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Articles By Parashar Gaur On Uttarakhand - पराशर गौर जी के उत्तराखंड पर लेख

Started by एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720, September 19, 2008, 06:42:35 PM

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Parashar Gaur
March 14 at 12:09am

"उलझने "
तुमने बात जो कही वो
दिल को छू गई
सुनके उसको दिल भी रो गया
है आँख रो गई !

भुलाये भूलकर उन्हें
यूँ भी चैन था नही
रह जाता दिल तडफके
जबभी बात आती उनकी कहीं
चेहरा मेरा, दर्द उनका
दुनिया बात ये समझ गई !

देके दर्द तुम तो
छुप गए कहीं। ...
सौगाते बनगई है
वो यादे अब सब सभी
याद मेरी, चेहरा उनका
सोचकर उलझने बद गई !

क्या कहूं मै दर्दे-दिलका
पीके सारे दर्द मौन हूँ
ढलेगी श्याम पर्बतों में जब
बढ़ेगा दर्द और , जानता भी हूँ
दर्द मेरा, आह उनकी
मिलके एक और दर्द हो गई !
@ पराशर गौर

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Parashar Gaur


aaj ek puri kavita aap ke samne hi .. USKR EK MUKHDA pahile yaha pr post kiya thaa .. aanand lijyegaa....

दिलमे शूल सी चुभो गया कोई
रूठ कर हमसे जब गया कोई
प्रीत में दर्द एक नया ...
नया दे गया मीत हम जब कोई !

रात भर जाग कर , जागते रहे
यादो के उलझनों में उनकी उलझे रहे
निगोड़ी चांदनी भी रात भर दिल को जलती रही और हम जलते रहे !
हो गए अकेले थे जब ......
जब हमसे हमरा दिल ले गया कोई !

पीड़ रात की किसी से कह सके न हम
सीके ओंठ अपने उस दर्द को पी गए थे हम
आसमा की ओर टक टकी लगा के देखते रहे
सूनेपन में को ओढ़े मौन को नियती उसको अपनी मानते रहे
हादसा हुआ छल गया . छल गया ....
प्रेम को , प्रेम में जब कोई !

रात आके हम से कह गई
इस दर्द का इलाज है ना कोई
खाली पन का दौर कह गया
दौर एसे जाने कितने है अभी
शुने पन ने दिल को छु लिया
दिलने उसको अपना कह के सह लिया
शब्द हो गये है गूंगे ..
गूंगे दिल ने, दिल से चोट खाई जब कोई !
@ parashar gaur

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Parashar Gaur
March 22 at 9:56am

चुनाऊ २०१४ का --- " जेब पर चेन लगालो " ( उत्तराखंड के बारे में )

