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उत्तराखंड पर कवितायें : POEMS ON UTTARAKHAND ~!!!

Started by Dinesh Bijalwan, August 05, 2008, 02:18:42 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


काली चाय मा गुडु कु ठुंगार
पूषा का मैना चुला मा
बांजा का अंगार
कोदा की रोटी पयाजा कु साग
बोडा कु हुक्का अर तार
वाली साज
चैता का काफल भादों की मुंगरी
जेठा की रोपणी अर टिहरी की
सिंगोरी
पुषों कु घाम अषाढ़ मा पाक्या आम
हिमाला कु हिंवाल जख छन
पवित्र चार धाम
असुज का मैना की धन की कटाई
बैसाख का मैना पूंगाडो मा
जुताई
बल्दू का खंकार गौडियो कु राम्णु
घट मा जैकर रात भरी जगाणु
डाँडो
मा बाँझ-बुरांश अर गाडियों घुन्ग्याट
डाँडियों कु बथऔं गाड--गदरो कु
सुन्सेयाट
सौंण भादो की बरखा, बस्काल की कुरेडी
घी-दूध की परोठी अर
छांच की परेडी
हिमालय का हिवाँल कतिकै की बगवाल
भैजी छ कश्मीर का
बॉर्डर बौजी रंदी जग्वाल
चैता का मैना का कौथिग और मेला
बेडू- तिम्लौ
कु चोप अर टेंटी कु मेला
ब्योऊ मा कु हुडदंग दगड़यो कु संग
मस्क्बजा
की बीन दगडा मा रणसिंग
दासा कु ढोल दमइया कु दमोऊ
कन भालू लगदु मेरु
रंगीलो गढ़वाल-छबीलो कुमोऊ
बुलाणी च डांडी कांठी मन मा उठी ग्ये उलार
आवा
अपणु मुलुक छ बुलौणु हवे जावा तुम भी तैयार

(Taken from Facebook)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


(From Om Prakash Nautiyal)
कलियुग मे 'मोहन'

उठाते थे निज उंगली पर कभी पर्वत समूचा जो,
वह 'मन' 'मोहन' भी कितने आज लाचार से लगते ।

नचाते थे कभी वंशी की धुन पर गोपियाँ सारी,
उनको बेसुरे कुछ लोग, अपने अनाचार से ठगते ।

मनचलों की मनमानी, मनहूस मन्सूबों के किस्से ,
मन मन ही 'मोहन' को किसी तलवार से चुभते।

सभी सृष्टि है 'मोहन' की तभी मजबूरी है सहना,
यह मनसबदार सारे पर बडे मक्कार से लगते ।

'ओंम' कलियुग घोर है तभी 'मोहन' भी विवश हैं,
राजा कंस, शिशुपाल नहीं उनकी फ़टकार से डरते।

(सर्वाधिकार सुरक्षित -मेरे ब्लौग में पूर्व प्रकाशित )

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

दुन्या


साधोसिंह नेगी

ईं दुन्या का मेला मा,
सुधि फुक्यंा ठेला मां,
कैन बूति कैन बाई
अर क्वी, धाण कैरि गे

खेलियूं मां मिसैकि हमतैं
सट्ट-वो लीगीं थौला मा°,
गौड़ि- भैंसी हमरि लैन्दी,
वू°थै घ्यू कि कमोˇि चैन्दी,
कट्वा कुक्कुरू° घ्यू खवैकि,
हम बैठ्या° छौं छैला मा।।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

हमर ख्याल भि कर्या°
आर० डी० शास्त्री

हैंसा भाग्यों हैसा जौंक दांत पाटि छन
तुमरा त रोटि खाणकु जुगाड़ भि छन
हमत् पैलकि ख्वˇा छवा°
हमर नजर तुम फरि छन
दिदौं हमर ख्याल भि कर्या°
हम त् पेटक आ°सु पेटि घुटणंा छवंा
न हैंसि सकदा न र्वै सकदा
दगणम किदोˇो सि हम भी खैंचणा छवां
पर क्यकन्न हम तुम देखि हैंसणा छवां
उनत् सब्या हम देखि खू°कार बंण्या छन
दुन्या हम देखि गारा पिसणी च
पर हम त चौपट खाˇम् पैलि बैठ्या° छवां।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

साठ बसंत
सुरेनर््ी पुण्डीर 

टुप्प सी
रयी गई मी,
देखदा-देखदा
साठ बसन्त
दिखयाली मीन्
मेरा स्वीणा
तिमला का दाणा सी
रैई गिन्-खत्यां।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

