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उत्तराखंड पर कवितायें : POEMS ON UTTARAKHAND ~!!!

Started by Dinesh Bijalwan, August 05, 2008, 02:18:42 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

ऋषिकेश राजा राणी नेग्या
देहरादूण नेता लोग !
जाणी कुजाणी लिख्यों कन
मेरा पहाड़ तेरु जोग !!

कखि पहाड़ डामो मा डूभिगै
कखि आयां रवाड़ा !
कखि हरी भरी डांडी सुखिगै
कखि बांजा विज्वाड़ा !!

कखि रिती छ चोक तिबार
कखि गों गुठियार !
कखि सुखा छ धरा पन्यारा
कखि सुखी नयार !!

कैकी ब्वे की अंख्यों आंशु छ
कैका बाबाजी उदास !
कैकी सोंझडियों तें इकुलांश छ
कैका दागडिया निरास !!

https://www.facebook.com/nitin.dwivedi.10

Bhishma Kukreti

Sandip Rawat: A Promising Garhwali language Poet, Story teller and Critic

[Notes on poets, story writers of Uttarakhandi languages; poets, story writers of Garhwali an Uttarakhandi language; poets, story writers of Himalayan language; poets, story writers of Mid Himalayan language; poets, story writers of North Indian regional language; poets, story writers of Indian regional language; poets, story writers of Asian regional language; poets, story writers of Oriental regional language]
                                      Bhishma Kukreti
           Snadip Rawat is promising poets who has been publishing his poems for a couple of years in Garhwali magazines and newsletters and relaying his poems story through Akashwani too.
                  Sandip was born in Alkhet, Talain, Pauri Garhwal in 1972.
   Sandip is Chemistry post graduate and his inclination to literature was from his student life. Sandip is Lecturer in Dhaddi, Tihri Garhwal.
  Sandip published Garhwali stories, poetries in Khabar Sar, Rant Raibar, Regional Reporter, Yugwvani .
   Garhwali literature creative appreciate much Sandip for his researches in history of Garhwali literature. Sandip Rawat published many articles regarding history of Garhwali literature in Garhwali newsletters. Sandip is very sensitive writer who has ability to see what an average literature can't see in the literature.
                   Recently, Sandip Rawat published his first Garhwali language poetry collection 'Ek Lapang' (2013). Famous Indian singer and Lyric Narendra Singh Negi, famous Garhwali poet and dramatist and lyricist Girish Sundariyal, the Nathpanthi literature scholar Dr Vishnu Datt Kukreti, the editor of Garhwali newspaper Vimal Negi, one of the great Garhwali poets Madan Duklan, the famous Garhwali critic Virendra Panwar appreciated poems of young Sandip Rawat.
Sandip has many plans for Garhwali literature and very soon he will publish critical history and review of Modern Garhwali Literature.
Sanipp lives in Shri Nagar Garhwal and readers may contact him on sandeeprawat524@gmail.com or 9720752367

Copyright@ Bhishma Kukreti, 15, April 2013

Notes on poets, story writers of Uttarakhandi languages; poets, story writers of Garhwali an Uttarakhandi language; poets, story writers of Himalayan language; poets, story writers of Mid Himalayan language; poets, story writers of North Indian regional language; poets, story writers of Indian regional language; poets, story writers of Asian regional language; poets, story writers of Oriental regional language to be continued...

