख(प्रसाद), पूरी, खीर इत्यादि बनाते थे| और चाव से पूजा करके खाते थे|

मुझे अब भी याद है हमे आग जलाने के लिए बहुत मस्सकत करनी पड़ती थी| छोटे छोटे छिलुख खर से लेजाकर उन्हें आग से जलाना, फ़िर पीरुल डालना ताकि आगा ज्यादा जले और फ़िर लकडियो के क्याड़-म्याड रखना, और अंत में बड़ी लकडिया रखना|
     
पूजा करके मन्दिर में भेट चढ़आते  थे और वह भेट अगले साल मन्दिर के लिए धुप अगर बत्ती खरीदने के काम आटा था|

अब भी मन्दिर के अवशेष बचे हुए है|

घर वालो का बहुत विरोध सहना पड़ता था| सभी कहते थे "क्वे आन-बान ई जाल ऊ मन्दिर में"

Risky Pathak

बचपन के दिनों में पेड़ पे चढ़ने का बहुत शौक था| कोई भी पेड़ होता ये शर्त लगती कि इस पेड़ पर सबसे ऊपर कौन चढ़ सकता है| फ़िर स्टार्ट होता पेड़ पे चड़ना और टूक में जाकर ही रूकता|
गर्मियो के दिनों में सुबह ८-९ बजे काफल के लिए घर से कांच की थैलिया लेकर निकल जाते और फ़िर घूमते इधर उधर काफल के पेड़ के लिए| काफल खाते भी और इक्कठे भी करते, जब सब की थैली भर जाती तब घर जाकर के १ थाली में खाली कर के लूण डालके खाते|

Risky Pathak

खेत में जाकर के हिसालू, किल्मोड़ा खाना के दिन अब भी बहुत याद आते है| बस डर यही रहता था कही सौंप या ग्वाण ना दिख जाए| सौंप से तो उतना डर नही लगता था, जितना ग्वाण से लगता था| ग्वाण के बारे में तो यही सुन रखा था की वो देखते ही फूक मारके आदमी को मार देता है|

गर्मियो के दिनों में चूख सां कर तिमुल के पात में खाने में भी बहुत मजा आता था| 

Mayank Chand Rajbar

यह है जब में  में आठवी में पड़ता है.. .., एक बार जब में और बाकि गों के लड़के काफल तोड़ने जंगल गए थे तो बहुत तेज बारिश होने लग गई...हम सब एक पुराणी कुटिया में जा के चुप गए.......क्यूंकि में पहली बार गया था इसलिए मुझे नही मालूम था की वहा शेर भी आते है जैसा की गों वालो ने बताया.......और में हस्सी में बात को टाल गया और शायद गो वाले भी मेरी खिचाई कर रहे थे.......तभी बारिश की वजह से मौसम अँधेरा हो गया और शायद में डरने लगा था..........अजीब सी आवाजे आ रही थी जंगलो से......हम लोग पाँच - छह लोग थे........मेने अपनी जिन्दगी में पहली बार पहाडी जंगली शेर देखा.......मेरी तो लग गई......वो दिन आज तक याद है........छोटा sa शेर...एक बकरी के बराबर का पर फिर भी वैसे जंगल में.............वो दिन एक बारफिर आज दोहराना चाहता हूँ...................