जब जब लोक सभा के चुनाउ आते है वो भी मेरी पहाड़ में, तब तब वो चुनाऊ भी किसी भयंकर आपदा से कम नही होते ! अभी हाल में केदार में आई आपदा ने अपने पानी के प्रभाव में किसी को नहीं बक्सा जो भी उसके रास्ते में आया वो उसे अपने साथ बहा कर ली गई , उसने बच्चे , बुड़े स्त्री , पुरुष जानबर तक नही देखा ठीक ऐसी ही २०१४ का ये चुनाओ उस बिपदा से कम नहीं ! राजनैतक पार्टियां अपने अपने मुनाफा नुक्सान को देख कर मेरे पहाड़ के विकास को अन देखी कर कर सी म के सीट पर कैसे बैठा जाए उसके लिए चाहिए पहाड़ और उसके भावनाओं को गिरबी ही क्यों ना रखा जाये उसके लिए चाहिए अपनी ही पार्टी को दागा देकर या उसे गिरा कर कुछ दिनों के लिए उस में बैठ जाए फिर सोचूंगा , किसका बिकास किसकी उन्नती भाड़ में जाये पहांडी जनता !
वो कैसॆ... ? अब देखिय ना अभी अभी एक एसे सीम जिस का पहाड़ से दूर दराज तक का कोइ लेना देना नहीं था उसे हंमारे ऊपर थोप
दिया ! वो भी इस लिए कि उनके डैड ( पिता जी वो भी जब दुत्कार दिए गए तो उनको भी तब पहाड़ याद आया था ) चूँकि वो पहाड़ से थे उनके जात वहाँ से मेल खाते थी सो उनके पुत्र ( जिनका उन्ही के तरह से पहाड़ से कोई लेना देना नहीं था ) क्यूँन कि बहिन जो एक बहुत बड़े राज्य की प्रेसिडेंट थी के कहने और पैसे के रुतबे ( सूना है ) उनको मेरे पहाड़ के राज गधी दे दी ! उस पर बैठते ही जो हुआ वो जनता ने देखा खुद उसकी सरकार ने देखा
क्या नहीं हुआ ! उसके तहत सरकारी तंत्र ने तो आपदा का पैसा भी डकार दिया ! उनका जाना हुआ तो फिरका प्रस्ती सामने आगई बहुगुणा / हरीश रावत/ सतपाल महाराज ( बिना किसी देश राष्ट्र के ) इनके बीच में हम एसे पिसे के जो छठा ही कि हम उनकी जेबे में है !
मेरी आप से बिनती है साथ में आप सब से कहता हूँ आप अपनी अपनी जेब को बंद रखे इनके दावेदारी से दूर रहे ( हाँ आप भी तो स्वार्थी ही ना कोई केसी जुगाड़ में होता तो किसी के कैसे रहोगे खैर ) एक अपील है अगर ये आपको को ये किसी बैंक का वो चेक की तरह से सम्झते है कि जब चाहिए जिस समये चाये भुनले तो कृपया आप बाउन्स हो जाये और पाने जब के चैन को बंद कर दे ताकि ये उस पर संध ना लगा पाये !
आभार पराशर गौर

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Parashar Gaur


" चुप रहो !"

कितनी बार कहा मैंने ,
अपने आप से...
क्यूँ बे-बजह , इस तरह
इन्तजार करता है किसिका !

मेरे मनने मुझ से कहा
"इन्तजार " शब्द का अर्थ समझते हो ?

इसके अंदर जाकर देखो तो
ईश्वरीय आनंद की अनुभूती होती है
एक तड़फ , एक शकुन , एक प्रेम के
जझंझावतों से जूझोगे तो
तब............
कहीं जाकर एहसास होगा
तुम , मै और वो का !

समझो ? वरना चुप रहो ?
जो हो रहा है उसे हो जाने दो !

@ पराशर गौर दिनाक २ मार्च १४ शयम ८. 1 ० पर !

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

बौडीक ऐ जा, बौडिक ऐ हे रे ज़माना ,
February 1, 2014 at 8:59pm

बौडीक ऐ जा, बौडिक  ऐ    हे  रे  ज़माना ,

खुदेणु   छो ,  हे   तेरा बाना

गौरु का  लैंजा वो , बाखरियों की डार

सुबेर  लखाया   बोण जो, ब्याखुनी पैटाया घार

कख  हर्चेनी, किले  हर्चेनी  यन  बतावा ,

बौडीक ऐ जा, बौडिक  ऐ    हे  रे  ज़माना ,

खुदेणु   छो  ,  हे   तेरा बाना

डांडा  की  उकाळी   वो   कुरछाली चमा चम् ,

उद्यारी  का बाठ  वो   धम्पाली  दमा दम ,

पूस का सिंसेर  हो  के   सौण   की  झड़ी ,

छोटी  छे  उम्र पर  हिकमत  छे  बड़ी ,

कख हर्चे, किले  हर्चे, इन  बतावा  ...

बौडीक ऐ जा, बौडिक  ऐ    हे  रे  ज़माना ,

खुदेणु   छो,  हे   तेरा बाना



पकदा   होला   हिंसर, किन्गोड   दगडयों

तिम्लो   की  भी  लगदी  छाटी  होली ,

खाण  वाला कख   हर्चेनी , किले हर्चेनी बतावा



बौडीक ऐ जा, बौडिक  ऐ    हे  रे  ज़माना ,

खुदेणु   छो,  हे   तेरा बाना

इस्कुल  का दगडयो मेरो , फिर धे  लगावा

जोड़ा मंडाण तुम , कौतिग  उरयावा,

कख हर्चे  व होंसिया उमर  जरा बतावा

बौडीक ऐ जा, बौडिक  ऐ    हे  रे  ज़माना ,

खुदेणु   छो  ,  हे   तेरा बाना 

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Parashar Gaur


इरादे !