माछि पकड़ माछि पकड़
माछि पकड़ डौंका
लाटा काला रैभि होला
छा हमारा गौंका।
टपगरौ सवाल भी
तोड़िगे अंवाˇ भी
चिफˇण्यां ढुंगौं कि सैर
बेˇिको बिंवाˇ भी
ठंुठा अकड़
गुंठा पकड़
तौमु कथा छौंका।
तड़तुडु रै भाग भी
गाडु लगे आग भी
माछि गैनि बाटा बाटा
बिरड़िगे दिमाग भी
जुनिबगड़ सूनिबगड़
चिप्टि होला जूंका।
छ्वीं कना क्य लाटिसी

तिल भी हमुन बांटिजी
गाड़ बिस्गी बिस्गी बिस्गी
माछि अफी छांटिजी
नाक रगड़
नाक रगड़
माछि पै न डौंका।

पंकज सिंह महर

पहाड़ मर गया.....................।

जंग छिड़ी हुई थी,
पर मैदान खाली था...!
कौन लड़ा? किससे लड़ा? कब लड़ा?
कुछ पता ही नहीँ चला,
और फिर एक दिन.....
अचानक ख़बर मिली - पहाड़ मर गया....!

विश्वास नहीँ हुआ....
आँखेँ फाड़कर चारोँ ओर देखा-
पहाड़ तो खड़ा है,
ठीक वैसे ही, जैसे पहले था।
घाटी से चोटी तक
और बुग्याल से हिमाल तक
कहीँ भी चोट का कोई निशान नहीँ था।

मैँ सोच मेँ डूबा ही था....
इतने मेँ एक और ख़बर आई-
गाँव हार गया है....!

माथे पर बल पड़ गया...
ये कैसी लड़ाई है...
जो दिखाई नहीँ देती...?

फिर गाँव जाकर देखा
तो पता चला-

इस बार लड़ाई मेँ

मवेशी हार गए हैँ -
मोटरगाड़ियोँ से,
गाय का गोठ-
गाड़ी के ग़ैराज़ से,

दुबले पतले रास्ते हार गए हैँ-
मोटी-चौड़ी सड़कोँ से,
हार गई है पाथर की छत भी-
सीमेँट के लैँटर से।
इन सबके साथ-साथ हार गए हैँ-
मिट्टी के चूल्हे
और चीड़ की लकड़ियाँ भी-
गैस सिलेँडर से।
लड़ाई ख़त्म होने से पहले ही-
हार गया गाँव...!

तभी दूर की एक सड़क ने आवाज़ दी-
"ये हार नहीँ, जीत है - विकास की..."

मैँने ग़ौर से उसकी ओर देखा...
सड़क की जीभ पर
अभी भी लगा हुआ था-
पहाड़ का ख़ून....।

मैँने सड़क के इस तर्क के ज़वाब की आस मेँ
गाँव की ओर देखा....
लेकिन तब तक गाँव,
अपनी आख़िरी सांसेँ गिन रहा था.......।

साभार- श्री विक्रम नेगी "बूँद"
जुलाई 2009
(पिथौरागढ़)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

(स्वर्गीय श्री कन्हयैलाल डंडरियाल जी की कविता"जनम भूमि" ऊंकी कविता संग्रह "कुयेडि" बटि)

मेरी मौत मीथै लिहज़ाणो ल्हिजे लै,
पर डाँडि काँठयू अपणि द्दखणि देंदी।

जई भूमि मा मिल मनखि जन्मा पाया,
जखा स्वातो को मिल मिठो पाणि प्याया,
नि उपकार वख को मि कुछ कैरि  सैको,
मिथै भूमि से वी क्षमा मगणि देंदी।

जखौ बाडि खैकि मिला पुटुग पाळा,
जखा माट्s मा मिल कथा खेल ख्याला
जऊँ डांडयू का मिल मिठा फल चखीना,
अपणि डाँडियों से विदा मगणि देंदी।

जऊँ डांडियो से मी बडो प्रेम छायो,
जखा गाड गदनों लगदि खुद छै भारी,
तुमू से सदनि कू अलग हूणो छौ मीं,
मिथै खोळू मा ऊँ इतग ब्वलणि देंदी।

उऊँ डांडियो मा मेरे याद कैकी,
गुज़र करणि ह्वैली मेरा सार रैकी,
तेरो-मेरु इतगै दगडु छायु दगड्या,
सिरफ वीमं जैकी इतग ब्वलणि देंदी।

मिला बाटु अपणो सरया काटि याला,
मेरा खुट न जाणी कतग काँडा बैठा,
मेरा पैंथरा भी अभी कतगै आला,
मिथै ऊकुँ रस्ता सफा करणि देंदी।

