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Proposal For Train Till Bageshwar - टनकपुर से बागेश्वर तक रेल लाईन का प्रस्ताव

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, October 11, 2007, 05:01:11 PM

पंकज सिंह महर

साथियो,
       यह योजना अंग्रेजों द्वारा प्रथम विश्व युद्द के बाद इस क्षेत्र की आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक प्रगति के अलावा यहां की प्रचुर वन सम्पदा व सैनिकों के सरल प्रवाह के निमित्त टनकपुर से बागेश्वर तक रेलवे लाईन का सर्वेक्षण प्रारम्भ किया गया। यह योजना द्वितीय विश्व युद्द होने के कारण धीरे-धीरे ठण्डे बस्ते में चली गई। १९६० में पद्म श्री स्व० देवकी नन्दन पाण्डे ने इस रेलवे लाईन के दोबारा सर्वेक्षण कराये जाने की मांग रखी, १९८० में तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी बागेश्वर आईं तो "बागेश्वर-टनकपुर रेलवे लाईन संघर्ष समिति" ने उन्हें ग्यापन दिया, जिसके फलस्वरुप १९८४ में इस लाईन के सर्वेक्षण हेतु बजट का प्रावधान किया, लेकिन सर्वेक्षण का कार्य नहीं हो पाया।
     वर्तमान में प्रस्तावित रेलवे लाईन के मार्ग में धौलीगंगा, टनकपुर और पंचेश्वर जैसी वृहद योजनायें चल रही हैं, और पहाड़ों में जो खनिज है यथा मैग्नेसाइट, खडिया, तांबा, जिप्सम आदि का उचित और सुगम दोहन हो सकेगा। इसके अतिरिक्त इस मार्ग में पड़्ने वाले अतयन्त दुर्गम और पिछड़े इलाके यथा बागेश्वर के कत्यूर, दानपुर, कमस्यार, खरही अल्मोड़ा के रीठागाड़ और चौगर्खा, पिथौरागढ के गणाई और गंगोल और चम्पावत के गुमदेश की लगभग १० लाख जनता इस सुगम और महत्वपूर्ण परिवहन से जुड़ सकेंगे।

पंकज सिंह महर

टनकपुर से बागेश्वर तक की इस प्रस्तावित योजना की लम्बाई १३७ किलोमीटर है, जिसमें से ६७ कि०मी० लाईन अंतराष्ट्रीय सीमा (भारत-नेपाल) के समानान्तर है और पंचेश्वर से यह योजना सरयू नदी के समानान्तर है। इस कारण इस योजना में कोई सामाजिक विस्थापन भी नहीं होना है, क्योंकि महाकाली और सरयू नदी दोनों भ्रंश घाटियों में बहती हैं। यह घाटियां भौगोलिक स्थिति से काफी मजबूत हैं, इसके अतिरिक्त इस प्रस्तावित योजना में चार बड़े रेल पुलों का निर्माण होना है और इनकी चौड़ाई भी मैदानी क्षेत्रों की तुलना में अत्यन्त कम होगी।
        पर्वतीय योजनाओं में मुख्य रुप से तकनीकी पक्ष मात्र ऊंचाई ही है, लेकिन इस लाईन को टनकपुर (समुद्र तल से ऊंचाई ८०० मीटर) से बागेश्वर तक पहुंचने में ६१० मीटर की ऊंचाई को पार करना होगा। अन्य पर्वतीय रेल योजनाओं की ऊंचाई की तुलना की जाय तो कालका से शिमला तक से ९८ कि०मी० की दूरी तय करने में १४३३ मीटर की ऊंचाई पार करनी पड़्ती है जब कि इस योजना में १३७ कि०मी० में मात्र ६१० मीटर की ही ऊंचाई को पार करनी पड़ेगी। इसके अतिरिक्त कांगड़ा और कश्मीर की तुलना में और ऊंचाई पार करनी पड़्ती है।

