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उत्तराखंड पर कवितायें : POEMS ON UTTARAKHAND ~!!!

Started by Dinesh Bijalwan, August 05, 2008, 02:18:42 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


Great work by Dinesh Ji and Mahar Ji by putting very-2 exclusive poem of Uk here.

i have also a book written by Pooran chand Kandpal ji om

खीमसिंह रावत

कल्पना चावला

अन्तरिक्ष की थी कल्पना
कल्पना में नही उडी थी कल्पना
बनाया था एक अद्भूत यान
जिसमें होती हो साकार कल्पना
स्वाभिमानी, दृढ-निश्चयी थी
भारत पुत्री मृदुभाड्ढी कल्पना
सफल प्रथम अभियान से
सरदार सबकी बनाई कल्पना
शान्त स्थिर व्योम चीरकर
उस पार गई थी कल्पना
शोघ गहन क्षण प्रतिक्षण
जीवन के उत्कर्षण में थी कल्पना
मेघों को पीछे छोड,आगे ही आगे
तारों को छुने लगी थी कल्पना
खुश थी पृथ्वी पुत्री पर
अजेय भारत की थी कल्पना
मानव ने रचा था यह खेल
विधाता ने नही की थी कल्पना
सन्देशों की बारिस रूक गई आखिर
अब नही थी यथार्थ की कल्पना
छिन्न भिन्न हुआ कोलम्बिया यान
आसमान में बिखर गई कल्पना
स्तब्धा रह गया जग
इस हश्र की नही थी कल्पना
यान अभियान दोंनों के संग
परलोक सिधार गई कल्पना
अद्म्य साहस आत्मबल की
अमर गाथा बन गई कल्पना
रम्भा, उर्वशी नही मेनका बनी
गार्गी, लक्ष्मीबाई थी कल्पना।

पंकज सिंह महर

उदय किरौला जी की एक कुमाऊंनी कविता "उठ रे जटायु"

उठ रे जटायु
रावण ऎगो,
त्वील हिम्मत करि बेर
रावण पर वार करौ।

आज त कतुकै रावण हैं गयी
कतूकै सीता चोरि हालीं
रावणौ फौज पैद हैगे
कूंनी कि जब रावण पैद हूंनी
जब कंस पैद हूनी
जब राक्षस पैद हूंनी
तब क्वे अवतार हूं कूंनी।

पर घोर कलजुग ऎगो
क्वे अवतार लीहूं तैयार नहां
देखंण में तो कतूकै
अवतारी है गयीं।
पर उं सब आपुंण
'चेला' बनौण रयीं
आपंण दुकान सजौंण रयीं।

पैली अवतारी
सब्बूं कै भल करछीं
उनाब त घर-घर में
रोज अवतार हूंण रयीं
क्वे बाकर, क्वे कुकुड़
क्वे बोतल मांगी बेर
छाई-छाई पर्व दिंण रयीं।

फिर ले समाज में
लूंण जौ लागियै छू
राक्षसों दगै लड़ै लिजि
क्वे ले तैयार नीछू।
राक्षसों कै देखि बेर
यां मनखी मरि जांणी
मनखियल आपुंण
हाथ-खुट छोड़ि हाली।

जटायु तू वीर छै
त्वील रावण दगै लड़ै करी
तू ली ले अवतार
दिखै दे मनखी कैं
आपुंण फर्ज
उठ रे जटायु
तू ली सकछै अवतार॥

पंकज सिंह महर

नरेंद्र सिंह नेगी ने 1994 में उत्तरकाशी में जब यह पंक्तियां लिखीं, तब सामने अलग राज्य का संघर्ष था। आज अलग राज्य तो है, लेकिन आम आदमी का संघर्ष वही है। ऐसे में उनका यह गीत आज मुझ जैसे न जाने कितने लोगों को संबल देता है।


द्वी दिनू की हौरि छ अब खैरि मुट्ट बोटीकि रख
तेरि हिकमत आजमाणू बैरि
मुट्ट बोटीक रख।

घणा डाळों बीच छिर्की आलु ये मुल्क बी
सेक्कि पाळै द्वी घड़ी छि हौरि,
मुट्ट बोटीक रख

सच्चू छै तू सच्चु तेरू ब्रह्म लड़ै सच्ची तेरी
झूठा द्यब्तौकि किलकार्यूंन ना डैरि
मुट्ट बोटीक रख।
हर्चणा छन गौं-मुठ्यार रीत-रिवाज बोलि भासा
यू बचाण ही पछ्याण अब तेरि
मुट्ट बोटीक रख।

सन् इक्यावन बिचि ठगौणा छिन ये त्वे सुपिन्या दिखैकी
ऐंसू भी आला चुनौमा फेरि
मुट्ट बोटीक रख।

गर्जणा बादल चमकणी चाल बर्खा हवेकि राली
ह्वेकि राली डांड़ि-कांठी हैरि
मुट्ट बोटीक रख।

खीमसिंह रावत

Agar swarachit kavita hoti to jyada thik hota/

hem

यह कविता तो नहीं है, हाँ स्वरचित तुकबंदी जरूर है :

मेरा पहाड़

मेरे मन की पीड़ा को कुछ हल्का करता
राहत देता मुझको अपनों से मिलवा कर
न्कज, मेहता आदि बहुत से मित्र मिले हैं
हाड़ तोड़ मेहनत से करते 'फॉरम'  बेहतर

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


Thanx great sir ..

