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Lets Recall Our Childhood Memories - आइये अपना बचपन याद करें

Started by हेम पन्त, July 17, 2008, 06:57:14 PM

Risky Pathak


किशोर अवस्था में आकर क्रिकेट हमारा प्रिय खेल था|
हालाकि प्लेन ग्राउंड न होने  के कारण हम इसे अपने गाज्यो के मांग में खेलते थे| और जब से खेला तब से इसपर आजतक गाज्यो नही उगा| 10-12 सीडीनुमा लंबे खेत का ग्राउंड था हमारा|  हम बीच वाले खेत में पिच बनाते थे| ऊपर के कोई रन नही थे| नीचे के ५-६ खेतो पर रन होते थे| उसके बाद गाड़ आ जाती थी, जिसके पार चौका और छक्का था|

सबसे परेशानी ये थी की बाल हरा(खो) जाती थी| कभी कभी तो बाल गाड़ में बह भी जाती थी| हमारा खेलने से ज्यादा टाइम बाल दुदःदने  में ही निकल जाता था|

हेम पन्त

लगभग यही स्थिति हमारे साथ भी थी... हमारे इलाके में क्रिकेट और फुटबाल समान रूप से प्रसिद्ध हैं. वैसे तो हमारा गांव आर्मी एरिया के नजदीक है और आर्मी वालों के साथ ही उनके फील्ड में हम ज्यादा खेलते थे. कभी-२ सख्त अफसर हमें साथ खेलने की अनुमति नहीं देते थे. फिर वो ही "गाज्यो के मांगे" हमारे मैदान बन जाते थे.

फुट्बाल खेलने में बङा आनन्द आता है लेकिन हमारे पास पैसों की कमी रहती थी, तो फुटबाल पंक्चर होने पर उसका ब्लेडर बनवाने के लिये भारी मेहनत करनी पङती थी. बारिश के मौसम में कीचङ सने हुए फुट्बाल खेलने का जोश और आनन्द भुलाये नहीं भूलता. उसके बाद नदी में नहा कर गांव में घुसते थे तो जिसके घर में "धिनाली"(दुग्ध पदार्थ की प्रचुरता) होती वहां जाकर खूब छांछ पीते थे.


Quote from: Himanshu Pathak on July 29, 2008, 02:51:47 PM

किशोर अवस्था में आकर क्रिकेट हमारा प्रिय खेल था|
हालाकि प्लेन ग्राउंड न होने  के कारण हम इसे अपने गाज्यो के मांग में खेलते थे| और जब से खेला तब से इसपर आजतक गाज्यो नही उगा| 10-12 सीडीनुमा लंबे खेत का ग्राउंड था हमारा|  हम बीच वाले खेत में पिच बनाते थे| ऊपर के कोई रन नही थे| नीचे के ५-६ खेतो पर रन होते थे| उसके बाद गाड़ आ जाती थी, जिसके पार चौका और छक्का था|

सबसे परेशानी ये थी की बाल हरा(खो) जाती थी| कभी कभी तो बाल गाड़ में बह भी जाती थी| हमारा खेलने से ज्यादा टाइम बाल दुदःदने  में ही निकल जाता था|


Risky Pathak

इसके अलावा हमने फुटबॉल,  जान्थ व प्लास्टिक की बोल से भट्ट के गाड़ में हॉकी, लॉन्ग जम्प, हाई जम्प, पकदम पकडे, विष अमृत, उंच नीच का पापडा जैसे अनगिनत खेल खेल रखे है|

वैसे कुछ और साधन था ही नही| लाईट होती नही थी, इसलिए दिन भर खेलो में ही समय कट जाता था|

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


I had very bad / bitter days of childhood.

Once i was going to play a cricket tournament in my nearby village area. I had worn Chappal unfortunatly, the chappal got broken en-route then i borrrowed shoes from someone to bat. Here also i was unfortunate that i could not get a chance to bat and remained notout at non-striker hand as all of the batmen got out one by one.


Meena Pandey

आहा क्या बचपन याद दिला दिया ठेरा आप लोगो ने ..............
बचपन में हम भी हिसालू खाने जाया करते थे हिसालू के काटे हाथ पैर में चुभते फ़िर भी हिसालू के स्वाद के आगे हम सब सह जाते थे. बचपन में हमारा सबसे पसंदीदा खेल था छुपन छुपी.  हमें अपने गाव जाने का हमेशा इंतजार रहता था! अम्मा के साथ मन्दिर में भजन गाते थे! अम्मा रसोई की एक सीमा रेखा से अन्दर किसी को नही आने देती थी !  और अगर गलती से कोई रसोई में चला जाता तो उस दिन वो खाना ही नही खाती थी ! जब गावं में जागर लगता तो पहले पहले तो आवाजे सुनकर डर लगता था पर बाद में जगारियो के साहसिक करतब अच्छे लगते थे ! जागर के दिन तो मेला सा लगता था गाव में!  मेरे गावं के रस्ते में एक गधेरा पड़ता था उसको हम पापा (बाज्यू) या चाचा के कंधे में चदकर पार करते थे. पेडो पर घंटो तक झुला झूलते और नोलो में जाकर पानी से खेल करते!