BC LOHUMI

पहली बात तो इस परियोजना का मूर्त रूप लेना निकट भविष्य में संभव प्रतीत नही होता।  यदि ऐसा हो भी जाता है तो यह एक सुगम साधन होगा यातायात का मुख्यत: उन बुजुर्ग और महिलाओं के लिये जिन्हें बस में बैठ कर यात्रा करना बहुत असुभिदाजनक लगता है।  जहां तक बात पर्यावरण के हानि की है, सड़क निर्माण में भी उतना ही होता है।

पंकज सिंह महर

फिर गरमाया टनकपुर-बागेश्वर रेल लाइन निर्माण का मुद्दा

बागेश्वर। टनकपुर-बागेश्वर रेल लाइन निर्माण की मांग एक बार फिर जोर पकड़ती जा रही है। संघर्ष समिति ने एक बैठक करते हुए रेल लाइन निर्माण की मांग को लेकर आंदोलन करने का निर्णय लिया है। साथ ही प्रधानमंत्री को ज्ञापन भेजा है।

स्थानीय टीआरसी में आयोजित एक बैठक को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने कहा कि केंद्र सरकार उत्तराखंड में रेल निर्माण के मुद्दे पर जनभावनाओं का सम्मान नहीं कर रही है। बागेश्वर की जनता विगत कई वर्षो से रेल लाइन निर्माण की मांग को नजरअंदाज किया जा रहा है। विगत वर्ष रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव ने भी टनकपुर-बागेश्वर रेल लाइन निर्माण की मांग को सैद्धांतिक स्वीकृति प्रदान करते हुए बजट आवंटित करने का आश्वासन दिया था। लेकिन रेल बजट में रेल मंत्रालय ने टनकपुर-बागेश्वर सहित पूरे उत्तराखंड राज्य की अवहेलना की। जिससे जनता में घोर निराशा है। रेल निर्माण संघर्ष समिति ने कहा कि जहां चीन व नेपाल सीमाओं तक रेल लाइनों का विस्तार कर रहे है वहीं भारत सरकार इस संवेदनशील क्षेत्र की उपेक्षा कर रही है। रेल लाइन निर्माण के बाद पहाड़ में विकास के द्वार खुल सकते है। यह सामरिक, पर्यटन व परिवहन आदि की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है। संघर्ष समिति ने इस मुद्दे पर लगातार संघर्ष करने का आश्वासन दिया।

