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Famous Temples Of Bhagwati Mata - उत्तराखंड मे देवी भगवती के प्रसिद्ध मन्दिर

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, July 24, 2008, 04:09:17 PM

Anil Arya / अनिल आर्य

श्री माँ डाट काली , देहरादून -  जय श्री माँ डाट काली __/\__

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

गढ़वाल के विभिन्न स्थानों पर स्थापित दुर्गा एवं उसके विभिन्न स्वरुपों के महत्वपूर्ण मन्दिर निम्न हैं।
मन्दाकिनी घाटी में कालीमठ नामक स्थल पर स्थित महाकाली, महासरस्वती, महालक्ष्मी एवं हरगौरी मन्दिर
धनौल्टी (मसूरी) के निकट स्थित सरकन्डा देवी मन्दिर
हिन्डोलाखाल-टिहरी मार्ग पर स्थित चन्द्रवदनी देवी मन्दिर
कालीफट में फांगू का दुर्गा मन्दिर
बिचाला नागौर में स्थित दुर्गा मन्दिर
तल्ला उदयपुर में स्थित भवानी मन्दिर
कल्बंगवारा दुर्गा मन्दिर जहाँ देवी ने रक्तबीज का वध किया था
बिरौन, बिचला नागपुर एवं उदयपुर पट्टी (खेरा) में स्थित चामुन्डा देवी मन्दिर
श्रीनगर में स्थित ज्वालपा देवी मन्दिर
तपोवन में स्थित गौरी मन्दिर
जोशीमठ में स्थापित नवदुर्गा मन्दिर
श्रीनगर एवं अजबपुर (देहरादून) में स्थित शीतला देवी मन्दिर
बसन्त ऋतु में एवं दशहरे से ठीक पहले शरद ऋतु में नौ दिनो तक देवी दुर्गा की पूजा पूर्ण श्रृद्धा के साथ की जाती है। इन नौ दिनो को नवदुर्गा के नाम से जाना जाता है एवं इन दिनो को विवाह एवं अन्य मांगलिक कार्यों के लिए अत्याधिक शुभ माना जाता है।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

गढ़वाल के विभिन्न स्थानों पर स्थापित दुर्गा एवं उसके विभिन्न स्वरुपों के महत्वपूर्ण मन्दिर निम्न हैं।

    * मन्दाकिनी घाटी में कालीमठ नामक स्थल पर स्थित महाकाली, महासरस्वती, महालक्ष्मी एवं हरगौरी मन्दिर
    * धनौल्टी (मसूरी) के निकट स्थित सरकन्डा देवी मन्दिर
    * हिन्डोलाखाल-टिहरी मार्ग पर स्थित चन्द्रवदनी देवी मन्दिर
    * कालीफट में फांगू का दुर्गा मन्दिर
    * बिचाला नागौर में स्थित दुर्गा मन्दिर
    * तल्ला उदयपुर में स्थित भवानी मन्दिर
    * कल्बंगवारा दुर्गा मन्दिर जहाँ देवी ने रक्तबीज का वध किया था
    * बिरौन, बिचला नागपुर एवं उदयपुर पट्टी (खेरा) में स्थित चामुन्डा देवी मन्दिर
    * श्रीनगर में स्थित ज्वालपा देवी मन्दिर
    * तपोवन में स्थित गौरी मन्दिर
    * जोशीमठ में स्थापित नवदुर्गा मन्दिर
    * श्रीनगर एवं अजबपुर (देहरादून) में स्थित शीतला देवी मन्दिर
    * बसन्त ऋतु में एवं दशहरे से ठीक पहले शरद ऋतु में नौ दिनो तक देवी दुर्गा की पूजा पूर्ण श्रृद्धा के साथ की जाती है। इन नौ दिनो को नवदुर्गा के नाम से जाना जाता है एवं इन दिनो को विवाह एवं अन्य मांगलिक कार्यों के लिए अत्याधिक शुभ माना जाता है।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Shidhpeeth Mata Bhagwati Maa Mathiyana Devi Mandir is located in the indian state of Uttaranchal at the longtitude of 78.91 and lattitude of 30.33. Rudraprayag is the nearest city from Shidhpeeth Mata Bhagwati Maa Mathiyana Devi Mandir. " Jai Maa Mathyana.




