• Welcome to MeraPahad Community Of Uttarakhand Lovers.
 

Panchayat Elections In Uttarakhand - उत्तराखंड मे पंचायत चुनाव

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, August 29, 2008, 01:04:58 PM

क्या पंचायतों में चुनी गयी महिला प्रतिनिधि पुरुषों की अपेक्षा अधिक विकास करवा पायेंगी?

yes
10 (47.6%)
No
7 (33.3%)
Can't Say
4 (19%)

Total Members Voted: 21

Voting closes: February 07, 2106, 11:58:15 AM

हेम पन्त

चम्बा/उत्तरकाशी। प्रसिद्ध लोक गायक नरेन्द्र सिंह नेगी का बहुचर्चित गीत 'हाथन पिलाई व्हिस्की फूलन पिलाई रम, छोटा-मोटा निर्दली दिदोंन कच्ची मा टरकाई हम' इस पंचायत चुनाव पर सटीक बैठ रहा है। जीत पक्की करने के लिए कई प्रत्याशी घर-घर शराब पहुंचाने में पसीना बहा रहे है।

चम्बा विकासखंड में 99 ग्राम प्रधानों, 40 क्षेत्र पंचायतों व 4 जिला पंचायत सदस्य पदों पर चुनाव हो रहा है। कई प्रत्याशियों ने मतदाताओं की संख्या के हिसाब से शराब का कोटा रखा है। शराब की दुकान से गाड़ियां भरकर गांवों को रवाना हुई। एक प्रत्याशी ने गाड़ी में शराब भरकर गांव में घुमाया, जो जहां मिला उसे बांटते रहे। नागणी-चम्बा मोटर मार्ग पर बांटी जा रही शराब की सूचना पुलिस को देने पर पुलिस कर्मियों ने गाड़ियों का पीछा किया तो उन्हे निराशा ही हाथ लगी। ऋषिकेश रोड़, मसूरी रोड और धरासू रोड के बड़े बड़े होटलों में शराब की पेटियों का उतरना व गांव के लिए रवानगी होती रही।

प्रहलाद तडियाल

आज उत्तराखंड में भी पंचायत चुनाव रंजिश का कारण बन रहे हैं। बाद में यह रंजिश खून खराबा का कारण बनती है। जरूरत इस बात की है कि उत्तराखंड की परंपरानुसार यहां पंचायत चुनाव सहभागिता की भावना लेकर आएं, एक दूसरे का दुश्मन बनने का कारण न बनें। अभी कुछ ही दशक पहले उत्तराखंड में अधिकांश गांवों में चुनाव के बजाय सर्वानुमति से प्रधानों को चुना जाता था। जब से पंचायतों को सरकारों से अधिक धन मिलने लगा है, तब से चुनावों में यह स्थिति सामने आई है।

