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उत्तराखंड पर कवितायें : POEMS ON UTTARAKHAND ~!!!

Started by Dinesh Bijalwan, August 05, 2008, 02:18:42 PM

Bhishma Kukreti

गढ़वाली मुंडरु - हाइकू - {गढ़वालिम}
.
हे लौ हे लौ कै .....
बड़जि बुलांदा छा .......
अब हैलो च ॰..... [#:३९]
.
.
Of and By: कृष्ण कुमार ममगांई
ग्राम मोल्ठी, पट्टी पैडुल स्यूं, पौड़ी गढ़वाल
[फिलहाल दिल्लि म] :: {जै भैरव नाथ जी की}

Bhishma Kukreti

गढ़वाली कुण्डलियाँ {गढ़वलिम}
{On : झूठन सदनि रांण झूsठ }
.
झूठ ब्वन्नु आसान का
ये विज्ञानन याsर ।
सफेद झूठ बोली की
डिलिट कैर कै बार ॥
.
डिलिट कैर कै बार
सबूत कुछ भी नी रांदा ।
तकनीकी इन छन की
सच भी झूठ दिखींदा ॥
.
ब्वल्द कृष्ण ममगाईं
अरे तू दाड़ि न कीट ।
करले मुन्ड कपाल
झूठन सदनि रांण झूsठ ॥ {११}

Bhishma Kukreti

गढ़वाली दोहा ""पखणौं का बुखणां"" का पिछला अंक का क्रम मा दोहा लम्बर 201 :
.
कुछकू हुंद स्वभाव इनू
जन कुकरै की पूंछ ।
टेरा टेरा रंदन ऊ
दुनिया दारी नीच ॥ (२०१)
.
बाकी फिर कभी अगले अंक में ........
.
Of and By : कृष्ण कुमार ममगांई
ग्राम मोल्ठी, पट्टी पैडुल स्यूं, पौड़ी गढ़वाल
[फिलहाल दिल्लि म] :: {जै भैरव नाथ जी की }

Bhishma Kukreti

गढ़वाली मुंडरु - हाइकू - {गढ़वालिम}
.
माछि पकड़ .....
माछि पकड़ डौंखि .......
हाथ चुसणां ..... [#:३८]
.
.
Of and By: कृष्ण कुमार ममगांई
ग्राम मोल्ठी, पट्टी पैडुल स्यूं, पौड़ी गढ़वाल
[फिलहाल दिल्लि म] :: {जै भैरव नाथ जी की}

Bhishma Kukreti

गढ़वाली कुण्डलियाँ {गढ़वलिम}
{On : घरवलि }
.
सूंणी की एक कान से हैंकन निकल्द भैर ।
घरवली वे की तेज च यां मैं वै की खैर ॥
.
यां मैं वै की खैर घरवली कैकी नि धरदा ।
द्वी कंदुडुन सुणदा गिच्चन भैर निकलदा ॥
.
ब्वल्द कृष्ण ममगाईं देखि दुनियाँ जांणी की ।
घरवलि दगड़ी मौन राव हर बात सूंणि की ॥ {१2} .
.
Of and By : कृष्ण कुमार ममगांई
ग्राम मोल्ठी, पट्टी पैडुल स्यूं, पौड़ी गढ़वाल
[फिलहाल दिल्लि म] :: {जै भैरव नाथ जी की}

Bhishma Kukreti

गढ़वाली दोहा ""पखणौं का बुखणां"" का पिछला अंक का क्रम मा दोहा लम्बर 200 :
.
कुदरत की लाठी पर
हूंद नी च आवाज ।
त्वलणीं रांदा कर्मु थैं
जंणदु नि क्वी यू राज ॥ (२००)
.
बाकी फिर कभी अगले अंक में ........
.
Of and By : कृष्ण कुमार ममगांई
ग्राम मोल्ठी, पट्टी पैडुल स्यूं, पौड़ी गढ़वाल
[फिलहाल दिल्लि म] :: {जै भैरव नाथ जी की }

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गढ़वाल , उत्तराखंड ,हिमालय से गढ़वाली कविताएं , गीत ; पौड़ी  गढ़वाल , उत्तराखंड ,हिमालय से गढ़वाली कविताएं , गीत ; चमोली  गढ़वाल , उत्तराखंड ,हिमालय से गढ़वाली कविताएं , गीत ; रुद्रप्रयाग  गढ़वाल , उत्तराखंड ,हिमालय से गढ़वाली कविताएं , गीत ;  टिहरी गढ़वाल , उत्तराखंड ,हिमालय से गढ़वाली कविताएं , गीत ; उत्तरकाशी गढ़वाल , उत्तराखंड ,हिमालय से गढ़वाली कविताएं , गीत ; देहरादून   गढ़वाल , उत्तराखंड ,हिमालय से गढ़वाली कविताएं , गीत ;  हरिद्वार गढ़वाल , उत्तराखंड ,हिमालय से गढ़वाली कविताएं , गीत ; Ghazals from Garhwal, Ghazals from Uttarakhand; Ghazals from Himalaya; Ghazals from North India; Ghazals from South Asia, Couplets in Garhwali, Couplets in Himalayan languages , Couplets from north India