It will boost the moral of members..

Quote from: hem on August 09, 2008, 10:08:36 PM
यह कविता तो नहीं है, हाँ स्वरचित तुकबंदी जरूर है :

मेरे मन की पीड़ा को कुछ हल्का करता
राहत देता मुझको अपनों से मिलवा कर
न्कज, मेहता आदि बहुत से मित्र मिले हैं
हाड़ तोड़ मेहनत से करते 'फॉरम'  बेहतर

हेम पन्त

वर्तमान समय में उत्तराखण्ड में पंचायत चुनाव का दौर चल रहा है. राजनीति के गिरते स्तर पर "हरीश चन्द्र डोर्बी जी" की एक कविता, चारु दा के सौजन्य से...

ब्लाक प्रमुखोक चुनाव ऐ गैईं
सुकिल टोपि क मुनाव ऐ गैईं
मैंके जितावो-मैके जितावो हैरे
अच्याल हमार गोवु कै बहार ऐरे
गोनु में क्वै पानि ल्याओ नै ल्याओ
सभापति क मुखम पाणि ऐगो
ब्लाक प्रमुखोक चुनाव ऐगो...

एक जा प्रमुख पन्द्रह जै उम्मीदवार है गई
यस लगाण छ जस हमार नेता लै बिरोजगार है गई
जाग-जाग कें मीटिंग हैरे, अपाण-अपाण सेटिंग हैरे
उम्मीदवारो के कि करूं- कि करूं हैरे
तात्ते खूं जल मरूं हैरे........

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Quote from: H.Pant on August 10, 2008, 07:38:37 PM
वर्तमान समय में उत्तराखण्ड में पंचायत चुनाव का दौर चल रहा है. राजनीति के गिरते स्तर पर "हरीश चन्द्र डोर्बी जी" की एक कविता, चारु दा के सौजन्य से...

ब्लाक प्रमुखोक चुनाव ऐ गैईं
सुकिल टोपि क मुनाव ऐ गैईं
मैंके जितावो-मैके जितावो हैरे
अच्याल हमार गोवु कै बहार ऐरे
गोनु में क्वै पानि ल्याओ नै ल्याओ
सभापति क मुखम पाणि ऐगो
ब्लाक प्रमुखोक चुनाव ऐगो...

एक जा प्रमुख पन्द्रह जै उम्मीदवार है गई
यस लगाण छ जस हमार नेता लै बिरोजगार है गई
जाग-जाग कें मीटिंग हैरे, अपाण-अपाण सेटिंग हैरे
उम्मीदवारो के कि करूं- कि करूं हैरे
तात्ते खूं जल मरूं हैरे........


Very good poem on present senario.

हेम पन्त

बल्ली सिंह चीमा जी एक क्रान्तिकारी कवि के रूप में पूरे भारत में एक जाना पहचाना नाम हैं. वह ऊधमसिंह नगर के बाजपुर कस्बे में रहते हैं. उन्होनें आमजन के सरोकारों से जुङे मुद्दों और अपने अधिकारों की रक्षा के लिये संगठित होकर संघर्ष करने के लिये जोश भरने वाली कई मशहूर कविताएं लिखी हैं. उनकी कुछ कविताएं आप लोगों के लिये प्रस्तुत हैं.


यह गीत उत्तराखण्ड आनदोलन के दौरान प्रमुख गीत बन कर उभरा. वर्तमान समय मे यह गीत भारत के लगभग सभी आन्दोलनों में मार्च गीत के रूप में व्यापक रूप से प्रयोग में लाया जाता है.

ले मशाले चल पडे हैं, लोग मेरे गांव के,
अब अंधेरा जीत लेंगे, लोग मेरे गांव के,

कह रही है झोपङी और पूछते हैं खेत भी
कब तलक लुटते रहेंगे,  लोग मेरे गांव के,

बिन लङे कुछ भी नहीं मिलता यहां यह जानकर
अब लङाई लङ रह हैं , लोग मेरे गांव के,

कफन बांधे हैं सिरो पर, हाथ में तलवार है
ढूंढने निकले हैं दुश्मन, लोग मेरे गांव के,

एकता से बल मिला है झोपङी की सांस को
आंधियों से लङ रहे हैं, लोग मेरे गांव के,

हर रुकावट चीखती है, ठोकरों की मार से
बेङियां खनका रहे हैं, लोग मेरे गांव के,

दे रहे है देख लो अब वो सदा-ए -इंकलाब
हाथ में परचम लिये हैं, लोग मेरे गांव के,

देख बल्ली जो सुबह फीकी है दिखती आजकल
लाल रंग उसमें भरेंगे, लोग मेरे गांव के,