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उत्तराखंड पर कवितायें : POEMS ON UTTARAKHAND ~!!!

Started by Dinesh Bijalwan, August 05, 2008, 02:18:42 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Semwal Prabhat
मी भली नि लगदी तीरि स्या दुन्या

जख मुखड़ो पर सबुका मुखड़ा लग्यां

हेसणा छ झूटी हेंसी सब्बी का सब्बी

अर मन का टुकड़ा -टुकड़ा हुयां

प्रभात सेमवाल ( अजाण )सर्वाधिकार सुरक्षित

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Garhwali Classes "गढ़वाली छुई"


ठहर गी आवाज कख्खी ...
बण गी ख़ामोशी यख्खी ..

पन्नों की आवाज से .....
हवा थे आहसास व्हे गी ..
कब तक यु राला कोरा ..
दर्द यूँ का मन म रेगी ..

ठहर गी आवाज कख्खी
बण गी ख़ामोशी यख्खी

मौसम भी अब बदलगी ..
आसमां बरखा से भीग गी ..
धरती उनि सुख्खी रैगी .
शब्द कख बटे कि आला ..
पन्नों का जु दर्द मिटला ...

ठहर गी आवाज कख्खी ..
बण गी ख़ामोशी यख्खी ...

पैली जन हवा अब नि चलदी ..
दिन भी अब रात लगदी ..
जिन्दगी अब जिंदगी से खलदी ..
बात कोई अब अच्छी नि लगदी..

ठहर गी आवाज कख्खी ..
बण गी खामोशी यख्खी

रिश्ता किले टूटी गेनी ..
अपणा सब किले बिखिर गेनी ...
अलग च सबकी राह ,मन म च सबकी चाह ..
रास्ता इन कोई ढुंडलु ,हमथे कि जु सबसे जुड़लु ...

ठहर गी आवाज कख्खी ..
बण गी खामोशी यख्खी ...

मोड़ जिन्दगी का कभी त इन आला ..
कोरा पन्नों म, पोड़लु जब अपणों कु साया
शायद,खुश होलू तब वे कु मन ..
चलली तब हाथ से वेकि रुकीं कलम ..
वेकि रुकीं कलम ...

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

कविता शैलेन्द्र जोशी

चला दी पेटा दी हिटा दी हे जी
मेला लगियु चा जी सैणा श्रीनगर मा जी
मिते चौपड़ वा गोला बाज़ार की घुमादी
बतियों कु मेला चतुद्रशी वैकुंठ कु मेला जी
भक्तो की भीर जी
पुत्र आश मा औत सौजडियो कु खाडू दियू जी
चला वी कमलेस्वर मा जी
मिते फौंदी मुल्य्दी चूड़ी बिंदी लादी
भली क्रींम पाउडर बुरुंसी लिपस्टिक मेला की समूण मा ल्या दी
मिते जादू सर्कस बन बनी का खेल तमासा दिखा दी
मिते चर्खी मा बैठे की घुमा दी
मिते चौपड़ वा गोला बाज़ार की घुमा दी
मिते सैणा श्रीनगर ले जा दी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

" किन्गोड़ा कु बीज "

घैल पौडियूँ बुराँस कक्खी
सुध बुध मा नि चा फ्योंली भी
बौल्ये ग्यीं घुघूती भी देखा
फुर्र - फुर्र उडणी इन्हे फुन्हेय
छोड़ अपडा फथ्यला - घोलौं भी

लटुली फूली ग्यें ग्वीरालअक
हुयुं लापता कफ्फू हिलांस
पकणा छीं बेडू भी बस
अब लाचारी मा बारामास

सूखी ग्यीं अस्धरा भी पन्देरौं का अब
सरग भी नि गगडाणू चा
लमडणा छीं भ्यालौं - भ्यालौं मा निर्भगी काफल
कुई किल्लेय हम थेय नि सम्लाणु चा

जम्म खम्म पौडयां छीं छन्छडा
धार हुईँ छीं लम्मसट
व्हेय ग्याई निराश कुलैं की भी बगतल
मुख लुकै ग्याई सौंण कुयेडी भी सट्ट

रूणाट हुयुं डांडीयूँ कांठीयूँ कू
ज्यूडी - दथुड़ी बोटीं अंग्वाल
छात भिटवौली पूछणा स्यारा - पुन्गड़ा
हे हैल -निसूडौं कन्न लग्ग फिट्गार

गैल ग्याई ह्यूं हिमवंत कू
बस बोग्णी छीं आंखियुं अस्धार
अछलेंद अछलेंद बुथियांन्द वे थेय
द्याखा बुढेय ग्याई देब्ता घाम

हर्चिं ताल ढ़ोल क ,
बिसिग सागर दमौ महान
बौल मा छीं गीत माँगल - रासों -तांदी
समझा उन्थेय मोरयां समान

छोडियाल चखुलीयौंल भी अब बोलुणु
काफल पाको ! काफल पाको !
तब भटेय जब भटेय हे मनखी !
तील सीख द्यीं
अपडा ही गौं मा बीज किन्गोड़ा का सोंगा सरपट चुलाणा
बीज किन्गोड़ा का सोंगा सरपट चुलाणा ..........