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

    Options
    हिमाँशु पुरोहित
    णि नापयेंदी युं डांडियों कि उकाल
    णि बोटेयेंदी जीण ते अंग्वाल ( जीने के लिए साहस )

    आंशु म्येरा बोग्णा जै धारों सि पाणी
    नाती -नतेणो कि खुद भि ह्वेगी बिराणी

    कख ह्वोला लाटा म्यारा ,कै मुल्क ग्ये बसीन
    इंकुलास प्राण म्येरू ,जामि ग्ये बसिंग

    जै नोना का बाना मेन कन खेरी नि खायी ह्वोली
    कै डांडा णि ग्ये ह्वोलू , कु कांडू णि चुबी ह्वोलू

    दयो-देवतों पुजि ,ब्राह्मणो मा दिन-बार गणाई
    ध्याणी भी नीरास हवेनि ,पर तु घार णि आयि

    प्राण झुरांणु च ,यु गात -सरील बुडयांणु च
    माटा कु बणयूँ सरिल ,माटा मा सामाणु च

    जाग्लू त्येरा खातिर ,बैरी दगडी लड़े कारिं च
    त्येरा बालापन कि समलोण धरीं च !

    :हिमांशु पुरोहित

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

ये काफल हैं
डा राजेश्वर उनियाल,
मुंबई
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अंग्रेज काफल वाले से
ओ मैन, ये का फल है
काफल वाला-
हॉ साब, ये काफल है
अरे भाई, हम पूछता है
ये का फल है,
जी, हम भी तो
यही कह रहे हैं
ये काफल हैं,
अरे नानसैंस
क्या तुम का फल का
मतलब नहीं जानता,
साब, जानता हूँ
तभी तो कह रहा हूँ
ये काफल हैं ।

ओ मैन,
हम तुमको कैसे समझाएं
ओ, मिस्टर,
जरा हमारी हेल्प करो
और इस इडियट से
पूछकर बताओ
ये का फल है,
सर,
इसमें पूछने वाली
क्या बात है
मैं बता देता हूँ
ये काफल हैं,
गुड गुड तो बताओ
ये का फल है
साब, बताया ना
ये काफल हैं ।

ओ गाड, तुम भी
वैसा ही जवाब देता है
हम तुमको कैसे बताएं
कैसे समझाएं,
सर, आप चिंता ना करें
बस, इस काफल के
चार दाने चख लीजिए
आपको पता चल जाएगा
कि ये काफल हैं ।

ठीक है पहले हम
चार दाना खाएगा
फिर बताएगा
कि ये का फल है
पर मैन,
इसको खाता कैसा है ।

साब, कुछ मत करिए
बस मुॅह में धरिए
और दॉतों से
चबाकर कहिए
ये काफल है।

ठीक है,
हम ऐसा ही करता है,
और अॅगे्रज ने जैसे ही
काफल को
दॉतों से दबाया
उसके चार दॉत
तडाक से टूट गए
वह चिल्लाया
ओह, ये काफल है ।

हॉ, अॅग्रेज के बच्चे
तुमको सीधे कहो
तो समझ में नहीं आता है,
जब दॉत टूट गए
तब कहते हो
कि ये काफल हैं ।

अरे, ये मेरे पहाडों को
प्रकृति का है अनुपम,
अद्वितीय उपहार, 
रंग है लाल लाल,
फलों का है फल
इसीलिए है कहलाता
प्‍यारा प्‍यारा काफल ।
पुर्रे पुतई पुर्रे पुर

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
हे रूडियौ का दिन,
छ्न अज्ग्याल,
भक्कु भि होलु,
लगण लग्यु,
अर तीस भि,
भौत होलि लगणि....

वन भि हमारा पहाड मा,
पाणि कू भौत अकाल छ,
हे राम कबरि क्या धारा,
रन्दा था लग्या पाणि का,
धारा मगरौ फर,
आज हर्चिगि,
तिस्वाला छन गंगा जी का मैति....
(कोका कोला हि प्यौला तब?)
-जगमोहन सिंह जयाडा जिग्यांसु
15.5.2013

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

किस कदर झुलसा जीवन (हिटो पहाड़).

वादियाँ मेरे गाँव की मुझको बुला रही है.
वाह रे मन, तुझको तो सिक्को की खनक भा रही है..

सब कुछ लूट जायेगा, क्या तब तुम जाओगे.
भिखरा हुआ आशियाना, क्या फिर सजाओगे..