उस लक्ष्य हेतु जो,
दूर , बहुत दूर था
जिस तक पहुँचने के लिए
हम दोनों निकले थे

पहले समतल ,
फिर उत्तराई , फिर चढ़ाई
रस्ते आड़े तिरछे सकरीले
ये सब ...
हनारे लक्ष्य को नहीं डगमगा पाये थे
जानते हो क्यों ?

उस लक्ष्य को साधने में
मै और तुम साथं साथ थे
दिल से, दिमाग से
तभी तो ओ लक्ष्य पूरा हुआ था
याद है ना !

हाँ याद है चूँकि
हमारे इरादे पके एवं
अडिग थे हिमालय के तरह
तभी तो सम्भह हो पाया ये सब !

कॉपीराइट @ पराशर गौर
४ मार्च रात के ११. १६ म पर

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Parashar Gaur
20 mins

पता नहीं
( भृष्टाचार पर एक व्यंग देखे )

भारत में फैलते भृष्टाचार पर
मै था , हैरान परेशान
मेरे भारत को क्या हो गया है
हे भगवान
क्या करूँ ?
कैसे हो इसका निदान !

युक्ति सूझी -------
लगाया ब्रह्मा का ध्यान

ब्रह्मा प्रकट हुए --- "बोले बत्स
-समझता हूँ मै तेरी उर की पीड़ा
कहो क्या ही तेरा प्रशन
सुन कर करूँ उसका निदान ! "

मैंने कहा पितामह
आप तो अजय -अमर है
है ना -------
वे बोले -- हाँ --हूँ पर क्या करूँ
खैर , तू अपना प्र्शन बोल

मैंने कहा -----
मेरे भारत से ये भ्र् ष्टाचार् कब समाप्त होगा
वो दिन, समय, बार बताएं
सुनकर जिसे मैं और संसार खुश हो जाएगा
ये सुनकर ब्रह्मा , बोले----पता नहीं बत्स
तब तक तो , मै भी मर जाऊंगा !

कॉपीराईट @पराशर गौर
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Parashar Gaur


देखे आज के ( चुनाओ ) संधर्व में

"उमीदवार"

बलात्कारी
हत्यारा
गुंडा
सत्ता में आकर मंत्री बन जाएगा
और बन गया है

उसका तुम ......
कुछ नहीं बिगाड़ पाओगे , क्यों कि वो
दरयोधन की तरह
गांधारी के सामने नंगा हो चुका है ! पराशर


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

Parashar Gaur
4 hrs

क्या हूद कबिता ?

कबिता हुन्द ....
स्वीली की पीड़ा
जू हुन्द , बचा थै , पैदा कन से पैली
जू बचा थै, भैर आणों बाटु बतोद !

कबिता हुन्द
धामी का डौर माँ लगाई कटाक
जैसे पैदा हुन्द नाद ( स्वर)
जू नाचाद घ्वाडा थै अपणी ताल माँ !

कबिता हुन्द
बाल जन जिदेर्ये हिगर
जू हिंगर डाली डाली अपणी बात मनोद
जब बात पूरी हवे जाद त खित हंसाद !

कबिता हुन्द
रुडियुमा बाजै जडियुम को ठंडो पाणी
जू बुझोद तिस्लियु की तीस
जै से निकल्द शब्द " जुगराज राया "!

कबिता हुन्द

धार मागे , कुंगुलू घाम सी
जू एहसाह दिलोद तपन की !

कबिता व हुन्द
जू बनू बच्याण की तमीज सिखांद
समझण अर संझानै बात बतोद
आपसमा प्यार प्रेम की भाषा सिखोंद !

`पराशर गौर
१९ जनबरी २०१०