मिथै कांडाँ बाटा सभी टिपणि दैदी,
म्यरी आखिरी छूवी सभी सूणी ल्हेदी,
मेरी मौत मीथै ल्हिणाणौ  ल्हिजे लै,
परा डांडी - काठयूँ अपणि द्दखणि देंदी।

मेरी मौत मीथै लिहज़ाणो ल्हिजे लै,
पर डाँडि काँठयू अपणि द्दखणि देंदी।


- प्रस्तुति - प्रतिबिम्ब बड्थ्वाल

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

By - Sushil Joshi.
पैरोडी गीत – फिल्म जागृति के मशहूर गाने 'आओ बच्चों तुम्हें दिखाएँ झाँकी हिन्दुस्तान की' की तर्ज़ पर आधारित उत्तराखंड के सभी 13 जिलाओं की खूबसूरती को अपने अंदर समेटे हुए आप सभी बंधुओं को समर्पित -

आओ बच्चों देखो झाँकी उत्तराखंड महान की,
इस मिट्टी को झुककर चूमो शत् शत् करो प्रणाम भी।
जय हो उत्तराखंड, जय हो उत्तराखंड।

       
  • ये देखो अल्मोड़ा यहाँ कितनी सुंदर हरियाली है
सबको है आकर्षित करती धरती ये मतवाली है
दूर दूर तक दृश्य विहंगम बदरा काली काली है
सबसे प्यारी नैना देवी झाँकी यहाँ निराली है
जागेश्वर मंदिर में बजते घंटे सुबह औ शाम जी,
इस मिट्टी को झुककर चूमो शत् शत् करो प्रणाम भी।
जय हो उत्तराखंड, जय हो उत्तराखंड।

       
  • बागेश्वर को देखो यहाँ कितना सुंदर विस्तार है
सुंदरता में इसकी महिमा चारों ओर अपार है
धरती से आकाश चूमते बाँज बुराँस का प्यार है
सचमुच में ये पावन धरती स्वर्ग का अवतार है
मन को ठंडक मिलती है जब लेते इसका नाम जी,
इस मिट्टी को झुककर चूमो शत् शत् करो प्रणाम भी।
जय हो उत्तराखंड, जय हो उत्तराखंड।

       
  • चमोली को शोभित करता देखो बद्रीनाथ है
गोपेश्वर भी है यहाँ पर हेमकुंड भी साथ है
औली में है बर्फ चमकती सुबह दिन रात है
फूलों की घाटी का सुंदरता में अदभुत् हाथ है
तपकुंड, विष्णु प्रयाग, पंच प्रयाग है जान जी,
इस मिट्टी को झुककर चूमो शत् शत् करो प्रणाम भी।
जय हो उत्तराखंड, जय हो उत्तराखंड।

       
  • चंपावत में बालेश्वर मंदिर ये बड़ा ही प्यारा है
मीठा रीठा साहब यहाँ पर सिखों का गुरुद्वारा है
पंचेश्वर और देवीधुरा ने इस धरती को तारा है
नागनाथ के मंदिर का भी यहाँ पे बड़ा सहारा है
वन्य जीवों से भरे हुए हैं यहाँ के हरे मैदान जी,
इस मिट्टी को झुककर चूमो शत् शत् करो प्रणाम भी।
जय हो उत्तराखंड, जय हो उत्तराखंड।

       
  • देखो देहरादून यहाँ की ये ही तो रजधानी है
अंग्रेजों की सत्ता की यहाँ पे कई निशानी हैं
घंटा घर आकाश चूमता आई.एम.ए. पहचानी है
लीची के हैं बाग यहाँ पर और मसूरी रानी है
शिक्षा में भी देहरादून रखता है प्रथम स्थान जी,
इस मिट्टी को झुककर चूमो शत् शत् करो प्रणाम भी।
जय हो उत्तराखंड, जय हो उत्तराखंड।

       
  • कितना पावन और निराला अपना ये हरिद्वार है
देवलोक से आती सीधी गंगा माँ की धार है
वेदों और पुराणों में भी गाथा बारंबार है
जीवन और मरण का देखो यही आखिरी सार है
इस पावन धरती पर देवों ने भी किया बखान जी,
इस मिट्टी को झुककर चूमो शत् शत् करो प्रणाम भी।
जय हो उत्तराखंड, जय हो उत्तराखंड।