हुक्का बू

मेरा अनुभव पंचायत चुनावों का काफी खराब है, इसके द्वारा जनता को अपना प्रतिनिधि चुनने का अधिकार भले ही मिला हो, लेकिन इस चुनाव की प्रतिद्वंदता ने मेरे पहाड़ के "एकता और संगठित" माहौल को कहीं दूर ढकेल दिया है। आज गांवों में इन चुनावों की प्रतिद्वंदता ने लोगों के रिश्ते बिगाड़ कर रख दिया है, यह जागरुकता और विकास का एक और चेहरा भी है। पहले गांवों में पधानचारी की व्यवस्था थी, गांव के एक समृद्ध और सुलझे हुये व्यक्ति को पूर्वजों ने पधान चुन लिया था और उसके वंशज ही गांव के पधान होते रहे। उन पधानों द्वारा पूरे गांव को अपनी जिम्मेदारी के रुप में स्वीकार किया। कोई भी होनी-अनहोनी पर प्रथम सूचना पधान को ही दी जाती थी और पधान द्वारा समस्याओं का निराकरण भी होता था।
      मजाल थी कि बिना पधान जी के आये गांव की किसी बेटी की डोली उठी हो, कोई जवान देश (अपनी फौज की ड्यूटी) गया हो, किसी बुजुर्ग की अर्थी उठी हो और गांव में कोई शुभ कार्य हुआ हो। जितना सम्मान गांव उनको देता था, उतनी ही प्यार और जिम्मेदारी से देखभाल पधानों द्वारा की जाती थी। गांव में किसी का झगड़ा होने पर कोई कोर्ट-कचहरी-थाना लोगों को मालूम नहीं था, या तो पधान द्वारा मामला सुलटा लिया जाता था, या पंचायत बुला ली जाती थी और पटवारी तो जमीन की नाप-जोख तक ही सीमित था। तब कितना खुशहाल था गांव, कितना प्यार था लोगों में........गांव के संजायत ओखलसारी(सभी का ओखल) में धान कूटती महिलायें, चौपाल में हुक्का पीते बुजुर्ग, पास ही खेलते बच्चे, घास के लिये गाना गाती हुई जा रही महिलायें..........गांव के किसी भी व्यक्ति का दुःख पूरे गांव का दुःख और उसके सुख में पूरा गांव खुश....!
          लेकिन फिर आये पंचायत चुनाव, लोगों के गुट बनने लगे, बुजुर्ग चौपाल में इकट्ठा न होकर किसी के चाख में खुसर-पुसर करने लगे....महिलाओं में आपसी बोलचाल बंद हुई और अब तो यह हाल है कि गांव वाले किसी और के काम से मुंह चुराने लगे.....गाली-गलौज होते-होते नौबत मार-पीट और कोर्ट-कचहरी तक आई। लोगों के गांव के तो क्या आपसी सगे रिश्ते भी खत्म होने लगे। मेरे गांव में पिछले पंचायत चुनाव में एक नौजवान ग्राम प्रधान का पर्चा भर कर आया तो उसे हराने उसके पिताजी परचा दाखिल कर आये और उनको नीचा दिखाने के लिये उनका छोटा भाई भी प्रत्याशी बन गया। इस बार के चुनाव में तो और भी हाल खराब हैं।
     इस राजनीति ने मेरा पहाड़ खराब कर दिया। एक साथ मिल-बैठ कर रहने-खाने वालों को अब दुश्मन बना दिया।

हेम पन्त

बूबू आप की एक-एक बात बिल्कुल सही है हो महाराज!

अब तो ऐसी नौबत आ गयी है कि जो लोग चुनाव में प्रत्याशी होते हैं वो आपस में न्यूते (निमन्त्रण) भी बन्द कर देते हैं, जो कि सामन्यतया भीषण दुश्मन के साथ ही किया जाता है.

मुझे याद है जब मैं छोटा था तो प्रधान बनाने के लिये एक छोटी सी मीटिंग बुलायी जाती थी और वहीं पर सर्वसम्मति से प्रधान का चुनाव हो जाता था. उस समय ऐसी स्थिति भी हो जाती थी कि किसी सयाने आदमी को मान-मुनौव्वल करके प्रधान बन जाने को राजी करवाया जाता था.

सीधे-साधे पहाङ के आदमी जब से नेतागिरी के चक्कर में पङे हैं गांवों में नफरत का आधिपत्य हो गया है. अब तो शहरों से जाकर लोग चुनाव लडने लगे हैं. अगर ऐसे लोग जीतने लगे तो लोगों को एक कागज पर 'साइन' कराने के लिये गांव से शहर आना पङेगा.

Risky Pathak


बूब ज्यूँ बिल्कुल ठीक कूणों छा हो| हर गोंक एक काथ छु|

फ़िर गो वाल ले आपस में बाटि जानेर भाय|
जो पधान ज्यूक मित्रवर हवाळ उनर घर तक खडंजा बणोल, पानी नेहर बनेल| पर जनुल पधान ज्यूँ कै वोट नै दये, उनर लिजिक क्ये  नै हो|