अब कब आएंगे वो गाव वाले दिन ????

Risky Pathak


हम लोग भांग की लकड़ी से फुरफुरी बनाते थे| और दौड़कर उसेथे तो फुरफुरी तेजी से गोलाकार में घुमती थी|

बहुत बार तीर व धनुष भी बनाते थे| और दांत भी खाते थे बडो से  "कटी आँख फोड़ ला, तीर तीर कर बेर खेलाक भेल हवाल"

Risky Pathak

मीना जी ने रिशया की याद दिलाके आँखों में अश्रु ला दिए है|

ठीक इसी तरह हमारी आमा भी रिशया के अन्दर नही आने देती थी|
Quote from: Meena pandey on July 29, 2008, 04:27:27 PM
आहा क्या बचपन याद दिला दिया ठेरा आप लोगो ने ..............
बचपन में हम भी हिसालू खाने जाया करते थे हिसालू के काटे हाथ पैर में चुभते फ़िर भी हिसालू के स्वाद के आगे हम सब सह जाते थे. बचपन में हमारा सबसे पसंदीदा खेल था छुपन छुपी.  हमें अपने गाव जाने का हमेशा इंतजार रहता था! अम्मा के साथ मन्दिर में भजन गाते थे! अम्मा रसोई की एक सीमा रेखा से अन्दर किसी को नही आने देती थी !  और अगर गलती से कोई रसोई में चला जाता तो उस दिन वो खाना ही नही खाती थी ! जब गावं में जागर लगता तो पहले पहले तो आवाजे सुनकर डर लगता था पर बाद में जगारियो के साहसिक करतब अच्छे लगते थे ! जागर के दिन तो मेला सा लगता था गाव में!  मेरे गावं के रस्ते में एक गधेरा पड़ता था उसको हम पापा (बाज्यू) या चाचा के कंधे में चदकर पार करते थे. पेडो पर घंटो तक झुला झूलते और नोलो में जाकर पानी से खेल करते!

अब कब आएंगे वो गाव वाले दिन ????

प्रहलाद तडियाल

waha waah Himanshu da ye sab to humne bhai keya hai hai aaj pher bachpan ke yaad taaja ho gaye..........

हम लोग भांग की लकड़ी से फुरफुरी बनाते थे| और दौड़कर उसेथे तो फुरफुरी तेजी से गोलाकार में घुमती थी|

बहुत बार तीर व धनुष भी बनाते थे| और दांत भी खाते थे बडो से  "कटी आँख फोड़ ला, तीर तीर कर बेर खेलाक भेल हवाल"
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हेम पन्त

पन्द्रह अगस्त से जुङी हुई बचपन की कई यादें हैं.स्कूल में सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिये तैयारियां हफ़्तों पहले से शुरु हो जाती थीं. स्वतंत्रता दिवस के दिन सुबह-२ प्रभातफेरी का बङा उत्साह रहता था. प्रभात फेरी के दौरान लगाये जाने वाला एक नारा अब भी याद आ रहा है.

अन्न जहां का - हमने खाया,
वस्त्र जहां के
- हमने पहने
वह है प्यारा -देश हमारा
उसकी रक्षा कौन करेगा?- हम करेंगे, हम करेंगे, हम करेंगे...

प्रभात फेरी के बाद सांस्कृतिक कार्यक्रम, जिसे देखने आस-पास के गांव से भी लोग आते थे. उसके बाद मिष्ठान्न वितरण और फिर छुट्टी....

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


We used to say this slogan " Aaj Kya hai 15 Aug" -2


Quote from: H.Pant on August 14, 2008, 05:31:16 PM
पन्द्रह अगस्त से जुङी हुई बचपन की कई यादें हैं.स्कूल में सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिये तैयारियां हफ़्तों पहले से शुरु हो जाती थीं. स्वतंत्रता दिवस के दिन सुबह-२ प्रभातफेरी का बङा उत्साह रहता था. प्रभात फेरी के दौरान लगाये जाने वाला एक नारा अब भी याद आ रहा है.

अन्न जहां का - हमने खाया,
वस्त्र जहां के
- हमने पहने
वह है प्यारा -देश हमारा
उसकी रक्षा कौन करेगा?- हम करेंगे, हम करेंगे, हम करेंगे...

प्रभात फेरी के बाद सांस्कृतिक कार्यक्रम, जिसे देखने आस-पास के गांव से भी लोग आते थे. उसके बाद मिष्ठान्न वितरण और फिर छुट्टी....