स्रोत : हिमालय की गोद से , सर्वाधिकार सुरक्षित (गीतेश सिंह नेगी )

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

पं. भास्कर जोशी
Yesterday
पुकारता है पहाड़

तुम हो कहाँ तुम हो कहाँ,
तुम्हें अपना पहाड़ पुकारता है।
सब कुछ सुना सुना सा हो गया,
अब तो आ भी जाओ तुम।।

आस लगाये खड़ी है कबसे,
ढूंढ़ रही है हर पगडण्डी पर।
दिन रात आस बिठाये रहती है,
अब तो आ भी जाओ तुम।।

जब थे तुम नन्हे-मुन्हे से बच्चे,
खेला करते थे इसकी आँचल में।
क्या अब तुम्हें वो याद आती नही,
अब तो आ भी जाओ तुम।।

छोड़ कर गए तुम जिस दिन,
बहुत रोई थी वो उस दिन।
दिन बीते महीने बीते सदियाँ बीत गयी,
अब तो आ भी जाओ तुम।।

क्या तुमको उसे तडपाने का,
अपनी जन्म भूमि को तरशाने का।
यही एक मार्ग मिला था क्या,
अब तो आ भी जाओ तुम।।

सोचा था अब के बर्ष आओगे तुम,
न तुम आये न तुम्हें उसकी याद आई।
कब तक ऐसे ही तडपाओगे तुम,
अब तो आ भी जाओ तुम।।

अब तो बहुत खेल लिया,
आँख मिचोली का खेल।
अब तो आ भी जाओ तुम,
तुम हो कहाँ तुम हो कहाँ ।।
प्रस्तुतकर्ता पं. भास्कर जोशी
http://gewadghati.blogspot.in/2012/12/blog-post_10.html

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Semwal Prabhat पहाड़ अर गढ़वाल का हाल द्याखी पहाड़ अर गढ़वाल कि पीड़ा तेन कविता कु रूप देणा कोसिस करी .

ऋषिकेश राजा राणी नेग्या
देहरादूण नेता लोग !
जाणी कुजाणी लिख्यों कन
मेरा पहाड़ तेरु जोग !!

कखि पहाड़ डामो मा डूभिगै
कखि आयां रवाड़ा !
कखि हरी भरी डांडी सुखिगै
कखि बांजा विज्वाड़ा !!

कखि रिती छ चोक तिबार
कखि गों गुठियार !
कखि सुखा छ धरा पन्यारा
कखि सुखी नयार !!

कैकी ब्वे की अंख्यों आंशु छ
कैका बाबाजी उदास !
कैकी सोंझडियों तें इकुलांश छ
कैका दागडिया निरास !!

 
प्रभात सेमवाल ( अजाण )सर्वाधिकार सुरक्षित

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

" वू लोग "

हमरा ही घोलौं बैठी ,हम्थेय की उडाणा छीं वू लोग
हमरा ही लट्ठों से ,हम्थेय की लठियाणा छीं वू लोग
हमरा ही म्वालौं थेय लगैऽक ,गिच्चौं फर हमरा
छुईं हमरी ही कन्न लगाणा छीं वू लोग

सरया जिन्दगी बाटू दिखाई जौं लोगौं
बाट हम्थेय ही आज कन्न बिरडाणा छीं वू लोग
खाई सरया जिन्दगी जौंल गाड- गाडीऽक पैन्छु
हम्थेय ही आज डडियाणा छीं वू लोग

खुच्चिलियुं मा ख्यलीं ब्याली तक जू हमरी
खण्ड कन्ना कन्ना हम्थेय ही आज खिलाणा छीं वू लोग
जू बुथैं बगत बगत थमथ्याकि हमुल
कन्न आज हम्थेय ही ठगाणा छीं वू लोग

जौंकी मुखडी आश देखि काट सरया जिंदगी हमुल
कन्न मुखडी आज सर्र हमसे ही लुकाणा छीं वू लोग
जौं थेय रौं पिल़ाणु दूध ,खून अप्डू सोचिक
कन्न गुरा बणिक आज हम्थेय ही तडकाणा छीं वू लोग