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Quote from: हुक्का बू on September 03, 2008, 02:34:23 PM
मेरा अनुभव पंचायत चुनावों का काफी खराब है, इसके द्वारा जनता को अपना प्रतिनिधि चुनने का अधिकार भले ही मिला हो, लेकिन इस चुनाव की प्रतिद्वंदता ने मेरे पहाड़ के "एकता और संगठित" माहौल को कहीं दूर ढकेल दिया है। आज गांवों में इन चुनावों की प्रतिद्वंदता ने लोगों के रिश्ते बिगाड़ कर रख दिया है, यह जागरुकता और विकास का एक और चेहरा भी है। पहले गांवों में पधानचारी की व्यवस्था थी, गांव के एक समृद्ध और सुलझे हुये व्यक्ति को पूर्वजों ने पधान चुन लिया था और उसके वंशज ही गांव के पधान होते रहे। उन पधानों द्वारा पूरे गांव को अपनी जिम्मेदारी के रुप में स्वीकार किया। कोई भी होनी-अनहोनी पर प्रथम सूचना पधान को ही दी जाती थी और पधान द्वारा समस्याओं का निराकरण भी होता था।
      मजाल थी कि बिना पधान जी के आये गांव की किसी बेटी की डोली उठी हो, कोई जवान देश (अपनी फौज की ड्यूटी) गया हो, किसी बुजुर्ग की अर्थी उठी हो और गांव में कोई शुभ कार्य हुआ हो। जितना सम्मान गांव उनको देता था, उतनी ही प्यार और जिम्मेदारी से देखभाल पधानों द्वारा की जाती थी। गांव में किसी का झगड़ा होने पर कोई कोर्ट-कचहरी-थाना लोगों को मालूम नहीं था, या तो पधान द्वारा मामला सुलटा लिया जाता था, या पंचायत बुला ली जाती थी और पटवारी तो जमीन की नाप-जोख तक ही सीमित था। तब कितना खुशहाल था गांव, कितना प्यार था लोगों में........गांव के संजायत ओखलसारी(सभी का ओखल) में धान कूटती महिलायें, चौपाल में हुक्का पीते बुजुर्ग, पास ही खेलते बच्चे, घास के लिये गाना गाती हुई जा रही महिलायें..........गांव के किसी भी व्यक्ति का दुःख पूरे गांव का दुःख और उसके सुख में पूरा गांव खुश....!
          लेकिन फिर आये पंचायत चुनाव, लोगों के गुट बनने लगे, बुजुर्ग चौपाल में इकट्ठा न होकर किसी के चाख में खुसर-पुसर करने लगे....महिलाओं में आपसी बोलचाल बंद हुई और अब तो यह हाल है कि गांव वाले किसी और के काम से मुंह चुराने लगे.....गाली-गलौज होते-होते नौबत मार-पीट और कोर्ट-कचहरी तक आई। लोगों के गांव के तो क्या आपसी सगे रिश्ते भी खत्म होने लगे। मेरे गांव में पिछले पंचायत चुनाव में एक नौजवान ग्राम प्रधान का पर्चा भर कर आया तो उसे हराने उसके पिताजी परचा दाखिल कर आये और उनको नीचा दिखाने के लिये उनका छोटा भाई भी प्रत्याशी बन गया। इस बार के चुनाव में तो और भी हाल खराब हैं।
     इस राजनीति ने मेरा पहाड़ खराब कर दिया। एक साथ मिल-बैठ कर रहने-खाने वालों को अब दुश्मन बना दिया।

Fully endosre views of Bhoo ji.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


From : Kheem Singh Bisht.

Quote from: khimsrawat on September 04, 2008, 12:21:51 PM
ग्राम प्रधान के चुनाव के लिए में पहाड़ गया था / ३०/८/२००८ को मेरा रामनगर के लिए रेल की टिकेट आरक्षित थी किंतु आरक्षित डिब्बा साधारण कोच बन गया था / ३१-०८-२००८ को रामनगर पहुच कर देखा की रामनगर के रानीखेत रोड में पैर रखने की जगह तक नही है/ सारी छोटी गाडिया डेल्ही व हरियाणा नंबर की थी रामनगर के इतिहास में पहली बार ऐसा हुवा है कि रानीखेत रोड में स्थित मिठै कि दुकानों में सुबह ५ बजे तक सारी मिठाई बिक चुकी थी मिठै के बाद फलों का नंबर लगा भाव आसमान को छू रहे थे  सभी के मुख में एक ही बात थी कि एस बार के चुनाव में हद ही हो गई है /

मैं सोचता रहा कि ग्राम स्तर पर एस तरह के चुनाव कितने लाभकारी और हानिकरक है / गावो का हाल इतना ख़राब है कि मन सिहर उठता है / शराब तथा धन बल का पूरा प्रयोग चुनावो में हो रहा है/
  :D :D

Mukesh Joshi

नई टिहरी (टिहरी गढ़वाल)। 'सैरा बसग्याल बण मां, इनी दिन गैन , मेरा सदनी इनी दिन रेना' प्रसिद्ध लोक गायक नरेन्द्र सिंह नेगी का यह गीत पहाड़ की महिलाओं के दुख को बखूबी उकेरता है। आज इक्कीसवीं सदी में जहां लोग चांद पर बसने की बात कर रहे हैं वही पहाड़ की महिलाएं आज भी सदियों पहले जैसे हाल पर हैं।

