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उत्तराखंड पर कवितायें : POEMS ON UTTARAKHAND ~!!!

Started by Dinesh Bijalwan, August 05, 2008, 02:18:42 PM

jagmohan singh jayara

"झबर्ताळ"

धरि थै गल्वाड़ा फर,
बचपन मा बुबाजिन,
ममतामयी माँ जिन,
स्कूल मा मास्टर जिन,
गौं का सयाणा मन्खिन,
ऊछाद, गल्ती कन्न फर.

आज जमानु यनु निछ,
अजग्याल का छोरों देखिक,
ब्वे, बाब,मास्टर जी,
गौं का सयाणा मन्खि,
भौत डरदा  छन अफुमा,
इज्जत का खातिर,
चुप रण मा ही भल्यारि,
समझदा छन सब्बि.

"झबर्ताळ" लगण फर,
होन्दु थौ अहसास,
अपणी भूल या गल्ती कू,
भूलिक  करदा था भलु काम,
अपणी जिंदगी का खातिर,
हिट्दा था सुबाटा फुन्ड,
क्वी ठटा  न लगौ हमारी.

कवि: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
(सर्वाधिकार सुरक्षित-"झबर्ताळ" नि लगैन २७.४.२०१०) 

jagmohan singh jayara

"फुन्ड धोळ्युं"

बोल्दा छन मेरा मुल्क का मनखि,
सीधा साधा निमाणा मनखि कू,
किलैकि ऊ कैकि जड़ नि काटदु,
कैका होण फर, अगनै बढण फर,
अपणा मन मा कब्बि  नि जल्दु,
ह्वै सकु  त सब्यौं की मदद करदु.

यनु भी  बोल्दा छन,
अरे! ऊत  गोरु सी कुर्च्युं,
"फुन्ड धोळ्युं" मनखि छ,
जै सनै चर्क न फर्क,
दुनियाँदारी क्या होन्दि.

"फुन्ड धोळ्युं" ऊ होन्दु छ,
जू कैकि जड़ काट करिक,
सारु पन्त मारदु अर  खोन्दु छ,
जब तक नि करलु उल्टा काम,
खयुं पेट मा हजम नि होन्दु छ.

कवि: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
(सर्वाधिकार सुरक्षित-  "फुन्ड धोळ्युं" नि छौं  २७.४.२०१०) 

jagmohan singh jayara

"पानी रे! पानी"

तेरी कदर किसी ने न जानी,
जब नहीं मिलता है,
दुनियाँ हो जाती दीवानी,
अपने शहर में देखता हूँ,
बर्तन लेकर भागते लोग,
पानी की खोज में,
कहाँ मिलेगा?
प्यास बुझाने के लिए,
अनमोल पानी.

जल को बचाते थे लोग,
परम्परा है पुरानी,
कहते हैं  आज मानव सभ्य है,
पीने लगा बोतल बन्द पानी,
ये विकल्प नहीं कालजयी,
भाग रहा दूर जिम्मेदारी से,
कर रहा है नादानी.

पहाड़ दम तोड़ रहा है,
जहाँ से निकलता है,
नदियों  के नीर के रूप में,
पवित्र गंगा, यमुना का पानी,
लील रहा मानव प्रकृति को,
मित्रता नहीं रखता उससे,
कर रहा कैसी नादानी.

हिमालय के आंसू निकल रहे,
मत समझना उसे पानी,
पिघल चुका है दिल उसका,
हो रहा बर्फ विहीन,
ऐ मानव!
प्रकृति का मिजाज बदला,
तेरी ही है मेहरबानी,
कवि "जिज्ञासु" की कल्पना नहीं,
ये आईना है सच्चाई का,
"पानी रे! पानी",
तेरा हाल ऐसा क्योँ हुआ?

कवि: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
(सर्वाधिकार सुरक्षित "पानी रे! पानी" ३०.४.२०१०)
दूरभास: ०९८६८७९५१८७
(प्रकाशित: यंग उत्तराखंड पोर्टल, मेरा पहाड़ पर)   

jagmohan singh jayara

"बास हे घुग्ति"

बास हे घुग्ति, डाळ्यौं मा बैठि,
मैनि लगिं छ चैत की,
ऐगि  मौळ्यार, सजि धजिं छन,
डांडी मेरा मैत की.......

पाख्यौं  मा फ्यौंलि, मुल-मुल हैंसणि,
सारी मेरा मैत की,
तेरु बासणु, कनु भलु लगणु,
फूल्यारि मैनि चैत की......