photo by
Rajveer Chauhan 



विनोद सिंह गढ़िया

मां महामाया अखिलतारिणी

लोहाघाट (चम्पावत) में दिगालीचौड़ के समीप मां महामाया अखिलतारिणी का मंदिर देवी भक्तों की आस्था का केंद्र है। स्कंद पुराण के अनुसार मां अखिलतारिणी और माता पूर्णागिरि दोनों सगी बहनें हैं। कार्तिक नवरात्री के अवसर पर गड़ गंगा से लौटते हुए चैत्र नवरात्री में अन्नपूर्णा शिखर एवं खिलपिती में वे अपना-अपना स्थान ग्रहण कर लेती हैं। माना जाता है कि यहां दर्शन करने से मनोकामना पूर्ण होती है। इस स्थान में चैत्रीय एवं शारदीय नवरातों में रोज श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है।  अखिलतारिणी मां को सिद्धिदात्री के रूप में भी पूजा जाता है। मां के दरबार में आने वाला उसका उपासक कभी खाली हाथ नहीं लौटता।

लोहाघाट से लगभग 15 किलोमीटर दूर अखिलतारिणी मां के दर्शन के लिए जाने के लिए सड़क उपलब्ध है। जहां दिनभर टैक्सियों का संचालन होता रहता है। सघन देवदार वनों के बीच में स्थित माता के मंदिर में पहुंचने पर श्रद्धालुओं को अलौकिक शांति एवं दिव्य आभा का अनुभव होता है। लोगों की दिनचर्या ही मां अखिलतारिणी के दर्शन से ही शुरू होती है। इस वनाच्छादित शैल शिखर से प्रकृति का आनंद लिया जा सकता है। इस दौरान यहां टनकपुर नायक गोठ के लोग अपनी कुलदेवी को पूजने के लिए भी आते हैं।

विनोद सिंह गढ़िया

मां त्रिपुरासुंदरी मंदिर अल्मोड़ा



चंद राजाओं ने अल्मोड़ा को राजधानी बनाने के साथ ही सभी दृष्टि से अजेय व सुरक्षित करने के लिए चारों दिशाओं में अष्ट भैरव नव दुर्गा की स्थापना की। उन्हीं नवदुर्गा मंदिरों में एक है मां त्रिपुरासुंदरी का मंदिर। कहते हैं तीन लोकों में सुंदरता के श्रेष्ठ शिखर की पदवी के कारण सृष्टि के रचियता ब्रह्मा ने मां भगवती को त्रिपुरासुंदरी नाम दिया। ऐसा उल्लेख धार्मिक ग्रंथों में मिलता है। त्रिपुरासुंदरी का शाब्दिक अर्थ तीनों पुरों का श्रृंगार या पाताललोक, मृत्युलोक व स्वर्गलोक में सुंदरता की पराकाष्ठा कहा गया है।

मां त्रिपुरासुंदरी का उल्लेख दुर्गासप्तशती सहित अनेक पुराणों व ग्रंथों में मिलता है। ग्रंथों में कहा गया है कि जब असुरों ने देवताओं, ऋषि-मुनियों, देवगणों पर अत्याचार अति कर दिए, तो तीनों लोकों के वासी भगवान शिव के दरबार में गए। असुरों से रक्षा की याचना की। भोले शंकर ने असुरों के अजेय नगर जो स्वर्ण, रजत व लौह से निर्मित था,पर मां त्रिपुरासुंदरी के प्रताप से दुर्ग ध्वंसकर विजय प्राप्त की । जिसके कारण मां को जनयित्री, पालयित्री व संहारक‌र्त्री शक्ति का समन्वय कहा गया।

यूं तो अल्मोड़ा के त्रिपुरासुंदरी मंदिर में पूरे वर्ष भर श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। नवरात्र आते ही मंदिर की शोभा व आभा अद्वितीय हो जाती है। ब्रह्मामुहूर्त से ही मंदिर में शंख, घंट ध्वनि, धूप कपूर चंदन की मोहक गंध के साथ मां भगवती का स्तुतिगान शुरू हो जाता है। मंदिर का निर्माण कब हुआ इसकी प्रमाणिकता तो नहीं है लेकिन इतिहासविदों का मानना है कि कुमाऊं के चंदवंशीय राजा उद्योतचंद ने डोटी (नेपाल) के राजा रेनका पर विजय प्राप्त करने के बाद विजय स्मृति में मंदिर की स्थापना की। मां के इस दरबार में आस्था, विश्वास गहरी जुड़ी हुई है। आस्थावान कहते हैं, जिसने भी मां के दरबार में अंतरमन व विश्वास से जो भी मांगे वह अवश्य पूरा होता है।

