• Welcome to MeraPahad Community Of Uttarakhand Lovers.
 

उत्तराखंड पर कवितायें : POEMS ON UTTARAKHAND ~!!!

Started by Dinesh Bijalwan, August 05, 2008, 02:18:42 PM


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Anoop Rawat
२६ जनवरी गणतंत्र दिवस फिर से आयी है.
इंडिया गेट राजपथ पर परेड होने आयी है..

देश की विभिन्न संस्कृति देखने को मिलेगी.
जब झाकिंयां हर राज्य की फिर से आयेगी..

जाबांजी दिखाने फिर सेना के जवान आयेंगे.
हर रायफल के जवान परेड करते जब आयेंगे..

स्कूली बच्चे भी अपना हुनर दिखाने आयेंगे.
सेना के जवानों से कदम से कदम मिलायेंगे..

देखेगी सारी दुनिया राजपथ से शक्ति हमारी.
जय जयकार होगी हिंदुस्तान की तब भारी..

देश के शहीदों को याद करेंगे जयकार होगी.
देशभक्ति गीतों भी की साथ में भरमार होगी..

भारत माता की जय जयकार के नारे गूंजेंगे.
हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई सभी भाई आयेंगे..

शपथ लें सब आज मिलकर देश को बचाना है.
इस देश की खातिर हमको मर मिट जाना है..

जय भारत, भारतीय एकता, जय हिन्दुस्तान.
जय जवान, जय किसान, जय हो विज्ञान...

भारत माता की जय वन्देमातरम् इन्कलाब जिंदाबाद
महात्मा गाँधी अमर रहे, राष्ट्रीय एकता जिंदाबाद...

सर्वाधिकार सुरक्षित © अनूप सिंह रावत
" गढ़वाली इंडियन " दिनांक -२३-०१-२०१२
इंदिरापुरम, गाजियाबाद (उत्तर प्रदेश)
http://rawatmusic.blogspot.com/

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

पहाड़ बै शहर तक, ज्वान बै बुड़ तक
सब कर हैलीं ख़राब, काव रंगे पाणि य.. नाम छू शराब !!

कैक हाथ में थैल, कैक हाथ में बोतल देखिणों
कैक हाथ में अद्ध कैक हाथ में पऊ हुणों !!

होटल में चार दगड़ी भैठा, बोतले-बोतल खुलणीं
शराब पीई बाद सुद्दे झुलम जै झुलणीं !!

ब्या हो या बरात, नामकरण हो या शराद
और चीज भूलि लै जला बोतल धरिया याद !!

दीपक कुमार पाण्डेय - बागेश्वर कॉलेज पत्रिका 2009 !!

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

उत्तराखंड में बेरोजगारी

रोजगार कार्यालयों के कमरे
बेरोजगारों के नामों से भरे
एक पद हेतु आवेदन हजार
नौकरी के लिए है मारामार
नियुक्ति के लिए धन चाहिए
धन देने के लिए माध्यम चाहिए
सरकारी ताकत हावी है
रिश्तेदारों की चाँदी है
आम आदमी को हक नहीं मिल रहा
सरकारी पहुँच वाला मौज कर रहा
उत्तराखंड बनने का यही नतीजा है
एक कुर्सी पर चाचा दूसरे पर भतीजा है
यहां तो नौकरी की उम्मीद है व्यर्थ
देवभूमि उत्तराखंड का यही है अर्थ।

महिपाल मनराल
सैणमानुर, अल्मोड़ा
(published in regional reporter)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

भैया साहस करो

  भूपाल सिंह अधिकारी

ठोकर खै बेर गिर ग्ये छा
भैया साहस करो।
बाट में घनघोर अन्यार
उजाव कर छा अगाशा्‌क तार
मन में सदा आस हो
आफुं पर विश्वास हो
अन्यार देखी डर ना, भैया ...
मंजिल भौते दूर न्हैं
जानै रये रुकि न्हैं
रस्त ट्‌याड़ अर करूड
मंजिल तक जालै जरूड
नकभल देखी डर ना, भैया ...
लपाग धर तु कठोर
बाट्‌क कां निहन ओर छोर
ध्यान धरि बे एक ओर
रात अगर ऐल छा
होलि जरूड  फिर भोर
रात देखि बे डर ना
सिद्‌द चलो अघिल बढ ो
उठो भैया साहस करो।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