Bhishma Kukreti


श्री एम् एन गौड़ के गढ़वाली गीत
-
*_*_*_*_*(गढ़वाली गीत-पंक्तियाँ)*_*_*_*
खिल्याँ बुराँस कैग्ये उदास,इखुली छोड़ी रुलै तु ग्येई,
रुनै रैग्ये घुघति हिलाँस ,कतगा निठुर हिया तेरो रैई,
या निगुरि तेरि माया,भटकैग्ये काया,काटीग्ये छाया,
तीसी चोलि सि जिकुड़ी तीस,तु पीणकु आँसू दे ग्येई ||
--
*_*_*_*_* *( गढ़वाली-गीत-पंक्तियाँ)*_*_*_*_*_*
छम छम छमकिदि खुटीयूँन, तु छलकिदि, छलार सी,
झम झम झमकद बुराँसु मा झम, गीतु की हुलार सी
रूपु मा रूपैलि रूपा,यूँ हँसदि आँख्यूं मा कतगै अगास
माया से मयाली माया ,घुत घुत भाटूल्यूं मा प्यार सी ||

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Bhishma Kukreti


" सटक "   

(गढ़वाली कविता )

Garhwali Poet Mr Manoj Bhatt , Born in 14/4/1974, Vill Iriya, Talla Udaypur, Post Graduate, Occupation - VDO in Yakeshwar

--


जै पर छे सैरी टक्क , सटक  घूली ग्याई  !
धोल दुफरि कू सी छैलू  ,छट छोड़ी ग्याई  !!
द्वार, मवार,परिवार भार कै उंद   विसाण !
क्वाण,कुलिण  ,कूडेटू,मवारु  की   पेथण!
दूर जैकी फाकुडा छोड़ी,जन विराणु भाई !
जै पर छे सैरी टक्क....
धोल दुफरि कू सी छेलू....


खड़  आखर सी तड़ बांची ,लिखवारु  सी लेखी !
जगरी जागंरू मा ढोेोल पूजी ,देवता सी देखी !!
विज्यां आंख्यू मा,सुपिन्या छोड़ी,िढबल्यूं आंसू दयाई !!
जै पर छे सैरी टक्क....
धोल दुफरि कू सी छैलू ....


गैणों की बैंणा  सी, नी बिगयांदु ,कैथे  फिटकारु  !
दाड़े पीड़ा सी कैल  बितांदू, भौ डोोणा  घुड़चयाणु!!
बोई कुचिला ,मा दुधारी  सी फूटी, गिच्चा गफ्फा नी ग्याई !!
जै पर छे सैरी टक्क....
धोल दुफरि कू सी छैलू....

सर्वाधिकर सुरक्षित @  मनोज कुमार भट्ट  पौड़ी गढ़वाल

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Bhishma Kukreti



पुरुस्कार
-
- (गढ़वाली कविता , Garhwali Poetry by Asis Sundriyal )
मेरा हिसाब से
यीं दा को/ पदम् पुरुस्कार
बिगरी बोडी तै मिलण चयेंद
किलैकि
बोडी को ब्वाडा /जो बीस-बाइस साल बॉर्डर पर रै
अर सदानि देश की चिंता कै