स्रोत- दैनिक जागरण

Hemant Kapkoti

जय हो होक्रा माता की........
होक्रा माता जोहार के निवाशियो की इष्ट देवी है ..... होक्रा माता का मंदिर मुनस्यारी विकासखंड तथा जिला पिथोरागढ़ में आता है...... मुझे भी इस मंदिर का दर्शन करने का सोभाग्य प्राप्त हुआ है .. मैंने १ अप्रैल २०१२ को रामनवमी के दिन होक्रा माता के दर्शन किये....astami को वहा पर बहुत ही विशाल मेला लगता है पर उस दिन जा नहीं पाया.. शायद माता का बुलावा नवमी को ही था ......कपकोट से मंदिर तक की दूरी लगभग ६० किलोमीटर है जिसमे १०-१२ किलोमीटर का कच्चा रास्ता है..... रोड तो कट चुकी है पर डामरीकरण नहीं हुआ है तथा मोटर पुल का निर्माण भी हो रहा है...... मैं और मेरे दोस्त लोग सुबह ५ बजे कपकोट से निकले और लगभग ७:३० बजे वह पहुचे..... ..... मंदिर में प्रवेश करने के दो प्रवेश द्वार है... एक जाने के लिए और एक वापस आने के लिए..... मंदिर के चारो ओर का निरिक्षण करने से ही पता लग रहा था की कल वहा पर कितना विशाल मेला लगा होगा .... हम एक प्रवेश द्वार से अंदर गए... वहा देखा की मंदिर के पुजारी जी नहा धोकर मंदिर के अंदर जा रहे थे... हमने भी हाथ पाव धोये और मंदिर में प्रवेश किया ...मंदिर में पहुचते ही मन को ऐसी शांति पहुची जिसे शब्दों में बया नहीं कर सकता..... रास्ते की जो भी थकान थी वो न जाने कहा छूमंतर हो गयी...... मंदिर का आँगन अगरबत्तियो के रैपर ओर पूजा की अन्य सामग्रियों से अटा पड़ा था .... मंदिर के सदस्य मंदिर की सफाई करने में व्यस्त थे..... हमने भी मंदिर की सफाई करने में उनका सहयोग किया.. जब मंदिर साफ़ हो गया तो फिर हमने वहा पूजा अर्चना भी की ...... पुजारी जी ने हमे बताया की भक्तजन यहाँ अपनी मनोकामनाए लिख कर जाते है ओर मनोकामनाए पूर्ण होने पर दोबारा यहाँ आकर पूजा आदि करते है...... होक्रा माता का मंदिर बहुत बड़े स्थान में फैला है .... सब कार्यो के लिए अलग अलग कमरे है .... खास बात ये है की मुख्य मंदिर में छत नहीं है .. चारो ओर बाज के पेड़ है और पेडो पर लाल चुनरिया बाँधी हुई थी... एक स्थानीय व्यक्ति ने बताया की पहले यहाँ पर कोई पेड़ नहीं थे...... ये खाली जमीन थी .. गाँव वालो ने सोचा की क्यों न यहाँ पर खेती की जाए .. तब कुछ लोगो ने यहाँ पर फसल बोई लेकिन फसल की जगह यहाँ पर ये पेड़ निकल आये .. ग्रामवासियों ने उन पेड़ो को काट दिया लेकिन फिर वहा पर दलदल बन गया.. तब ग्रामवाशियो ने वहा पर खेती करना छोड़ दिया ओर धीरे धीरे दलदल सुख गया ओर बाज के पेड़ दोबारा उग गए...... तब वहा पर मंदिर की स्थापना की गयी... एक कहानी ओर भी सुनी मैंने इस बारे में की एक महिला खेत में गुड़ाई कर रही थी की तभी कुदाल एक पत्थर से टकराया ओर कहते है की उस पत्थर से खून निकलने लगा ओर पत्थर कराहने लगा .. उस महिला ने ये बात ग्रामवाशियो को बताई तब ग्रामवाशियो ने उस पत्थर पर माखन आदि रखा ओर लोगो ने उस पत्थर, जो देवी का रूप है की पूजा करना प्रारंभ कर दिया..... आज वह पत्थर काफी बड़ा हो गया है ... ओर मान्यता है की हर वर्ष वो पत्थर जो देवी का रूप है धीरे धीरे ओर भी बड़ा हो रहा है आज भी मंदिर में उसी देवी रूपी पत्थर की पूजा की जाती है ..... यहाँ सच्चे दिल से जो भी मांगो अवश्य मिलता है.....

मैं तो मंदिर ओर माता के दर्शन करके धन्य हुआ .... मित्रो आप भी जाइये कभी होक्रा माता के दरबार में..... होक्रा माता आपकी मनोकामना पूरी करे .....