सैंती पालि कैरी ज्वान जू
बोझ हम्थेय ही आज बताणा छीं वू लोग
जौं का बाना पूजीं ढुन्गा सरया दुनियाऽक
ढुन्गु समझिक उन्दु आज हम्थेय ही चुलाणा छीं वू लोग

दिन चार पैदा हूँया , जौं थेय नि व्हाई अज्जी
औकात ब्वेऽक आज पुछणा छीं वू लोग
मी छौं हिमालय ,प्राण -भाल भारत कू ,
यी च बस परिचय म्यारू
मिल सुण सफेदपोश व्हेकि अज्काल
दिल्ली -देहरादूण मा
लाल बत्ती खूब रिंगाणा छीं वू लोग
लाल बत्ती खूब  रिंगाणा छीं वू लोग...........

स्रोत : हिमालय की गोद से ,गीतेश सिंह नेगी (सर्वाधिकार सुरक्षित )

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Awanish Dabral दूर धार गों का पार..
फिर लगी च टक..
आनु होलू क्वी बोडिकी..
आस जगी च फिर यख..

ग्ये छयाई जे खातिर छोड़ी..
गों मुल्क अपरू पहाडा वख़...
मिल ग्ये सुपिनु तेरु ता....
क्यों बिसरी ग्ये अपणु पहाणु अब..

दूर धार गों का पार..
फिर लगी च टक..

क्या याद नि आदि त्वे कभी...
ऊ डांडी काठी गों गोंरो की.....
क्यों बिसरी ग्ये तू आज भुला...
वा सर सर बथो ऊ डांडीयो की...

दूर धार गों का पार..
फिर लगी च टक..

रेणा त तुम सहरु माँ छ्या...
क्या दिल भी अब बस ग्ये वख़..
वख़ अपरू नि उपरुयू माँ क्वी....
तू बोडी येजा घोर झट....

दूर धार गों का पार..
फिर लगी च टक..

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Vijay Gaur ‎"प्रवासी"

कैथैं सुणों यीं कथा, कैमा लगौं य व्यथा,
म्येरू ज्यु ब्वनु सब्यों बताणो,
क्वी त बोला दी!!!!......बथा।

मिन बि ल्ये छौ यु जलम,
स्यीं स्वाणी धरती मा,
मिन बि बाँचि छन आखर-पहाड़ा,
वीं नीली-ख़ाकी स्कुल्या बरदी मा,
फिर बगतन छुड्ये दये मुलुक,
झणी किलै! मै नि पता!!!!
म्येरू ज्यु ब्वनु सब्यों बताणो,
क्वी त बोला दी!!!!......बथा।

मजबूरी मिथें बिरणा मुलुक लि ऐ,
न यिख, न उख, क्वी बि त अब अपणु नि रै,
म्येरा अपणा हि अब मै "प्रवासी" बुलान्दन,
बेर-बेर म्येरि मजबूरी याद दिलान्दन,
"प्रवास" कैसणी भलु लगदु?
तुमि बोला, तुमि बता??
म्येरू ज्यु ब्वनु सब्यों बताणो,
क्वी त बोला दी!!!!......बथा।

स्यु छौं आज बिना "पछ्याण" कु जीणू,
पहाड़ी ह्वैकि बि पहाड़ नि रैणु,
लाटु मन्न पहाड़ों मा हि रिन्गणु,
निर्दयी बगत मनै बात नि बिंगणु,
प्रवासी से निवासी होण कु मंसा,
पूरी होलि कि ना, नि पता,

कैथैं सुणों यीं कथा, कैमा लगौं य व्यथा,
म्येरू ज्यु ब्वनु सब्यों बताणो,
क्वी त बोला दी!!!!......बथा।

विजय गौड़
सर्वाधिकार सुरक्षित।
पूर्व प्रकाशित

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Dimpal Mahara इस भ्रस्ताचार के गर्म तवे पर
हमने क्या क्या न सिकते देखा

स्वाभिमान को बिकते देखा
इमानो को लुटते देखा

बेईमानो को फलते देखा
अरमानो को घुटते देखा

शर्म हया को खोते देखा
मजलूम जिन्दगी ढोते देखा

मज्लुम जुल्म से चिल्लाते देखा
हर सियासी डाल पर उल्लू सोते देखा

इस भ्रस्ताचार के गर्म तवे पर
हमने क्या क्या न सिकते देखा

ये भ्रस्ताचार न जाने अभी और क्या क्या दिखलायेगा
धीरे धीरे दानव बनकर एक सब को खा जायेगा
धीरे धीरे दानव बनकर एक सब को खा जायेगा

डिम्पल महारा