अबरि अयुं छौं, मैत मैं अपणा,
खुद नि लगणि मैत की,
बास बास तू, प्यारी हे घुग्ति,
रौंत्याळि  मैनि चैत की......

स्वाळि पकोड़ी,  खाणु छौं घुग्ति,
थगोलि दाळ भात की,
कथगा सवादि, लग्दि छन 
लगड़ी ब्वै  का हात की.....

मैत मा अपणा, दगड़्यौं दगड़ि,
सुण हे  घुग्ति मैत की,
कथगा ऊलार, रीत रसाण,
ऊलारया मैनि मैत की.....

"बास हे घुग्ति", डाळ्यौं मा बैठि,
बोन्नि  बैठिं पास,
कवि "जिज्ञासु", दूर प्रदेश,
होयुं छ ऊदास.........

कवि: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
(सर्वाधिकार सुरक्षित-"बास हे घुग्ति" प्रकाशित यंग उत्तराखंड, मेरा पहाड़ पर १३.४.२०१०)

jagmohan singh jayara

"यंग उत्तराखंड सिने अवार्ड-२०१०"

जब-जब होलु जिक्र,
कब ह्वै थै अर कैन करि?
"उत्तराखंड सिने अवार्ड" की,
एक अनोखी शुरुआत.

लिख्यालि स्वर्णाक्षर मा,
अर दर्ज कार्यालि,
इतिहास का पन्ना फर,
९-मई, २०१०,
"यंग उत्तराखण्डन" अपणु नौं.

उत्तराखण्ड सिने जगतन,
करि प्रगट अपणु आभार,
या शुरुआत छ भलि,
होलु हौर सुन्दर प्रयास प्रसार.

जुग जुग राजि रै,
"यंग उत्तराखण्ड संगठन"
सार्थक छ आपकु,
पैलु भागीरथ प्रयास,
करदु रला आप,
उत्तराखण्ड कू सृंगार,
समाज का सर्वहित मा,
सब्यौं की छ या आस.

आयोजन मंच सी दिनि,
सब्बि महान लोगुन सन्देश,
बोली भाषा कू सम्मान करा,
रलु कायम अस्तित्व हमारू,
समृद्ध होलु हमारू उत्तराखण्ड प्रदेश.

कवि: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
(सर्वाधिकार सुरक्षित-"यंग उत्तराखंड सिने अवार्ड-२०१०")
(यंग उत्तराखण्ड और मेरा पहाड़ पर प्रकाशित १०.५.२०१०)

हेम पन्त

Jayara ji Young Uttarakhand ke sundar kary ki tarah hi aapki kavita bhi sundar lagi.

YU ko karykram ke safal aayojan ke liye badhai aur aapko sundar kavita likhane ke liye badhai..

jagmohan singh jayara

"हमारा  पहाड़ कू रैबार"

खड़ा छौं हम सीना ताणिक,
चूमणा छौं आकाश,
सबक लेवा तुम भि हमसि,
कब्बि न होवा निराश.

देख्युं हम बतै नि सकदा,
वीर भडु़ की बात,
राज करि यख गढ़ राजौंन,
सदा नि रै क्वी साथ.

कवि: "जिज्ञासु" कन्नु छ,
अपणा मन मा अहसास,
पंछी  बणिक फुर्र उड़ि जौं,
प्यारा पहाड़ का पास.

रचना: जगमोहन सिंह जयाड़ा  "जिज्ञासु"
(सर्वाधिकार सुरक्षित-"हमारा  पहाड़ कू रैबार" ११.५.२०१०)
(मेरा पहाड़ अर यंग उत्तराखण्ड फर प्रकाशित)

jagmohan singh jayara

  "तेरी मुखड़ि"

बतौणि छ हाल तेरा दिल का,
कुजाणि क्या ह्वै होलु यन,
उखड़ीं-उखड़ी सी "तेरी मुखड़ि",
खोयुं-खोयुं सी तेरु मन.

क्या त्वैकु कैन कुछ बोलि?
खोल दी अपणा मन की गेड़,
घमटैयुं सी भलु नि होन्दु,
जिंदगी मा ढेस अर बेड़.

बकळी ज्युकड़ी भलि निछ,
बतौ  अपणा मन की बात,
कुछ त बोल चुप किलै?
होलु कुछ तेरा मेरा हाथ.

बात यनि कुछ भि निछ,
कुजाणि मन मेरु अफुमा ख्वै,
मुखड़ि मेरी उखड़ीं-उखड़ीं,
आज उदास क्यौकु ह्वै.

