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उत्तराखंड पर कवितायें : POEMS ON UTTARAKHAND ~!!!

Started by Dinesh Bijalwan, August 05, 2008, 02:18:42 PM

Bhishma Kukreti

 XXX   दारु स्त्रोत्रम XXX

Poet Harish Juyal



विश्वेश्वराय 'सुरा' पिये , प्याज की दाणी म घुट्टी लगे

भेळउन्द प्वडाय मुंड कच्याय , कुकरोन तैकू थ्व्बड़ो चटाय



              भ्रात्री स्नेह उपदेसिका

ख़ास भायुं मा खुंकर्यूळ हवायो एका कारिज मा हैंकु नि आयो

इका उन्नति मा हैंकु जळन्ति म मनुष्य रुपेण ढयबराश्चरंती



                   हरिओम् तत्सत्



जुमळी दिदा ब्वाद हरिओम तत्सत , सम्सूत रातिम ब्वादा सरांद

भैर कनु रौंद नमो शिवाय: ,भितरम जैक भुटुवा खुज्यांद



            तीर्थ जातरा समापन पूजा



काकी बदरीनाथ जातरा बटे आई , कुडै मुंडळी मुंग झट्ट गाई

यकचुट गाळयों परसाद द्याई, घरम्याळी काकी नमो नमस्ते



                    ख्व्बळया



ख्व्बळया गिची से कबि छंच्या कबि चुनमुंडू कबि बडी पकाणम

च्यूड़ा बुखाणम त कनक्वे चपाणम , बिभूक्षितम किम ण करोति पापम



                    विद्यार्थी



मैच चेष्टा ब्व्गठया ध्यानम , सुंगर निद्रा तथैव च

डिग्ची हारी किताबी त्यागी , विद्यार्थी पाँच लक्षणम





Bhishma Kukreti


परमेश्वर इ  क्या ?

कवि -शूरबीर  रावत

भगावन
तुमन बचन दे छौ बल
यदा यदा ही धर्मस्य ...।
वै दिन बिटेन आज तक
जुग बीतिगे तुमारि जग्वाळ मा /तुमरि ई
सृष्ठी मा झणि रोज होणा छन
कतनै पाप -महापाप

हे शम्भो !
तेरी जटा बटी ब्वगदि गंगा बि आज
कतना
कजोळेगे /पाप्युं दगड़ा
धर्म्युं धरम बौगिन खबिन
कतनै विद्वान्।/किलै चाणा छन जोग लेणु ?

हे ईश्वर !
तुम जणदै छौं कि  तब
रावण लंका बटि
कंस मथुरा बटि
(कु ) शासन चलान्दा छा
पण अब त
अयोध्या -गोकुल की धरती ही
रावण -  कंसुं से भरीं च
अब त प्रभु
ना नौ हजार अवतार बि कम पोड़ल !


बदरि -केदार नि रयां  अपणा

कवि -प्रेम बल्लभ पुरोहित 'राही'
बदरि  क्यदार अब नि रयाँ अपणा
जु मोटी रकम करला भेंट
वु दर्शन पाला
बकि गरीब -गुर्बा
खौंळे तैं , घौर आला।


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

दारु

दारु !
पगळीं च बगणि च
डांडी कांठ्यों धारु धारु
पीड़ बिसरौण कु
माथमि, द्यब्तौं सि सारु

गंगा उंद बगदी
दारु उबां-उबां टपदी
पैलि अंज्वाळ् अदुड़ि/
फेर, पव्वा सेर
जै नि खपदी
हे राम! दअ बिचारु

गबळान्दि बाच
ढगड्यांदि खुट्टी
अंगोठा का मुखारा
अंग्रेजी फुकदी गिच्ची
कुठार रीता शरेल् पीता
ठुंगार मा लोण कु गारु

