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Gangnath: God Of Justice - न्याय का देवता "गंग नाथ"

Started by Rajen, July 23, 2008, 04:34:07 PM

Rajen

भानु को समझाने के बाद जोशी जी आगे की रणनीति के बारे में सोचने लगे.  उन्होंने चार बलिष्ट मजदूरों को अपने बिस्वास में लिया और उन्हें समझाया की गंगनाथ एक दूसरे देश का जासूस है और हमारे प्रदेश में कब्जा कराने के लिए यहाँ आया है.  उसने राजा को बिस्वास में ले लिया है और सारी सेना को अपनी तरफ़ कर लिया है.  अब हालत ये है की राजा उसका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते क्यौकी यदि राजा उससे छुटकारा पाने के लिए कुछ भी करने की कोशिस करते हैं तो वो सेना से राजा को मरवा देगा और गद्दी पर ख़ुद कब्जा कर देगा.  अतः उसका खात्मा करना जरूरी है नहीं तो हम सब दूसरे प्रदेश के गुलाम बन जायेंगे.  यह काम तुम बहुत ही चालाकी से करोगे मैं गंगनाथ को किसी सुनसान जगह पर रात के अंधेरे में बुलाऊंगा और उसे बातों में लगा लूँगा.  मौका देख कर तुम चारों उस पर हथियार से हमला कर दोगे.  इसके बदले राजा तुम्हें बहुत इनाम देंगे और राजमहल में तुम्हें नौकरी भी मिल जायेगी.  इस तरह जोशी जी कई दिनों तक इस रणनीति पर उन मजदूरों से बिचार करते रहे. 

फ़िर एक दिन जोशी जी ने राज्य का काम निपटा कर गंगनाथ से कहा की तुमसे भानु के  बारे में कुछ बात करनी है सो तुम थोड़ी देर बाद मुझे फला जगह पर कुवे के पास मिलना.  उन्होंने ने गंगनाथ से कहा कि तुम वहां अकेले आना क्यौकी यह हमारा पारिवारिक मामला है. गंगनाथ साफ़ दिल का था सो वह खतरे को भांप नहीं पाया.  वह अंधेरे में जोशी जी से मिलाने तय जगह पर पहुच गया.  जोशी जी बातों - २ में कुवे के पास ले गए और एक पेड़ के नीचे बैठ गए.  गंगनाथ उनके और मुह कर बैठ गया.  अब जोशी जी बोले गंगनाथ तुम भाना से ब्याह करोगे?  गंगनाथ की खुशी का ठिकाना नही रहा. उसने कहा क्योँ नही, भाना ही तो मेरी जिंदगी है उसी की खातिर मैं यहाँ आया हूँ और यह कह कर उसने जोशी जी के चरणों में अपना सर रख दिया.  जोशी जी उसके सर को सहलाते रहे और मीठी-२ बातें करते रहे ठीक उसी समय चारों मजदूरों ने अंधेरे में से निकल कर कुल्हाडी से भरपूर वर गंगनाथ के सर पर कर दिया.  गंगनाथ वही ढेर हो गया.  वह छल से जोशी जी का शिकार हो गया.  करते समय उसके मुहं से भाना का ही नाम निकला.

