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Badrinath Temple - भारतवर्ष के चार धामों में से एक बद्रीनाथ धाम

Started by Uttaranchali Nauni, October 11, 2007, 07:30:22 PM

Devbhoomi,Uttarakhand


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dinesh kandpal

Quote from: Uttaranchali Nauni on October 11, 2007, 07:30:22 PM
Here's a pic of badrinath temple ....

साथियो,
        भगवान बद्रीनाथ जी से आप सभी लोग परिचित होंगे, यह उत्तराखण्ड के चार धामों में तो है ही, साथ ही हिन्दू मान्यताओं के अनुसार चार धाम, जो आदिगुरु शंकराचार्य द्वारा स्थापित किये गये ( यथा- उत्तर में बद्रीनाथ, दक्षिण में रामेश्वरम, पूरब में पुरी तथा पश्चिम में द्वारिका) उनमें से भी एक है, तो आइये जानें इसका महत्व और इतिहास....!


Devbhoomi,Uttarakhand

                    बद्रीनाथ धाम के बारे मैं कहा जाता है-बद्रीनाथ विश्वंभरम
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बद्रीनाथ धाम भारत के पवित्र चार धामों में प्राचीनतम है। शास्त्रों में चार युगों में चार धामों की महिमा कही गई है। इनमें बद्रीनाथ सतयुग का उत्तर में, रामेश्वरम त्रैता का दक्षिण में, द्वारिका पश्चिम में द्वापर का और जगन्नाथधाम पूर्व में कलियुग का पावनकारी धाम है। पौराणिक कथानक के मुताबिक हिमालय के गंधमार्दन पर्वत शिखर पर बद्री (बेर) के वन में महाविष्णु ने नर-नारायण के रूप में तप किया था।

बद्रिकाश्रम क्षेत्र में आज भी नर और नारायण नाम के दो पर्वत विमान हैं। विभिन्न युगों में इस स्थान को मुक्ति प्रदा, योगसिद्धित, बद्रीविशाल नामों से भी जाना गया। इसी बद्रिकाश्रम क्षेत्र में सनकादिक, नारद, भृगु, वेदव्यास आदि ऋषियों ने भी तप किया।

कहा जाता है सर्वप्रथम यहां बद्रीनाथ की स्थापना देवताओं ने अलकनंदा के नारदकुंड से शालिग्राम निकालकर की थी। नारद यहां के प्रधान अर्चक हुए। बाद में अनास्थावादी लोगों ने इस मूर्ति को अलकनंदा में फेंक दिया, तब आदिशंकराचार्य ने वहां से निकालकर इन्हें गरुड़कोटि गुफा में स्थापित किया। लेकिन एक बार फिर मंदिर के किसी पुजारी ने ही इस विग्रह को तप्त कुंड में फेंक दिया तो तीसरी बार इसी संप्रदाय के रामानुजाचार्य (श्री संप्रदाय के प्रवर्तक नहीं) ने तप्त कुंड से निकालकर इन्हें प्रतिष्ठित किया।

यहां का वर्तमान मंदिर कई सदी पूर्व गढ़वाल के महाराजाओं ने बनवाया था और इंदौर की महारानी ने इसकी छतरी को स्वर्ण मंडित करवाया था। मंदिर के तीन हिस्से हैं-गर्भगृह, दर्शन मंडप व सभा मंडप। गर्भगृह में श्रीबद्रीनाथजी का विग्रह काले शालिग्राम शिला पर अंकित है। पद्मासन मुद्रा में यह प्रतिमा चतुर्भजी है।

ऊपर दो हाथों में से एक में शंख और दूसरे में चक्र है जबकि बाकी दो हाथ ध्यान की अवस्था में हैं। इनके ललाट पर तीसरे नेत्र के स्थान पर हीरा लगा हुआ है। इनके बायीं ओर नर-नारायण व श्रीदेवी, भूदेवी और दाहिनी ओर उद्धव व कुबेर तथा बद्रीनाथजी की कांसे की उत्सव मूर्तियां और सामने गरुड़ हैं। मंदिर के मुख्य द्वार से कुछ सीढ़ियां पहले शंकराचार्य का मंदिर है। परिक्रमा में भोग मंडी के पास लक्ष्मीजी का मंदिर है तथा हनुमान, गणेश व कर्ण आदि की मूर्तियां हैं।

हिंदू कलेंडर के मुताबिक यहां बद्रीनाथ के दर्शन वैशाख से कार्तिक तक छह माह होते हैं। इस बार मंदिर के कपाट 8 मई को खुलेंगे। जिन दिनों मुख्य मंदिर के कपाट बंद रहते हैं, उन दिनों उत्सव मूर्तियों की ही सेवा पूजा होती है।

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शीतकाल में मौसम खराब होने के कारण मार्गशीर्ष से चैत्र तक छह महीने के लिए बद्रीनाथ मंदिर बंद रहता है, उन दिनों उत्सव मूर्तियों को पालकी में पूर्ण वैभव के साथ बिठाकर पहाड़ी से नीचे यहां से करीब 42 किलोमीटर दूर आदि शंकराचार्य के बद्रिकापीठ, जोशीमठ लाया जाता है। (कुछ लोगों ने बताया कि इस दौरान बद्रीनाथ पांडुकेश्वर में विराजते हैं, जो बद्रीनाथ धाम से करीब 24 किलोमीटर की दूरी पर है)।

यहां एक रिवाज है कि कपाट बंद होने की तिथि के दिन माणा गांव की एक कुंवारी कन्या उसी दिन भेड़ का ऊन निकालकर उसे धोती कातती है और कंबल बुनती है। पूजा अर्चना के बाद यही कंबल घी में भिगोकर बद्री नारायण को ओढ़ाकर सुला दिया जाता है। छह माह बाद कपाट खुलने वाले दिन ज्योति दर्शन के समय कंबल श्रद्धालुओं में बांट दिया जाता है।