पौंणै बरात
मड़्वयों कु सात
बग्त कि बात
दारु नि हात
त क्य च औकात
छौंदि मा कु खारु

नाज मैंगु काज मैंगु
आज मैंगु रिवाज मैंगु
दारु बोदा त
दअ बै क्य च फारु

Source : Jyundal (A Collection of Garhwali Poems)
Copyright@ Dhanesh Kothari

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

दारु

दारु !
पगळीं च बगणि च
डांडी कांठ्यों धारु धारु
पीड़ बिसरौण कु
माथमि, द्यब्तौं सि सारु

गंगा उंद बगदी
दारु उबां-उबां टपदी
पैलि अंज्वाळ् अदुड़ि/
फेर, पव्वा सेर
जै नि खपदी
हे राम! दअ बिचारु

गबळान्दि बाच
ढगड्यांदि खुट्टी
अंगोठा का मुखारा
अंग्रेजी फुकदी गिच्ची
कुठार रीता शरेल् पीता
ठुंगार मा लोण कु गारु

पौंणै बरात
मड़्वयों कु सात
बग्त कि बात
दारु नि हात
त क्य च औकात
छौंदि मा कु खारु

नाज मैंगु काज मैंगु
आज मैंगु रिवाज मैंगु
दारु बोदा त
दअ बै क्य च फारु

Source : Jyundal (A Collection of Garhwali Poems)
Copyright@ Dhanesh Kothari

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

न उन धरम्यालु आगाश न उनि मयलू यखै धरती,
अज्याण ओखा छिन पैंडा मनिखि अणमील चौतरफी,
चुचों चखुला भि डाला बोटा भी उपरी यखा,
में घोर छोड्यावा......।
हैजी सार्यूं मा फूली गे होलि........।

रंदा तुम डुटि सर्यादिन मी यखुलि भमाण क्वाटर मा,
न क्वी छुंई बथ न धै धवडी ढक्यांछिन दुवार घरु घरु मा,
छिभै ये निरभै परदेश मा तुम रौणा त रा
में घोर छोड्यावा......।
हैजी सार्यूं मा फूली गे होलि........।

#बौल्या

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

कागजि विकास

घाम लग्युं च कागजि डांडों
काडों कि च फसल उगिं
आंकड़ों का बांगा आखरुं मा
उखड़ कि भूमि सेरा बणिं
घाम लग्युं च.............

ढांग मा ढुंग ढुंग मा ढांग
माटा भिड़ौन गाड़ रोक्युं
बार बग्त आंदा भ्वींचळों
पर च, अब बाघ लग्युं
आदत प्वड़िगे हम सौंणै
अर ऊं धन्नै कि डाम
औंसी रात बिचारी गाणिं
खणकि जोनी का सारा लगिं
घाम लग्युं च.............

धारा पंदेरा छोया सुख्यां
रौला-बौला बगणा छन
स्वर्ग दिदा हड़ताल परै च
खणकि रोपण लगणा छन
दिन गगड़ांद द्योरु रोज
बिजली कड़कदी धार मा
हौड़ बिनैगे भटका भटकी मा
आयोडैक्स कु ख्याल ही नि
घाम लग्युं च.............

झुनकौं उंद छन झिलारी बासणी
ल्वत्गी लफारी गळ्बट गिच्च
मुसा का छन पराण जाणा
बिराळा कु तैं ख्याल च सच्च
दौंळ् बोटण कु सेळु नि
घणमण घंडुलि अछणा धरिं
फौंर्याई मन भैलू लेकि
अंधेरा कु तैं शरम ही नि
घाम लग्युं च.............