पहाड़ौक्‌ विकास

  डॉ. शंकर दत्त तिवारी

उत्तराखंड में सरकारलै करिहै कमाल
पहाड  बै पलायन हनै हैगी बुरा हाल
सरकारोंक्‌ आश्वासन बे पहाड  खोखाल हैगी
कानों पर मोबाइल लगै बेर यो आ्‌ब काल हैगी।
जब निछी मोबाइल इना कानों पर जूं रैंग छी
आबाक्‌ जमान में यो जुंआ कानों पर रैंग छी
नदी नाल नहौ सब पहाड ों में सुख गई
पहाड ों मै ले हैंडपंपोंक्‌ आब मौज है गई।
बिराव कुकुर लै आब दगड ै खेलण लागी
बीजेपी लै आब कांग्रेस दगै हाथ मिलाण लागी
विकासौक नाम पर सबूल बहोतै खाय
देहरादून राजधानि बणै बेर जनताल के पाय?
ताबै हौल आब पहाड ौंक विकास
जब पहाडि  आदिम पहाड ौंक तरफ आल।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

मेरा गौं का नौंन्याक्त

शैलेन्द्र भण्डारी 'दीनबंधु'

गौं का बीच,
भीमक्तै डाक्ति मूण
कूड़ि-भांडि खेलदा
मेरा गौं का नौंन्याक्त।
जेठ का घामूं मा
गोरू की डार अटकांदा
बौण-बौण डबखदा
मेरा गौं का नौंन्याक्त।
गदन्यों का ओर-पोर
काफक्त बिणदा, गीत गांदा
नयेंदा-धुयेंदा, खेल्दा-खेल्दि
झगड ेंदा भी, मेरा गौं का
नौंन्याक्त।
फसल काटी रीती हुईं,
गौं का सामणै सार मा
बण पैट्‌दि बाछ्‌यों का पिछनै,
अट्‌कदा मेरा गौं का नौंन्याक्त।
छुटि्‌ट ह्‌वेकि, बस्ता लेकि
घौर ऐकि, ताक्ति देखि
भूखन्‌ कबलैगि पोट्‌गी
आंसू पोंजदा चित बुजौंदा,
मेरा गौं का नौंन्याक्त।
ज्वानि की उमर अब
ब्वै-बाबू कु सारु चैंद
सोचदा-सोचदी आंखी तोपदा,
पहाड  छोड दा मेरा गौं का नौन्याक्त।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Anoop Rawat तुम्हारी माया मा बौल्या ह्वेग्युं मी हे छोरी देस्वाली.
ज्वानी की रौंस मा लतपथ बणी चा छोरी देस्वाली.
माया मा इन्कु अलझे ग्यायी छोरा 'अनु' गढ़वाली..

संभाली की भी नि सम्भलेंदी या निर्भे ज्वानी हाँ.
मेरु चित मन चोरी ली ग्यायी मुखुड़ी स्वाणी हाँ..
झणी किले यु दिल करुनु रेंद विंकि ही जग्वाली..
माया मा इन्कु अलझे ग्यायी छोरा 'अनु' गढ़वाली..

दिखेण मा सरम्याली सी पर नखरा छन हजार.
क्या दन लगदी या बांद जब करदी सज श्रृंगार..
ईं बांद कु रंग रूप न मेरु चित मन चोरी याली.
माया मा इन्कु अलझे ग्यायी छोरा 'अनु' गढ़वाली..

मीठु बुलाणु गैल्यों गैल इन्कु मुल मुल हैन्सणु.
अर चोरी चोरी नजर बचे की मिथे इन्कु देखणु..
दिल मा विंकि भी मेरु ख्याल मैन यु जाणियाली.
माया मा इन्कु अलझे ग्यायी छोरा 'अनु' गढ़वाली..