       
  • अदभुत् सुंदर कितना प्यारा अपना नैनीताल है
चारों ओर यहाँ पर फैला झीलों का जंजाल है
चाइना पीक यहाँ पर चोटी बहुत ही बेमिसाल है
इस धरती को गर्वित करते तल्ली मल्ली ताल है
मृदुभाषी हैं लोग यहाँ के हँसके करें सलाम जी,
इस मिट्टी को झुककर चूमो शत् शत् करो प्रणाम भी।
जय हो उत्तराखंड, जय हो उत्तराखंड।

       
  • पौड़ी जिले की उत्तराखंड में एक अलग पहचान है
नागर्जा का मंदिर इसमें ज्वालपा माँ की शान है
बिंसर महादेव यहाँ है, ताराकुंड भी जान है
सचमुच इसमें रचता बसता उत्तराखंड का प्राण है
लोकगीत संगीत में पौड़ी का है ऊँचा नाम जी,
इस मिट्टी को झुककर चूमो शत् शत् करो प्रणाम भी।
जय हो उत्तराखंड, जय हो उत्तराखंड।

       
  • सीमा की है रक्षा करता पिथौरागढ़ महान है
उल्का देवी मंदिर की भी एक नई पहचान है
राय गुफा भी अदभुत् इसमें, भटकोट स्थान है
हनुमान गढ़ी में जुटती रोज़ भीड़ तमाम है
कई बार बचाई इसने हम लोगों की आन जी,
इस मिट्टी को झुककर चूमो शत् शत् करो प्रणाम भी।
जय हो उत्तराखंड, जय हो उत्तराखंड।

       
  • अलकनंदा, मंदाकिनी का संगम रुद्र प्रयाग है
कहीं पे शीतल धारा है, कहीं उफनती आग है
अगस्त मुनि की बोली है, केदारनाथ का राग है
गुप्तकाशी है, खिर्सू है, देओरिया, सोन प्रयाग है
यहाँ थकावट को मिलता है अदभुत् एक विराम जी,
इस मिट्टी को झुककर चूमो शत् शत् करो प्रणाम भी।
जय हो उत्तराखंड, जय हो उत्तराखंड।

       
  • देखो जिला ये टिहरी का श्रीदेव सुमन से वीर पले
कितने उन पर अंग्रेज़ों के बर्छी भाले तीर चले
भूखे रहे वो 26 दिन तक पर ना उनके नीर चले
1944 में दुनिया से बन कर पीर चले
मर कर वो इतिहास बन गए गाथा पूरे ग्राम की
इस मिट्टी को झुककर चूमो शत् शत् करो प्रणाम भी।
जय हो उत्तराखंड, जय हो उत्तराखंड।

       
  • उधम सिंह नगर की देखो कितनी सुंदर शाम है
चैती मंदिर, गिरी सरोवर, नानक माता धाम है
इतिहास के पन्नों में भी इसका जिक्रे आम है
जनरल डायर की हत्या में उधम सिंह का नाम है
उत्तम सादा रहन सहन है सादा खान पान जी
इस मिट्टी को झुककर चूमो शत् शत् करो प्रणाम भी।
जय हो उत्तराखंड, जय हो उत्तराखंड।

       
  • देखो ये उत्तरकाशी कितना सुंदर उजियारा है
गोमुख नाम से गंगा जी का जल स्रोत ये प्यारा है
चारों ओर हिमालय फैला बड़ा ही भव्य नज़ारा है
ऐसा लगता है इसको देवों ने यहाँ उतारा है
अपना पावन उत्तराखंड रहे हर पल यूँ ही जवान जी
इस मिट्टी को झुककर चूमो शत् शत् करो प्रणाम भी।
जय हो उत्तराखंड, जय हो उत्तराखंड।
———————————— लेखक – सुशील जोशी

http://p4poetry.com/

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


कैसे गाऊं होली के गीत

चारों तरफ तबाही देख, रोता हैं न जाने क्यों मन
प्रभु की कृपा देख कर भी, बर्बादी पर रोता मेरा मन
हंसती खेलती दुनिया को तबाह होते देख रोता है मन
क्यों बना कर मिटा रहे हैं यही सोच कर रोता है मन
तेरी माया तुही जाने दुस्वप्न से भी सहमा है मेरा मन
तबाही भारत में हो या जापान में बिलखता है मेरा मन
कैसे तुझको समझाऊं साथी विध्वंष से तड़फता है मन
कैसे गांऊ गीत मिलन के, अब नाचे कैसे मेरा तन मन
कैसे होली के गीत गाऊं अब कैसे बर्बादी में गाये मन।
(देवसिंह रावत-15मार्च 2011 रात 10.29)

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