पंकज सिंह महर

साथियो,
       यह योजना अंग्रेजों द्वारा प्रथम विश्व युद्द के बाद इस क्षेत्र की आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक प्रगति के अलावा यहां की प्रचुर वन सम्पदा व सैनिकों के सरल प्रवाह के निमित्त टनकपुर से बागेश्वर तक रेलवे लाईन का सर्वेक्षण प्रारम्भ किया गया। यह योजना द्वितीय विश्व युद्द होने के कारण धीरे-धीरे ठण्डे बस्ते में चली गई। १९६० में पद्म श्री स्व० देवकी नन्दन पाण्डे ने इस रेलवे लाईन के दोबारा सर्वेक्षण कराये जाने की मांग रखी, १९८० में तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी बागेश्वर आईं तो "बागेश्वर-टनकपुर रेलवे लाईन संघर्ष समिति" ने उन्हें ग्यापन दिया, जिसके फलस्वरुप १९८४ में इस लाईन के सर्वेक्षण हेतु बजट का प्रावधान किया, लेकिन सर्वेक्षण का कार्य नहीं हो पाया।
     वर्तमान में प्रस्तावित रेलवे लाईन के मार्ग में धौलीगंगा, टनकपुर और पंचेश्वर जैसी वृहद योजनायें चल रही हैं, और पहाड़ों में जो खनिज है यथा मैग्नेसाइट, खडिया, तांबा, जिप्सम आदि का उचित और सुगम दोहन हो सकेगा। इसके अतिरिक्त इस मार्ग में पड़्ने वाले अतयन्त दुर्गम और पिछड़े इलाके यथा बागेश्वर के कत्यूर, दानपुर, कमस्यार, खरही अल्मोड़ा के रीठागाड़ और चौगर्खा, पिथौरागढ के गणाई और गंगोल और चम्पावत के गुमदेश की लगभग १० लाख जनता इस सुगम और महत्वपूर्ण परिवहन से जुड़ सकेंगे। 
टनकपुर से बागेश्वर तक की इस प्रस्तावित योजना की लम्बाई १३७ किलोमीटर है, जिसमें से ६७ कि०मी० लाईन अंतराष्ट्रीय सीमा (भारत-नेपाल) के समानान्तर है और पंचेश्वर से यह योजना सरयू नदी के समानान्तर है। इस कारण इस योजना में कोई सामाजिक विस्थापन भी नहीं होना है, क्योंकि महाकाली और सरयू नदी दोनों भ्रंश घाटियों में बहती हैं। यह घाटियां भौगोलिक स्थिति से काफी मजबूत हैं, इसके अतिरिक्त इस प्रस्तावित योजना में चार बड़े रेल पुलों का निर्माण होना है और इनकी चौड़ाई भी मैदानी क्षेत्रों की तुलना में अत्यन्त कम होगी।
        पर्वतीय योजनाओं में मुख्य रुप से तकनीकी पक्ष मात्र ऊंचाई ही है, लेकिन इस लाईन को टनकपुर (समुद्र तल से ऊंचाई ८०० मीटर) से बागेश्वर तक पहुंचने में ६१० मीटर की ऊंचाई को पार करना होगा। अन्य पर्वतीय रेल योजनाओं की ऊंचाई की तुलना की जाय तो कालका से शिमला तक से ९८ कि०मी० की दूरी तय करने में १४३३ मीटर की ऊंचाई पार करनी पड़्ती है जब कि इस योजना में १३७ कि०मी० में मात्र ६१० मीटर की ही ऊंचाई को पार करनी पड़ेगी। इसके अतिरिक्त कांगड़ा और कश्मीर की तुलना में और ऊंचाई पार करनी पड़्ती है। 






एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


Mahar Ji,

We still don't know when this project will start.