ओंठडी चुप रैंदी मायामा पर आँखी सब बिगान्दी.
दुनिया दुश्मन होंन्दी माया की पर डर नि रांदी..
होलू जू भी दिखे जालू मिन भी यु अब ठरियाली.
माया मा इन्कु अलझे ग्यायी छोरा 'अनु' गढ़वाली..

सर्वाधिकार सुरक्षित © अनूप सिंह रावत
" गढ़वाली इंडियन " दिनांक -२५-०१-२०१२
इंदिरापुरम, गाजियाबाद (उत्तर प्रदेश)
http://rawatmusic.blogspot.com/

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Rajeshwar Uniyal मैं हिमालय हूँ
    डॉ. राजेश्वर उनियाल/ 9869116784
मैं हिमालय, हूँ हिमालय, ही रहूँगा मैं सदा
मैं खड़ा, यूँ ही रहूँगा, हिम शिलावों से लदा.
हिल नहीं सकता हूँ मैं, हिलना मुझे आता नहीं
झुक नहीं सकता हूँ मैं, झुकना मुझे भाता नहीं.
मैं हिमालय, हूँ हिमालय, ही रहूँगा मैं सदा ...

मैं निशब्द सा, मौन हूँ पर, ज़ड नहीं चेतन भरा
अस्तित्व ये, सदियों पुराना, उस विधाता का रचा .
मैं अडिग, अविचल हिमालय, भाव से गंभीर हूँ
पर ह्रदय से, अपने बहता ,मैं सदा ही नीर हूँ .
मैं हिमालय, हूँ हिमालय, ही रहूँगा मैं सदा ....

सूर्य की, रश्मियाँ नित, करती मेरा शृंगार है
इन्द्रधनुष, की घटायें, बनती मेरा हार है.
दिव्य हूँ मैं, भव्य हूँ मैं, रत्नों का भंडार हूँ
जनक हूँ ,गौरी का मैं, स्वर्गरोहनद्वार हूँ.
मैं हिमालय, हूँ हिमालय, ही रहूँगा मैं सदा ....

मैं चौखम्बा, मैं ही नंदा, शिखरों का शूल हूँ,
मैं ही नर , मैं ही नारायण, शिव का त्रिशूल हूँ,
शीश हूँ मैं, भाल हूँ मैं, ताज हूँ इस राष्ट्र का
मैं छूता, व्योम को पर, रहता धरा पर हूँ सदा.
मैं हिमालय, हूँ हिमालय, ही रहूँगा मैं सदा

विनोद सिंह गढ़िया

पहाड़ की पीड़ा

मकान हो गए खंडहर, खेत पड़ गए बंजर
दरवाजों पर लटके हैं ताले, आंगन में उग आई झाड़
पलायन के इस बाढ़ में रो रहा मारे दहाड़
अपनों की याद में तड़प रहा है पहाड़ ,
कंकरीटों का यहां बन रहा जंजाल,
सूख गए नौले, सूख गई हैं ताल,
उजड़ गए वन, होती यहां नित धमाकों की मार ,
सुनाई देता है, विकास कर रहा मेरा पहाड़
विकास की मार में दरक रहा है पहाड़
राजनीति अब यहां भी घुस आई
लड़ रहे हैं, आज भाई-भाई
धर्म-जाति के नाम बांट दिया आज
उन हैवानों ने इंसान,
सुनाई पड़ता था, होते हैं दंगे शहरों में लेकिन
अब महफूज नहीं इज्जत यहां भी
यहां भी होने लगा है नरसंहार
अब मायूस दीदी-भुला की पीड़ा में,
सुलग रहा मेरा पहाड़
एक ओर महंगाई का बढ़ता राज
और इधर शराब, गाजे के नशे में डूबा समाज
अब तो दुल्हन भी बिन घूंघट दिखाई देती है
खो गई संस्कृति, लुप्त हो गए
वो रामलीला में मेले, वो त्यौहार
रो रहा पहाड़, सुनक रहा पहाड़
विकास के दौर में, अस्तित्व खो रहा पहाड़
-कमलेश जोशी 'कमल',
कोटगाड़ी पांखू, पिथौरागढ़