जय होक्रा माता




Hemant Kapkoti

श्री १००८ कोकिला माता ( कोटगाडी ) की जय
इस मंदिर को भगवती माता का मंदिर भी कहते है I कोटगाडी देवी को न्याय की देवी भी कहा जाता है I मान्यता है की जिसे कही से न्याय नहीं मिलता उसे इस मंदिर से अवश्य न्याय मिलता है I इस मंदिर की खासियत ये है की यहाँ आप सच्चे दिल जो भी मांगो उससे माता अवस्य पूरा करती है I यह कुमाऊ का एक प्रसिद्ध मंदिर है जहा प्रतिदिन श्रधालुवो का ताता लगा रहता है I कोटगाडी देवी मंदिर पिथौरागढ़ जिले में स्थित है I पिथौरागढ़ से इस मंदिर की दूरी लगभग 72 किमी है I



Risky Pathak




जैंती। यहां से तीन किमी दूर आरा ग्राम में मां भीमा देवी का एक छोटा सा अलौकिक मंदिर है। यहां मां जगदम्बिका अपने भीम रूप में विद्यमान है। देवी के इस मंदिर की खासियत यह है कि यहां बलि नहीं बल्कि उड़द के दाल का भोग लगता है। भक्तजन मन की मुराद पूरी होने पर मां भीमा देवी के मंदिर में सात्विक पूजा-अर्चना करते हैं।
भीमा देवी मंदिर ही एक ऐसा मंदिर है जो घाटी (तलहटी) में बना है। इसे गौतम गोत्रीय पांडे लोगों की कुलदेवी माना जाता है। मूल रूप से राजस्थान निवासी पांडे वंशज औरगंजेब के प्रतिदिन 17 हजार जनेऊ के होम से तंग आकर यहां सालम के नया संग्रौली ग्राम आकर बस गए। विशाल शिला के जमीन के अंदर दबा होने के कारण उसे भीमा देवी कहा जाने लगा। मंदिर के चारों ओर बंजर जमीन है जिसमें आज तक कोई पेड़ नहीं उग पाया है। बंजर जमीन की खुदाई करने पर शिवलिंग नुमा पत्थर निकलते हैं। इसीलिए ग्रामीण 200 फीट क्षेत्र को बंजर रखे हुए हैं। मंदिर से लगभग 250 मी. दूरी पर पांच जल धाराएं झरने के रूप में निकलती है, जिन्हें बसुधारा कहा जाता है। कहा जाता है कि ये धाराएं माता के चरणों से होकर आती हैं। इसी पानी से स्नान कर मां भीमा देवी का जलाभिषेक किया जाता है।
स्थानीय पंडितों के अनुसार पहले वसुधारा में सात धाराएं निकलती थी, जिसमें से दो धाराएं दूध की थी। कालांतर में किसी बाबा द्वारा धाराओं के दूध से खीर बनाकर खा लेने से दूध की धारा बंद हो गई।
अब यहां पांच धाराएं ही रह गईं हैं। मार्कण्डेय पुराण के अनुसार शुंभ का वध करने के बाद सभी देवता अग्नि को आगे कर देवी कात्यायनी की स्तुति करने लगे तो देवी ने प्रसन्न होकर वर मांगने को कहा। देवताओं ने मांगा कि 'हे देवी आप हमारी सभी बाधाओं को दूर करते हुए शत्रुओं का नाश करती रहो'। देवी ने देवताओं को भरोसा दिलाया कि 'मैं समय-समय पर अवतरित होकर राक्षसों का नाश करूंगी'। दुर्गा सप्तशती के 11वें अध्याय के 51 वें श्लोक में भी इस बात का वर्णन है।
मानस खंड के अनुसार द्वापर युग में पांडवों के वनवास के दौरान भीम ने वसुधारा के पास नदी में एक राक्षस का वध कर भीमा देवी की स्तुति की तथा वसुधारा के जल से देवी का जलाभिषेक किया था। मान्यता है कि मां दुर्गा (शक्ति) देवीधुरा से धुर्कादेवी मंदिर जा रही थी तो रास्ते में जाते-जाते उसे आरा ग्राम के पास रात हो गई और देवी (शक्ति) जमीन में बैठ गई। तत्पश्चात भगवान शंकर ने स्वयं यहां आकर दर्शन दिए तथा सप्त धाराओं का उदय हुआ। इसी कारण मंदिर के चारों ओर आज भी शिव लिंग पाए जाते हैं। जमीन में शक्ति बैठने के कारण इसे भीमा देवी कहा गया है। उल्लेखनीय है कि दुर्गा मां के सभी मंदिर प्राय: ऊंची चोटियों तथा गुफाओं में बने हैं।

Source: AmarUjala

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Naithna Devi Temple-village naubara The temple is at an altitude of about 1652 mtrs., on a 4 kms. Uphill trek from  naubara, through Masi- Ranikhet motorable road-Naithna Devi is 55 kms. From Ranikhet and is situated on Gan Mughda Hill. In addition to the sanctity, the place is a favourite tourist spot with a view of the high snow capped peaks of the Himalayas, and the cities of Almora, Ranikhet, Mansi and Choukhutiya. Rail : Nearest railhead is Kathgodam, 136 kms.from-kripal bhakuni(naubara)