सिरप बोडी की भ्वार
वेन अपणा बाल बच्चों की सोची /किलैकि
वो जणदू छौ / कि
वेका घौर को मोर्चा /वे चुले बड़ी योद्धा को समाल्युं च
यकडु बल्द सि
बोडिन बै बि च / लै बि च/ खाई बि च / कमाई बि च
नथर पलै ग्ये छै कुटुम्दारि/ ब्वाडा की कमै पर
पांच-पांच नौना- नौनी छा/ खाण वळा/ स्कूल जाण वळा
बोडिन अपणु सब्ज्याठू नौनु एम. ए तक पढ़ाई/ मास्टर बणाई
फिर जेठि बोडी कि नौनी छै/ बोडिन वेंतै पढ़ाण कुवि कमी नई कै
आज व एक संस्था चलाणी च /कतनै नौन्याळुं को भविष्य बणाणी च
बिचलू नौनु बि बोडिन खूब पढाई/ खैरी खैकि बि कम्पाउंडर बणाई
अब वो वे डांडा जैकी ड्यूटी कनु च/ जख मनखी बिन द्वै कु म्वनू च
खुद वो कुछ नी जणदी छै/ पर कणसी नौनी तै वींन इन विद्या दे
वीन जगा जगा अपणा देश को नौ कै
बोडी का निकणसा नौना न खेल मा बड़ी धाक जमाई/ पर बोडिन वेका पैथर खूब खैरी खाई
इतगई ना
इगास- बग्वाल का भैला हुईं या होरी /
जागर - मंडाण हुईं या थड्या- चौंफला
न बोडी बिगर शुरू हुँदा न खतम /
मांगल लगांद-लगांद/ लटुली फूली गेन बोडी की
कुल मिलैकि
कखि न कखि / कुछ न कुछ /योगदान जरूर च बोडी को
इलै
पुरुस्कार कुवि बि द्या/ कै बि द्या
पर
यीं बात तै कुवि नि झूठे सकदु
कि
पहाड़ अर
पहाड़ की सँस्कृति ज्यूंदी च / त
सिरप
बिगरी बोडी/ अर पहाड़ मा पहाड़ जनो जीवन जीण वळि
वीं जनि कतनै माँ - बैण्युं क भ्वार
©आशीष सुंदरियाल
-
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......उण्पचासौं बुलेटिन....
-
Sociopolitical Satirical, Current Event depicting  Poetries by Satish Kaleshwari
=
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सुण्दा रावा खास खबरौं, सिलसिला अबि जारी चा...
// सन् अस्सी बटि बिछुड़ीं,
अंग्रेजी अर देसी भुलि।
कंपोजिट लाइसंस,
पैरै ग्या नै झगुलि।
झाँझियुँ थैं सुहाणि खूब, नीति आबकारी चा।
सुण्दा रावा...
// बद्रीनाथ रस्ता मा,
रैड़ि गैनी फिर पहाड़।
सीजन मा कमै कू,
कन भलु ह्वे जुगाड़।
करमचारियुं बाँछि खिलिनी, खुस हूणु ब्योपारी चा।
सुण्दा रावा...
// ना'पाक' चौकी उड़ाऽण,
बाईस सेकंड खेल बणि।
वीडियो फुटेज यांकि,
किलै बणि होलि कुझणि।
अपड़ि फौजौ पराक्रम, दिखाणु प्रचारी चा।
सुण्दा रावा...
// शेयर, बैंक, बीमा बचत,
खोलिगी मंहगै कु रस्ता।
घुवाड़ौं दौड़, कैसिनौ अर,
बड़ा-बड़ा होटल सस्ता।
वैलकम, जी एस टी यो, कदम कर सुधारी चा।
सुण्दा रावा...
// आई सी जे न् पाक की,
उम्मीदुं थैं भेळु ध्वाल।
एक रुपया पिठै मा,
साल्वे न करी कमाल।
जाऽधव बाटु जग्वळणि, देसै जनता सारी चा।
सुण्दा रावा खास खबरौं, सिलसिला अबि जारी चा...
=
=
पचासौं बुलेटिन
-
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सुण्दा रावा खास खबरौं, सिलसिला अबि जारी चा...
// बीफ पार्टी का बहाना,
मुक्क जहर नि कोचा तुम।
सर्वधरम समभा$व,
मिटाणै नि सोचा तुम।
धरत्या पल छाळ तलक, बुन्याद हमारी चा।
सुण्दा रावा...
// जेवर की सड़क्युं फुंड,
यूप्या गुंडों कु उत्पात।
कतल, रेप, लुछा-लुछि,
योगी खुणि अंध्यरी रात।
सपा-बसपा राज जनि, मैली चित्रकारी चा।
सुण्दा रावा...
// घ्याळ, गौळि बुखैकी,
बाच ल्हीगी चोरिकी।
फुक्यां झ्वंपड़ा शाकिबपुर,
रूणान भकोरि की।
सेना बणै, क्रोध घृणा, हतासा, लाचारी चा ।
सुण्दा रावा...
// तीन बरस राज कनौ,
किलै दीणा छौ हिसाब।
सरकार उत्सव मनावा,
बोला जै जै मोदी साब।
वैतरणि पार कनौ, नौं ही असरदारी चा।
सुण्दा रावा...
// भ्रष्टाचारै पैली सीढ़ी,
अत्याचारै एजेन्सी।
हजार पटवर्युं निकलीं,
उत्तराखंड मा भेकेन्सी।
हर कामा खुण पैंसौं हडगि, यूँ कुकरौं प्यारी चा।
सुण्दा रावा खास खबरौं, सिलसिला अबि जारी चा...
★★★★★
डॉ.सतीश कालेश्वरी।
1.6.2017
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