गंगनाथ की लाश को  ठिकाने लगाने के बाद जोशी जी ने उन मजदूरों को बिशेष हिदायत देकर बिदा कर दिया और अपने घर की ओर चल दिए.  घर जाकर वह लेट गए लेकिन नीद उनकी आखों से कोसों दूर थी.  रह-रह कर उनका मन उन्हें कचोट रहा था कि धर्म का बहाना बना कर उन्होंने गंगनाथ जैसे इन्सान की हत्या कर दी.  उन्हें बेचैनी होने लगी.  अचानक उन्हें लगा कि भानु अभी तक सोयी नहीं है. वह भानु के कमरे में चले गए.  उन्होंने देखा कि भानु कमरे में तेज-२ कदमों से चक्कर काट रही थी.  जोशी जी ने पूछा क्या हुआ बेटी अभी तक सोयी नही?  भानु कुछ नही बोली लाल-२ आखों से जोशी जी ओर घूरने लगी.  जोशी जी डर गए.  वो बोले क्या बात है बेटी तुम मुझे ऐसे क्योँ घूर रही हो?  भानु फ़िर भी कुछ नही बोली कुछ समय बाद वह तेजी से कमरे से बाहर निकल गयी.  जोशी जी उसे मानाने के लिए पीछे-२ चलने लगे.  भाना तेज कदमों से उसी ओर बढ़ी जा रही थी जहाँ गंगनाथ की कुछ देर पहले जोशी जी ने हत्या करवा दी थी.  उस जगह पर पहुच कर भाना ने जोशी जी ओर लाल लाल आखों से घूरा.  और बोली मूर्ख तूने मुझे मार डाला.  जोशी जी डर गए वो बोले ये तुम क्या कह रही हो बेटी किसने तुम्हें मार डाला और ये तुम्हारी आवाज को क्या हुआ ;यह इतनी भारी मर्दों की तरह क्योँ हो गयी है?  भाना बोली मूर्ख में गंगनाथ हूँ.  तूने मुझे छल से मार डाला.  मैंने कहा था ना कि भाना मेरी जिंदगी है सो भाना को मैं अपने साथ ले जारहा हूँ.  अब तू अपने धर्म की रक्षा कर.  यह कह कर भाना ने कुवे में छलांग लगा दी.  जोशी जी के मुह से चीख निकल गयी.

Rajen

एक लम्बी चीख के साथ जोशी जी बेहोश हो गए.  दूसरे दिन राज कर्मियौं ने जोशी जी को उनके घर बेहोशी की हालत में पहुचाया.  दोनों लाशों को निकल कर अन्तिम संस्कार कर दिया.  पूरे राज्य में यह ख़बर आग की तरह फ़ैल गयी.  गंगनाथ और भाना की मौत पर सबको बहुत दुःख हुआ.  कुछ दिनों के बाद जोशी जी की बेहोशी टूटी तो वो पागलों की तरह ब्यवहार कराने लगे.  गंगनाथ को मारने वाले मजदूरों की दशा भी ऐसी ही हो गयी.  धीरे-२ पूरे राज्य में अजीब सी बैचैनी फैलने लगी.  तब तक जोशी जी के कुछ और रिश्तेदार सौराष्ट्र से यहाँ पहुच चुके थे.  उन्हें भी पूरी बात जानकर बहुत दुःख हुआ.  तब उनमें से किसी सयाने ब्यक्ति ने राजा को सलाह दी की गंगनाथ और भाना की अतृप्त आत्माओं के कारण ही राज्य में यह बैचैनी और अराजकता फ़ैल रही है अतः गंगनाथ और भाना का एक मन्दिर बना कर उन्हें देवता की तरह पूजा जाय तो कुछ समाधान निकल सकता है.  राजा ने ऐसा ही किया तब राज्य में सुख शान्ति हुई.  तभी से गंगनाथ की नियमित रूप से पूजा होती है.  गंगनाथ के साथ क्यूंकि अन्याय हुआ था, सो वह हर उस ब्यक्ति की सहायता करने लगे जो किसी के अन्याय से पीड़ित हो और गंगनाथ के पास फरियाद करे. 

Rajen


Rajen

मित्रो यह तो रही गंगनाथ की कथा जो मैंने कड़ी-२ जोड़ कर यहाँ लिखने का प्रयास किया है किंतु गंगनाथ के बारे मैं यही कथा है ऐसा नही है.  कुछ लोगों का मत था कि....

Anubhav / अनुभव उपाध्याय

Jai Ho Gangnath ji ki

+10 Karma aapko is katha ke liye.