Quote from: पंकज सिंह महर on March 31, 2008, 11:45:51 AM
साथियो,
       यह योजना अंग्रेजों द्वारा प्रथम विश्व युद्द के बाद इस क्षेत्र की आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक प्रगति के अलावा यहां की प्रचुर वन सम्पदा व सैनिकों के सरल प्रवाह के निमित्त टनकपुर से बागेश्वर तक रेलवे लाईन का सर्वेक्षण प्रारम्भ किया गया। यह योजना द्वितीय विश्व युद्द होने के कारण धीरे-धीरे ठण्डे बस्ते में चली गई। १९६० में पद्म श्री स्व० देवकी नन्दन पाण्डे ने इस रेलवे लाईन के दोबारा सर्वेक्षण कराये जाने की मांग रखी, १९८० में तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी बागेश्वर आईं तो "बागेश्वर-टनकपुर रेलवे लाईन संघर्ष समिति" ने उन्हें ग्यापन दिया, जिसके फलस्वरुप १९८४ में इस लाईन के सर्वेक्षण हेतु बजट का प्रावधान किया, लेकिन सर्वेक्षण का कार्य नहीं हो पाया।
     वर्तमान में प्रस्तावित रेलवे लाईन के मार्ग में धौलीगंगा, टनकपुर और पंचेश्वर जैसी वृहद योजनायें चल रही हैं, और पहाड़ों में जो खनिज है यथा मैग्नेसाइट, खडिया, तांबा, जिप्सम आदि का उचित और सुगम दोहन हो सकेगा। इसके अतिरिक्त इस मार्ग में पड़्ने वाले अतयन्त दुर्गम और पिछड़े इलाके यथा बागेश्वर के कत्यूर, दानपुर, कमस्यार, खरही अल्मोड़ा के रीठागाड़ और चौगर्खा, पिथौरागढ के गणाई और गंगोल और चम्पावत के गुमदेश की लगभग १० लाख जनता इस सुगम और महत्वपूर्ण परिवहन से जुड़ सकेंगे। 
टनकपुर से बागेश्वर तक की इस प्रस्तावित योजना की लम्बाई १३७ किलोमीटर है, जिसमें से ६७ कि०मी० लाईन अंतराष्ट्रीय सीमा (भारत-नेपाल) के समानान्तर है और पंचेश्वर से यह योजना सरयू नदी के समानान्तर है। इस कारण इस योजना में कोई सामाजिक विस्थापन भी नहीं होना है, क्योंकि महाकाली और सरयू नदी दोनों भ्रंश घाटियों में बहती हैं। यह घाटियां भौगोलिक स्थिति से काफी मजबूत हैं, इसके अतिरिक्त इस प्रस्तावित योजना में चार बड़े रेल पुलों का निर्माण होना है और इनकी चौड़ाई भी मैदानी क्षेत्रों की तुलना में अत्यन्त कम होगी।
        पर्वतीय योजनाओं में मुख्य रुप से तकनीकी पक्ष मात्र ऊंचाई ही है, लेकिन इस लाईन को टनकपुर (समुद्र तल से ऊंचाई ८०० मीटर) से बागेश्वर तक पहुंचने में ६१० मीटर की ऊंचाई को पार करना होगा। अन्य पर्वतीय रेल योजनाओं की ऊंचाई की तुलना की जाय तो कालका से शिमला तक से ९८ कि०मी० की दूरी तय करने में १४३३ मीटर की ऊंचाई पार करनी पड़्ती है जब कि इस योजना में १३७ कि०मी० में मात्र ६१० मीटर की ही ऊंचाई को पार करनी पड़ेगी। इसके अतिरिक्त कांगड़ा और कश्मीर की तुलना में और ऊंचाई पार करनी पड़्ती है। 







एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

रेल मार्ग निर्माण को फिर आंदोलन करेगी जनताJun 29, 11:39 pm

बागेश्वर। टनकपुर से बागेश्वर तक रेल मार्ग निर्माण की मांग को लेकर बागेश्वर की जनता ने फिर लामबंद होने का निर्णय लिया है। रविवार को रेल मार्ग निर्माण संघर्ष समिति ने बैठक करते हुए उक्त निर्णय लिया। संघर्ष समिति ने कहा कि विगत कई वर्षो से टनकपुर-बागेश्वर रेल लाइन निर्माण की मांग को लेकर जनता आंदोलन की राह पर है। जनता की मांग के आधार पर ही रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव ने भी सैद्धांतिक स्वीकृति प्रदान करते हुए सर्वे का आदेश दिया था। लेकिन वित्तीय स्वीकृति प्रदान करने में केंद्र सरकार ने कोताही बरती। संघर्ष समिति ने इसे जनता के साथ धोखा करार देते हुए पुन: आंदोलन का रास्ता अख्तियार करने का संकल्प लिया। संघर्ष समिति ने जौलजीबी-टनकपुर, चौखुटिया-रामनगर, ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल मार्गो का भी निर्माण करने, जिला आंदोलनकारियों को सम्मानित करने, अमर राम के आंदोलन को समर्थन दिये जाने, आय जाति, स्थायी निवास आदि प्रमाण पत्र बनाने की प्रक्रिया सरल बनाने की मांग की गयी।