हालांकि यह मंदिर उत्तर भारत में है पर यहां की सेवा-अर्चना केरल की नंबूदरी मूल के पंडित करते हैं, इन्हें भृगु ऋषि का वंशज माना जाता है। यहां मुख्य पुजारी को 'रावलजी' कहते हैं। यहां की नित्य सेवा का क्रम वही है जो शंकराचार्यजी ने स्थापित किया था। सबसे बड़ी खासियत यह है कि पूजा-अर्चना का सारा विधान श्रद्धालुओं के समक्ष ही होता है।

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सुबह बद्रीविशाल सुप्रभातम के गान के बीच मंदिर के कपाट खुलते हैं। सबसे पहले बद्रीनारायण भगवान के शरीर पर से चंदन का लेप हटाया जाता है ताकि सवार्ंग दर्शन हो सकें, इसे निमालयन दर्शन कहते हैं।

इसके बाद स्नान कराया जाता है, जो अभिषेक दर्शन कहलाता है। स्नान के बाद सबसे पहले सभी अंगों में चंदन का लेप लगाया जाता है, फिर फूल मालाओं और वस्त्राभूषणों से सुसज्जित किया जाता है, इसे अलंकार दर्शन कहा जाता है। इसके बाद होते हैं आरती दर्शन। यह सब करीब बारह बजे तक चलता है, इसके बाद मंदिर बंद हो जाता है।

दोपहर बाद करीब चार बजे मंदिर फिर खुलता है और रात आठ बजे तक बद्रीनाथ भगवान के दर्शन होते हैं। इस दौरान भी विविध विधि विधान होते हैं गीता, श्रीसूक्त और विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ होता रहता है। शाम को भी एक बार आरती होती है। भोग दिन में दो बार लगता है।

रात्रि में भगवान के शयन से पूर्व रावलजी चंदन लेप को छोड़कर सभी वस्त्राभूषण व श्र्ृंगार उतार देते हैं, चंदन लेप सुबह उतार कर प्रसाद के रूप में श्रद्धालुओं को बांटा जाता है। बाहर से आने वाले श्रद्धालु यहां पूजा-अर्चना के लिए वन-तुलसी की माला, चने की दाल (कच्ची), नारियल और मिश्री लाने की इजाजत है।

नियम यह है कि केदारनाथ के दर्शन करके ही बद्रीनाथ के दर्शन करने जाना चाहिए पर जो श्रद्धालु सीधे बद्रीनाथ जाते हैं, उनके लिए विधान है कि तप्त कुंड में स्नान व पंचशिला के दर्शन करके ही बद्रीनाथजी का दर्शन करें। तप्त कुंड की खासियत यह है कि इससे भाप निकलती नजर आती है क्योंकि सल्फर युक्त इस जल का तापमान सदा 55 डिग्री सेंटीग्रेड रहता है।

बद्रीविशाल के अतिरिक्त चार अन्य बद्री (वृद्ध बद्री, योग-ध्यान बद्री, भविष्य बद्री, आदि बद्री) भी इस क्षेत्र में हैं, जिन्हें मिलाकर पंचबद्री कहा जाता है। इसके अलावा भी इस क्षेत्र में अनेकों तीर्थ स्थल और कुंड हैं।

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                                         बद्रीनाथ को तेल चढ़ाने की सदियों पुरानी प्रक्रिया
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दुनिया में हिन्दुओं के सर्वोच्च तीर्थ के रुप में स्थापित भगवान विष्णु के बैकुण्ठ धाम बद्रीनाथ के ग्रीष्मकालीन पूजा पाठ के दौरान परम्परागत ढंग से भगवान के विग्रह पर तिल का तेल चढ़ा कर उसे स्पर्श कराने और अखण्ड दीपक जलाने के लिए मंदिर के सहायक पुजारी द्वारा तेल के पात्र को पुजारियों के डिम्मर गांव से पूरे विधि विधान से रवानगी के साथ ही भगवान के मंदिर खोलने की प्रक्रिया शुरू हो गई।

उत्तराखण्ड के चमोली जिले के मुख्यालय गोपेश्वर से करीब 90 किलोमीटर दूर दस हजार फीट ऊंचाई पर स्थित बद्रीविशाल मंदिर के कपाट ग्रीष्मकाल में आम तौर पर अप्रैल महीने में खोले जाते हैं लेकिन कपाट खोलने की प्रक्रिया अभी से ही शुरू कर दी जाती है।

परम्पराओं और आस्था के अनुसार भगवान के विग्रह पर पूरे छह महीने तक जिस तेल का स्पर्श कराया जाता है और अखण्ड दीपक जलाया जाता है उसे तैयार करने के लिए उत्तराखण्ड के ही पूर्व टिहरी राज्य के राजघराने की महिलाएं बडी ही पवित्रता से राजमहल के अन्दर ही बने कोल्हू से तिल का तेल निकालती हैं और उसे पूरे विधि विधान के साथ बद्रीनाथ को रवाना किया जाता है।

इस वर्ष के लिए तय किए गए सहायक पुजारी दुर्गाप्रसाद डिमरी ने बताया कि जिस बर्तन में राजमहल की रानियों और अन्य द्वारा तेल निकाल कर रखा जाता है उसे भी बडी पवित्रता से राजमहल तक पहुंचाया जाता है और इसी के साथ मंदिर खोलने की प्रक्रिया भी शुरू हो जाती है।