अब जबकि पंचायत चुनाव में महिलाओं को पचास प्रतिशत आरक्षण मिलने के बाद भले ही पंच प्रधानों के तौर पर पुरूषों का वर्चस्व टूटेगा लेकिन अधिकांश महिलाओं के लिए आज भी आरक्षण के कोई मायने नहीं है। उनकी दिनचर्या में वही मुश्किलें अब भी हैं जो सदियों से चली आ रही है। पहाड़ में महिलाएं आर्थिकी की रीढ़ होने के साथ यहां के तमाम आंदोलनों में अगुवा की भूमिका में रही है। राज्य आंदोलन के दौरान महिलाएं घर-परिवार का काम-काज निपटाने के बाद सड़कों पर उतरी। राज्य में चले तमाम शराब विरोधी आंदोलनों में भी महिलाओं की भूमिका अहम रही। बहरहाल, पंचायत चुनाव में महिलाओं को पचास प्रतिशत आरक्षण मिलने के बाद अधिकांश महिलाओं की दिनचर्या व स्थिति में कोई बदलाव नजर नहीं आता है। सुदूर गांव में आज भी आम महिला अपने नियमित काम-काज में ही उलझी हुई हैं। थौलधार प्रखंड निवासी रामी देवी का कहना है कि पंचायतों में महिलाओं को आरक्षण मिला गया लेकिन उनकी मुश्किल दूर नहीं हुई है। उन्हें तो आज भी सुबह उठकर खेती-बाड़ी की चिंता लगी रहती है। कई महिलाओं को तो यह भी नहीं पता कि पचास प्रतिशत आरक्षण क्या बला है। महिलाओं के कंधें पर पंचायत प्रतिनिधि की बंदूक के परिणाम क्या होंगे इससे भी महिलायें अनभिज्ञ हैं।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Quote from: mukesh joshi on September 06, 2008, 09:53:10 AM
नई टिहरी (टिहरी गढ़वाल)। 'सैरा बसग्याल बण मां, इनी दिन गैन , मेरा सदनी इनी दिन रेना' प्रसिद्ध लोक गायक नरेन्द्र सिंह नेगी का यह गीत पहाड़ की महिलाओं के दुख को बखूबी उकेरता है। आज इक्कीसवीं सदी में जहां लोग चांद पर बसने की बात कर रहे हैं वही पहाड़ की महिलाएं आज भी सदियों पहले जैसे हाल पर हैं।

अब जबकि पंचायत चुनाव में महिलाओं को पचास प्रतिशत आरक्षण मिलने के बाद भले ही पंच प्रधानों के तौर पर पुरूषों का वर्चस्व टूटेगा लेकिन अधिकांश महिलाओं के लिए आज भी आरक्षण के कोई मायने नहीं है। उनकी दिनचर्या में वही मुश्किलें अब भी हैं जो सदियों से चली आ रही है। पहाड़ में महिलाएं आर्थिकी की रीढ़ होने के साथ यहां के तमाम आंदोलनों में अगुवा की भूमिका में रही है। राज्य आंदोलन के दौरान महिलाएं घर-परिवार का काम-काज निपटाने के बाद सड़कों पर उतरी। राज्य में चले तमाम शराब विरोधी आंदोलनों में भी महिलाओं की भूमिका अहम रही। बहरहाल, पंचायत चुनाव में महिलाओं को पचास प्रतिशत आरक्षण मिलने के बाद अधिकांश महिलाओं की दिनचर्या व स्थिति में कोई बदलाव नजर नहीं आता है। सुदूर गांव में आज भी आम महिला अपने नियमित काम-काज में ही उलझी हुई हैं। थौलधार प्रखंड निवासी रामी देवी का कहना है कि पंचायतों में महिलाओं को आरक्षण मिला गया लेकिन उनकी मुश्किल दूर नहीं हुई है। उन्हें तो आज भी सुबह उठकर खेती-बाड़ी की चिंता लगी रहती है। कई महिलाओं को तो यह भी नहीं पता कि पचास प्रतिशत आरक्षण क्या बला है। महिलाओं के कंधें पर पंचायत प्रतिनिधि की बंदूक के परिणाम क्या होंगे इससे भी महिलायें अनभिज्ञ हैं।


Great song by negi ji describing the real plight women in Pahad.

Mukesh Joshi