मुंगेरी लाल के सपने मुझे झूले में झुला रही है.
वादियाँ मेरे गाँव की मुझको बुला रही है..

विनाश काले बिपरीत बुद्धि कितना सत्य लगता है.
टपक पड़े जब बूद पत्थर पर, पत्थर भी घिसने लगता है..

मुरझा रहे है फूल खुशियों के, और मन चाँद को पाने का सपना दिखा रही है.
वादियाँ मेरे गाँव की मुझको बुला रही है..

बेखबर हम है, उस जमीन पर किसी और ने ठिकना कर लिया.
सर छुपाने की जिद्दोजेहद में जिंदगी को परवाना कर दिया..

जलकर सबकुछ खाक हो जायेगा एक दिन, दर पर आज बर्बादी की चिंगारी सुलगा आये है.
वाह रे मन, तुझको तो सिक्को की खनक भा रही है..

वादियाँ मेरे गाँव की मुझको बुला रही है.
वाह रे मन, तुझको तो सिक्को की खनक भा रही है..

(अशोक नयाल दा रचित ये सुन्दर पंकतिया)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
छक्किक पी हे भुला,
प्यारा पहाड़ का,
धारा कू पाणी,
त्वै देखिक तरसेणु,
यू पापी पराणी,
रुड़यौं दिन छन,
भभसेणु पराण,
छोया ढुंग्यौं कू ठंडु पाणी चूकि,
अपणु प्यांरु मुल्कं छूटि,
ढुंगु होयुं छ पराण्‍,........

-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
सर्वाधिकार सुरक्षित एंव प्रकाशित 21.5.2013

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
ऐंसु का साल कै कैन हिंसर खाई अर चाखी,
काफल भी खै होला,
कै कै दगड़यान मजा लिनि काफल हिंसर कू......

बैाल्या बुरांस भी देखि होलु अपणा गौं का डांडा फुन्ड,
भलु होलु तुमारु जरा बतै देवा.......

समझा सच्चा उत्तराखण्ड भक्त छन ऊ,
मेरी कलम आज यनु बोन्निै छ,
हे तुमारा सौं, मेरा प्यारा उत्तडराखडीं भै बन्धो....

-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
21.5.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

राजेन्द्र सिंह कुँवर 'फरियादी'
विकाश कु रूप देख्याला

तिसोल्या छन मन्खी यख
डांडियों मा हरियालो नी
रुमक पौडिगे पाखियों मा
जोनिकू उजाल्यु नी !!
कनु होणु च यू विकाश देखा
कनु होणु च यू विकाश देखा
कनु होणु च यू विकाश देखा देखा मेरा पहाड़ मा !

हफार पार धारुमा, शाहरू का अख्बारुमा !
सैणी सड़क बनी च सरकारी बहीखातों मा
प्रधान पटवारी मिलिक रकम चटगौणा छीन
आवाज उठाई जैन तैतै भी धम्कौणा छीन
कनु होणु च यू विकाश देखा
कनु होणु च यू विकाश देखा
कनु होणु च यू विकाश देखा देखा मेरा पहाड़ मा !

गौ का गौ पड़ीयाँ छीन खाली
राशन हर मौ मा बटेंनी छ
ड्यूटीयालू की पोड़ीन बार
अपणु पहाड़ी दिखेंदु निच
कनु होणु च यू विकाश देखा !
कनु होणु च यू विकाश देखा !
कनु होणु च यू विकाश देखा देखा मेरा पहाड़ मा !.....गीत - राजेन्द्र सिंह कुँवर 'फरियादी'

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

from - Anil Bora

आज म्योर दगडू यक्लू बनारोक जन्मदिन छू
ब्याव के दावत छु
आप सबुन्कें चुल न्यूत छू "पहाड़ी भोज "
सब एक एक कविता सुणाल आज
य गिफ्ट समझिलियो
शराब पी बेर एंट्री मन छू .......
बानर इंसान है ज्यादे पवित्र हुनी