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उत्तराखंड पर कवितायें : POEMS ON UTTARAKHAND ~!!!

Started by Dinesh Bijalwan, August 05, 2008, 02:18:42 PM

अरुण/Sajwan

Fooli ge saryu ma Pyonli,
Basan laige hilanase;
Banjh kafal ka dandyu ma,
Dekha kya bwanu cha Buransh.

Paar dandyu ka tuk ma,
Dagdyon kuyed laige;
Rat biyen ma kakhi,
Chakor basan laige.

Paki satti ki khushboo,
Dekha ton saryu bai aani;
Gor bachru ki ghandi,
Hamthai dhai lagaiki bhatyani.

Gam gam bwagdeeni gadna,
Jhar jhar rolyun ku pani;
Dagdyon yu swanu pahad,
Meri jikudi ma samagi...

Dinesh Bijalwan

आज फिर गई है बिजली,
आज फिर निकली है लालटेन-
अन्धेरे से बाहर , अन्धेरा दूर करने
आज सभी बतिया रहे है,
कोई गून्गा नही है,
सामने टी वी नही है,
दादी सुना रही  है अपने जमाने की बाते,
सभी सुन रहे है , जैसे देखते है अपना प्रिय धारावाहिक.
किसी को जल्दी नही है,
दादी सुना रही है,  किस तरह  दिन भर  के बाद,
गुठ्यार मे कट्ठा  हो जाता था  गाव,
शौक से या भय की आशन्का मे रेवड बनने की  स्वाभाविक प्रव्रती  से,
समूह की शक्ती ख्त्म कर देती थी  आदिम भय/
थड्या चौफ्ला से गूजती थी घाटी ,
थिरक उठता था गुठ्यार,
धीरे धीरे फटती थी पौ ,
और  शूरू हो जाती थी जीवन की भाग्म भाग-
लो बिज्ली भी आ गयी ,
ये क्या-
उसकी कल परीक्शा है ,
उन्को सुबह दफतर जाना है,
बड्की का कोलेज है,
कम्ररे मे रह ग्ये  दादी और लालटेन
लालटेन रोशनी की उपस्थिती  से बैचैन,
दादी अपनो की अनुपस्थिती से,
अच्छा है कभी कभी चली जाये बिज्ली,
कान्प्ते हाथो से  बुझाती है लाल्टेन

umeshbani

ब्यानातर नामक एक पत्रिका पर्काशित होती थी बहुत शायद १९८९-९० मई  पहले अल्मोडे से श्रीमान दीपक कार्की और श्री अनिल भोज द्वारा . कुमोउनी पत्रिका उसमे पढ़ी थी मैंने सबसे पहले कुमाउनी कविताऐ . अगर किसी नै पढ़ी हो तो शायद उनही याद होंगी
 

umeshbani

श्रीमान दीपक कार्की तो एक अच्छे कुमाउनी कवि है

हेम पन्त

बहुत ही बढिया लिखा है बिजल्वान जी! शहरीकरण और आधुनिकता के दौर में पुरानी बातें और संस्कृति किस कदर अपना अस्तित्व बचाने को तङप रही है, इसका बहुत अच्छा वर्णन किया है. एक सामान्य सी घरेलू दिनचर्या का सहारा लेकर दिल झूने वाली बात के साथ समापन ने कविता को एक ऊंचे स्तर पर पहूंचा दिया...

Quote from: dinesh bijalwan on January 21, 2009, 04:42:54 PM

दादी सुना रही है,  किस तरह  दिन भर  के बाद,
गुठ्यार मे कट्ठा  हो जाता था  गाव,
-------------------
कमरे मे रह ग्ये  दादी और लालटेन
लालटेन रोशनी की उपस्थिती  से बैचैन,
दादी अपनो की अनुपस्थिती से,
अच्छा है कभी कभी चली जाये बिज्ली,
कांपते हाथो से  बुझाती है लाल्टेन


Parashar Gaur

यह कविता मेरे पुस्तक "उकाल-उंदार" से है !

ये पहली पुस्तक होगी और है जो फॉरेन याने वेदेश में छापी गयी और जिसका विमोचन हिन्दुस्तान में गढ़वाल  भवन देहली में हुआ   !


खुशी

जब जब सुबरू घाम
मेरा पहाड़ की हुन्च्याली डाडियू थै छुंदी
वेकु तन मन खुश हवे जंद
तब
खिलिजंदी वेका रोम रोम
च्याखुली चुन्च्यान बैठी जन्दन
गाद गधिनी नचण बैठी जन्दन
तब मेरो  समूचा पहाड़ ....
जी उठद एक नई उमंग का साथ  !

      पुगडियुमाँ हैल लागौन्द हल्या   
     सियूँ का पिछनै -  पिछनै जांदी
     मेरी माँ बैणी , दीदी भुली
     लेकी हत्युमा नई बीज की पौध
     जब जब वो धरती माँ डल्द
     तब ...........
     मुल -   मुल हैन्सी धरती
     वे बीज थै माटी का दगड मिलिकी
    अपणी खुच्लीमा समोंद
     तब एक हैंकि किस्स्मो आनद आंद !

अररर धरती......
वीकी मुख्डिम उमंग उत्साह की
एक नई लहर डाली फिर औणु बुलद
जब ..धरतिम अंकुर फुटदिन
जब वो उगदन
तब विथै लगद की
म्यारो पाहाड,  मेरी धरती
कतका सुंदर चा , कतका बिगरैली चा

परासर गौड़  4 जनवारी  सन २००४

Parashar Gaur

लीस्सा पेड


म्यारा मुल्कका लोग
लीस्सा का पेड छ्न
जु ..  घये जदिन पुटकवी  बिटि
तब ...
किन बैठी जन्दन उकै
लीस्सा कि  !

एक एक बूद
रस रस्सी चून्द
बणिक  ल्वै ......
तब,  वे थै कठठा कयेजांद
कनासतरू  मा     
फिर  ..........
लगै कि बोली
सरे आम , उंचा दाम
करै जांद नीलाम   
डैर अर दैशत का मारी
नि खुलुदु तब कुवी जुबान  !


ई सोची सोची कि
सिलै जांदी वेका दांत 
और दिखदै दिखद ..
फिर हैंकि चोटल
घये जांद वैकी आंत
घों घयेकी,  घै -घै  की
ल्वै का आंसू , पे - पे कि
बोइकी  खुचिल्म्म  लुड्की जांद
वो चुपचाप  .................


कुछ दिनों को बाद
मिटीजांद विको नामो निशान
क्वी  छौ यखम
कैल जलंम छौ यखम  !

पराशर गौड़
२ जुलाई 1962

Parashar Gaur

 क्या सटीक विवरण किया बिज्ल्वान जी आपने !   बहुत अछा ! 
पराशर गौड़

Parashar Gaur

बिज्लाव्वान जी आप की कविता को देखकर  . याद आई मुझेकोमेरी ये कविता  ,. ज़रागौर फरमाना  जी

फिर


व्याली रात कुई
चौका तीर / मिन्डलिम
लालटेन रखिगे
कखी ......

फिर चूनों त नि आगे होला  ?

तबित भोट मंगणु
अचानक  रोशनी  दिखैगे
फिर.....
छलणु आगे  !

मि..... सुचुणु रौ
अपणा आप से पुछुणु रौ
की , अचानक 
लालटेन  लुडिकिगे
अन्ध्यरू हुयेगे
मि .. .....................
जखम छौ वखमै रैगेऊ
सुबेर सुणी ......की कुई म्यारो
भोट डालिगे ...!

पराशर गौड़
१८ नम्बर १९९८