Rajen

कुछ लोगों का कहना था की गंगनाथ डोटी से इसलिए नही निकले की नई रानी उनको मरवाना चाहती थी बल्कि इसके पीछे भी एक कहानी है.

कहते हैं की एक बार सपने में एक ख़ूबसूरत युवती गंगनाथ के सपने में आई और कहा की गंगनाथ मेरा जन्म तुम्हारे लिए हुआ है.  मैं अपने बारे में सिर्फ़ इतना बता सकती हूँ की मेरा नाम भाना है और मैं फलां की पुत्री हूँ.  मेरा और मेरे पिता का कोई निश्चित ठिकाना नही है हम लोग अपना घर बार छोड़ कर किसी अंजान स्थान की ओर जा रहे हैं.  अब यदि तुम मुझे अपनाना चाहते हो और अपने मां के सच्चे सपूत हो तो मुझे ढूँढ कर अपना बनाओ अन्यथा मैं समझूँगी की तुम झूठे हो. 

कहते हैं की गंगनाथ और भाना दोनों अवतारी थे अर्थात दोनों में कुछ दैवीय अंश था.  गंगनाथ ने भाना को ढूँढने का निश्चय किया.  लेकिन राज्य का उत्तराधिकारी होने के नाते वह सहजता से राज्य से बाहर नहीं जा सकता था.  सो गंगनाथ ने एक रात जोगी का भेष धारण किया और निकल पड़े डोटी से भाना की खोज में. 
बीच की कुछ घटनाएँ पिछली कहानी से मेल खाती हैं.
डोटी से निकल कर गंगनाथ उत्तराखंड के कई स्थानों से होते हुए हरिद्वार पहुंचे और वहां पर उन्होंने कुशा घाट पर स्नान किया और अपनी माता का तर्पण किया.  वहां से वो अपने गुरु के आश्रम पहुंचे और गुरु को प्रणाम कर उनसे दीक्षा ली और आशीर्वाद लेकर आगे की यात्रा शुरू की.  वहां से गंगनाथ ऊंची नैनीताल - नीची भीमताल होते हुए, चम्पावत के रस्ते उस जगह पहुच गए जहाँ भाना अपने पिता के साथ रह रही थी.  गंगनाथ जहाँ भी जाते अपनी एक बिशेष छाप छोड़ जाते.  लोग उन्हें अवतारी पुरूष मानते.  उन्हें कई स्थानों पर बिषम परिस्थियौं का भी सामना करना पड़ा.  जब जब गंगनाथ संकट में पड़ते तो जगरिया के बोल "हूँ नै होशियार जोगी,  रू नै डोटी में" मुखरित होते अर्थात अरे जोगी तू इतने संकट में घिर गया है यदि तू होशियार होता तो डोटी में चैन से रहता. 
गंगनाथ को देखते ही भाना उससे लिपट गयी.  इस दृश्य को देख कर भाना के पिता को बहुत क्रोध आया किंतु अपने पद की गरिमा का ख्याल कर चुप रहे और मन ही मन गंगनाथ को दंड देने की युक्ति सोचने लगे.  सो उक्त युक्ति से ही उन्होंने गंगनाथ का बध करवाया. 

Rajen


कहते हैं की अपनी हत्या के बाद गंगनाथ की आत्मा सबसे पहले भाना के अन्दर आयी थी इसीलिये गंगनाथ के जागर में गंगनाथ का डंगरिया भी महिला ही होती हैं जिसे "भान बामुनी" कहा जाता है. 

Quote from: Himanshu Pathak on August 01, 2008, 11:30:18 AM
गंगनाथ के जागरी में १ औरत अतार्ती है, उसे "भन बामणी" कहते है| पहले मुझे नही पता था की उसे  "भन बामणी" क्यों कहते है| पर अब ये कथा पढ़कर समझ आ गया

Bhan= kyunki uska naam bhanu tha
Baameni= Kyunki wo Brahmin(Joshi) thi



Rajen

मेरी ओर से इतना ही.  धन्यवाद.