मुखड़ि बतौंन्दि  छ,
सच मा  मन का हाल,
चा पोंछ्युं हो दूर  कखि,
जख प्यारू कुमौं-गढ़वाल.

कवि: जगमोहन सिंह जयाड़ा "ज़िज्ञासु"
(सर्वाधिकार सुरक्षित- "तेरी मुखड़ि" १२.५.२०१०)
(मेरा पहाड़ और यंग उत्तराखण्ड पर प्रकाशित)
गढ़वाली कविता श्री जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"

jagmohan singh jayara

"यंग उत्तराखण्ड सिने अवार्ड-२०१०"
(झलक:कवि की कलम सी)

आयोजन स्थल परिसर मा,
बज्दि मशकबीन अर ढोल की थाप,
जरूर ह्वै होलु पहाड़ी मन गद-गद,
अर थिरकी होला मन ही मन आप.

लगण लग्युं थौ आज अपणु पहाड़,
दूर  बिटि "दर्द भरी दिल्ली" मा ऐगि,
पहाड़ की समूण दगड़ा मा अपणा,
हमारा खातिर गेड़ बान्धिक ल्हेगि. 

निर्णायक मण्डल का सदस्यन,
ज्यूरी कू मतलब,
गौळा फर बाध्युं जूड़ू बताई,
कखि क्वी कमी रैगि होलि,
डगर भौत कठिन थै,
आयोजन कक्ष मा बैठ्याँ दर्शकु तैं,
मंच फर यनु ऐना भी दिखाई.

दिल्ली बिटि अयाँ  एक उत्तराखंडीन,
प्रवेश द्वार फर खड़ु  ह्वैक गुहार लगाई,
पास का बिना प्रवेश वर्जित थौ,
क्या बोलौं मैकु वै फर तरस आई.

यंग उत्तराखण्ड का समर्पित सदस्य,
काम मा जुट्याँ जनु बेटी कू हो ब्यो,
मिलि होलु सकून जब निब्टि होलु,
खुश ह्वै होलु सब्ब्यौं कू समर्पित मन
थकित बेटी का बुबा की तरौं खुश,
जनु प्यारी "बेटी का डोला अड़ेथिक".

अनुभव काम करिक आज अपतैं ह्वैगि,
सोच्यन  अर संकल्प कर्यन  आप अफुमा,
समाज की एक गरीब बेटी का ब्यो कू,
पहाड़ कू श्रींगार अर समाज तैं सहायता,
"यंग उत्तराखण्ड" कु छ संकल्प अर आधार.

कवि: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
(सर्वाधिकार सुरक्षित १२.५.२०१०)
ग्राम: बागी-नौसा, पट्टी. चन्द्रबदनी, टेहरी गढ़वाल.

jagmohan singh jayara

"पर्वतजन अर  जंगळ"

जबरी बिटि जंगळु की मुनारबंदी ह्वै,
पर्वतजनु कू हक्क हकूक नि रै,
उबरी ऊन "ढंडक आन्दोलन" चलै,
टूटिगि रिश्ता जंगळु सी ऊँकू,
जंगळु फर वन विभाग कू अधिकार ह्वै.

फिर भी "चिपको आन्दोलन" चलैक,
लालची ठेकेदारू सी जंगळ  बचैक,
रैणी,चमोली का प्रकृति प्रेमी पर्वतजनुन,
दुनियां मा "डाळ्यौं का दगड़्या" बणिक,
कर्तव्य निभैक, सच मा डंका बजै.
जळ्दा जंगळु की रक्षा करदु-करदु,
कै पर्वतजनुन अपणी जान गवैं,
सरकारी प्रयासुन जंगळ नि बच्यन,
जंगळु कू धीरू धीरू सत्यानाश ह्वै.

पहाड़ का पराण छन  प्यारा जंगळ,
जख बिटि निकल्दु छ पवित्र पाणी,
हैंस्दा छन बणु मा प्यारा बुरांश,
बास्दा  छन घुघती अर हिल्वांस.
पर्वतजनु कू हरा भरा जंगळु सी,
अटूट रिश्ता छ सख्यौं पुराणु,
कायम रयुं चैन्दु भल्यारि का खातिर,
"पर्वतजन अर जंगळु " कू सदानि.

कवि: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
(सर्वाधिकार सुरक्षित १४.५.२०१०)
(यंग उत्तराखंड, मेरा पहाड़ और हिमालय गौरव पर प्रकाशित)