Source : Jyundal (A Collection of Garhwali Poems)
Copyright@ Dhanesh Kothari

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

"मडुवे की रोटी, सिसोँड़े का साग
बाँज की लकडी की करारी आग,

चौमासा की बरखा,ह्रयून्द कि आग
मुंगरी कि रोटी पिन्डालु कू साग

आषाड कि रोपणी,भादो का घाम
सौण की बरखा,अशूज कु काम

ह्रयून्द क मैना की लम्बी लम्बी रात
अहा कन च अपणा गौँ की बात.

update by-अतुल गुसाईं

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

उत्तराखण्ड बणौंण हमुन्

अब कैकू नि रोण हमुन
उत्तराखण्ड बणौंण हमुन

उजाड़ कुड़ि पुंगड़्यों तैं
उदास अळ्सी मुखड़्यों तैं
फूल अरोंगि पंखड़्यों तैं
पित्तुन पकीं ज्युकड़्यों तैं
अब कै धै नि लगौण हमुन

रगदा बगदा पाणि तैं
सैंति समाळी जवानि तैं
खर्री खोटी चवानि तैं
बेकार बैठीं ज्वानि तैं
सुदि मुदी नि गवौंण हमुन

कागजुं मा भोर्यां विकास तैं
झूठी सौं अर आस तैं
खणकि जल्मदा विश्वास तैं
बथौं मा छोड़ीं श्वास तैं
धोरा धरम नि लौंण हमुन

पंच पर्याग बदरी केदार तैं
गंगा जमुना कि धार तैं
पंवड़ा जैंति जागर तैं
थौळ् कौथिग त्योहार तैं
द्यो द्यब्तौं जगौंण हमुन

माधो चंदर गबर तैं
सुमन सकलानी वीर तैं
दादा दौलत भरदारी तैं
तीलू रामी सी नारी तैं
अफ्वु मा इना ख्वज्यौण हमुन

Source : Jyundal (A Collection of Garhwali Poems)
Copyright@ Dhanesh Kothari

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

चौंठी भुक्कि

छौं मि ये ही मुल्क कु,
भुलिग्यों यख कि माया
भुलिग्यों वा चौंठी भुक्कि,
कोख जैंन मि खिलाया

कन नचदा रांसौं मण्डाण,
चड़दा कन युं ऊंचा डांडौं
क्या च कौंणि कंडाळी कु स्वाद,
हिसर खिलदा कन बीच कांडौं
भुलिग्यों दानों कु मान,
सेवा पैलगु शिमान्या

कैन बंटाई पुंगड़्यों कि धण,
द्याई कैन गौं मेळ्वाक
कख च बगणि धौळी गंगा,
गैन कख सी कांद काख
याद नि च रिंगदा घट्ट,
चुलखांदों कि आग खर्याय

रुड़्यों धर मा फफरांदी पौन,
ह्‍युंदै कि निवाति कुणेटी
मौ कि पंचमी, भैला बग्वाळ्,
दंग-दंगि सि पैडुल्या सिलोटी
बणिग्यों मि इत्यास अफ्वु मा,
बगदिग्यों थमण नि पाया

Source : Jyundal (A Collection of Garhwali Poems)
Copyright@ Dhanesh Kothari

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

घाम पाणी माँ सास च रिंगणी ;बुढया बणयूं च ग्वरे बणु माँ
सें गुसैं कु कुई अणदरू नि च ; लग्युं फेस बुक तौं की मौ माँ।
देर सबेर उठदी ब्वारी ;सिराणा अपड जप्कान्दी
सिराणु बाटी ले की मुबेल ; वनी ऑनलाइन ह्वै जांदी
सासू ब्वल्दि उठ जा ब्वारी ;मुख माँ घाम ए ग्ये
ब्वारी लगीं कुचर कुचर ;बस लाइक कन रे ग्ये
लग्याँ आग तुमार मोबेलों माँ ;
फेसबुक लग्युं तों की मौ माँ
भांडी ले की छानी जांदी ;बैठी गौडी पिजाण
तबरी घुर्रे तैंक मोबेल ;करी लाइक कैन मीजाण
चम् उछंडी गौडी उबरि ; चाय कुन सासू टपराइ
लग्याँ काण्ड तुमर करों माँ
फेसबुक लग्युं तों की मौ माँ
फेसबुक लग्युं तों की मौ मा.......
दीपक नौटियाल।।।।।