जय गंगनाथ

Rajen

आपने तो मालामाल कर दिया.  धन्यवाद. ;D

Quote from: Anubhav / अनुभव उपाध्याय on August 04, 2008, 03:54:50 PM
Jai Ho Gangnath ji ki

+10 Karma aapko is katha ke liye.


पंकज सिंह महर

Quote from: Rajen on August 05, 2008, 02:55:29 PM
कुछ लोगों का कहना था की गंगनाथ डोटी से इसलिए नही निकले की नई रानी उनको मरवाना चाहती थी बल्कि इसके पीछे भी एक कहानी है.

कहते हैं की एक बार सपने में एक ख़ूबसूरत युवती गंगनाथ के सपने में आई और कहा की गंगनाथ मेरा जन्म तुम्हारे लिए हुआ है.  मैं अपने बारे में सिर्फ़ इतना बता सकती हूँ की मेरा नाम भाना है और मैं फलां की पुत्री हूँ.  मेरा और मेरे पिता का कोई निश्चित ठिकाना नही है हम लोग अपना घर बार छोड़ कर किसी अंजान स्थान की ओर जा रहे हैं.  अब यदि तुम मुझे अपनाना चाहते हो और अपने मां के सच्चे सपूत हो तो मुझे ढूँढ कर अपना बनाओ अन्यथा मैं समझूँगी की तुम झूठे हो. 

कहते हैं की गंगनाथ और भाना दोनों अवतारी थे अर्थात दोनों में कुछ दैवीय अंश था.  गंगनाथ ने भाना को ढूँढने का निश्चय किया.  लेकिन राज्य का उत्तराधिकारी होने के नाते वह सहजता से राज्य से बाहर नहीं जा सकता था.  सो गंगनाथ ने एक रात जोगी का भेष धारण किया और निकल पड़े डोटी से भाना की खोज में. 
बीच की कुछ घटनाएँ पिछली कहानी से मेल खाती हैं.
डोटी से निकल कर गंगनाथ उत्तराखंड के कई स्थानों से होते हुए हरिद्वार पहुंचे और वहां पर उन्होंने कुशा घाट पर स्नान किया और अपनी माता का तर्पण किया.  वहां से वो अपने गुरु के आश्रम पहुंचे और गुरु को प्रणाम कर उनसे दीक्षा ली और आशीर्वाद लेकर आगे की यात्रा शुरू की.  वहां से गंगनाथ ऊंची नैनीताल - नीची भीमताल होते हुए, चम्पावत के रस्ते उस जगह पहुच गए जहाँ भाना अपने पिता के साथ रह रही थी.  गंगनाथ जहाँ भी जाते अपनी एक बिशेष छाप छोड़ जाते.  लोग उन्हें अवतारी पुरूष मानते.  उन्हें कई स्थानों पर बिषम परिस्थियौं का भी सामना करना पड़ा.  जब जब गंगनाथ संकट में पड़ते तो जगरिया के बोल "हूँ नै होशियार जोगी,  रू नै डोटी में" मुखरित होते अर्थात अरे जोगी तू इतने संकट में घिर गया है यदि तू होशियार होता तो डोटी में चैन से रहता. 
गंगनाथ को देखते ही भाना उससे लिपट गयी.  इस दृश्य को देख कर भाना के पिता को बहुत क्रोध आया किंतु अपने पद की गरिमा का ख्याल कर चुप रहे और मन ही मन गंगनाथ को दंड देने की युक्ति सोचने लगे.  सो उक्त युक्ति से ही उन्होंने गंगनाथ का बध करवाया. 


जागर में भी इसका वर्णन होता है, क्योंकि उनके हरिद्वार जाकर गुरु से दीक्षा लेने का वर्णन भी हर जागर में होता है और वह अतरते हुये अपने गुरु की आरती भी करते हैं, यह जागर का एक आवश्यक पार्ट है।