राजेश जोशी/rajesh.joshee

यह तो अच्छा है कि रेल लाइन के लिए आन्दोलन किया जा रहा है पर जनता का व्यापक हित भी देखना चाहिए न की अपने राजनैतिक हित|  मैं ट्रेन से कभी कभी सफर करता हूँ पर अगर देहरादून से हल्द्वानी जाना हो तो बहुत समय लगता है, ऐसे ही अगर दिल्ली से देहरादून आने पर सहारनपुर से देहरादून तक ४ से ५ घंटे लग जाते हैं जबक बस से वही दूरी १.५ - २ घंटे में तय की जा सकती है |  अगर जनता के व्यापक हित की बात है तो ये लोग टनकपुर से देहरादून तक रेलवे लाइन के लिए भी आन्दोलन क्यों नही करते जिसमे शायद खर्च भी मामूली होगा और प्रदेश की जनता का बहुत भला होगा|  कुमाऊँ और गढ़वाल के बीच संपर्क बढेगा और कुमाऊँ के व्यापारियों को भी गढ़वाल में नया बाज़ार मिलेगा|  इसके अलावा टनकपुर / लालकुआ से बरेली तक बढ़ी लाइन, लक्सर से मुज़फ्फरनगर तक डायरेक्ट लाइन, देहरादून, रामनगर, ऋषिकेश, कोटद्वार, टनकपुर और काठगोदाम तक डबल ट्रैक के लिए सरकारों पर दबाव बनाया जाना उत्तराखंड की जनता के व्यापक हित में होगा| जब तक यह सब नही होता तब तक पहाडों पर ट्रेन दौड़ने की बात करना उत्तराखंड की एक करोड़ जनता के साथ बेमानी होगा|   पहाड़ पर ट्रेन तभी दौड़ पायेगी जब वह मैदान से रफ़्तार पकडेगी|   

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720



Joshi Ji,


I was just reading a book written by Mr P C Kandal "Uttarakhand ka Darpan".. He had quoted that in South train is already running in Timalnaadu Hill stations which are even much height than the Ranikhet and other places of UK.

Similarly, in Himanchal, J&K and Darjiling etc train are running in hill areas which is also attracting a lot of tourists. 

I feel there is no strong representation from  UK in Centre due to which such projects are pending long outstanding.



Quote from: rajesh.joshee on July 01, 2008, 11:19:42 AM
यह तो अच्छा है कि रेल लाइन के लिए आन्दोलन किया जा रहा है पर जनता का व्यापक हित भी देखना चाहिए न की अपने राजनैतिक हित|  मैं ट्रेन से कभी कभी सफर करता हूँ पर अगर देहरादून से हल्द्वानी जाना हो तो बहुत समय लगता है, ऐसे ही अगर दिल्ली से देहरादून आने पर सहारनपुर से देहरादून तक ४ से ५ घंटे लग जाते हैं जबक बस से वही दूरी १.५ - २ घंटे में तय की जा सकती है |  अगर जनता के व्यापक हित की बात है तो ये लोग टनकपुर से देहरादून तक रेलवे लाइन के लिए भी आन्दोलन क्यों नही करते जिसमे शायद खर्च भी मामूली होगा और प्रदेश की जनता का बहुत भला होगा|  कुमाऊँ और गढ़वाल के बीच संपर्क बढेगा और कुमाऊँ के व्यापारियों को भी गढ़वाल में नया बाज़ार मिलेगा|  इसके अलावा टनकपुर / लालकुआ से बरेली तक बढ़ी लाइन, लक्सर से मुज़फ्फरनगर तक डायरेक्ट लाइन, देहरादून, रामनगर, ऋषिकेश, कोटद्वार, टनकपुर और काठगोदाम तक डबल ट्रैक के लिए सरकारों पर दबाव बनाया जाना उत्तराखंड की जनता के व्यापक हित में होगा| जब तक यह सब नही होता तब तक पहाडों पर ट्रेन दौड़ने की बात करना उत्तराखंड की एक करोड़ जनता के साथ बेमानी होगा|   पहाड़ पर ट्रेन तभी दौड़ पायेगी जब वह मैदान से रफ़्तार पकडेगी|